Wednesday, July 29, 2020

गर्ग और काश्य सांदीपन

भागवत 10:45:29 
‘ततश्च लब्ध संस्कारौ द्विजत्वं प्राप्य सुव्रतौ,
गर्गाद्यदुकुलाचार्याद्गायत्रं व्रतमास्थितौ’. 
‘दोनों (राम-कृष्ण) ने द्विजत्व प्राप्ति संस्कार के लिये यदुकुल के आचार्य गर्ग द्वारा गायत्री में स्थित हुए’.
भागवत 10:45:31
अथोगुरुकुले वासमिच्छन्तावुपजग्मतुः,
काश्यं सांदीपनिं नाम ह्यवंतिपुरवासिनम’.
विष्णुपुराण 5:21:19 'ततस्सांदीपनिं काश्यमवंतिपुरवासिनम्, --' में 'सांदीपनि काश्य' कहा गया है. 
गुरुकुल में रहने की इच्छा के कारण वे अवंतिपुर वासी ‘काश्य सांदीपनी’ के यहाँ गये’. 
भागवत का अंग्रेजी मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, के अनुवाद में ‘काश्य’ का तात्पर्य ‘काश्यप गोत्र’ मानकर किया गया है. 
अब हम पौराणिक सहित्य में ‘गर्ग’ और ‘काश्य सांदीपन’ का वास्तविक स्रोत तलाश करते हैं. 
विष्णुपुराण 4:19 के अनुसार दुष्यंत का वंश वृक्ष ऐसे है,
दुष्यंत- भरत- वितथ (भरद्वाज)- मन्यु- चार पुत्र (बृहत्क्षत्र, महावीय, नर, गर्ग).
गर्ग का पुत्र शिनि हुआ, जो गार्ग्य शैन्य नामक क्षत्रोपेत द्विज हुए. द्विज से आधुनिक अनुवाद्क ‘ब्राह्मण’ तात्पर्य ही लेते हैं ! अर्थात, गर्ग के पुत्र शिनि का वंशज पुरोहित कर्म से युक्त हो गया.
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अब ‘काश्य सांदीपन’ का मुआयना करते हैं. 
विष्णुपुराण 4:07 के अनुसार नहुष, क्षत्रवृद्ध, रम्भ, रजि, अनेना, इन पाँच भाइयों में क्षत्रवृद्ध का वंश,
क्षत्रवृद्ध- सुहोत्र- तीन भाई (काश्य, काश, गृत्समद). इसमें गृत्समद प्रसिद्ध ऋषि हुए हैं. महाभारत अनुशासनपर्व 30:61 में गृत्समद के पुत्र सुचेत से सुचेता ब्राह्मणों की उत्पत्ति हुई, ऐसा विष्णुपुराण कहता है. 
गृत्समद के भाई काश्य से वह वंश चला जिसमें आयुर्वेद का स्थापक धन्वन्तरी समेत ढेर सारे ऋषि योद्धा उत्पन्न हुए. धनवंतरी को यज्ञ-भाग का भोक्ता बताया गया है ! इस वंश के राजा भार्गभूमि को चातुर्वर्ण्य का प्रचारक बताया गया है. निश्चय ही कश्यप और काश्यप शब्दों से जुड़े पौराणिक चरित्र इसी वंश से जुड़े हैं. क्योंकि, ब्रह्मपुराण 09:60,61 में कहा गया,
‘वत्सस्य वत्सभूमिस्तु भार्गभूमिस्तु भार्गजः, एते त्वङ्गिरसः पुत्रा जाता वंशेऽथ भार्गव’. 
‘ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्त्रयः पुत्राः सहस्रशः, इत्येते काश्यपाः प्रोक्ता नहुषस्य निबोधत’.
वत्स का पुत्र वत्सभूमि, और भार्ग का पूत्र भार्गभूमि को यहाँ पुरोहित परम्परा से जुड़ा अंगिरा कहा गया है. नहुष के हजारों  ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य पुत्रों को ‘काश्यप’ (काश्य से उत्पन्न) कहा गया है.
वायुपुराण 98:88 में 'गार्ग्य संदीपनि' को वासुदेव (कृष्ण) का पुरोहित बताया गया है. और हमने देखा कि गर्ग और काश्य, दोनों क्षत्रिय परिवारों से निकले चरित्र हैं, जिसे पौराणिकों ने पुरोहित के रूप में रेखांकित किया है.
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वायुपुराण 65:105 में औदार्य, आयु, दनु, दक्ष, दर्भ, प्राण, हविष्मान, हविष्णु, क्रतु और सत्य को अंगिरा का औरस-पुत्र कहा गया है. अयस्य, उतथ्य, वामदेव, उशिज, भारद्वाज, शंकृतिक, गार्ग्य, काण्व, रथीतर, मुद्गल, विष्णुवृद्ध (हरिश्चंद्र), हरित, वायु, भरद्वाज, भाक्ष, आर्षभ, किम्भय को अंगिरा-पक्ष कहा गया. अंगिरा-पक्ष में शामिल पुरोहित गोत्र वैवस्वत मनु के क्षत्रिय संतानों से निकले वंश हैं. और यही हाल भार्गव पुरोहितों की शाखाओं का है. सबसे पुराने खुद को भृगु से जोड़ने वाले पुरोहितों की संख्या अल्प है. बाहर से आकर भार्गव परम्परा में शामिल हुए गोत्रों की संख्या बहुत अधिक है. और ऋक सम्हिता में भृगु एक अनार्य क्षत्रिय जन के रूप में दाशराज्ञ युद्ध में शामिल बताया गया है. आर्यों के युद्धग्रस्त जीवन में पिछड़ने वाले जन की संतानें पौरोहित्य, कृषि आदि कर्मों से युक्त हुए.  
वास्तविकता है कि स्वयं अंगिरा भी अति प्राचीन क्षत्रिय था. स्वायम्भुव मनु से उत्पन्न क्षत्रियों में अंगिरा शामिल है. अंगिरा के भाई अंग से ही वेन उत्पन्न हुआ था. और वेन के पुत्र पृथु वैन्य को महानतम क्षत्रियों में गिना जाता है.

