Sunday, January 27, 2013

इतिहास –विश्लेषण और उप-महाद्वीपीय समझ




प्रसिद्ध इतिहासकार पर्सीवल स्पीयर ने आधुनिक इतिहास पर लिखी अपनी किताब में पाकिस्तान आन्दोलन की चर्चा भारत में इस्लामी समाज की स्थापना काल से शुरू की है. इसके उलट, भारतीय इतिहासकार विपिन्द चन्द्र ने(औरों ने भी) पाकिस्तान के जन्म को लेकर आधुनिक काल में अंग्रेजी शासन की नीतियों के उद्भव के साथ शुरू किया है. एक ओर जहाँ पर्सीवल स्पीयर का रुख पाकिस्तानी सरकार के दृष्टिकोणों से अधिक मेल खाता दिखता है, वहीं विपिन चन्द्र जैसे विद्वानों का दृश्टिकोण भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस की राष्ट्रवादी अवधारणा पर आधारित रही है. इसके तहत, अंग्रेजी शासन शुरू होने से पहले तक भारत में साम्प्रदायिक सोच का भारतीय समाज में सर्वथा अभाव माना गया. भारतीय समाज को शनैः-शनैः आधुनिकता की ओर कदम बढाते एक ऐसे समाज के रूप में प्रदर्शित और व्याख्यायित किया गया है, जिसमें सामाजिक और सांस्कृतिक विकास ‘गंगा-जमुनी’ अवधारणा पर बड़ी सहजता से हो रही थी. यह एक ऐसा काल के रूप में जाना जा सकता है जब आक्रांता, आप्रवासित और धर्मांतरित मुसलमानों का स्थानीय सामाजिक ताने बाने के साथ एक सहज साहचर्य स्थापित हो चुका था. तुर्की, अरबी, और फारसी भाषा के आधार पर राजकाजीय क्षेत्र में एक ऐसी भाषा विकसित हो चुकी थी जिसे हिन्दू और मुसलमान अपनी साझी विरासत कह सकते थे. वर्गीय-विभाजन का आधार धर्म की जगह आर्थिक और सामाजिक हैसियत थी. पहनावा-ओढावा, रीति-रिवाज, पसन्द-नापसन्दगी, लोकाचार, विश्वास-अन्धविश्वास, जैसी तमाम चीजें साझी हो चुकी थी. इस काल की ऐसी सामाजिक सांस्कृतिक छवि का अंकण तमाम तरह के प्राथमिक स्रोतों से लिया गया है. ऐसे चित्रांकण को किसी भी लिहाज से गलत कहना अनुचित होगा.
दूसरी ओर पर्सीवल स्पीयर और द्वारा पाकिस्तान की स्थापना का इतिहास भारत में इस्लामी काल के आरम्भ से शुरू करने के पीछे एक सहज अवधारणा रही है, कि, इस देश में हिन्दू और मुस्लिम सामाजिक-सांस्कृतिक धारा हमेशा एक दूसरे के समांतर बनी रही. इस्लामी शासकों ने लगातार अपनी शक्ति और क्षमता को सशक्त बनाये रखने के लिये शासन-प्रशासन में मुसलमानों को वरीयता दी. यहाँ तक, कि, इस बात पर विशेष रूप से जोड़ दिया गया है कि सैनिक और प्रशासन के उच्च पदों पर बाहरी मुसलमानों को प्रमुखता दी जाती थी. कुछ अपवादों को छोड़कर, हिन्दू-तत्वों पर बहुत ज्यादा विश्वास और निर्भरता नहीं दिखाई देती. सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में आदान-प्रदान उच्च वर्गीय लोगों के एक सीमित पॉकेट, दरबारों के आस-पास, तक सीमित रही. विभिन्न शासकों के समय बार-बार देखा गया, कि, कट्टर-उलेमा अपनी धार्मिक-नीतियों को ऊपर रखने में कामयाब होते थे. मुसलमान शासकों की स्थिति अर्ध-स्थायित्व से जूझता रहता था. ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों और सामंतों के बीच तनाव और संघर्ष हमेशा कायम रहता था. युग की सोच के अनुकूल ऐसे तनाव और संघर्ष का रंग हर बार धार्मिक पूर्वग्रह में सना हुआ दिखता है. सामाजार्थिक और धार्मिक तनाव के बीच अंतर कर पाना इस युग में सम्भव  नहीं था. लगान की वसूली के लिये अभियान का धार्मिक-अभियान में बदल जाना, अस्थिर सशस्त्र समुदायों के खिलाफ सैनिक अभियानों का साम्प्रदायिक रंग में रंगा होना, युगोनुकूल ही था. कुल मिलाकर, सामाजिक-सांस्कृतिक पटल की गुलाबी तस्वीर काफी धुँधली नजर आती है. इसी धुँधली तस्वीर को लेकर जब अंग्रेजी शासन के परिप्रेक्ष्य में. जो कि, आधुनिक दृष्टि की रोशनी में था, देखने पर उस वक्त की हिन्दू-मुस्लिम सामाजिक सम्बन्धों की तमाम विषमताएँ और विडम्बनाएँ प्रकट हो जाती हैं. पर्सीवल स्पीयर ने इन्हीं विडम्बनाओं के आधार पर होने पर साम्प्रदायिक राष्ट्रीय चेतना के विकास को विश्लेषित करने की कोशिश की है.
