दुनिया का दुनियाकरण(वैश्वीकरण, globalisation) हो रहा है. अमरीका में किसी पास्टर की फितूर का सीधा असर भारत की अपनी पहले से उलझी हुई मर्ज को और उलझा देती है, अफगानिस्तान में अमरीकी सैनिक कार्रवाई पर पूरी दुनिया की निगाह लगी होती है, तो बीबीसी का हिन्दी कार्यक्रम अब लन्दन के बुश हाउस से प्रसारित न होकर दिल्ली के किसी गली से निकलकर हम तक पहुँच रही है. आतंकवाद का अंतर्राष्ट्रिय नेटवर्क हो या सूचनातंत्र का अंतर्जाल, हर समाज जाने-अनजाने ही एक वैश्विक व्यवस्था से जुड़ा हुआ पाता है. राष्ट्र की अवधारणा सिमटती हुई खेल-कूद में फहराये जानेवाले झंडो के ईर्द-गीर्द सिमटने लगी है. किसी भी घटना का विश्लेषण अब सिर्फ स्थानीय परिदृष्य का हिस्सा नही रहा, उसके बाहरी, और बाहरी आयामों की चर्चा जरूरी होती जा रही है. पेट्रॉल का दाम हो, या गेहूँ-सब्जी की, देशों की सीमाओं के आर-पार होनेवाले लेन-देन से सीधे-सीधे निर्धारित होने लगी हैं. लेकिन, ये सच का महज एक पक्ष है. दूसरी तरफ भारत जैसे देश में स्थानीय, गुटीय, जातीय पहचानों को स्थापित करने की एक बाढ सी आई हुई है. विकासशील देशों के भीतर सांस्कृतिक और आर्थिक स्वायत्तता की मारा-मारी के बीच यह भ्रम हो उठता है कि वास्तव में दुनियाकरण जैसी कोई बात कहीं घटित भी हो रही है या नहीं.
स्थानीयकरण और वैश्वीकरण को अगर हम एक साथ मिलाकर देखें तो इनके अंतर्विरोधों के बीच एक बड़ा घनिष्ठ अंतर्सम्बन्ध देखने को मिलता है. एक तथ्य तो यह सामने आता है कि लोगों की निगाहें अब बड़े परिदृष्य को एक साथ देख पाती हैं. दुनिया के एक छोर पर की स्थानीय घटना दूसरे जगहों पर अपना असर छोड़ती हैं. एक जगह का मजदूरों का प्रदर्शन दुनिया के अन्य भागों में मजदूर असंतोष को बल देता है. फैशन की दुनिया में स्थानीयता का असर सुदूर भागों में फैशन के ट्रेंड में भी देखने को मिलता है. 1990 के दशक में इस दुनियाकरण की अवधारणा के प्रति लोगों में जो भय और आशंका देखने में आई थी वह आज की हकीकत बन गयी है. स्थानीयकरण का भी वैश्वीकरण हो गया है. आज का मंत्र think globally, act locally ऐसे ही नहीं बन गया है. आज की हकीकत तो यही है कि बिना वैश्वुक सोच के हम अपनी किसी भी समस्या से सफलतापूर्वक नहीं लड़ सकते. मार्क्सवाद अपने जमाने में वैश्विकता की ओर ही एक प्रयास था. आज हम सचमुच वैश्विक आयामों में जीने की ओर उन्मुख हो रहे हैं.
1990 के शुरुआती दौर में वैश्विकरण जैसे शब्दों के प्रति एक बड़े वर्ग में इसके प्रति आशंका फैलाया गया कि यह राष्ट्रीय और स्थानीय पहचानों और स्वायत्तताओं के लिये एक बड़ा खतरा है. कि यह पश्चिमी पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा लाई गयी ऐसी साजिश है जिसका उद्देश्य मुख्यतः विकाशशील देशों के संसाधनों और रोजगारों को अपने हित में उपयोग करना है. हो सकता है ऐसी आशंकाओं का अपना आधार हो. लेकिन, सभी बातों की एक बात कि दुनियावाद आज की बड़ी ताकतवर हकीकत के रूप में हमारे सामने है, और कि यह किसी अन्य वाद की महज corollary भर नहीं है. , वह चाहे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद हो, गरमाती पर्यावरण का मसला हो, या दुनिया की गरीबी के खिलाफ जंग हो, इन सब का निदान सिर्फ स्थानीय प्रयासों से सम्भव नहीं.

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