Monday, July 27, 2020

ब्राह्मणों का कृष्ण

जातिवादी पुरोहितों ने कृष्ण के चरित्र को एक योद्धा से परिवर्तित कर अपने लिये आदर्श चरित्र कैसे और क्यों गढा ?
इसका उत्तर वैसे तो और भी कई जगह मिल जाते हैं. परन्तु भागवत के ग्यारहवें स्कंध के आरम्भिक कुछ श्लोकों को विशेष तौर पर देखा जा सकता है.
‘कृत्वा दैत्यवधं कृष्णः सरामो यदुभिर्वृतः, भुवः अवतारयत् भारम् जविष्ठं जनयन्कलिम्’
वैसे तो इस श्लोक का सीधा अर्थ है ‘यादवों से आवृत्त बलराम समेत कृष्ण ने दैत्यों को मारकर पृथ्वी का भार हल्का किया, और तुरंत कलियुग को उत्पन्न किया.’
प्रश्न है कि कलियुग को उत्पन्न करने की जल्दबाजी ब्राहमण पुरोहितों को क्यों रही होगी? इसका उत्तर इस में है कि पौराणिक गंथों में विष्णु का कलि अवतार एक ब्राह्मण परिवार में होना बताया गया है. और पुरोहितों को लगता होगा कि शायद ब्राह्मणों के हितों की रक्षा (आर्थिक हितों के अलावा वर्णशंकरता से बचाव भी) जल्द से जल्द विष्णु के कल्कि अवतार द्वारा सम्भव था. याद रहे कि क्षत्रिय चाहे गौतम बुद्ध के रूप में हो कि ययाति के रूप में, पुरोहित वर्ग के लिये हानिकारक ही था. क्योंक बुद्ध ने पुरोहितों के आर्थिक हितों को बड़ी क्षति पहुँचाई थी, और ययाति जैसे चरित्र को जातिवादी लोग वर्णशंकरता के पोषक प्रतीकों के रूप में देखते होन्गेेे..
अगले श्लोक में कहा गया कि कौरव-पाण्डवों के बीच युद्ध के निमित्त कृष्ण ने दोनों ओर से आये हुए राजाओं को मारकर पृथ्वी का भार हर लिया, यानी पृथ्वी को हल्का कर दिया.
उसके बाद तीसरे और चौथे श्लोक में ‘अत्याचारी यदुवंश’ के विनाश का ‘श्रेय’ भी कृष्ण को दिया जाना महत्वपूर्ण है. कृष्ण को यह सोचता हुआ दर्शाया गया कि ‘—अभी तो मैं पृथिवी का भार उतारकर भी नहीं उतरे के समान समझता हूँ, क्योंकि अत्याचारी यादव-कुल तो अभी बना ही हुआ है’. चौथे श्लोक में कृष्ण के मन में प्रतिक्रियावादी पुरोहित इस प्रकार सोचता हुआ पाया जाता है, ‘---- इसलिये बाँसों की बाड़ी में उत्पन्न हुए अग्नि के समान इनमें अंतः कलह उत्पन्न कर मैं शांतिपूर्वक अपने धाम को जाऊँगा’.
जिसे विष्णु का अवतार बताया गया, उसकी सोच के बारे में की गयी परिकल्पना की निम्नता देखिये !
सोचने की बात है कि एक ऐसे युद्ध की कल्पना जिसमें भारत के सारे क्षत्रियों के मारा जाना बताया गया, उसे प्रतिक्रियावादी पुरोहितों के एक वर्ग ने ईश्वर द्वारा पृथ्वी का भार-हरण होना बताया ! यह अपने आप में उस सोच को रेखांकित करता है जिसमें राजन्य की हर क्षति पुरोहित वर्ग के लाभ के रूप में देखा गया. भारतीय समाज में जातिवाद की जहर के प्रभाव की गहराई को इससे बेहतर नहीं समझा जा सकता. जिस समाज में ऐसी सोच को बढावा दिया गया हो वहाँ किसी प्रकार की राष्ट्रीय चेतना का जन्म असम्भव रहा होगा. और यह तो समाज के महज एक हिस्से की सोच को दर्शाता है. बाकी भी जातिवादी सोच की गिरफ्त में उसी प्रकार फंसे रहे.
सोच के पीछे के तर्कशास्त्र को समझने का प्रयास करते हुए हमें सावधान रहना चाहिये कि महाभारत जैसे किसी युद्ध में भारतीय प्रायद्वीप के राजाओं के मारे जाने जैसी कोई घटना घटित नहीं हुई थी. यह एक ऐतिहासिक सच्चाई नहीं है. महाभारत के युद्ध की संकल्पना अपने आप में इतिहास सम्मत नहीं है. अलग अलग युद्ध की कहानियों को आपस में जुड़ने से धीरे धीरे एक महाकाव्य बन गया, वह और बड़ा हुआ.

