भागवतपुराण 09:06:01 के अनुसार
‘रथीतरस्याप्रजस्य भार्यायां तन्तवेऽर्थितः,
अङ्गिरा जनयामास ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान्’
अर्थात्त, ‘अम्बरीष के तीन पुत्र थे- विरूप, केतुमान, और शम्भु. विरूप से पृषदश्व, और उसका पुत्र रथीतर हुए. रथीतर संतानहीन था. वंश परम्परा की रक्षा के लिये उसने अंगिरा ऋषि से प्रार्थना की. उन्होंने उसकी पत्नी से ब्रह्मतेज से सम्पन्न कई पुत्र उत्पन्न किये. ये ही रथीतर-वंशीयों के प्रवर कहलाये. क्योंकि ये क्षत्रोपेत ब्राह्मण थे- क्षत्रिय और दोनों गोत्रों से इनका सम्बंध था.’ (गीताप्रेस का अनुवाद)
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विष्णुपुराण 4:02:10 में अम्बरीष के पुत्र वीरूप, और उसके पुत्र रथीतर के वंशज के बारे में कहता है ‘अत्रायं श्लोकः- एते क्षत्रप्रसूता वै पुनश्चाङिरसाः स्मृताः. रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः’. अर्थात्, ‘यह श्लोक है कि ये (रथीतर) क्षत्रिय संतान होते हुए भी आंगिरस कहलाये. अतः वे क्षत्रोपेत ब्राह्मण हुए’.
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वायुपुराण 88:06 कहता है ‘अबरीषस्तु नाभागिर्विरूपस्तस्य च आत्मजः, पृषदश्वो विरूपस्य तस्य पुत्रो रथीतरः’.
अगला श्लोक, ‘एते क्षत्रप्रसूता वै पुनश्चाङिरसः स्मृताः, रथीतराणां प्रवराः क्षात्रोपेता द्विजातयः’
यहाँ भी अर्थ वही है कि ‘ये क्षत्रिय उत्पन्न हुए, लेकिन अंङिरस हो गये. रथीतर की संतति क्षत्रिय समान द्विज थे.
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ऐसा ही भरत के गोद लिये हुए, बृहस्पति द्वारा अपनी भाभी ममता के बलात्कार से उत्पन्न बालक, वितथ को लेकर भी किया गया है. वितथ ही भरद्वाज है, इसे छुपाने के लिये भरद्वाज से भरत की पत्नियों का यौन सम्बंध करवाने का जघण्य कार्य ऐसे पुरोहितों ने किया है ! और मजे की बात कि यहाँ भी ‘क्षत्रोपेत’ शब्द नहीं पाया जाता. ‘क्षत्र + अपेत’ की संधि प्पर आधारित इस शब्द का अर्थ इनमें शामिल दो हिस्सों से स्पष्ट है. क्षत्र से जो बाहर निकल गया, उसे क्षत्रोपेत कहा गया. ‘संस्कृत कोश समुच्चय’ में ‘अपेत’ का अर्थ escaped (निकला हुआ), departed, gone, having retired from (निवृत्त), free from, lost(खो चुका), gone away(जा चुका), fled (भागा हुआ) आदि है.
अब यह पूछ जाना चाहिये कि क्या पौराणिक ग्रंथों में जिस जिस जगह पुरोहितों ने राजाओं की स्त्रियों से सन्तानोत्पत्ति का उटपटांग दावा किया है, क्या उन सभी जगहों पर ‘क्षत्रोपेत’ धरपुरा का इस्तेमाल किया है ?
नहीं किया है ! इक्ष्वाकु वंशी दशरथ की पत्नियों के माध्यम, या विचित्रवीर्य की पत्नियों के माध्यम से संतान के लिये ‘क्षत्रोपेत’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है. यही नहीं वसिष्ठ को कल्माशपाद की पत्नी से संतान उत्पन्न करने का उल्लेख है, मगर ‘क्षत्रोपेत’ शब्द वहाँ नहीं है. ऐसी तमाम जगहों पर क्षत्रोपेत का प्रयोग नहीं होना कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि क्षत्रोपेत शब्द का वह अर्थ है ही नहीं जो भागवतपुराण जैसे नये रचे गये पुराणों में दिखाने का प्रयास हुआ है. यह पुरोहित वर्ग का धांधली है ! यह पुरोहीत वर्ग का क्षत्रियों के प्रति प्रतिशोध है ! उनसे रक्त-सम्बंध विच्छेद की घोषणा है ! समाज में आर्थिक दृष्टि से पिछड़ जाने की कुंठा है !
