जातिवादी पुरोहितों ने कृष्ण के चरित्र को एक योद्धा से परिवर्तित कर अपने लिये आदर्श चरित्र कैसे और क्यों गढा ?
इसका उत्तर वैसे तो और भी कई जगह मिल जाते हैं. परन्तु भागवत के ग्यारहवें स्कंध के आरम्भिक कुछ श्लोकों को विशेष तौर पर देखा जा सकता है.
‘कृत्वा दैत्यवधं कृष्णः सरामो यदुभिर्वृतः, भुवः अवतारयत् भारम् जविष्ठं जनयन्कलिम्’
वैसे तो इस श्लोक का सीधा अर्थ है ‘यादवों से आवृत्त बलराम समेत कृष्ण ने दैत्यों को मारकर पृथ्वी का भार हल्का किया, और तुरंत कलियुग को उत्पन्न किया.’
प्रश्न है कि कलियुग को उत्पन्न करने की जल्दबाजी ब्राहमण पुरोहितों को क्यों रही होगी? इसका उत्तर इस में है कि पौराणिक गंथों में विष्णु का कलि अवतार एक ब्राह्मण परिवार में होना बताया गया है. और पुरोहितों को लगता होगा कि शायद ब्राह्मणों के हितों की रक्षा (आर्थिक हितों के अलावा वर्णशंकरता से बचाव भी) जल्द से जल्द विष्णु के कल्कि अवतार द्वारा सम्भव था. याद रहे कि क्षत्रिय चाहे गौतम बुद्ध के रूप में हो कि ययाति के रूप में, पुरोहित वर्ग के लिये हानिकारक ही था. क्योंक बुद्ध ने पुरोहितों के आर्थिक हितों को बड़ी क्षति पहुँचाई थी, और ययाति जैसे चरित्र को जातिवादी लोग वर्णशंकरता के पोषक प्रतीकों के रूप में देखते होन्गेेे..
अगले श्लोक में कहा गया कि कौरव-पाण्डवों के बीच युद्ध के निमित्त कृष्ण ने दोनों ओर से आये हुए राजाओं को मारकर पृथ्वी का भार हर लिया, यानी पृथ्वी को हल्का कर दिया.
उसके बाद तीसरे और चौथे श्लोक में ‘अत्याचारी यदुवंश’ के विनाश का ‘श्रेय’ भी कृष्ण को दिया जाना महत्वपूर्ण है. कृष्ण को यह सोचता हुआ दर्शाया गया कि ‘—अभी तो मैं पृथिवी का भार उतारकर भी नहीं उतरे के समान समझता हूँ, क्योंकि अत्याचारी यादव-कुल तो अभी बना ही हुआ है’. चौथे श्लोक में कृष्ण के मन में प्रतिक्रियावादी पुरोहित इस प्रकार सोचता हुआ पाया जाता है, ‘---- इसलिये बाँसों की बाड़ी में उत्पन्न हुए अग्नि के समान इनमें अंतः कलह उत्पन्न कर मैं शांतिपूर्वक अपने धाम को जाऊँगा’.
जिसे विष्णु का अवतार बताया गया, उसकी सोच के बारे में की गयी परिकल्पना की निम्नता देखिये !
सोचने की बात है कि एक ऐसे युद्ध की कल्पना जिसमें भारत के सारे क्षत्रियों के मारा जाना बताया गया, उसे प्रतिक्रियावादी पुरोहितों के एक वर्ग ने ईश्वर द्वारा पृथ्वी का भार-हरण होना बताया ! यह अपने आप में उस सोच को रेखांकित करता है जिसमें राजन्य की हर क्षति पुरोहित वर्ग के लाभ के रूप में देखा गया. भारतीय समाज में जातिवाद की जहर के प्रभाव की गहराई को इससे बेहतर नहीं समझा जा सकता. जिस समाज में ऐसी सोच को बढावा दिया गया हो वहाँ किसी प्रकार की राष्ट्रीय चेतना का जन्म असम्भव रहा होगा. और यह तो समाज के महज एक हिस्से की सोच को दर्शाता है. बाकी भी जातिवादी सोच की गिरफ्त में उसी प्रकार फंसे रहे.
सोच के पीछे के तर्कशास्त्र को समझने का प्रयास करते हुए हमें सावधान रहना चाहिये कि महाभारत जैसे किसी युद्ध में भारतीय प्रायद्वीप के राजाओं के मारे जाने जैसी कोई घटना घटित नहीं हुई थी. यह एक ऐतिहासिक सच्चाई नहीं है. महाभारत के युद्ध की संकल्पना अपने आप में इतिहास सम्मत नहीं है. अलग अलग युद्ध की कहानियों को आपस में जुड़ने से धीरे धीरे एक महाकाव्य बन गया, वह और बड़ा हुआ.