Sunday, July 26, 2020

क्षत्रोपेत

भागवतपुराण 09:06:01 के अनुसार
‘रथीतरस्याप्रजस्य भार्यायां तन्तवेऽर्थितः,
अङ्गिरा जनयामास ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान्’
अर्थात्त, ‘अम्बरीष के तीन पुत्र थे- विरूप, केतुमान, और शम्भु. विरूप से पृषदश्व, और उसका पुत्र रथीतर हुए. रथीतर संतानहीन था. वंश परम्परा की रक्षा के लिये उसने अंगिरा ऋषि से प्रार्थना की. उन्होंने उसकी पत्नी से ब्रह्मतेज से सम्पन्न कई पुत्र उत्पन्न किये. ये ही रथीतर-वंशीयों के प्रवर कहलाये. क्योंकि ये क्षत्रोपेत ब्राह्मण थे- क्षत्रिय और दोनों गोत्रों से इनका सम्बंध था.’ (गीताप्रेस का अनुवाद)
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विष्णुपुराण 4:02:10 में अम्बरीष के पुत्र वीरूप, और उसके पुत्र रथीतर के वंशज के बारे में कहता है ‘अत्रायं श्लोकः- एते क्षत्रप्रसूता वै पुनश्चाङिरसाः स्मृताः. रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः’. अर्थात्, ‘यह श्लोक है कि ये (रथीतर) क्षत्रिय संतान होते हुए भी आंगिरस कहलाये. अतः वे क्षत्रोपेत ब्राह्मण हुए’.
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वायुपुराण 88:06 कहता है ‘अबरीषस्तु नाभागिर्विरूपस्तस्य च आत्मजः, पृषदश्वो विरूपस्य तस्य पुत्रो रथीतरः’.
अगला श्लोक, ‘एते क्षत्रप्रसूता वै पुनश्चाङिरसः स्मृताः, रथीतराणां प्रवराः क्षात्रोपेता द्विजातयः’
यहाँ भी अर्थ वही है कि ‘ये क्षत्रिय उत्पन्न हुए, लेकिन अंङिरस हो गये. रथीतर की संतति क्षत्रिय समान द्विज थे.
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ऐसा ही भरत के गोद लिये हुए, बृहस्पति द्वारा अपनी भाभी ममता के बलात्कार से उत्पन्न बालक, वितथ को लेकर भी किया गया है. वितथ ही भरद्वाज है, इसे छुपाने के लिये भरद्वाज से भरत की पत्नियों का यौन सम्बंध करवाने का जघण्य कार्य ऐसे पुरोहितों ने किया है ! और मजे की बात कि यहाँ भी ‘क्षत्रोपेत’ शब्द नहीं पाया जाता. ‘क्षत्र + अपेत’ की संधि प्पर आधारित इस शब्द का अर्थ इनमें शामिल दो हिस्सों से स्पष्ट है. क्षत्र से जो बाहर निकल गया, उसे क्षत्रोपेत कहा गया. ‘संस्कृत कोश समुच्चय’ में ‘अपेत’ का अर्थ escaped (निकला हुआ), departed, gone, having retired from (निवृत्त), free from, lost(खो चुका), gone away(जा चुका), fled (भागा हुआ) आदि है. 
