Thursday, May 7, 2020

जीवन, समय, और कर्मकांंड

आज हम व्यक्तिगत या सार्वजनिक तौर पर जो कुछ भी करते हैं, वह प्राचीन विकासक्रम में कभी न कभी किसी न किसी अनुष्ठान का हिस्सा रहा है. जीवन की दिनचर्या में सहज होकर चीजें अलौकिक से लौकिक या सांसारिक हो जाती हैं. यहीं अलौकिक से लौकिक का विकासक्रम रहा है. आज हम किसी भोज का आयोजन करते हैं तो उससे जुड़ी तैयारी में जाने कितनी ही कड़ियाँ होती हैं, जो अलग अलग प्रकार के समुदायों में अलग अलग प्रकार से अंजाम दी जाती हैं. आजकल बड़े शहरों में आयोजन का सारा दायित्व विशेषज्ञता प्राप्त व्यावसायिक संस्था पर होता है. पहले ऐसे आयोजन समुदायों के भीतर आपसी सहयोग से होता था. आयोजन की रूपरेखा, आवश्यक सामान का जुगाड़, आमंत्रित लोगों के रहने खाने की व्यवस्था, अलग अलग प्रकार आमंत्रितों की अलग अलग व्यवस्था, लोगों को निमंत्रित करना, सब समुदाय के भीतर कार्यविभाजित तरीके से होता था. हर कार्य के लिये अलग प्रकार के लोग हुआ करते थे. लोगों का जीवन प्रकृति से निकट था, आयोजन के समय निर्धारण में भी प्राकृतिक घटनाओं की बड़ी भूमिका थी. आसपास उपलब्ध संसाधन अनुष्ठान आयोजन में प्रयुक्त चीजों को प्रभावित करते थे.   
अनुष्ठानों के इस आयोजन को हम जैसे जैसे समय में पीछे की ओर ले जाते हैं, एक स्तर पर चीजें अगर सहज होती नजर आती हैं, तो दूसरे स्तर पर क्लिष्टता के अलग प्रकार हमारे सामने प्रकट होते हैं. आज जो चीजें बिल्कुल लौकिक महत्व की हैं, आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व उनके साथ गहन कर्मकाण्ड जुड़े थे. मसलन, यज्ञ के लिये खरही काटना होता था, तो उसके साथ भी एक कर्मकाण्ड जुड़ा था. उसके लिये शुभ दिन, मुहूर्त, उसे काटने के लिये किसी सौभाग्यशाली व्यक्ति, कुछ मंत्र, कुछ तौर तरीके की जरूरत होती थी. लोग जब पंक्ति में बैठकर खाते, तो भोजन शुरु करने का कर्मकाण्ड होता था. कौन सी चीज पहले , और कौन सी बाद में परोसी जायेगी, इसका भी कर्मकाण्डीय अर्थ होता था. कौन पहले खायेगा, कौन बाद में, यह भी कर्मकाड़ का हिस्सा था. विशिष्ट जन को भोजन के लिये आग्रह करने का अपना खास तौर तरीका हुआ करता. और इन तमाम छोटी छोटी चीजों को कहने, आदेश करने, मना करने, अनुरोध करने, विनती करने से जुड़ी चीजों को ही मंत्र कहा जाता था. वे मंत्र बद्धमूल तरीके से समुदाय के पुरोहितों द्वारा संकलित, संगृहित, सुरक्षित रखे जाते, क्योंकि इसी प्रकार किसी आयोजन से जुड़ी तैयारियों की मानक रूपरेखा को अगली पीढी के लिये सुरक्षित किया जा सकथा था. 
समुदाय जब भौतिक दृष्टि से बदलता है, तो अतीत की चीजें धार्मिक कर्मकाण्डों के रूप में उसके जीवन में बची रह जाती हैं. लम्बी परम्परा से उपजे धार्मिक कर्मकाण्ड लोगों के लिये श्रद्धा की चीज होती हैं. श्रद्धा इसलिये भी कि उसके माध्यम से अतीत से जुड़ा हुआ महसूस होता है. इतिहास लेखन युग से पहले समुदाय इसी प्रकार अपने अतीत से जुड़ने का प्रयास करते थे.

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