पाकिस्तान की सरकारी इतिहास भी पाकिस्तान आन्दोलन को इस्लामी इतिहास के एक पन्ने के तौर पर देखती है, न कि, भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास के तौर पर. यह साम्प्रदायिक दृष्टि का एक बेहतरीन उदाहरण है. भारत में साम्प्रदायिक इतिहास में यकीन करने वालों के लिये पर्सीवल स्पीयर ज्यादा आकर्षक लेखक होंगे. दूसरी तरफ राजनीतिक दृष्टि से सेकुलर लोगों को विपिन चन्द्र का विश्लेषण ज्यादा अनुकूल लगेगा. लेकिन, एक सही मायने में ऐतिहासिक दृष्टि-सम्पन्न व्यक्ति इतिहास को किसी खास परिप्रेक्ष्य में देखने से पहले उसका वस्तुनिष्ठ अवलोकन करना चाहेगा. यह वस्तुनिष्ठ अवलोकन किसी भी समाज के बौद्धिक मानक को दर्शाता है. पर्सीवल स्पीयर, विपिन चन्द्र, या पाकिस्तानी राष्ट्रीय दृष्टिकोण को दर्शाता इतिहास लेखन निश्चय ही अपनी-अपनी अवधारणाओं की पुष्टि के लिये उसी कालखंड से अपने उदाहरण और तथ्य जुटाते हैं. तथ्यों के चुनाव से कोई परेशानी नहीं होती, बल्कि, एक तथ्य की जगह दूसरे की अवहेलना से परेशानी होती है. इस लिहाज से हर विश्लेषक और लेखक अपनी ‘सुविधा’ को नहीं छोड़ पाता. और ‘सुविधा’ से तात्पर्य ऐतिहासिक तथ्यों के चुनाव में दृष्टिकोणों की भूमिका से है. कोई यह दावा नहीं कर सकता, कि, उसका अध्ययन उद्देश्यहीन है. उद्देश्य ही प्रेरणा है. और कई बार यही उद्देश्य विष्लेषक को एक तथ्य की जगह दूसरे तथ्य को महत्वपूरण मानने के लिये प्रेरित करता है. इसीलिये, किसी भी जगह के किसी कालखण्ड पर वस्तुनिष्ठ नजर डालने के लिये किसी एक लेखन परम्परा से जुड़ना पर्याप्त नहीं है. पर्सीवल स्पीयर आधुनिक भारत में साम्प्रदायिक राजनीति और उसके पृष्ठभूमि में राष्ट्रवाद की खिचड़ी पकने की कहानी में अंग्रेजों की भूमिका को निश्चित तौर पर काफी सकारात्मक मानकर चलते हैं. उनके लिये तत्कालीन भारतीय समाज में अंतर्निहित साम्प्रदायिक, जातीय, वर्गीय खींचतान ही पर्याप्त आकर्षण रखता है, जिसके परिप्रेक्ष्य में वो पाकिस्तान-आन्दोलन को रेखांकित करते हैं. इसके विपरीत, कॉंग्रेस की राष्ट्रीय विचारधारा से मेल खाती विपिन चन्द्र जैसे इतिहास विश्लेषक इस काल-खण्ड के इतिहास में अंग्रेजी शासन की भूमिका को बहुत ज्यादा महत्व देकर चलते हैं. सामप्रदायिकता और इसके इर्द-गिर्द की राजनीति में अंग्रेजी सरकार की नीतियों, उसके कार्यान्वयन जैसी बातों को शक्तिशाली अवयवय के रूप में लेकर चलते हैं. एक अध्येता के लिये दोनों तरह की बातों को जानना जरूरी है.
भारतीय परिप्रेक्ष्य में इतिहास –विश्लेषण की सबसे सशक्त और विज्ञानिक पद्धति मार्क्सवादी लेखकों के पास माना जा सकता है. इसमें भारतीय मार्क्सवादी स्कूल ने काफी मूल्यवान योगदान किया है. दुर्भग्यवश, सोवियत संघ के पतन के साथ मार्क्सवादी इतिहास-लेखन को नये बौद्धिक परिवेष में विकास-विरोधी समझने की एक भूल की जा रही है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जहाँ एक ओर नये-पूँजीवादियों द्वारा नकारने की कोशिश हो रही है, तो दूसरी ओर साम्प्रदायिक दृष्टिकोणों द्वारा भी इसे अग्राह्य समझा जाने लगा है. भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में मार्क्सवादी दृष्टिकोण की एक स्वशक्त परम्परा धीरे-धीरे कमजोर पडती दिख रही है. भारत्त और इस्लाम के बीच लम्बे साहचर्य को समझने के लिये, भारतीय उप-महाद्वीप में बहुपंथीय समाज के विकास और उसकी अन्योन्याश्रयी सम्बन्धों को समझने, और भविष्य में दिशा तलाशने के क्षेत्र में मार्क्सवादी इतिहास-विश्लेषण और लेखन का महान योगदान को भुलाने की कोशिश की जा रही है. साम्प्रदायिक राजनीतिक और नव-पूँजीवादी विकासवादियों के मजबूत होते गठबन्धन द्वारा मार्क्सवादी इतिहास लेखन को दर-किनार करना स्वाभाविक है. जब हर प्रकार की दकियानूसी अवधारणाओं को सम्मानजनक स्थान देने के दावे के बीच एक स्वस्थ सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक समाज की अवधारणा को लोगों के मन-मस्तिष्क से दूर किया जा रहा है, ऐसे में, उपमहाद्वीप के इतिहास को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने की परम्परा को मजबूत होने देने की बात कोई क्यों करेगा ?                  .