अब यह पूछ जाना चाहिये कि क्या पौराणिक ग्रंथों में जिस जिस जगह पुरोहितों ने राजाओं की स्त्रियों से सन्तानोत्पत्ति का उटपटांग दावा किया है, क्या उन सभी जगहों पर ‘क्षत्रोपेत’ धरपुरा का इस्तेमाल किया है ?
नहीं किया है ! इक्ष्वाकु वंशी दशरथ की पत्नियों के माध्यम, या विचित्रवीर्य की पत्नियों के माध्यम से संतान के लिये ‘क्षत्रोपेत’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है. यही नहीं वसिष्ठ को कल्माशपाद की पत्नी से संतान उत्पन्न करने का उल्लेख है, मगर ‘क्षत्रोपेत’ शब्द वहाँ नहीं है. ऐसी तमाम जगहों पर क्षत्रोपेत का प्रयोग नहीं होना कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि क्षत्रोपेत शब्द का वह अर्थ है ही नहीं जो भागवतपुराण जैसे नये रचे गये पुराणों में दिखाने का प्रयास हुआ है. यह पुरोहित वर्ग का धांधली है ! यह पुरोहीत वर्ग का क्षत्रियों के प्रति प्रतिशोध है ! उनसे रक्त-सम्बंध विच्छेद की घोषणा है ! समाज में आर्थिक दृष्टि से पिछड़ जाने की कुंठा है ! 
विष्णुपुराण, वायुपुराण पढने के बाद जब कोई भागवतपुराण को पढता है तो उसे आभास हो जाता कि समय के साथ पुराण लेखन संकलन से जिड़े पुरोहितों ने अतीत के साथ किस प्रकार का बलात्कार किया है. समाज में सर्वोच्च धार्मिक मान्यता पाने के लिये कैसे कैसे ऊल-जुलूल कपोल-कल्पित तथाकथित अलौकिक कहानियाँ रची. क्षत्रियों के संदर्भ में अतीत का चित्रण अपमानजनक तोड़-मरोड़ के साथ प्रस्तुत करते समय उन्होंने यह नहीं सोचा कि वो अपने अतीत के तथ्यों को भी मिटा रहे हैं ! आर्थिक कारणों से उपजे वर्गीय विभाजन को नस्ली मानकर पुरोहितों को बाकी सभी वर्णों का पिता बताने के लिये झूठ का जो पुलिंदा लिखा उसमें बची-खुची बौद्धिकता भी लुप्त हो गयी.
उपरोक्त उदाहरण महज अपवाद नहीं है, बल्कि समय के साथ नये पौराणिक ग्रंथ लेखन का यही ढर्रा रहा. यही कारण है कि जातिवादी ब्राह्मणवाद से पीड़ित पुरोहित वर्ग पुराने पौराणिक ग्रंथों के उद्धरणों की जगह अपेक्षाकृत नये पुराणों का हवाला देते हैं. बौद्धिक कचड़े में सना हुआ ऐसे संकलन भारतीय समाज के सम्मानित ग्रंथ हैं !   

