Sunday, May 10, 2020

दुष्यंत की कहानी

दुष्यंत की कहानी
दुष्यंत की कहानी

मात्स्यपु.27:09 और  वाय.पु.99:129 में दुष्यंत से जुड़ी वंशावली इस प्रकार है,
अप्रतिरथ (इलीन?)- कण्व और ऐलीन. कण्व- मेधातिथि (काण्वायन द्विज्). ऐलीन- दुष्यंत एवं अन्य. 
भाग.पु.09:20:06 रंतिभार- सुमती, ध्रुव, अप्रतिरथ. अप्रथिरथ- कण्व- मेधातिथि. सुमति (ऋभ?)- रैभ्य- दुष्यंत. अर्थात् मात्स्य, वायु, और भागवत पुराणों में थोड़ा अंतर है. गौरतलब है कि हर ग्रंथ में दुष्यंत और कण्व निकट रक्त सम्बंधी बताये गये हैं.  
आदिप.70:07 में दुष्यंत ने खुद को इलिलपुत्र कहा है. 
आदिप.70:23 में ‘अप्रतिरथ’ शब्द का प्रयोग दुष्यंत के लिये हुआ है. और इसके गीताप्रेस और किशारीमोहन के अंग्रेजी अनुवाद में भूल है. पौराणिक वंशावलियों पर ध्यान देने से यह समझ आता है  कि दुष्यंत और कण्व नजदीकी चचेरे भाई हैं. दुष्यंत और शकुंतला प्रसंग से जुड़े इस अध्याय में कण्व को काश्यप गोत्रीय बताकर उसके आश्रम का वर्णन उसी अनुसार किया गया है. ऐसी मनगढंत कहानियों का उद्देश्य समझना बहुत मुश्किल नहीं है. अप्रतिरथ के कुल में उत्पन्न दुष्यंत राजा के रूप में चित्रित हैं, तो कण्व सूक्तों के रचयिताओं में प्रमुख है. तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि शकुंतला कण्व की पुत्री थी, जिसके साथ दुष्यत का यौन सम्बंध स्थापित होने से एक बच्चे का जन्म हुआ, जिसे भरत कहा गया. इस प्रकार शकुंतला और दुष्यंत आपस में रक्त सम्बंधी हुए. लेकिन जातिवादी सोच के तहत पौराणिक लेखकों ने एक को क्षत्रिय तो दूसरे को तथाकथित काश्यप गोत्रीय ब्राह्मण बताया. शांतिप.29:49 में कण्व को दौष्यंति भरत का ऋत्विज बताया गया है. इससे पता चलता है कि उस कबीलाई युग में निकट सम्बंधी ही ऋत्विज कर्म किया करते थे.
दुष्यंत शब्द पर गौर किया जाना जरूरी है. संस्कृत में एक शब्द है ‘दूषय’, जिसका अर्थ है किसी महिला के सतीत्व या सम्मान को नष्ट करना, उसे अपवित्र करना. शकुंतला से जुड़ी इस घटना से स्पष्ट है कि इस व्यक्ति ने शकुंताला के कौमार्य को भंग किया था. सभ्यता के विकास के क्रम में इस क्षत्रिय चरित्र को उद्दात्त बनाया गया.   
देखा जा सकता है कि शकुंतला और दुष्यंत की इस कहानी में अनेक झूठ बोले गये. क्यों? 
पहली बात कि कण्व का ऋग्वेद का एक महत्वपूर्ण ऋषि होना जातिवादी व्यवस्था में उसे जातिगत ब्राह्मण साबित करने वाली प्रेरणा बनी. आदिपर्व में दुष्यंत का आख्यान कहने का उद्देश्य अध्याय 68:06 में ही प्रकट कर दिया गया है. ‘न वर्णसंकरकरो न कृष्याकरकृज्जनः, न पापकृत् कश्चित् आसीत् तस्मिन् राजनि शासति.’  अर्थात् दुष्यंत के राज्य में ‘न तो वर्णसंकर उत्पन्न होते थे, और न कृषक कृषि कर्म करते थे, न कोई पाप करने वाला था’. वर्णसंकर शब्द से भयभीत लोगों ने धर्मशास्त्रों की रचना की. ब्राह्मण पुरोहित इसमें बढ-चढ कर हिस्सा ले रहे थे. आदिप.75:15 कहता है ‘ब्राह्मणा मानवाः तेषां सांगं वेदधारयन्,--‘, अर्थात् मानवों में ब्राह्मण अंगों समेत वेद धारण करते थे’. अतः वेद पर एकाधिकार साबित करना सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा था. 
