Thursday, May 21, 2020

प्राचीन क्षत्रिय कबीलों से निकले ऋत्विज वंश का वर्णन

प्राचीन क्षत्रिय कबीलों से निकले पुरोहित वंश का वर्णन 

सूर्यवंश से जुड़े-

- इक्ष्वाकु वंश में नाभाग और अम्बरीश के बाद एक कोई रथीतर हुए, जिनके वंशज, क्षत्रीय होते हुए भी आंगिरस क्षत्रोपेत द्विज हुए. (वि.पु. (4-02-09)
‘एते क्षत्रप्रसूता वै पुनश्चांग़िरसः स्मृताः, रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः’. (वायुपुराण 88:07)
- अम्बरीश- युवनाश्व- हारीत. ‘तस्मात् हारीतः यत: अंगिरसः हारीताः’ (विष्णुपुराण 4:03:03)
- ‘हरितो युवनाश्वस्य हारिता शूरय स्मृता, एते ह्यंगिरस पुत्रा क्षत्रोपेतेता द्विजातयः’ (युवनाश्व का पुत्र हारीत, और उसका पुत्र सूर विख्यात हुए. ये महर्षि अंगिरा के पुत्र क्षत्रिय धर्मपरायण द्विजाति कहे जाते थे.) (वायुपुराण 88:73)
- वायुपुराण 88:79 में सत्यव्रत (त्रिशंकु), जिससे वसिष्ठों की शत्रुता रही, उसके पुत्र विष्णुवृद्ध की संतानों में अनेक अंगिरा गोत्रीय क्षत्रोपेत ब्राह्मण हो गये, ऐसा लिखा गया.
- त्रसदस्यु से उत्पन्न वंश परम्परा में भी आगे चलकर विष्णुबृद्ध की संतति अंगिरा के पुत्र क्षत्रिय मिश्रित द्विजाति वर्ण के हुए. (वायुपुराण 88:79)