Saturday, January 15, 2011

शिवरंजनी

शिवरंजनी

गहरे निःशब्द रात्रि में

लम्हों के कारवें रुक जाते हैं जब

ठिठुरते पत्तों के आस-पास,

कराहता है कोई, उखड़े-उखड़े साँसों में

मेरे पास, मेरे रूह के गिर्द-ओ-पेश,

गुनगुनाता हूँ मैं, बेवजह

शिवरंजनी के सुरों को,

दूर कहीं, ऐसा लगता है,

जागती हो तुम चौंककर

ख्वाबों से

भटकते सुरों के दस्तक पे

गहन निःशब्द रात्रि में.

फिर, गाता हूँ मैं झूमकर

द्रुत शिवरंजनी

अपने आँसू को चूमकर

तुमको सुनाने को, या

खुद को बहलाने को-

गामजन हैं फिर से

लम्हों के कारवें

एक सुबह की ओर----

_ namit, 19.01.03 ___________

Sunday, January 9, 2011

शिकायती शुभकामना

मैनें उससे नहीं कहा
हैप्पी न्यू ईयर
सुबह उठकर, पहली किरण के साथ ;
शायद ये सोचकर
कि वो मुझे भूल चुका है
पिछले साल के किसी गुमनाम दिन की तरह .
कि, उसके मन के कोने में
होंगे कितने ही लोगों कि तस्वीरें
कितनी ही और बातें,
जो ज्यादा जरूरी हैं
मेरे बेमतलब चेहरे के.
मेरी यादों के पुरानेपन के सिवा;
कई काम होंगें जरूरी,
साल के पहले दिन, सुनहले दिन.
जब उसके यादों में
उभरा नहीं मैं कोई अहसास बनकर.
मैंनें फोन की घंटी नहीं बजाई
कहने को 'सुप्रभात'
'नया प्रभात उसके जीवन में
जगमगाये, खुशियाँ नई लहराये
ताजे मस्तियों के झुँड
उसे दुलराये,
जो प्यारे हैं उसे, और भी मनभाये
जिसे वो भूलता है
वो भी उसे, मन ही मन,
चुपके से उसके लिये आँसू बहाये'!

