उदाहरण एक -
द्रोणपर्व 03:02 कहता है, ‘दृष्ट्वा पितामहं भीष्मं
सर्वक्षत्रांतकं गुरुम्, दिवैरस्त्रैर्महेष्वासं पातितं सव्यसाचिना’.
अर्थात्, समस्य क्षत्रियों का अंत करनेवाला गुरु, महाधनुर्धर, पितामह भीष्म
को सव्यसाची अर्जुन ने अपने दिव्यास्त्रों से गिरा दिया.’
उदाहरण दो -
ब्रह्मपुराण 13:67 ‘दिवोदास इति ख्यातः सर्वक्षत्रप्रणाशनः, दिवोदासस्य पुत्रस्तु वीरो राजा प्रतर्दनः’.
अर्थात्, दिवोदास सर्वक्षत्रप्रनाशक के रूप में प्रसिद्ध हुआ. उसका पुत्र वीर प्रतर्दन हुआ'.
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उपरोक्त दो शब्दों, 'सर्वक्षत्रांतक' और 'सर्वक्षत्रप्रणाशक' का अर्थ एक
ही है. भीष्म के लिये 'सर्वक्षत्रांतक' और दिवोदास के लिये
'सर्वक्षत्रप्रनाशक' का प्रयोग हुआ है. लेकिन इसके आधार पर आम धारणा में यह
प्रचार नहीं हुआ कि इन राजाओं ने 'सारे क्षत्रियों' का नाश कर दिया था.
लेकिन, परशुराम के लिये जब कहीं 'सर्वक्षत्रांतक' का इस्तेमाल हुआ, तो इसे
लेकर इतनी सारी कहानियाँ लिखी गयीं कि आज खुद को ब्राह्मण जाति का मानने
वाला हरेक शख्स, और दूसरे लोग भी, इस बात को याद रखते हैं कि परशुराम ने
इक्कीस बार क्षत्रियों का सफाया किया था. क्योंकि पौराणिक साहित्य में इसे
इतनी बार दुहराया गया है, कि किसी को कंठस्थ हो जाये.
इसी को कहते हैं दुस्प्रचार का प्रभाव !
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यही नहीं, मगध के राजा नंद के बारे में भी पुराणों में 'सर्वक्षत्रांतक'
शब्द का उपयोग हुआ है. और इसका तात्पर्य इतिहासकारों ने यह लगाया कि वास्तव
में वह शूद्र था, इसीलिये सारे क्षत्रियों का सफाया कर दिया. और इस प्रकार
का तर्क देने वालों में घोर ब्राह्मणवादी से लेकर वामपंथी इतिहासकार शामिल
हैं. सवाल है कि क्यों हैं? तो दोनों के अपने अपने कारण है. घोर
ब्राह्मणवादी नंद को शूद्र कहते हैं, क्योंकि उनकी धर्मशास्त्रीय निगाह में
बुद्ध और महावीर जैसे प्रज्ञा-पुरुष भी 'शूद्र' ही थे, क्योंकि वो
ब्राह्मणवादी जाति आधारित श्रेष्ठता को स्वीकार नहीं करते थे.
दूसरी
तरफ वामपंथी इतिहासकारों ने नंद को शूद्र मानकर ब्राह्मणवादी जाति आधारित
वर्णव्यवस्था को इसी के मुहावरे में जवाब देकर परास्त करनी चाहते थे. इस
फेर में अगर कोई पराजित होता है, तो वह है इस देश की बौद्धिक-चेतना.
Tuesday, August 4, 2020
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