पौराणिक आख्यानों में बहुत सारी कहानियाँ हैं जिसमें वसिष्ठ को इक्ष्वाकु से लेकर राम, और उसके बाद तक, का खानदानी पुरोहित के तौर पर दिखाया गया है. लेकिन इसके साथ ऐसे अनेक प्रसंग यहाँ वहाँ बिखड़े पड़े हैं जिसमें ईक्ष्वाकुओं एवं वसिष्ठ कुल के बीच घोर शत्रुता का उल्लेख है. पौराणिक आख्यानों में जहाँ जहाँ क्षत्रिय विरोधी भावना खुल कर सामने आई है, वहाँ इक्ष्वाकुओं एवं वसिष्ठ कुल के लोगों के बीच वैमनस्य और शत्रुता का उल्लेख किया गया है. इसका कुछ उदाहरन हम देख सकते हैं,
- वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड अध्याय 65 में भी इस कहानी का एक संस्करण है. इसमें भी सौदास द्वारा दो राक्षसों में से एक को मारने का उल्लेख है. सौदास के यज्ञ समापन पर वसिष्ठरूपी राक्षस को ‘पूर्व वैर स्मरण’ होने का उल्लेख है, ‘अथावसाने यज्ञस्य पूर्ववैरमनुस्मरन्, वसिष्ठरूपी राजानमिति होवाच राक्षसः’. तात्पर्य यह है कि यज्ञ करवा रहे वसिष्ठ के मन में पुराने वैर के स्मरण से राक्षस प्रवृत्ति जाग उठी.
-वाल्मीकिरामायण 1:69:27 में इक्ष्वाकु वंश का विवरण में कहा गया है, ’रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्धः पुरुषादकः, कल्माषपादो ह्यभवत्तस्माज्जातस्तु शङ्खणः’. इस श्लोक में कल्माषपाद को ‘पुरुषादक’ (नरभक्षी) कहा गया है.
- विष्णुपुराण 1:01:12 में पराशर को यह कहते उद्धृत किया गया है कि विश्वामित्र द्वारा नियुक्त राक्षसों नें वसिष्ठ के पुत्रों को खा लिया था. इसी बात को नाटकीय बनाकर अनुशासनपर्व 03:03,04, और आदिपर्व 173:08 में लिखा गया कि विश्वामित्र ने क्रोध में ‘तेजस्वी राक्षस’ रच डाले थे. राक्षस की रचना से तात्पर्य विश्वामित्र के सहयोग से मित्रसह का कल्माषपाद हो जाना है. इस कथा में वसिष्ठ के शाप से कल्माशपाद के राक्षस हो जाने का भी उल्लेख है. वायुपुराण 01:175 में सौदास द्वारा वसिष्ठ पुत्र शक्ति के ‘निग्रह’ अर्थात् पराजित करने का उल्लेख है. अतः ‘तेजस्वी राक्षस’ सौदास को विश्वामित्र का सहयोग मिला था.
- आदिपर्व 180 में पराशर द्वारा ‘राक्षस-यज्ञ’ के आयोजन का वर्णन है. विष्णुपुराण 1:01:14 में भी इस राक्षस विनाश के लिये सत्र का उल्लेख है.
- विष्णुपुराण 1:01:14 ‘---, भस्मीभूताश्च शतशस्तस्मिन्सत्रे निशाचराः’, अर्थात् सैकड़ों राक्षसों के मारे जाने का उल्लेख है. निश्चित तौर पर यह अभियान उन विपक्षी आर्य जनों, यथा विश्वामित्र और कल्माशपाद शौदास, के विरुद्ध हुआ. इस हिंसक संघर्ष का वर्णन वामनपुराण 40:22 में भी देखा जा सकता है.
- वायुपुराण 2:26:176 में वसिष्ठ को कल्माषपाद के लिये अश्मक नामक पुत्र उत्पन्न करने का भी उल्लेख है. ब्राह्मण पौराणिकों द्वारा यह बात अपमानजनक संदर्भ में कहा गया है. महाभारत के अनुसार पराशर की माता ने कल्माशपाद को यह शाप दिया था, कि उसकी पत्नी मदयंती वसिष्ठ से संतानोत्पत्ति करेगी, जिससे सूर्यवंशियों का वंश आगे बढेगा. यह शाप धर्मशास्त्रीय युग के बाद की एक गाली है !
- शांतिपर्व 234:30 में कहा गया है, कि मित्रसह ने वसिष्ठ को अपनी पत्नी देकर उसके साथ स्वर्गलोक पाया था. मित्रसह, कल्माषपाद का नकारात्मक विशेषण है. कहने का उद्देश्य यह है राजा को अपनी पत्नी तक पुरोहितों को दान कर देना चाहिये !

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