लेकिन कण्व को काश्यप गोत्रीय ब्राह्मण साबित करने के लिये साहित्य रच लेने से समस्या और उलझ जाती. कण्व को आश्रम-निवासी निःसंतान ब्रह्मचारी बता दिया गया (आदिप.71:17).  क्योंकि धर्मशास्त्रीय प्रावधानों के तहत एक ब्राह्मण कण्व की पुत्री का विवाह क्षत्रिय दुष्यंत से कैसे सम्भव था? वही वर्णसंकरता का संकट, वह भी प्रतिलोमात्मक ! एक परेशानी और, कि धर्मशास्त्रों के ज्ञाता दुष्यंत के इतने निकट रक्त सम्बंध में वैवाहिक सम्बंध को मान्यता कैसे दिया जाये? गुप्त-काल तक जाति आधारित वर्ण-व्यवस्था इतना पुख्ता हो चुका था कि रघुवंश11:64 में भार्गव राम का जनेऊ धारण ब्राह्मण पिता, और धनुष धारण करना उसकी क्षत्रिय माता की पृष्ठभूमि में दिखाया गया है.  
इसके लिये विश्वामित्र और मेनका की अलौकिक कहानी रची गयी. वैसे बु.च.04:20 और वा.रा.4:35:07 में विश्वामित्र को घृताचि के सम्बंधित किया गया है. शकुंतला को क्षत्रिय विश्वामित्र से उत्पन्न बताकर कण्व की पालित पुत्री बनाया गया. क्योंकि विश्वामित्र को पौराणिक कहानियों में वसिष्ठ से शत्रुता के कारण जातिगत क्षत्रिय माना जा चुका था. 
झूठ के जाल का बुनाव कितना ही विस्तृत हो, सच छुप नहीं पाता. विभिन्न पौराणिक स्रोतों से वह सच निकल आया है. पौराणिक लेखक यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि वो भी अतीत के उस क्षत्रिय कबीलाई संस्कृति से उत्पन्न थे, जब कृषि संस्कृति का विकास नहीं हुआ था, जैसा कि ऊपर श्लोकांश में ‘न कृष्याकरकृज्जनः’. लेकिन इस श्लोकांश का अर्थ अनुवादक ने यह लगा दिया कि दुष्यंत के राज्य में भोजन के लिये कृषि की जरूरत ही नहीं थी ! यह समझने का प्रयास नहीं किया गया, या इसे नजरंदाज किया गया कि वह आर्यों की अर्द्ध-घुमंतु सामाजिक अवस्था थी. 
और श्लोक में पापकर्म का उल्लेख है, तो वास्तविकता यह है कि उस युग में बलात्कार तक किसी अपराध की श्रेणी में नहीं था. दुष्यंत ने शकुंतला से यौन सम्बंध स्थापित किया. और जब बच्चा हुआ, तो उसे किसी हाल में स्वीकार करने को तैयार नहीं था. जैसे तैसे मामले को निपटाया गया. इसका पूरा विवरण आदिप. के इन अध्यायों में है. इस तथ्य से तो आज भी बहुत सारे लोग नाराज हो जायेंगे. आदिप.74:02 दुष्यंत शकुंतला के विवाह के तीन वर्ष बाद भरत का जन्म हुआ, ‘--- त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु दीप्तानलसमद्युतिम्’. आदिप.63:86 किसी कन्या को गभवती बनाकर छोड़ देने का ऐसा ही एक उदाहरण पराशर द्वारा सत्यवती को यमुनाद्वीप में छोड़ देना (‘न्यस्तो द्वीपे’) था.

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