विष्णुपुराण, वायुपुराण पढने के बाद जब कोई भागवतपुराण को पढता है तो उसे आभास हो जाता कि समय के साथ पुराण लेखन संकलन से जिड़े पुरोहितों ने अतीत के साथ किस प्रकार का बलात्कार किया है. समाज में सर्वोच्च धार्मिक मान्यता पाने के लिये कैसे कैसे ऊल-जुलूल कपोल-कल्पित तथाकथित अलौकिक कहानियाँ रची. क्षत्रियों के संदर्भ में अतीत का चित्रण अपमानजनक तोड़-मरोड़ के साथ प्रस्तुत करते समय उन्होंने यह नहीं सोचा कि वो अपने अतीत के तथ्यों को भी मिटा रहे हैं ! आर्थिक कारणों से उपजे वर्गीय विभाजन को नस्ली मानकर पुरोहितों को बाकी सभी वर्णों का पिता बताने के लिये झूठ का जो पुलिंदा लिखा उसमें बची-खुची बौद्धिकता भी लुप्त हो गयी.
उपरोक्त उदाहरण महज अपवाद नहीं है, बल्कि समय के साथ नये पौराणिक ग्रंथ लेखन का यही ढर्रा रहा. यही कारण है कि जातिवादी ब्राह्मणवाद से पीड़ित पुरोहित वर्ग पुराने पौराणिक ग्रंथों के उद्धरणों की जगह अपेक्षाकृत नये पुराणों का हवाला देते हैं. बौद्धिक कचड़े में सना हुआ ऐसे संकलन भारतीय समाज के सम्मानित ग्रंथ हैं !
‘रथीतरस्याप्रजस्य भार्यायां तन्तवेऽर्थितः,
अङ्गिरा जनयामास ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान्’
अर्थात्त, ‘अम्बरीष के तीन पुत्र थे- विरूप, केतुमान, और शम्भु. विरूप से पृषदश्व, और उसका पुत्र रथीतर हुए. रथीतर संतानहीन था. वंश परम्परा की रक्षा के लिये उसने अंगिरा ऋषि से प्रार्थना की. उन्होंने उसकी पत्नी से ब्रह्मतेज से सम्पन्न कई पुत्र उत्पन्न किये. ये ही रथीतर-वंशीयों के प्रवर कहलाये. क्योंकि ये क्षत्रोपेत ब्राह्मण थे- क्षत्रिय और दोनों गोत्रों से इनका सम्बंध था.’ (गीताप्रेस का अनुवाद)
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विष्णुपुराण 4:02:10 में अम्बरीष के पुत्र वीरूप, और उसके पुत्र रथीतर के वंशज के बारे में कहता है ‘अत्रायं श्लोकः- एते क्षत्रप्रसूता वै पुनश्चाङिरसाः स्मृताः. रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः’. अर्थात्, ‘यह श्लोक है कि ये (रथीतर) क्षत्रिय संतान होते हुए भी आंगिरस कहलाये. अतः वे क्षत्रोपेत ब्राह्मण हुए’.
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वायुपुराण 88:06 कहता है ‘अबरीषस्तु नाभागिर्विरूपस्तस्य च आत्मजः, पृषदश्वो विरूपस्य तस्य पुत्रो रथीतरः’.
अगला श्लोक, ‘एते क्षत्रप्रसूता वै पुनश्चाङिरसः स्मृताः, रथीतराणां प्रवराः क्षात्रोपेता द्विजातयः’
यहाँ भी अर्थ वही है कि ‘ये क्षत्रिय उत्पन्न हुए, लेकिन अंङिरस हो गये. रथीतर की संतति क्षत्रिय समान द्विज थे.