Sunday, July 19, 2020

प्राचीन इंद्र-पूजा बनाम नया कृष्ण-पूजा

(विष्णुपुराण 5:10:,,,,)
व्रजमण्डल में निर्मल आकाश और नक्षत्रों से भरे
शरत्काल आने पर कृष्ण ने समस्त व्रजवासियों को इंद्र का उत्सव मनाने की तैयारी करते देखा. कृष्ण ने उन गोपों को उत्सव के उमंग में देख कौतुल वश अप्पने बूढे-बुजुर्ग से पूछा, 'आपलोग जिसके लिये इतने प्रसन्न है वह इंद्र-यज्ञ क्या है?'
'मेघ और जल का स्वामी देवराज इंद्र है. उसकी प्रेरणा से मेघगण जलरूप रस की वर्षा करते हैं. हम और अन्य समस्त देहधारी उस वर्षा से उत्पन्न अन्न पर निर्भर हैं. अतः उस अन्न से हम देवताओं को तर्पित करते हैं. उस वर्षा से बढी हुई घास से ही तृप्त होकर ये गौवें तुष्ट और पुष्ट होकर वत्सवती एवं दुधारू होती हैं. जहाँ भूमि पर बरसने वाले मेघ दिखायी देते हैं उसपर कभी फसल और घास का अभाव नहीं होता, और लोग भूखे नहीं रहते. यह पर्जन्यदेव पृथ्वी के जल को सूर्यकिरणों द्वारा खींचकर सम्पूर्ण प्राणियों की वृद्धि के लिये उसे मेघों द्वारा पृथ्वी पर बरसाता है. इसीलिये, वर्षा ऋतु में सभी राजा, हमलोग और अन्य मनुष्य यज्ञ द्वारा इंद्र की अर्चना करते हैं.'
इंद्रपूजा के बारे में नंदगोप से यह सुनकर दामोदर ने इंद्र को नाराज करने के लिये कहा, -------  'जो व्यक्ति जिस विद्या से युक्त है उसका वही इष्ट-देवता है, वही पूजा-अर्चना के योग्य है, और वही परम उपकारी है. जो व्यक्ति एक से फल लाभ कर अन्य की पूजा करता है उसका इहलोक अथवा परलोक में कहीं भी शुभ नहीं होता. खेतों के अंत में सीमा है. सीमा के अंत में वन है. और वनों के अंत में समस्त पर्वत है. वे पर्वत ही हमारी परमगति हैं. हमलोग न तो किवाड़ और दीवार के अंदर रहने वाले हैं, और न ही निश्चित घर अथवा ख्त वाले किसान ही हैं. हमलोग तो घुमक्कर लोग हैं.'     
'सुना जाता है कि इस वन के पर्वतगण इच्छानुसार रूप धारण करने वाले हैं. वे मनोवांछित रूप धारन क्कर शिखरों पर विहार करते हैं. जब कोई वनवासी गिरिदेवों को किसी तरह की बाधा पहुँचाते हैं तो वे सिंह आदि का वेश बनाकर उन्हें मार डालते हैं. अतः आज से गिरियज्ञ अथवा गोयज्ञ का प्रचार हो. हमें इंद्र से क्या प्रयोजन ? हमारे देवता तो गौवें और पर्वत ही हैं. ब्राह्मणलोग मंत्र-यज्ञ, तथा कृषकगण सीरयज्ञ (हलयज्ञ) करते हैं. अतः पर्वत और वनों में रहने वाले हमलोगों को गिरियज्ञ और गौयज्ञ करना चाहिये.'
'अतः आप लोग विधिप्पूर्वक मेध्य पशुओं की बलि देकर विविध सामग्रियों से गोवर्द्धन शैल(पर्वत या पहाड़) की पूजा करें. आज सम्पूर्ण व्रज का दूध एकत्र कर लो और उससे ब्राह्मणों तथा अन्य याचकों को भोजन कराओ. इस विषय में और अधिक सोच-विचार मत करो. गोवर्धन की पूजा, होम और ब्राह्मण-भोजन समाप्त होनेपर शरद-ऋतु के पुष्पों से सजे हुए मस्तकवाली गौएँ गिरिराज की प्रदक्षिणा करें. हे गोपगण ! आपलोग यदि प्रीतिपूर्वक मेरी इस सम्मति के अनुसार कार्य करेंगे तो इससे गौओं को, गिरिराज को और मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी.' 
