Saturday, July 18, 2020

आर्य समुदाय का निर्माण


ऋकों के युग में जो समुदाय खुद को आर्य कहता था, वह अनेक छोटे छोते समुदायों के सम्मिलन से बना था. शोध के आधार पर यह निष्कर्ष स्वीकार किया जा सकता है कि भारत में पहुँचे ऋग्वैदिक समुदाय का निर्माण उत्तर-पूर्व ईरान और उत्तरी अफगानिस्तान के इलाके में हुआ था. इसी इलाके में मित्र और वरुण पूजकों, जो खुद को असुर कहते थे, का उस इलाके में उत्तर से आये इंद्र पूजक उन आर्यों से सम्बंध स्थापित हुआ. उत्तर से आये इंद्र-पूजक आर्यों ने असुर संस्कृति के लोगों को दास कहा. ऋग्वेदिक जमाने में भी हम कई दास नामांत, जैसे सुदास, दिवोदास, महत्वपूर्ण आर्य राजा का नाम ऋचाओं में पाते हैं. अवेस्ता में वर्णित ईरानी धर्म में अहुर-माज्दा में असुर शब्द इस बात का समर्थन करता है. अवेस्ता में देव एक नकारात्मक शब्द है. यह मिथ्र और वरुण पूजन वाले संस्कृति पर बाहर से आये बर्बर असभ्य देवों का द्योतक है. अतः हमें आज के ईरान अफगानिस्तान की उत्तरी सीमा के इलाके में असुर और देव संस्कृति के बीच संघर्ष और तत्पश्चात्त सह-अस्तित्व के विकास की भूमि की पहचान होती है. उत्तर पूर्वी ईरानी असुर संस्कृति वाले लोगों के दक्षिण दैत्यों एवं दानवों की स्थित हो सकती है. ऋचाओं के रचयिताओं का उनके जन के परिप्रेक्ष्य एक वृहत विश्लेषण पर आधारित विदेशी भारतविदों के शोध से इस तथ्य को उद्घाटिक किया गया है. 
सप्तसिंधु में पहुँचने वाले जन उसी उत्तर-पूर्वी ईरान से पहुँचे थे. इंद्रपूजक जन को अगर सूर्यवंशी जनों से जोड़ा जा सकता है, तो असुर मूल के जनों को चंद्रवंशी या सोमवंशी के रूप में पहचाना जा सकता है. यहाँ ऋग्वेदिक आर्यों में बहुसंख्य चंद्रवंशी जन से जुड़े लोग ही थे. ऋचाओं से स्पष्ट हो जाता है कि देवताओं में इंद्र को सर्वोच्च महत्व के साथ स्वीकार किया गया था. आर्य जनों के बीच आपसी संघर्ष एक आम बात थी. इन जनों के बीच अन्य आर्य जनों के विरुद्ध गठबंधन उस युग की पहचान थी. एक आर्य जन या जनों का गठबंधन दूसरे अनार्य जनों का सहयोग लेने से परहेज नहीं करते थे. दाशराज्ञ युद्ध जैसी घटनाओं के माध्यम से ही आर्य जन शनैः शनैः भारतीय भूमि में पूरब और दक्षिण की ओर बढते रहे. ऋग्वेदिक आर्यों का सामाजिक संगठन में कार्य-आधारित वर्ण की अवधारणा विकसित हुई. ऋचाओं के रचनाकार जनों के महत्वपूर्ण लोग थे. वो योद्धा थे. सारे ऋषियों का सम्बंध जनों के राजा से जोड़ा जा सकता है. आर्थिक हितों में तेजी से उत्पन्न दूरी ने आर्यों के सामाजिक समरसता को प्रभावित किया. और राजन्य(क्षत्रिय) बनाम पुरोहित का विभाजन दिखने लगा. हारे हुए स्थानीय जनों को शूद्र के तौर पर सामाजिक ढांचे में समाहन मिला. धीरे धीरे क्षत्रिय और पुरोहित वर्ग से खिसककर लोग वैश्य कर्म में युकत हुए.
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि भारत में क्षत्रिय और पुरोहित वर्ग में अधिकांश असुर-कुल या मित्र-वरुण कुल के लोग ही पाये जाते हैं. प्राचीन इंद्र-पूजक आर्यों की संख्या निश्चय ही काफी सीमित दीखी ताती. यह बात पौराणिक ग्रंथों में राजवंशों के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है.       
इसके साथ यह भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आर्यों की ईरानी अतीत के समय सिंधु सभ्यता वाले लोगों से सम्पर्क रहा था. सिंधु सभ्यता का प्रभाव विस्तार भारत में हरियाना से लेकर अफगानिस्तान तक पाया जाता है. चौदहवीं पंद्रहवीं शताब्दी ईसापूर्व आर्य भारत की ओर बढे तब सिंधू सभ्यता का उत्कर्ष बीत चुका था, लेकिन उसके अवशेषों के साथ आर्यों का सामना अवश्य हुआ होगा. ऋचाओं एवं तत्पश्चात यजुषों की यज्ञ संस्कृति में अगले कुछ सौ वर्षों में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है. ऋचाओं के सात आठ सौ वर्ष बाद की जाति आधारिक ब्राह्मण संस्कृति के निम्न संस्करणों में स्थानीय धार्मिक तत्वों की भरमार नजर आती है. इस समय तक आर्यों का आर्य-पूर्व भारतीय लोगों के साथ निकटवर्तीए सम्बंध स्थापित हो चुका था. 

No comments: