Sunday, July 19, 2020

प्राचीन इंद्र-पूजा बनाम नया कृष्ण-पूजा

(विष्णुपुराण 5:10:,,,,)
व्रजमण्डल में निर्मल आकाश और नक्षत्रों से भरे
शरत्काल आने पर कृष्ण ने समस्त व्रजवासियों को इंद्र का उत्सव मनाने की तैयारी करते देखा. कृष्ण ने उन गोपों को उत्सव के उमंग में देख कौतुल वश अप्पने बूढे-बुजुर्ग से पूछा, 'आपलोग जिसके लिये इतने प्रसन्न है वह इंद्र-यज्ञ क्या है?'
'मेघ और जल का स्वामी देवराज इंद्र है. उसकी प्रेरणा से मेघगण जलरूप रस की वर्षा करते हैं. हम और अन्य समस्त देहधारी उस वर्षा से उत्पन्न अन्न पर निर्भर हैं. अतः उस अन्न से हम देवताओं को तर्पित करते हैं. उस वर्षा से बढी हुई घास से ही तृप्त होकर ये गौवें तुष्ट और पुष्ट होकर वत्सवती एवं दुधारू होती हैं. जहाँ भूमि पर बरसने वाले मेघ दिखायी देते हैं उसपर कभी फसल और घास का अभाव नहीं होता, और लोग भूखे नहीं रहते. यह पर्जन्यदेव पृथ्वी के जल को सूर्यकिरणों द्वारा खींचकर सम्पूर्ण प्राणियों की वृद्धि के लिये उसे मेघों द्वारा पृथ्वी पर बरसाता है. इसीलिये, वर्षा ऋतु में सभी राजा, हमलोग और अन्य मनुष्य यज्ञ द्वारा इंद्र की अर्चना करते हैं.'
इंद्रपूजा के बारे में नंदगोप से यह सुनकर दामोदर ने इंद्र को नाराज करने के लिये कहा, -------  'जो व्यक्ति जिस विद्या से युक्त है उसका वही इष्ट-देवता है, वही पूजा-अर्चना के योग्य है, और वही परम उपकारी है. जो व्यक्ति एक से फल लाभ कर अन्य की पूजा करता है उसका इहलोक अथवा परलोक में कहीं भी शुभ नहीं होता. खेतों के अंत में सीमा है. सीमा के अंत में वन है. और वनों के अंत में समस्त पर्वत है. वे पर्वत ही हमारी परमगति हैं. हमलोग न तो किवाड़ और दीवार के अंदर रहने वाले हैं, और न ही निश्चित घर अथवा ख्त वाले किसान ही हैं. हमलोग तो घुमक्कर लोग हैं.'     
'सुना जाता है कि इस वन के पर्वतगण इच्छानुसार रूप धारण करने वाले हैं. वे मनोवांछित रूप धारन क्कर शिखरों पर विहार करते हैं. जब कोई वनवासी गिरिदेवों को किसी तरह की बाधा पहुँचाते हैं तो वे सिंह आदि का वेश बनाकर उन्हें मार डालते हैं. अतः आज से गिरियज्ञ अथवा गोयज्ञ का प्रचार हो. हमें इंद्र से क्या प्रयोजन ? हमारे देवता तो गौवें और पर्वत ही हैं. ब्राह्मणलोग मंत्र-यज्ञ, तथा कृषकगण सीरयज्ञ (हलयज्ञ) करते हैं. अतः पर्वत और वनों में रहने वाले हमलोगों को गिरियज्ञ और गौयज्ञ करना चाहिये.'
'अतः आप लोग विधिप्पूर्वक मेध्य पशुओं की बलि देकर विविध सामग्रियों से गोवर्द्धन शैल(पर्वत या पहाड़) की पूजा करें. आज सम्पूर्ण व्रज का दूध एकत्र कर लो और उससे ब्राह्मणों तथा अन्य याचकों को भोजन कराओ. इस विषय में और अधिक सोच-विचार मत करो. गोवर्धन की पूजा, होम और ब्राह्मण-भोजन समाप्त होनेपर शरद-ऋतु के पुष्पों से सजे हुए मस्तकवाली गौएँ गिरिराज की प्रदक्षिणा करें. हे गोपगण ! आपलोग यदि प्रीतिपूर्वक मेरी इस सम्मति के अनुसार कार्य करेंगे तो इससे गौओं को, गिरिराज को और मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी.' 