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ऐसा ही भरत के गोद लिये हुए, बृहस्पति द्वारा अपनी भाभी ममता के बलात्कार से उत्पन्न बालक, वितथ को लेकर भी किया गया है. वितथ ही भरद्वाज है, इसे छुपाने के लिये भरद्वाज से भरत की पत्नियों का यौन सम्बंध करवाने का जघण्य कार्य ऐसे पुरोहितों ने किया है ! और मजे की बात कि यहाँ भी ‘क्षत्रोपेत’ शब्द नहीं पाया जाता. ‘क्षत्र + अपेत’ की संधि प्पर आधारित इस शब्द का अर्थ इनमें शामिल दो हिस्सों से स्पष्ट है. क्षत्र से जो बाहर निकल गया, उसे क्षत्रोपेत कहा गया. ‘संस्कृत कोश समुच्चय’ में ‘अपेत’ का अर्थ escaped (निकला हुआ), departed, gone, having retired from (निवृत्त), free from, lost(खो चुका), gone away(जा चुका), fled (भागा हुआ) आदि है.
अब यह पूछ जाना चाहिये कि क्या पौराणिक ग्रंथों में जिस जिस जगह पुरोहितों ने राजाओं की स्त्रियों से सन्तानोत्पत्ति का उटपटांग दावा किया है, क्या उन सभी जगहों पर ‘क्षत्रोपेत’ धरपुरा का इस्तेमाल किया है ?
नहीं किया है ! इक्ष्वाकु वंशी दशरथ की पत्नियों के माध्यम, या विचित्रवीर्य की पत्नियों के माध्यम से संतान के लिये ‘क्षत्रोपेत’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है. यही नहीं वसिष्ठ को कल्माशपाद की पत्नी से संतान उत्पन्न करने का उल्लेख है, मगर ‘क्षत्रोपेत’ शब्द वहाँ नहीं है. ऐसी तमाम जगहों पर क्षत्रोपेत का प्रयोग नहीं होना कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि क्षत्रोपेत शब्द का वह अर्थ है ही नहीं जो भागवतपुराण जैसे नये रचे गये पुराणों में दिखाने का प्रयास हुआ है. यह पुरोहित वर्ग का धांधली है ! यह पुरोहीत वर्ग का क्षत्रियों के प्रति प्रतिशोध है ! उनसे रक्त-सम्बंध विच्छेद की घोषणा है ! समाज में आर्थिक दृष्टि से पिछड़ जाने की कुंठा है !
विष्णुपुराण, वायुपुराण पढने के बाद जब कोई भागवतपुराण को पढता है तो उसे आभास हो जाता कि समय के साथ पुराण लेखन संकलन से जिड़े पुरोहितों ने अतीत के साथ किस प्रकार का बलात्कार किया है. समाज में सर्वोच्च धार्मिक मान्यता पाने के लिये कैसे कैसे ऊल-जुलूल कपोल-कल्पित तथाकथित अलौकिक कहानियाँ रची. क्षत्रियों के संदर्भ में अतीत का चित्रण अपमानजनक तोड़-मरोड़ के साथ प्रस्तुत करते समय उन्होंने यह नहीं सोचा कि वो अपने अतीत के तथ्यों को भी मिटा रहे हैं ! आर्थिक कारणों से उपजे वर्गीय विभाजन को नस्ली मानकर पुरोहितों को बाकी सभी वर्णों का पिता बताने के लिये झूठ का जो पुलिंदा लिखा उसमें बची-खुची बौद्धिकता भी लुप्त हो गयी.
उपरोक्त उदाहरण महज अपवाद नहीं है, बल्कि समय के साथ नये पौराणिक ग्रंथ लेखन का यही ढर्रा रहा. यही कारण है कि जातिवादी ब्राह्मणवाद से पीड़ित पुरोहित वर्ग पुराने पौराणिक ग्रंथों के उद्धरणों की जगह अपेक्षाकृत नये पुराणों का हवाला देते हैं. बौद्धिक कचड़े में सना हुआ ऐसे संकलन भारतीय समाज के सम्मानित ग्रंथ हैं !

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