दिग्घनिकाय में अम्बट्ठ सुत्त का लब्ब-ओ-लुबाब यह है कि अम्बष्ठ नामक एक ब्राह्मण गौतम बुद्ध से मिलने आता है. उसे अपने ब्राह्मण होने का गर्व है. बुद्ध से वह शिकायत करता है, कि उनका शाक्य जन बड़ा ही असभ्य है. क्योंकि एक बार जब वह ब्राह्मण शाक्यों के सभागार में पहुँचा, तो सारे लोग आपस में खूब मजाक और चुहलबाजी कर रहे थे. किसी ने अम्बष्ठा का अभिवादन नहीं किया. अम्बष्ठ के अनुसार ‘क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ब्राह्मणों के सेवक हैं’(यहाँ ब्राह्मण शब्द जातिवादी नहीं है). बुद्ध ने अम्बष्ठ के कुल के बारे में पूछ तो उसने कान्ह(काला) गोत्र का कान्हायन बताया. तब बुद्ध उसे कान्ह की उत्पत्ति की बात बताते हैं. बुद्ध का शाक्य वंश इक्ष्वाकु से उत्पन्न बताया गया है. इक्ष्वाकु की दासी से कान्ह की उत्पत्ति बतायी गयी है. इस आधार पर शाक्यों की कान्हायनों के ऊपर सामाजिक श्रेष्ठता का दावा किया गया है. इसपर बुद्ध ने अम्बष्ठ को उन तमाम तर्कों का सामना कराया जिससे ब्राह्मणों की तुलना में क्षत्रिय श्रेष्ठता साबित होता है. इस स्थान पर बुद्ध ने ब्राह्मण सनत्कुमार के एक प्रसिद्ध कथन को अम्बष्ठ के सामने उद्धृत किया है. कहा,
‘क्षत्रिय वो श्रेष्ट है जो अपनी वंशगत शुद्धता को महत्व देता है. लेकिन देवताओं एवं मनुष्यों में श्रेष्ठ उसे माना जाता है, जो बुद्धि और सदाचार में श्रेष्ठ है’.
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बुद्ध के समय आर्य समुदाय के बीच पहले से चले आ रहे पुर्वग्रह, और विकसित होती हुई नई सोच के बीच के अंतर को प्रदर्शित समझने में यह प्रसंग महत्वपूर्ण है. क्षत्रियों की श्रेष्ठता के दावे के पीछे का कारण हम वंशगत रक्त शुद्धता को पाते है. वहीं ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के दावे का आधार उस समय की यह प्रगतिशील सोच थी कि आर्यों के बीच बुद्धि और सदाचार में श्रेष्ठ होना ही श्रेष्ठता का मानदण्ड है. शाक्यों की उत्पत्ति की कहानी भी वंशगत रक्त शुद्धता को उजागर करता है. कहा गया है कि इक्ष्वाकु की प्रिय रानी के पुत्र को राजा बनाने के लिये इक्ष्वाकु ने अपने अन्य पुत्रों को हिमालय की तराई में निष्कासित कर दिया. शाक(टीक) वन में रहने वाले उन भाइयों ने अपनी रक्त शुद्धता को बचाये रखने के लिये अपनी बहनों से ही संतान उत्पत्ति की. और रक्त शुद्धता के इसी आधार पर शाक्य खुद को श्रेष्ठ मानते थे.
इस कहानी से प्राचीन आर्यों के बीच रक्त शुद्धता के महत्व को समझा जा सकता है. ब्राह्मणवादी पौराणिक ग्रंथों के मुआयना से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन क्षत्रियों की वंशावलियों में सारे विवाह सम्बंध निकट रक्त सम्बंधियों में पाये जाते हैं. दूसरी तरफ धर्मशास्त्रीय ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण, जो कि अधिक आधुनिक माना जा सकता है, के तहत सगोत्रियों में विवाह को वर्जित माना गया है. स्वाभाविक है कि आर्यों के बीच रक्त-शुद्धता को बल देने वाली धारणा को शुरुआत में ब्राह्मणों ने सकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा होगा. सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करने वाले कारणों पर गौर करने से स्पष्ट हो जाता है कि युद्ध-प्रिय कबीलाई युग में सबसे ताकतवर लोग सामाजिक सीढी में सबसे ऊपर स्थित थे. संघर्षपूर्ण जीवन में पिछड़े लोग पौरोहित्य, पशुपालन, या कृषि-कर्म से जुड़ते थे. स्त्रियों की प्राप्ति के लिये होने वाले संघर्ष में कबीले के पिछड़े हुए लोगों को अनार्य औरतों से सम्बध स्थापित करना पड़ता होगा. यही कारण है कि प्राचीनतम ब्राह्मणों की उत्पत्ति और उनके वैवाहिक जीवन को लेकर अलौकिक कथाएँ लिखी गयी हैं. अधिकांश पौराणिक ब्राह्मण चरित्रों को या तो अप्सराओं से उत्पन्न बताया गया, या राजाओं से कन्याएँ उपहार में पाया गया बताया गया. उस युग में कबीले के राजा से किसी पुरोहित का कन्या उपहार में पाना, एक कपोल कल्पना है. पौरणिक ग्रंथों में इसका कई बार उल्लेख आता है कि निर्धन व्यक्ति का विवाह करना कठिन था. इन परिस्थितियों में पुरोहित और तपस्वी समुदाय रक्त-शुद्धता के सिद्धांत का पालन नहीं कर सकता. और इस मजबूरी ने भी वैवाहिक सम्बंधों में गोत्र-वर्जना के सिद्धांत को जन्म देने में अपनी भूमिका निभाई.
अब प्रश्न उठता है, कि आर्य समुदाय के भीतर जो ब्राह्मण रक्त-सम्बंधों समेत अन्य कई सामाजिक सम्बंधों में रक्त-शुद्धता जैसी प्राचीन नस्लीय पुर्वग्रहों का विरोध करता रहा, वही, धीरे धीरे स्वयँ जातिवादी बंधनों का किलेदार कैसे बन गया?