Sunday, September 26, 2010

शर्म का कॉमनवेल्थ

-->
न जाने क्यों मुझे लगता है कि कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी को लेकर जो अफरातफरी का माहौल बना है, वह एक तरह से भारत के हित में ही रहेगा. इस आयोजन ने “इंक्रेडिबल इंडिया”, “शाइनिंग इंडिया” जैसे चमकदार नारों के पीछे छुपे हुए व्यवस्थागत और नैतिक कमियों को खोलकर एकबार फिर से सामने रख दिया है. हम भारतीय अपनी कमियों के बारे में बहुत कुछ जानते तो हैं, लेकिन वह जानकारी उस गहरे अहसास में नहीं बदल पाता, जिसके कारण हम अपने आप में बदलाव की जरूरत महसूस कर सकें. चीजों की जानकारी एक बात होती है, और उसके प्रति जागरुकता दूसरी बात. सिर्फ जानकारी ही बदलाव को जन्म देने के लिये काफी नहीं, इसके लिये सजगता की आवश्यकता होती है, और अक्सर जागरुकता के लिये एक झटके की जरूरत होती है. कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन में हमारी गैर-पेशेवर, भ्रष्ट और घटिया स्तर के कारण पूरी दुनिया में जो भद्द पिटी है, और उससे जो शर्म पैदा हुई है, वह हमारी जानकारियों को गहरे अहसास में बदलने में जरूर सहायक होगा.

अपनी तमाम बड़ी सफलताओं के इस दौर में भारत एक अजीब विडम्बनापूर्ण स्थितियों का सामना कर रहा है. जीवन के हर क्षेत्र में जहाँ भारतियों के झंडे फहरा रहे है, हमारी सामुहिक असफलताएँ हमारा मुँह चिढा रही हैं. भ्रष्टाचार एक समस्या से बढकर एक जीवन-पद्धति का रूप ले रही है. व्यक्तिगत क्षमताओं से परिपूर्ण हमारी व्यवस्था में सरकारी या सामुहिक संस्थाएँ बेइमानी, अक्षमता, अकुशलता, घटियापन का पर्याय जैसे लगते हैं. गाँव में स्कूल-भवन, पंचायत-भवन, के निर्माण या मरम्मत का मामला हो या कोमनवेल्थ खेल जैसे बड़े आयोजन, इन तमाम के पीछे एक अशुभ और विद्रुप चेहरा छुपा होता है. इसके बारे में सभी को पता है, सभी किसी न किसी कारण लाचार हैं, कि उसके खिलाफ कुछ नहीं बोलते. शायद ऐसा कहें कि लाचार नहीं, वरन्, सिर्फ इस बात से दुखी हैं कि पर्दे के पीछे के खेल में उन्हें मौका नहीं मिला. इस प्रकार की परिस्थिति के हम अभ्यस्त हो चुके हैं. यह “अभ्यास” शायद इस बार मिलनेवाली सामुहिक अपमान की झकझोर से शायद थोड़ी बदले, ऐसी उम्मीद होती है. लोग कहते हैं ‘उम्मीद पर ही तो इतनी बड़ी दुनिया कायम है’ ! 