कृष्ण की बात सुनकर नंद आदि व्रजवासी गोपों ने प्रसन्नता से खिले हुए मुख से 'साधु, साधु' कहा, और बोले, 'हे वत्स ! तुमने अपना जो विचार प्रकट किया है वह बड़ा ही सुंदर है. हम सब ऐसा ही करेंगे. आज से गिरियज्ञ का प्रचार किया जाये.' 
तदनतर उन व्रजवासियों ने गिरियज्ञ का अनुष्ठान किया तथा दहि, खीर, और मांस आदि से पर्वतराज को बलि दी. सैकड़ों, हजारों ब्राह्मणों को भोजन करा, तथा पुष्पार्चित गौओं और सजल जलधर के समान अत्यंत गर्जनेवाले साँड़ों ने गोवर्धन की परिक्रमा की. उस समय कृष्ण ने पर्वत के शिखर पर अन्य रूप में प्रकट होकर यह दिखलाते हुए कि वो मूर्तिमान गिरिराज हैं, उन गोपश्रेषों के चढाये हुए विविध व्यंजनों को ग्रहण किया. 
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यह कहानी ब्राह्मणवाद के विकास में एक निहायत ही महत्वपूर्ण प्रक्रिया पर प्रकाश डालता है. इसमें देखा जा सकता है कि कैसे पुरोहितों के एक वर्ग ने सामाजिक विकास के साथ अपने हितों को सुरक्षित करने की कोशिश की. इस कहानी में ऐसी तमाम सूचनाएँ है जिसके माध्यम से हमें उस युग के बारे में पता चलता है जब सुसभ्य आर्य सामाजिक परिवेश से बाहर बसने वाले पशुचारियों को उनके धार्मिक सांंस्कृतिक तत्वों को मुख्यधारा में शामिल करते हुए नये धार्मिक कर्मकाण्डों को जनम दिया गया. वास्तव में यह एक क्लिष्ट प्रक्रिया की ओर इशारा करता है. इसमें कई प्रकार की सम्भावनाएं आपस में क्रियाशील देखी जा सकती है. एक तो यह कि पुरोहितों में ऐसे लोग भी थे जो यज्ञ संस्कृति से अलग अपने लिये सामाजिक सम्मान तलाश रहे थे. पौराणिक लेखन के युग में यज्ञ समाज के उच्च वर्ग से जुड़ी चीज थी. साधारण पुरोहितों के जीवन यापन के लिये लोकप्रिय धार्मिक अनुष्ठानोंंका आश्रय लेना जरूरी हो गया था. पुरोहित वर्ग में अवहेलित, शास्त्रों के कम जानकार पुरोहितों ने समाज के पशुचारी, कृषक, वनिक आदि समुदायों में अपनी पैठ बनाने के लिये उनके अनुकूल धार्मिक अनुष्ठानों  को प्रोत्साहित किया. 
यह भी सम्भव है कि जिन पुरोहितों को आर्य कबीलों के बीच अतीत की शत्रुता में उनके जन, कुल, परिवार के पराजय से जुड़ी कहानियाँ परेशान करती होंगी, जिसे विजेता जनों, कुलों, परिवारों, क्षात्र-बल से उन्हें अपने अधीन किये रहे थे, के विरुद्ध प्रतिक्रिया रही होगी. और ऐसे पुरोहितों ने क्षत्रियों के सबसे महत्वपूर्ण देवता को साहित्य में नीचा दिखाने से उन्हें आत्मिक तुष्टि मिलती होगी. और इसी क्रम में ऐसे पुरोहितों ने ऋचाओं के देवताओं की जगह नये देवताओंं को प्रचलित प्रचारित किया.              

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