Thursday, May 20, 2021

अतीत का युद्ध और कुम्भ की अवधारणा !

 कुंभ की अवधारणा को समुद्र मंथन की कहानी से जोड़ा जाता है, जो एक प्रतीकात्मक कहानी है। इसके पीछे के वास्तविक अर्थ को समझा जाना आवश्यक है। 

कुंभ, यानी घड़ा, का संबंध यज्ञों में तैयार सोमरस के पात्र से है। महाभारत, आदिपर्व 34:,, में गरुड़ द्वारा यज्ञ से सोम कलश लेकर भागने का वर्णन है। इस पूरे वर्णन में 'सोम कलश' का अनुवाद 'अमृत कलश' किया गया है। मुझे लगता है की तथाकथित अमृत कलश की अवधारणा यज्ञ के 'सोम कलश' का ही विकसित रूप है।

इस छीना झपटी से जुड़ी एक और प्राचीन कहानी इंद्र और त्वष्टा के बीच शत्रुता पर आधारित है। यज्ञ-संस्कृति से जुड़े प्राचीन साहित्य में इंद्र द्वारा त्वष्टा का सोम जोर जबरदस्ती पीने का उल्लेख है। हालांकि मुझे लगता है कि सोम की छीना झपटी के पीछे देवताओं एवं असुरों के बीच हिंसक संघर्ष की कहानी छुपी हुई है। इसी संघर्ष के दौरान त्वष्टा के पुत्र वृत्र के इंद्र के हाथों मारे जाने का उल्लेख है। इस दौरान त्वष्टा के और भी पुत्र मारे गए थे। प्रतीकात्मक तौर पर युद्ध को भी यज्ञ कहा गया है। ऐसा लगता है कि देवताओं ने असुरों से उनकी समृद्धि छीन ली थी। सोम कलश प्राचीन यज्ञ में देवताओं को अर्पित की जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण वस्तु थी। बात की कहानियों में इस बात का उल्लेख आता है कि देवताओं ने यज्ञ असुरों से छीना था। इसमें यह संभव है उत्तर दिशा से आने वाले आर्य कबीलों ने उत्तरी पूर्वी ईरान के आर्थिक रूप से संपन्न कबीलों को अपनी युद्धक क्षमता से पराजित किया था। और उसके बाद उत्तरी कबीलों एवं ईरान के असुर संस्कृति वाले कबीलों के बीच शांतिपूर्ण सामंजस्य स्थापित हुआ था। इन्हीं मिश्रित आर्यों का बाद में भारतीय उपमहाद्वीप में आगमन हुआ था। उसी क्रम में उत्तर के कबीलों ने असुर संस्कृति के बहुत सारी धार्मिक कर्मकाण्डीय तौर-तरीकों को अपना लिया था। सामंजस्य स्थापित होने के बावजूद उत्तरी कबीलों के विजेताओं का आर्य समुदाय पर आने वाले समय में दबदबा बना रहा। 

उत्तर से आए हुए कबीलों एवं ईरान के आसुरी कबीलों के बीच सामंजस्य स्थापित होने के बावजूद अतीत की शत्रुता से जुड़ी कहानियां विभिन्न प्रकार के धार्मिक कर्मकांडों में जीवित रहा। सोम कलश की छीना झपटी का संबंध यज्ञ स्थल से जुड़ा है। और प्राचीन काल में रमणीक यज्ञ स्थलों को प्रयाग कहते थे। आर्य समुदाय की भारत में पहुंचने पर सरस्वती नदी का तट जो कुरुक्षेत्र इलाके में था, पवित्र प्रयाग के रूप में हमारे पौराणिक आख्यानों में उल्लिखित है। धीरे धीरे गंगा की उपत्यका में आर्य समुदाय के विस्तार के फलस्वरूप गंगा यमुना दोआब, और फिर आज का गंगा-यमुना संगम क्षेत्र धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो गया। संगम क्षेत्र का विकास करने में मुगल साम्राज्य का बहुत बड़ा हाथ रहा है। संगम क्षेत्र के विकास के पीछे इस स्थान का व्यवसायिक महत्व मूल रूप से रहा है। गौर करना चाहिए हमारे धार्मिक स्थल प्राचीन व्यावसायिक स्थलों से गहराई से जुड़े रहे हैं।

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