Saturday, September 18, 2010

दुनियावाद

दुनिया का दुनियाकरण(वैश्वीकरण, globalisation) हो रहा है. अमरीका में किसी पास्टर की फितूर का सीधा असर भारत की अपनी पहले से उलझी हुई मर्ज को और उलझा देती है, अफगानिस्तान में अमरीकी सैनिक कार्रवाई पर पूरी दुनिया की निगाह लगी होती है, तो बीबीसी का हिन्दी कार्यक्रम अब लन्दन के बुश हाउस से प्रसारित न होकर दिल्ली के किसी गली से निकलकर हम तक पहुँच रही है. आतंकवाद का अंतर्राष्ट्रिय नेटवर्क हो या सूचनातंत्र का अंतर्जाल, हर समाज जाने-अनजाने ही एक वैश्विक व्यवस्था से जुड़ा हुआ पाता है. राष्ट्र की अवधारणा सिमटती हुई खेल-कूद में फहराये जानेवाले झंडो के ईर्द-गीर्द सिमटने लगी है. किसी भी घटना का विश्लेषण अब सिर्फ स्थानीय परिदृष्य का हिस्सा नही रहा, उसके बाहरी, और बाहरी आयामों की चर्चा जरूरी होती जा रही है. पेट्रॉल का दाम हो, या गेहूँ-सब्जी की, देशों की सीमाओं के आर-पार होनेवाले लेन-देन से सीधे-सीधे निर्धारित होने लगी हैं. लेकिन, ये सच का महज एक पक्ष है. दूसरी तरफ भारत जैसे देश में स्थानीय, गुटीय, जातीय पहचानों को स्थापित करने की एक बाढ सी आई हुई है. विकासशील देशों के भीतर सांस्कृतिक और आर्थिक स्वायत्तता की मारा-मारी के बीच यह भ्रम हो उठता है कि वास्तव में दुनियाकरण जैसी कोई बात कहीं घटित भी हो रही है या नहीं.
स्थानीयकरण और वैश्वीकरण को अगर हम एक साथ मिलाकर देखें तो इनके अंतर्विरोधों के बीच एक बड़ा घनिष्ठ अंतर्सम्बन्ध देखने को मिलता है. एक तथ्य तो यह सामने आता है कि लोगों की निगाहें अब बड़े परिदृष्य को एक साथ देख पाती हैं. दुनिया के एक छोर पर की स्थानीय घटना दूसरे जगहों पर अपना असर छोड़ती हैं. एक जगह का मजदूरों का प्रदर्शन दुनिया के अन्य भागों में मजदूर असंतोष को बल देता है. फैशन की दुनिया में स्थानीयता का असर सुदूर भागों में फैशन के ट्रेंड में भी देखने को मिलता है. 1990 के दशक में इस दुनियाकरण की अवधारणा के प्रति लोगों में जो भय और आशंका देखने में आई थी वह आज की हकीकत बन गयी है. स्थानीयकरण का भी वैश्वीकरण हो गया है. आज का मंत्र think globally, act locally ऐसे ही नहीं बन गया है. आज की हकीकत तो यही है कि बिना वैश्वुक सोच के हम अपनी किसी भी समस्या से सफलतापूर्वक नहीं लड़ सकते. मार्क्सवाद अपने जमाने में वैश्विकता की ओर ही एक प्रयास था. आज हम सचमुच वैश्विक आयामों में जीने की ओर उन्मुख हो रहे हैं.
1990 के शुरुआती दौर में वैश्विकरण जैसे शब्दों के प्रति एक बड़े वर्ग में इसके प्रति आशंका फैलाया गया कि यह राष्ट्रीय और स्थानीय पहचानों और स्वायत्तताओं के लिये एक बड़ा खतरा है. कि यह पश्चिमी पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा लाई गयी ऐसी साजिश है जिसका उद्देश्य मुख्यतः विकाशशील देशों के संसाधनों और रोजगारों को अपने हित में उपयोग करना है. हो सकता है ऐसी आशंकाओं का अपना आधार हो. लेकिन, सभी बातों की एक बात कि दुनियावाद आज की बड़ी ताकतवर हकीकत के रूप में हमारे सामने है, और कि यह किसी अन्य वाद की महज corollary भर नहीं है. , वह चाहे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद हो, गरमाती पर्यावरण का मसला हो, या दुनिया की गरीबी के खिलाफ जंग हो, इन सब का निदान सिर्फ स्थानीय प्रयासों से सम्भव नहीं.

