संदर्भ भागवतपु.11:17:16,,,
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गुप्तकाल के ब्राह्मणों ने जो कहा या लिखा उसमें बेईमानी की मात्रा कम है. बीसवीं शताब्दी के ब्राह्मण अनुवादकों की बेईमानी सभी सीमाओं को तोड़ देता है. और इन्हीं बेईमान जातिगत ब्राह्मणों के नेतृत्व में सनातन आंदोलन चल रहा है.
तो सावधान !
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'शमो दमस्तपः शौचं संतोषः क्षांतिरार्जवम्, मद्भक्तिश्च दया सत्यं ब्रह्मप्रकृतयस्त्विमाः'.
ब्रह्म प्रकृति का अनुवाद ब्राह्मण वर्ण की प्रकृति किया गया है. जाहिर है यहाँ ब्राह्मण शब्द का अर्थ जातिगत नहीं है. लेकिन पंद्रह सौ से अधिक वर्षों में हुए सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव के संदर्भ में इसे स्पष्ट किया जाना चाहिये था. मेरी समझ से ब्रह्मप्रकृति को ब्राह्मण वर्ण की पृकृति बताया जाना अनुचित है.
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अगले श्लोक 17 में क्षत्रप्रकृति के बारे में है जहाँ उसे 'ब्राह्मण्य' होने के तौर पर देखा गया है. 'ब्राह्मण्य' शब्द का अनुवाद 'ब्राह्मण भक्ति' किया गया है. वास्तव में ब्राह्मण्य का अर्थ ब्रह्म-कर्म अर्थात् यज्ञ-कर्म रहा है, जिसके तहत देवताओं को तुष्ट किया जाता है. कालांतर में बेईमानी की एक परम्परा स्थापित हुई जिसके तहत शब्दों के अर्थ अजीबोगरीब घालमेल का शिकार हुए.
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अगले श्लोक 18 में वैश्य को 'ब्रह्मसेवन' होने की बात कही गयी है. और यहाँ भी 'ब्रह्म सेवा' का अनुवाद 'ब्राह्मण सेवा' किया गया है. अनुवाद की यह बेईमानी इससे और अधिक स्पष्ट हो जाता है जब इस के बाद वाले श्लोक 19 में 'शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां' अर्थात् 'द्विज, गाय, और देवताओं की शुश्रूषा' का अलग से उल्लेख किया गया है.
गौर तलब है कि समस्या गुप्त-काल के आसपास रचे गये भागवतपुराण के इस अध्याय के लिखने वाले से नहीं है, इसका आधुनिक अनुवाद करने वाले क्षुद्र-दृष्टि निहित स्वार्थी लोगों से है.
ऐसा अनुवाद सर्वथा निंदनीय है.
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सनातन सांस्कृतिक परिवेष को पारम्परिक तौर पर हम इतना दूषित कर चुके हैं कि ब्रह्म, ब्रह्मण, ब्रह्मन्, पंडित, विप्र, द्विज, जैसे तमाम शब्द आज एक जाति विशेष का पर्याय बना दिया गया है. और ऐसे बेईमानी और धांधली को उजागर करने को धर्मद्रोही, देशद्रोही, वामपंथी, बताने के लिये एक पूरा राजनीतिक परिवेष तैयार खड़ा है.