इसका उत्तर वैसे तो और भी कई जगह मिल जाते हैं. परन्तु भागवत के ग्यारहवें स्कंध के आरम्भिक कुछ श्लोकों को विशेष तौर पर देखा जा सकता है.
‘कृत्वा दैत्यवधं कृष्णः सरामो यदुभिर्वृतः, भुवः अवतारयत् भारम् जविष्ठं जनयन्कलिम्’
वैसे तो इस श्लोक का सीधा अर्थ है ‘यादवों से आवृत्त बलराम समेत कृष्ण ने दैत्यों को मारकर पृथ्वी का भार हल्का किया, और तुरंत कलियुग को उत्पन्न किया.’
प्रश्न है कि कलियुग को उत्पन्न करने की जल्दबाजी ब्राहमण पुरोहितों को क्यों रही होगी? इसका उत्तर इस में है कि पौराणिक गंथों में विष्णु का कलि अवतार एक ब्राह्मण परिवार में होना बताया गया है. और पुरोहितों को लगता होगा कि शायद ब्राह्मणों के हितों की रक्षा (आर्थिक हितों के अलावा वर्णशंकरता से बचाव भी) जल्द से जल्द विष्णु के कल्कि अवतार द्वारा सम्भव था. याद रहे कि क्षत्रिय चाहे गौतम बुद्ध के रूप में हो कि ययाति के रूप में, पुरोहित वर्ग के लिये हानिकारक ही था. क्योंक बुद्ध ने पुरोहितों के आर्थिक हितों को बड़ी क्षति पहुँचाई थी, और ययाति जैसे चरित्र को जातिवादी लोग वर्णशंकरता के पोषक प्रतीकों के रूप में देखते होन्गेेे..
अगले श्लोक में कहा गया कि कौरव-पाण्डवों के बीच युद्ध के निमित्त कृष्ण ने दोनों ओर से आये हुए राजाओं को मारकर पृथ्वी का भार हर लिया, यानी पृथ्वी को हल्का कर दिया.
उसके बाद तीसरे और चौथे श्लोक में ‘अत्याचारी यदुवंश’ के विनाश का ‘श्रेय’ भी कृष्ण को दिया जाना महत्वपूर्ण है. कृष्ण को यह सोचता हुआ दर्शाया गया कि ‘—अभी तो मैं पृथिवी का भार उतारकर भी नहीं उतरे के समान समझता हूँ, क्योंकि अत्याचारी यादव-कुल तो अभी बना ही हुआ है’. चौथे श्लोक में कृष्ण के मन में प्रतिक्रियावादी पुरोहित इस प्रकार सोचता हुआ पाया जाता है, ‘---- इसलिये बाँसों की बाड़ी में उत्पन्न हुए अग्नि के समान इनमें अंतः कलह उत्पन्न कर मैं शांतिपूर्वक अपने धाम को जाऊँगा’.
जिसे विष्णु का अवतार बताया गया, उसकी सोच के बारे में की गयी परिकल्पना की निम्नता देखिये !
सोचने की बात है कि एक ऐसे युद्ध की कल्पना जिसमें भारत के सारे क्षत्रियों के मारा जाना बताया गया, उसे प्रतिक्रियावादी पुरोहितों के एक वर्ग ने ईश्वर द्वारा पृथ्वी का भार-हरण होना बताया ! यह अपने आप में उस सोच को रेखांकित करता है जिसमें राजन्य की हर क्षति पुरोहित वर्ग के लाभ के रूप में देखा गया. भारतीय समाज में जातिवाद की जहर के प्रभाव की गहराई को इससे बेहतर नहीं समझा जा सकता. जिस समाज में ऐसी सोच को बढावा दिया गया हो वहाँ किसी प्रकार की राष्ट्रीय चेतना का जन्म असम्भव रहा होगा. और यह तो समाज के महज एक हिस्से की सोच को दर्शाता है. बाकी भी जातिवादी सोच की गिरफ्त में उसी प्रकार फंसे रहे.
सोच के पीछे के तर्कशास्त्र को समझने का प्रयास करते हुए हमें सावधान रहना चाहिये कि महाभारत जैसे किसी युद्ध में भारतीय प्रायद्वीप के राजाओं के मारे जाने जैसी कोई घटना घटित नहीं हुई थी. यह एक ऐतिहासिक सच्चाई नहीं है. महाभारत के युद्ध की संकल्पना अपने आप में इतिहास सम्मत नहीं है. अलग अलग युद्ध की कहानियों को आपस में जुड़ने से धीरे धीरे एक महाकाव्य बन गया, वह और बड़ा हुआ.

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