Wednesday, September 8, 2010

इस्लाम को जानते हुए


दुनिया के लोकप्रिय धर्मों सम्प्रदायों के वैचारिक बनावट, उसकी विशेषता और स्वरूप को जानने के लिये महज उस धर्म से जुड़े ग्रंथों का अद्ध्ययन ही काफी नहीं, ऐसा मेरा मानना है. किताबों मे लिखे हुए धर्म का स्वरूप बद्धमूल अवधारणाओं का वो फॉसिलाईज्ड ब्लूप्रिंट कहा जा सकता है जो उस धर्म के ऐतिहासिक विकास को समझने में सहायक होता है. धर्म का किताबी स्वरूप उस धर्म के जीवंत संस्करण से बहुत कुछ अलग होता है. धर्म का व्यवहारिक पक्ष किताबों में बताये गये सीमा रेखाओं से बाहर दूसरी सांस्कृतिक धार्मिक व्यवहारों के साथ ऐसा घुला मिला होता है जिसे हम किताबों के अन्दर ढूँढने की कोशिश करते है. समाज के अन्दर धर्मों के मूलभूत स्वरूप के प्रतीक बाहरी तौर पर जितने अलग-अलग दिखते हैं वैसा इंसानों के अन्दर उनकी सोचों में नहीं होता. अन्दर से एक व्यक्ति का धार्मिक सोच बड़ा ही जटिल और जीवंत होता है. बाहरी तौर पर धार्मिक किताबें जिस प्रकार की सीमांकण करती हैं वो आंतरिक सोच के स्तर पर ज्यादा उद्दात्त और दूसरे सोचों के साथ गुँथे होते है.
मेरी समझ में ये बात नहीं आती कि इस्लाम जैसे धर्म के बारे में हमारी अवधारणा महज उन बातों पर आधारित होती है जो कुछ कट्टर सोचवाले लोगों द्वारा प्रचारित होता है. हम इस्लाम के बारे जो कुछ सोचते या कहते हैं वो महज धार्मिक किताबों में वर्णित अवधारणाओं में से कुछ खास पर ही आधारित होती हैं. और यह तब जब हमारी उस धार्मिक किताब के बारे में जानकारी काफि सीमित होती है. हम अगर इस्लाम के बारे में कुछ कहना चाहते हैं तो हमें उन तमाम वैचारिक और धार्मिक विचारों को परिप्रेक्ष्य में रखकर कहना होगा जो इस्लाम को माननेवाले महान विचारकों ने पिछले लगभग 1500 वर्षों में कहा है और उसे जिया है. इस्लाम धर्म सिर्फ वही कुछ नहीं है जो इस्लामी धर्म ग्रंथों में अभिव्यक्त हुआ है, परंतु वह, वह सब भी है जो पिछले युगों में दुनिया के विभिन्न कोनों में इस्लाम को माननेवालों ने बौद्धिक स्तर पर जिया, सोचा, और इस्लाम को एक सम्मृद्ध वैचारिक परिदृष्य प्रदान किया है.

Saturday, July 17, 2010

एक प्रतिक्रिया

आज 17 जुलाइ 2010 की दोपहर में लोकसभा टीवी पर बीरभूम से एमपी सुश्री शताब्दि राय से ली जा रही इंटरव्यू देखते वक़्त मैंने कुछ बातों पर गौर किया. पहली बात कि प्रश्न अंग्रेजी में पूछे जाने के बावजूद सुश्री राय हिन्दी में ही जवाब दे रही थीं. अंग्रेजी में शुरू करने के बाद सहज ही हिन्दी में बोलने लगतीं. वो बांग्ला फिल्मों में काम करती रही, बांग्ला परिवेष में पली बढीं हैं, इसके बावजूद हिन्दी में इतनी सहजता देखकर सुखद आश्चर्य होता रहा. इसके विपरीत अगर हम बॉलीवूड के कलाकारों के भाषागत आदतो पर गौर करें तो पायेंगे कि वहाँ वाले हिन्दी में पूछे गये सवालों का जवाब भी अंग्रेजी में ही देते हैं. असल में हमें यह पता ही नहीं चलने देते कि वो हिन्दी जानते भी हैं या नहीं. यहाँ मैं सुश्री शताब्दी राय की भाषाई व्यवहार पर गौर कर रहा था. मुझे स्पष्ट तौर पर लगा कि एक बंगाली अपने स्वाभाविक परिवेष से बाहर जिस माहौल में अपने आपको सबसे सहज पाता है वह हिन्दी ही है. बंगाल में अभी तक पढे-लिखे माहौल में बांग्ला का ही बोलबाला है. अंतर्राज्यीय व्यवहार में रहने वाले बंगालियों के लिये बांग्ला के बाद हिन्दी ही सहज माध्यम होता है. यह बात बंगाल के अन्दर रहनेवाले के लिये भी लागू होता है. अंतर इतना सा है कि कम ही बंगाली इस तथ्य को स्वीकार कर पाते हैं.