Tuesday, February 9, 2021

दैवाधीनं जगत्सर्वं मंत्राधीनश्च देवता: --

 आस्था के केंद्र में धारणा है. यह मानना कि यह करने से, ऐसा करने से, ऐसा होता है; आस्था का निर्माण होता है. ऋचा कहता है कि ब्रह्मा (स्तोत्र, प्रार्थना, प्रशंसा) से इंद्र के बल में वृद्धि होती है, तो यह आस्था है. ऐसा मानना कि छंद का प्रभाव देवताओं को सबल, सामर्थ्यवान, और सक्षम बनाता है, तो यह आस्था है. इसीलिये बौद्धिक चिंतन में देवताओं को छंदज, छंद से जनमा हुआ, कहा गया. देवताओं को सोम रस पसंद है, यह भी आस्था का विषय है. सोम अर्पित करने से देवता शक्तिशाली, ऐश्वर्यशाली होते हैं, यह आस्था का विषय है. इसी आस्था पर आधारित बौद्धिक चिंतन से यह निष्कर्ष निकला कि देवता सोमपा, सोम पायी, है.

आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास के साथ होने वाले बौद्धिक विकास से पुरानी आस्था की जगह नयी आस्था का विकास होता है. ऋकों में मंत्र शब्द नहीं पाया जाता. इससे जाहिर है कि मंत्र का सम्बंध यज्ञ और उससे जुड़े कर्मकाण्ड के विकास से है. यह एक नई प्रकार की आस्था का द्योतक है. यज्ञ में बहुत सारी ऋचाओं का इस्तेमाल मंत्र के तौर पर हुआ है. मंत्र से जुड़ी आस्था यह है कि इससे देवताओं को बाध्य होकर प्रसन्न होना पड़ता है. पूर्व में देवताओं को प्रसन्न करने के लिये स्तुति की जगह बाद में मंत्रों ने ले लिया. स्तुति और प्रार्थना वाली आस्था से मंत्र वाली आस्था में बदलाव मानवीय बुद्धि में विकास का परिणाम था. कर्मकाण्डों से जुड़े लोग अब मंत्रों के माध्यम से देवताओं जो जबरन अपने नियंत्रण में लेने की बात करने लगे. ब्रह्म, ब्रह्मा, ब्रह्माण, ब्रह्माणि जैसी शब्दावलियों का अर्थ ऋक सम्हिता में स्त्रोत्र, प्रार्थना, प्रशंसा बताया गया है. इन्हें कण्ठस्थ रखने और यथोचित इस्तेमाल करने वाले ब्राह्मण कहलाते थे. मंत्रों के युग में ब्राह्मण ऋत्विज ने तमाम तरह के ऋतिजों में प्रमुखता पाई. क्योंकि उसने मंत्र के माध्यम से देवताओं को अपने नियंत्रण में करने का दावा किया था. पौरोहित्य का बौद्धिक विकास का कदम यह रहा, कि ब्राह्मण पुरोहित ने स्वयं को देवताओं से भी ऊपर स्थापित करने का दावा किया. कुछ न सही, तो जनमानस में खुद को देवताओं जैसा सम्मान पाने का हकदार तो बनाया ही ! यह भी आस्था का एक रूप था. इस आस्था के सहारे ब्राह्मणवाद ने लगभग हजार वर्ष तक अपनी यात्रा सफलतापूर्वक जारी रखा है. इस आस्था को हम निम्नोक्त श्लोक में अभिव्यक्त पाते हैं,

'दैवाधीनं जगत्सर्वं मंत्राधीनश्च देवता:, ते मंत्रा:ब्राह्मणाधीना:, तस्मात् ब्राह्मण देवता:'

इस श्लोक को मेरे एक मित्र मनोज मन्मथ जी ने गर्वपूर्वक अपनी दीवाल पर प्रदर्शित किया है. हालाँकि इस प्रकार की आस्था को अभिव्यक्त करता हुआ विशाल साहित्य पौराणिक आख्यानों में उपलब्ध है. लेकिन, वहाँ भी ब्राह्मण शब्द का अर्थ ब्रह्म (स्तोत्र, प्रार्थना) को जानने वाला ही बताया गया है. मगर आज ऐसे श्लोकों का गर्वोन्नत उल्लेख 'गर्व से कहो हम ब्राह्मण हैं' जैसा नारा लगाने वाले लोग करते हैं. इस प्रकार का श्लोक आज आस्था पर आधारित नहीं है, सामुदायिक पहचान को परिभाषित करने के प्रयास पर आधारित है. दुखद यह है कि आस्था और अर्थ से हीन ऐसे प्रयास से ब्राह्मणवाद कलंकित होता है. इसकी जगह पर जातिवादी ब्राह्मणवाद बचा रह जाता है, जो हिंदुओं का धार्मिक नेतृत्व करने का नैतिक अधिकार नहीं रखता.

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