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Saturday, January 15, 2011

शिवरंजनी

शिवरंजनी

गहरे निःशब्द रात्रि में

लम्हों के कारवें रुक जाते हैं जब

ठिठुरते पत्तों के आस-पास,

कराहता है कोई, उखड़े-उखड़े साँसों में

मेरे पास, मेरे रूह के गिर्द-ओ-पेश,

गुनगुनाता हूँ मैं, बेवजह

शिवरंजनी के सुरों को,

दूर कहीं, ऐसा लगता है,

जागती हो तुम चौंककर

ख्वाबों से

भटकते सुरों के दस्तक पे

गहन निःशब्द रात्रि में.

फिर, गाता हूँ मैं झूमकर

द्रुत शिवरंजनी

अपने आँसू को चूमकर

तुमको सुनाने को, या

खुद को बहलाने को-

गामजन हैं फिर से

लम्हों के कारवें

एक सुबह की ओर----

_ namit, 19.01.03 ___________