चंद्रवंश से जुड़े-

- पुरुरवा- क्षत्रवृद्ध- सुहोत्र- काश्य, काश, गृत्समद (ऋषि)- सुचेत (इससे सुचेत नामक ब्राह्मण हुए, अनुशासनपर्व 30:61)
- गृत्समद- सुचेता- वर्चा- विहव्य- वितव्य- सत्य- संत- श्रवा- तम- प्रकाश- वागिंद्र- प्रमिति (+ घृताचि)- रुरु (+ प्रमद्वरा)- शुनक- शौनक -  महाभारत अनुशासनपर्व 30वाँ अध्याय (भार्गव गोत्रीय)
- विश्वामित्र- देवरात (शुनःशेप), मधुच्छंद, धनंजय, कृतदेव, अष्टक, कच्छप, हारितक. (कौशिक-गोत्र)
- अजमीढ- जह्नु- सिंधुद्वीप- बलाकाश्व- बल्लभ- कुशिक- गाधि- विश्वामित्र, सत्यवती) (अनुशासनपर्व 04) इस वंश में सिंधुद्वीप, विश्वामित्र, शुनःशेफ, मधुच्छंद, अष्टक आदि ऋषि हैं.
- पुरुवंशी अप्रतिरथ का पुत्र कण्व, और उसका मेधातिथि हुआ. इसी से काण्वायण द्विज हुए. (‘यतः काण्वायना द्विजा बभुवः’. वि.पु. 4-19-07)
- भरत की संतति में गर्ग से गार्ग्य और शिनि से शैन्य नामक क्षेत्रोपेता ब्राह्मण हुए. आगे चलकर भी इस वंश में कई लोग द्विज हो गये.(4-19-26)
- दुष्यंत- भरत- भरद्वाज (वितथ)- महावीर्य- दुरुक्षय- (त्रय्यारुणि, पुष्करिण्य, कपि, तीनों बाद में ब्राह्मण हो गये) (द्वाज- दो पिता से उत्पन्न) (वि.पु., 4-19--)
- हर्यश्व- मुद्गल, सृजय, बृहदिषु, यवीनर, काम्पिल्य (पांचाल कहलाये)
मुद्गल से (मौद्गल्य नामक क्षत्रोपेत ब्राह्मण) (वि. पु. 4-19-59)
(अग्निपुराण 278:20 में वंशक्रम ऐसे है, पुरुजात- बाह्यश्व- मुकुल, सृन्जय, बृहदिषु, यवीनर, कृमिल.)
‘मुकुलस्य तु मौकुल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः,-----‘. (अग्निपुराण 278:21)
- वायुपुराण 99:198 में लिखा है कि मुद्गल के वंशज क्षत्रिय गुणधर्म वाले ब्राह्मण हुए. कण्ठ (कण्व) और मुद्गल के वंशज अंगिरस गोत्र में सम्मिलित हो गये.
- (वायुपुराण 99:206, दिवोदास- मित्रयु (ब्रह्मिष्ठ)- च्यवन- सुदासु- सहदेव- सोमक- जंतु- अजमीढ-,,,,, पृषत्. मैत्रेयवंशी भार्गव गोत्रीय ब्राह्मण हुए.)
इस पृषत के पुत्र द्रुपद से द्रोण की शत्रुता थी. और द्रोण को कई जगह भार्गवों से सहायता लेता हुआ दिखाया गया है. द्रोण का जन्म भरद्वाज नामक अस्त्रवेत्ता के एक घृताची नामक अप्सरा के संसर्ग से हुआ. अस्त्रवेत्ता को बाद में ब्राह्मण सिद्ध करने का क्या अर्थ हो सकता है ? विदित रहे कि यह भरद्वाज कोई और नहीं स्वयं भरत के गोद लिये पुत्र वितथ थे, जिनसे सारा कुरुवंश निकला. इस प्रकार द्रोण का जन्म अगर भरद्वाज कुल से जुड़ा था तो वह कौरवों के सगोत्रीय रक्त सम्बंधी हुए. पुराणों के पुनर्लेखन में इन सारे तथ्यों को गड्डमड्ड करके छुपाकर द्रोण को ब्रह्मण दिखाने का प्रयास किया गया है. (आदिपर्व 63:106, 130:37 (द्रोण में ऋषि के वीर्य से द्रोण का जन्म) भरद्वाज के मित्र राजा प्रिषत थे. प्रिषत के पुत्र द्रुपद हुए. द्रुपद द्रोण का मित्र हो गया. कृप की बहन का विवाह द्रोण से हुआ. द्रुपद द्वारा दोण का तिरष्कार. द्रोण का वर्ण श्याम था (आदिपर्व 130:20). द्रोण द्वारा क्षत्रिय बल को धिक्कारने वाली बात का उल्लेख ( आदिपर्व 130:23). सींकी को अभिमंत्रित कर अंगुठी को निकालना. (आदिपर्व 67:69)   
 ‘ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशों राजर्षिसत्कृतः,
क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थानं प्राप्स्यसे कलौ.’ (विष्णु पुराण, 4-21-18)
अर्थात, ‘जो वंश ब्राह्मण और क्षत्रियों की उत्पत्ति का कारण स्वरूप तथा नाना राजर्षियों से विभाजित है, वह कलियुग में राजा क्षेम के उत्पन्न होने पर समाप्त हो जायेगा’.
‘ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वशो देवर्षिसत्कृतः, क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थास्यति कुलौ युगे.’ (मत्स्य पुराण 50:88)
भलंदन, वत्स, संकील को वैश्य ऋषि बताया गया है. (ब्रह्माण्डपुराण 32:121)
चाक्षुश मनु से ब्राह्मण क्षत्रिय का प्रवर्त्तक (ब्रह्माण्डपुराण 36:102)
‘काशः शलश्च द्वावेतौ तथा गृत्समदः प्रभुः, पुत्रो गृत्समदस्यापि शुनको यस्य शौनकः.’
ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव वैश्याः शूद्रास्तथैव च, शलात्मजः आर्ष्टिसेणस्तनयस्य काश्यपः.’ (ब्रह्मपुराण 09:33, 34)
‘ब्रह्मक्षत्रादयः तस्मान् मनुः जात अस्तु मानवाः, ततः अभवन् महाराज ब्रह्म क्षत्रेण संगतम्’. (आदिपर्व 75:14)
क्षत्रिय-ब्राह्मण सम्बंध – आदिपर्व 136:14 (दुर्योधन ने भीम से कहा), आदिपर्व 81:19 (देवयानी ने ययाति से कहा, “संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रेण ब्रह्म संहितम, ऋषिश्चाप्यृषिपुत्रश्च नाहुषांग़ वहस्व माम”)

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