दुनिया के लोकप्रिय धर्मों सम्प्रदायों के वैचारिक बनावट, उसकी विशेषता और स्वरूप को जानने के लिये महज उस धर्म से जुड़े ग्रंथों का अद्ध्ययन ही काफी नहीं, ऐसा मेरा मानना है. किताबों मे लिखे हुए धर्म का स्वरूप बद्धमूल अवधारणाओं का वो फॉसिलाईज्ड ब्लूप्रिंट कहा जा सकता है जो उस धर्म के ऐतिहासिक विकास को समझने में सहायक होता है. धर्म का किताबी स्वरूप उस धर्म के जीवंत संस्करण से बहुत कुछ अलग होता है. धर्म का व्यवहारिक पक्ष किताबों में बताये गये सीमा रेखाओं से बाहर दूसरी सांस्कृतिक धार्मिक व्यवहारों के साथ ऐसा घुला मिला होता है जिसे हम किताबों के अन्दर ढूँढने की कोशिश करते है. समाज के अन्दर धर्मों के मूलभूत स्वरूप के प्रतीक बाहरी तौर पर जितने अलग-अलग दिखते हैं वैसा इंसानों के अन्दर उनकी सोचों में नहीं होता. अन्दर से एक व्यक्ति का धार्मिक सोच बड़ा ही जटिल और जीवंत होता है. बाहरी तौर पर धार्मिक किताबें जिस प्रकार की सीमांकण करती हैं वो आंतरिक सोच के स्तर पर ज्यादा उद्दात्त और दूसरे सोचों के साथ गुँथे होते है.
मेरी समझ में ये बात नहीं आती कि इस्लाम जैसे धर्म के बारे में हमारी अवधारणा महज उन बातों पर आधारित होती है जो कुछ कट्टर सोचवाले लोगों द्वारा प्रचारित होता है. हम इस्लाम के बारे जो कुछ सोचते या कहते हैं वो महज धार्मिक किताबों में वर्णित अवधारणाओं में से कुछ खास पर ही आधारित होती हैं. और यह तब जब हमारी उस धार्मिक किताब के बारे में जानकारी काफि सीमित होती है. हम अगर इस्लाम के बारे में कुछ कहना चाहते हैं तो हमें उन तमाम वैचारिक और धार्मिक विचारों को परिप्रेक्ष्य में रखकर कहना होगा जो इस्लाम को माननेवाले महान विचारकों ने पिछले लगभग 1500 वर्षों में कहा है और उसे जिया है. इस्लाम धर्म सिर्फ वही कुछ नहीं है जो इस्लामी धर्म ग्रंथों में अभिव्यक्त हुआ है, परंतु वह, वह सब भी है जो पिछले युगों में दुनिया के विभिन्न कोनों में इस्लाम को माननेवालों ने बौद्धिक स्तर पर जिया, सोचा, और इस्लाम को एक सम्मृद्ध वैचारिक परिदृष्य प्रदान किया है.

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