कृष्ण की बात सुनकर नंद आदि व्रजवासी गोपों ने प्रसन्नता से खिले हुए मुख से 'साधु, साधु' कहा, और बोले, 'हे वत्स ! तुमने अपना जो विचार प्रकट किया है वह बड़ा ही सुंदर है. हम सब ऐसा ही करेंगे. आज से गिरियज्ञ का प्रचार किया जाये.' 
तदनतर उन व्रजवासियों ने गिरियज्ञ का अनुष्ठान किया तथा दहि, खीर, और मांस आदि से पर्वतराज को बलि दी. सैकड़ों, हजारों ब्राह्मणों को भोजन करा, तथा पुष्पार्चित गौओं और सजल जलधर के समान अत्यंत गर्जनेवाले साँड़ों ने गोवर्धन की परिक्रमा की. उस समय कृष्ण ने पर्वत के शिखर पर अन्य रूप में प्रकट होकर यह दिखलाते हुए कि वो मूर्तिमान गिरिराज हैं, उन गोपश्रेषों के चढाये हुए विविध व्यंजनों को ग्रहण किया. 
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यह कहानी ब्राह्मणवाद के विकास में एक निहायत ही महत्वपूर्ण प्रक्रिया पर प्रकाश डालता है. इसमें देखा जा सकता है कि कैसे पुरोहितों के एक वर्ग ने सामाजिक विकास के साथ अपने हितों को सुरक्षित करने की कोशिश की. इस कहानी में ऐसी तमाम सूचनाएँ है जिसके माध्यम से हमें उस युग के बारे में पता चलता है जब सुसभ्य आर्य सामाजिक परिवेश से बाहर बसने वाले पशुचारियों को उनके धार्मिक सांंस्कृतिक तत्वों को मुख्यधारा में शामिल करते हुए नये धार्मिक कर्मकाण्डों को जनम दिया गया. वास्तव में यह एक क्लिष्ट प्रक्रिया की ओर इशारा करता है. इसमें कई प्रकार की सम्भावनाएं आपस में क्रियाशील देखी जा सकती है. एक तो यह कि पुरोहितों में ऐसे लोग भी थे जो यज्ञ संस्कृति से अलग अपने लिये सामाजिक सम्मान तलाश रहे थे. पौराणिक लेखन के युग में यज्ञ समाज के उच्च वर्ग से जुड़ी चीज थी. साधारण पुरोहितों के जीवन यापन के लिये लोकप्रिय धार्मिक अनुष्ठानोंंका आश्रय लेना जरूरी हो गया था. पुरोहित वर्ग में अवहेलित, शास्त्रों के कम जानकार पुरोहितों ने समाज के पशुचारी, कृषक, वनिक आदि समुदायों में अपनी पैठ बनाने के लिये उनके अनुकूल धार्मिक अनुष्ठानों  को प्रोत्साहित किया. 
यह भी सम्भव है कि जिन पुरोहितों को आर्य कबीलों के बीच अतीत की शत्रुता में उनके जन, कुल, परिवार के पराजय से जुड़ी कहानियाँ परेशान करती होंगी, जिसे विजेता जनों, कुलों, परिवारों, क्षात्र-बल से उन्हें अपने अधीन किये रहे थे, के विरुद्ध प्रतिक्रिया रही होगी. और ऐसे पुरोहितों ने क्षत्रियों के सबसे महत्वपूर्ण देवता को साहित्य में नीचा दिखाने से उन्हें आत्मिक तुष्टि मिलती होगी. और इसी क्रम में ऐसे पुरोहितों ने ऋचाओं के देवताओं की जगह नये देवताओंं को प्रचलित प्रचारित किया.              

