भागवत 10:45:29
‘ततश्च लब्ध संस्कारौ द्विजत्वं प्राप्य सुव्रतौ,
गर्गाद्यदुकुलाचार्याद्गायत्रं व्रतमास्थितौ’.
‘दोनों (राम-कृष्ण) ने द्विजत्व प्राप्ति संस्कार के लिये यदुकुल के आचार्य गर्ग द्वारा गायत्री में स्थित हुए’.
भागवत 10:45:31
अथोगुरुकुले वासमिच्छन्तावुपजग्मतुः,
काश्यं सांदीपनिं नाम ह्यवंतिपुरवासिनम’.
विष्णुपुराण 5:21:19 'ततस्सांदीपनिं काश्यमवंतिपुरवासिनम्, --' में 'सांदीपनि काश्य' कहा गया है.
गुरुकुल में रहने की इच्छा के कारण वे अवंतिपुर वासी ‘काश्य सांदीपनी’ के यहाँ गये’.
भागवत का अंग्रेजी मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, के अनुवाद में ‘काश्य’ का तात्पर्य ‘काश्यप गोत्र’ मानकर किया गया है.
अब हम पौराणिक सहित्य में ‘गर्ग’ और ‘काश्य सांदीपन’ का वास्तविक स्रोत तलाश करते हैं.
विष्णुपुराण 4:19 के अनुसार दुष्यंत का वंश वृक्ष ऐसे है,
दुष्यंत- भरत- वितथ (भरद्वाज)- मन्यु- चार पुत्र (बृहत्क्षत्र, महावीय, नर, गर्ग).
गर्ग का पुत्र शिनि हुआ, जो गार्ग्य शैन्य नामक क्षत्रोपेत द्विज हुए. द्विज से आधुनिक अनुवाद्क ‘ब्राह्मण’ तात्पर्य ही लेते हैं ! अर्थात, गर्ग के पुत्र शिनि का वंशज पुरोहित कर्म से युक्त हो गया.
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अब ‘काश्य सांदीपन’ का मुआयना करते हैं.
विष्णुपुराण 4:07 के अनुसार नहुष, क्षत्रवृद्ध, रम्भ, रजि, अनेना, इन पाँच भाइयों में क्षत्रवृद्ध का वंश,
क्षत्रवृद्ध- सुहोत्र- तीन भाई (काश्य, काश, गृत्समद). इसमें गृत्समद प्रसिद्ध ऋषि हुए हैं. महाभारत अनुशासनपर्व 30:61 में गृत्समद के पुत्र सुचेत से सुचेता ब्राह्मणों की उत्पत्ति हुई, ऐसा विष्णुपुराण कहता है.
गृत्समद के भाई काश्य से वह वंश चला जिसमें आयुर्वेद का स्थापक धन्वन्तरी समेत ढेर सारे ऋषि योद्धा उत्पन्न हुए. धनवंतरी को यज्ञ-भाग का भोक्ता बताया गया है ! इस वंश के राजा भार्गभूमि को चातुर्वर्ण्य का प्रचारक बताया गया है. निश्चय ही कश्यप और काश्यप शब्दों से जुड़े पौराणिक चरित्र इसी वंश से जुड़े हैं. क्योंकि, ब्रह्मपुराण 09:60,61 में कहा गया,
‘वत्सस्य वत्सभूमिस्तु भार्गभूमिस्तु भार्गजः, एते त्वङ्गिरसः पुत्रा जाता वंशेऽथ भार्गव’.
‘ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्त्रयः पुत्राः सहस्रशः, इत्येते काश्यपाः प्रोक्ता नहुषस्य निबोधत’.
वत्स का पुत्र वत्सभूमि, और भार्ग का पूत्र भार्गभूमि को यहाँ पुरोहित परम्परा से जुड़ा अंगिरा कहा गया है. नहुष के हजारों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य पुत्रों को ‘काश्यप’ (काश्य से उत्पन्न) कहा गया है.
वायुपुराण 98:88 में 'गार्ग्य संदीपनि' को वासुदेव (कृष्ण) का पुरोहित बताया गया है. और हमने देखा कि गर्ग और काश्य, दोनों क्षत्रिय परिवारों से निकले चरित्र हैं, जिसे पौराणिकों ने पुरोहित के रूप में रेखांकित किया है.
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वायुपुराण 65:105 में औदार्य, आयु, दनु, दक्ष, दर्भ, प्राण, हविष्मान, हविष्णु, क्रतु और सत्य को अंगिरा का औरस-पुत्र कहा गया है. अयस्य, उतथ्य, वामदेव, उशिज, भारद्वाज, शंकृतिक, गार्ग्य, काण्व, रथीतर, मुद्गल, विष्णुवृद्ध (हरिश्चंद्र), हरित, वायु, भरद्वाज, भाक्ष, आर्षभ, किम्भय को अंगिरा-पक्ष कहा गया. अंगिरा-पक्ष में शामिल पुरोहित गोत्र वैवस्वत मनु के क्षत्रिय संतानों से निकले वंश हैं. और यही हाल भार्गव पुरोहितों की शाखाओं का है. सबसे पुराने खुद को भृगु से जोड़ने वाले पुरोहितों की संख्या अल्प है. बाहर से आकर भार्गव परम्परा में शामिल हुए गोत्रों की संख्या बहुत अधिक है. और ऋक सम्हिता में भृगु एक अनार्य क्षत्रिय जन के रूप में दाशराज्ञ युद्ध में शामिल बताया गया है. आर्यों के युद्धग्रस्त जीवन में पिछड़ने वाले जन की संतानें पौरोहित्य, कृषि आदि कर्मों से युक्त हुए.
वास्तविकता है कि स्वयं अंगिरा भी अति प्राचीन क्षत्रिय था. स्वायम्भुव मनु से उत्पन्न क्षत्रियों में अंगिरा शामिल है. अंगिरा के भाई अंग से ही वेन उत्पन्न हुआ था. और वेन के पुत्र पृथु वैन्य को महानतम क्षत्रियों में गिना जाता है.