Saturday, July 18, 2020

आर्य समुदाय का निर्माण


ऋकों के युग में जो समुदाय खुद को आर्य कहता था, वह अनेक छोटे छोते समुदायों के सम्मिलन से बना था. शोध के आधार पर यह निष्कर्ष स्वीकार किया जा सकता है कि भारत में पहुँचे ऋग्वैदिक समुदाय का निर्माण उत्तर-पूर्व ईरान और उत्तरी अफगानिस्तान के इलाके में हुआ था. इसी इलाके में मित्र और वरुण पूजकों, जो खुद को असुर कहते थे, का उस इलाके में उत्तर से आये इंद्र पूजक उन आर्यों से सम्बंध स्थापित हुआ. उत्तर से आये इंद्र-पूजक आर्यों ने असुर संस्कृति के लोगों को दास कहा. ऋग्वेदिक जमाने में भी हम कई दास नामांत, जैसे सुदास, दिवोदास, महत्वपूर्ण आर्य राजा का नाम ऋचाओं में पाते हैं. अवेस्ता में वर्णित ईरानी धर्म में अहुर-माज्दा में असुर शब्द इस बात का समर्थन करता है. अवेस्ता में देव एक नकारात्मक शब्द है. यह मिथ्र और वरुण पूजन वाले संस्कृति पर बाहर से आये बर्बर असभ्य देवों का द्योतक है. अतः हमें आज के ईरान अफगानिस्तान की उत्तरी सीमा के इलाके में असुर और देव संस्कृति के बीच संघर्ष और तत्पश्चात्त सह-अस्तित्व के विकास की भूमि की पहचान होती है. उत्तर पूर्वी ईरानी असुर संस्कृति वाले लोगों के दक्षिण दैत्यों एवं दानवों की स्थित हो सकती है. ऋचाओं के रचयिताओं का उनके जन के परिप्रेक्ष्य एक वृहत विश्लेषण पर आधारित विदेशी भारतविदों के शोध से इस तथ्य को उद्घाटिक किया गया है. 
सप्तसिंधु में पहुँचने वाले जन उसी उत्तर-पूर्वी ईरान से पहुँचे थे. इंद्रपूजक जन को अगर सूर्यवंशी जनों से जोड़ा जा सकता है, तो असुर मूल के जनों को चंद्रवंशी या सोमवंशी के रूप में पहचाना जा सकता है. यहाँ ऋग्वेदिक आर्यों में बहुसंख्य चंद्रवंशी जन से जुड़े लोग ही थे. ऋचाओं से स्पष्ट हो जाता है कि देवताओं में इंद्र को सर्वोच्च महत्व के साथ स्वीकार किया गया था. आर्य जनों के बीच आपसी संघर्ष एक आम बात थी. इन जनों के बीच अन्य आर्य जनों के विरुद्ध गठबंधन उस युग की पहचान थी. एक आर्य जन या जनों का गठबंधन दूसरे अनार्य जनों का सहयोग लेने से परहेज नहीं करते थे. दाशराज्ञ युद्ध जैसी घटनाओं के माध्यम से ही आर्य जन शनैः शनैः भारतीय भूमि में पूरब और दक्षिण की ओर बढते रहे. ऋग्वेदिक आर्यों का सामाजिक संगठन में कार्य-आधारित वर्ण की अवधारणा विकसित हुई. ऋचाओं के रचनाकार जनों के महत्वपूर्ण लोग थे. वो योद्धा थे. सारे ऋषियों का सम्बंध जनों के राजा से जोड़ा जा सकता है. आर्थिक हितों में तेजी से उत्पन्न दूरी ने आर्यों के सामाजिक समरसता को प्रभावित किया. और राजन्य(क्षत्रिय) बनाम पुरोहित का विभाजन दिखने लगा. हारे हुए स्थानीय जनों को शूद्र के तौर पर सामाजिक ढांचे में समाहन मिला. धीरे धीरे क्षत्रिय और पुरोहित वर्ग से खिसककर लोग वैश्य कर्म में युकत हुए.
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि भारत में क्षत्रिय और पुरोहित वर्ग में अधिकांश असुर-कुल या मित्र-वरुण कुल के लोग ही पाये जाते हैं. प्राचीन इंद्र-पूजक आर्यों की संख्या निश्चय ही काफी सीमित दीखी ताती. यह बात पौराणिक ग्रंथों में राजवंशों के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है.       
इसके साथ यह भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आर्यों की ईरानी अतीत के समय सिंधु सभ्यता वाले लोगों से सम्पर्क रहा था. सिंधु सभ्यता का प्रभाव विस्तार भारत में हरियाना से लेकर अफगानिस्तान तक पाया जाता है. चौदहवीं पंद्रहवीं शताब्दी ईसापूर्व आर्य भारत की ओर बढे तब सिंधू सभ्यता का उत्कर्ष बीत चुका था, लेकिन उसके अवशेषों के साथ आर्यों का सामना अवश्य हुआ होगा. ऋचाओं एवं तत्पश्चात यजुषों की यज्ञ संस्कृति में अगले कुछ सौ वर्षों में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है. ऋचाओं के सात आठ सौ वर्ष बाद की जाति आधारिक ब्राह्मण संस्कृति के निम्न संस्करणों में स्थानीय धार्मिक तत्वों की भरमार नजर आती है. इस समय तक आर्यों का आर्य-पूर्व भारतीय लोगों के साथ निकटवर्तीए सम्बंध स्थापित हो चुका था. 

Friday, July 17, 2020

An Episode on Religion & Sex

An Episode on Religion & Sex
(from Vamana Purana 06, 07)

Narada asked- "Please, make me know why and for what reason lord Mahadeva had burnt the body of sex-god into ashes. Pulastya replied- "O Brahmin! Lord Sankara began to walk to and fro in the indecisive state of mind subsequent to the death of Satl and ruination of the yajna arranged by her father Daksa. The sex-god with the flower weapon had blown a weapon known as Unmada on Sankara when he saw him bereaved of wife.
Bearing the pain caused by that unmada arrow, Sankara badly intoxicated began to move in forests and reservoirs.
O divine sage! Like an elephant hit by an arrow, lord Sankara began to recollect the moments of acquaintance with Sat! but could not be satiated anyhow.
O hermit! In the status of sheer anxiety, Sankara fell down into Kalindi (Yamuna). The temperature in his body was so high thathis immersion, the water of that river boiled and turned into dark colour.
Since then Kalindi's water became as dark as Anjana and Bhringa and that holy river started flowing like the bunch of earth's hair.
Mahesvara then voluntarily strolled at a number of holy rivers reservoirs, fountains, enchanting river banks, ponds, lotus grown forests, mountains, jungles and mountain peaks but could not feel a sign of relief from the anxiety.
O divine sage! sometimes he would sing, on other moments weep and sometimes think about the slim and beautiful Sati, the daughter of Daksa.
Now he would sleep, now he would dream and on seeing Sati in dreams, he used to blutter in these words- O cruel! Just stop O idiot! Why are you leaving me alone? O beloved! O enchanting Sati! I am burning myself in the sensual fire due to your separation.
‘O Sati! Are you really annoyed? O darling! Don't be angry. I salute you with my head bowing, O beloved! I ceaselessly listen to you, watch you, touch you, pray to you and embrace you. Why are you not talking with me? O lady! Who is so cruel as not to express sympathy on a wailing man? Specially, who will not melt when she watches her own husband wailing. It is confirmed now that you really are cruel at heart’.
‘O slim lady! You had earlier said that you will not live without me but you would not stand firm in your words, your statement was untrue’.
‘O beautiful eyed lady! Come! Come to me. I am immersed in the lust ocean. Hence, embrace me. O darling! I depose that there is no other option except that I cool down the temperature’.
When such a wailing dream was over, he immediately stood up and started weeping loudly in the forest.
When the sex-god watched at a distance that lord Sankara was weeping bitterly, he took his bow soon and again shot a shaft called Santap at him. The Santapa arrow had made him more anxious and passionate to sex. In excess of appeal, he began to expirate from the mouth resulting anxiety spread over the whole world and the time thus passed.
The sex-god shot Vijrimbhana weapon on Mahadeva resulting frequent yawning. At this state of body he strolled here and there and crossed the four directions. He thus reached in the world of demi-gods (यक्ष) where he saw Pradhana Pancalika, the son of the king Kubera. He accessed to him and said- "O Nephew! You are extremely chivalrous. Do today as I suggest to you." (मेरी समझ में यह समलैंगिकता से जुड़ा आग्रह हो सकता है.)
Pancalika replied- "O master! I will execute the assignment in spite of being tough to do for the gods. O master of unique powers ! O Shabhu ! please order me. I am your loyal servant.’’ Mahesvara said- "My body is feeling aggravated sensuality on account of the demise of Ambika (Sati) as she was only able to satiate me. As I am hit hard by the Vijrimbhana and Unmada shafts, patience, coitus or pleasure has departed away from me causing sheer anxiety. "O son! Nobody other than you can hold the acute shafts of Vijrmbhana, Santapa and Unmada shot by sex-god. Hence, hold these within yourself." Pulastya said- "That demi-god(यक्ष) had held all those shafts including Vijrimbhana and it immediately cooled down lord Sankara. Having been satisfied, he said-Mahadeva said- ‘O son! As you have held such fierce shafts within yourself, I will endow you with a boon worth bringing in honour and obeisance for you in this whole world. An old man, a child, young chap or a woman whosoever will either touch or worship you in the month of Caitra (March) shall immediately the intoxicated with sensuality(यौन उत्तेजना के लिये उपाय, सम्मोहन !). O demi-god! They all will sing, dance, do merriments and play with expertise on musical instruments. They shall joke and laugh before you still bound in intoxication (Yoga). You will be honoured and addressed with my name. You will attain popularity with the name of Pancalikesa. You shall receive the highest honour and could give blessings with my pleasure. Now depart to your destination. 
Under compliance with the words from Mahesvara, that demi-god immediately went to see all countries. The supreme holy state at north to Kalanjara and south to the Himalaya was the country where he finally settled down permanently. He became popular by the grace of Rudra. Lord Sankara also went to Vindhya mountain when he left that place. The sex-god reached there also and stared at Sankara. In order to defend him from his encounter, lord Sankara started running from there. The sex-god chased them and at the end of such a race lord Mahadeva entered into a dense forest known as Daruvana. The household hermits used to live there with their wives. Having seen lord Sankara there, the hermits saluted him with sheer obeisance and the lord asked for alms from them(यह किस प्रकार की भिक्षा है?!). All hermits kept mum and did not respond to Sankara. O Narada! lord Sankara then began to stool in all hermitages. Having seen Mahadeva enter into the asrama all, wives of Bhargava and Atreya except most chaste Arundhatl and Anusuya became sensuous and ejaculated. The enchanted, sensuous and passionate women of asrama then followed lord Mahadeva wherever he went. As the (she) elephants follow the intoxicated male-elephant, the wives of hermits began to run after lord Mahadeva and contravened all the rules of the household. O sage! Having seen such a phenomenon, Bhargava and Angirasa hermits blew a curse that his penis (linga) fell down on the earth.