Tuesday, February 9, 2021

दैवाधीनं जगत्सर्वं मंत्राधीनश्च देवता: --

 आस्था के केंद्र में धारणा है. यह मानना कि यह करने से, ऐसा करने से, ऐसा होता है; आस्था का निर्माण होता है. ऋचा कहता है कि ब्रह्मा (स्तोत्र, प्रार्थना, प्रशंसा) से इंद्र के बल में वृद्धि होती है, तो यह आस्था है. ऐसा मानना कि छंद का प्रभाव देवताओं को सबल, सामर्थ्यवान, और सक्षम बनाता है, तो यह आस्था है. इसीलिये बौद्धिक चिंतन में देवताओं को छंदज, छंद से जनमा हुआ, कहा गया. देवताओं को सोम रस पसंद है, यह भी आस्था का विषय है. सोम अर्पित करने से देवता शक्तिशाली, ऐश्वर्यशाली होते हैं, यह आस्था का विषय है. इसी आस्था पर आधारित बौद्धिक चिंतन से यह निष्कर्ष निकला कि देवता सोमपा, सोम पायी, है.

आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास के साथ होने वाले बौद्धिक विकास से पुरानी आस्था की जगह नयी आस्था का विकास होता है. ऋकों में मंत्र शब्द नहीं पाया जाता. इससे जाहिर है कि मंत्र का सम्बंध यज्ञ और उससे जुड़े कर्मकाण्ड के विकास से है. यह एक नई प्रकार की आस्था का द्योतक है. यज्ञ में बहुत सारी ऋचाओं का इस्तेमाल मंत्र के तौर पर हुआ है. मंत्र से जुड़ी आस्था यह है कि इससे देवताओं को बाध्य होकर प्रसन्न होना पड़ता है. पूर्व में देवताओं को प्रसन्न करने के लिये स्तुति की जगह बाद में मंत्रों ने ले लिया. स्तुति और प्रार्थना वाली आस्था से मंत्र वाली आस्था में बदलाव मानवीय बुद्धि में विकास का परिणाम था. कर्मकाण्डों से जुड़े लोग अब मंत्रों के माध्यम से देवताओं जो जबरन अपने नियंत्रण में लेने की बात करने लगे. ब्रह्म, ब्रह्मा, ब्रह्माण, ब्रह्माणि जैसी शब्दावलियों का अर्थ ऋक सम्हिता में स्त्रोत्र, प्रार्थना, प्रशंसा बताया गया है. इन्हें कण्ठस्थ रखने और यथोचित इस्तेमाल करने वाले ब्राह्मण कहलाते थे. मंत्रों के युग में ब्राह्मण ऋत्विज ने तमाम तरह के ऋतिजों में प्रमुखता पाई. क्योंकि उसने मंत्र के माध्यम से देवताओं को अपने नियंत्रण में करने का दावा किया था. पौरोहित्य का बौद्धिक विकास का कदम यह रहा, कि ब्राह्मण पुरोहित ने स्वयं को देवताओं से भी ऊपर स्थापित करने का दावा किया. कुछ न सही, तो जनमानस में खुद को देवताओं जैसा सम्मान पाने का हकदार तो बनाया ही ! यह भी आस्था का एक रूप था. इस आस्था के सहारे ब्राह्मणवाद ने लगभग हजार वर्ष तक अपनी यात्रा सफलतापूर्वक जारी रखा है. इस आस्था को हम निम्नोक्त श्लोक में अभिव्यक्त पाते हैं,

'दैवाधीनं जगत्सर्वं मंत्राधीनश्च देवता:, ते मंत्रा:ब्राह्मणाधीना:, तस्मात् ब्राह्मण देवता:'

इस श्लोक को मेरे एक मित्र मनोज मन्मथ जी ने गर्वपूर्वक अपनी दीवाल पर प्रदर्शित किया है. हालाँकि इस प्रकार की आस्था को अभिव्यक्त करता हुआ विशाल साहित्य पौराणिक आख्यानों में उपलब्ध है. लेकिन, वहाँ भी ब्राह्मण शब्द का अर्थ ब्रह्म (स्तोत्र, प्रार्थना) को जानने वाला ही बताया गया है. मगर आज ऐसे श्लोकों का गर्वोन्नत उल्लेख 'गर्व से कहो हम ब्राह्मण हैं' जैसा नारा लगाने वाले लोग करते हैं. इस प्रकार का श्लोक आज आस्था पर आधारित नहीं है, सामुदायिक पहचान को परिभाषित करने के प्रयास पर आधारित है. दुखद यह है कि आस्था और अर्थ से हीन ऐसे प्रयास से ब्राह्मणवाद कलंकित होता है. इसकी जगह पर जातिवादी ब्राह्मणवाद बचा रह जाता है, जो हिंदुओं का धार्मिक नेतृत्व करने का नैतिक अधिकार नहीं रखता.

Friday, February 5, 2021

इक्ष्वाकु और वसिष्ठ

 पौराणिक आख्यानों में बहुत सारी कहानियाँ हैं जिसमें वसिष्ठ को इक्ष्वाकु से लेकर राम, और उसके बाद तक, का खानदानी पुरोहित के तौर पर दिखाया गया है. लेकिन इसके साथ ऐसे अनेक प्रसंग यहाँ वहाँ बिखड़े पड़े हैं जिसमें ईक्ष्वाकुओं एवं वसिष्ठ कुल के बीच घोर शत्रुता का उल्लेख है. पौराणिक आख्यानों में जहाँ जहाँ क्षत्रिय विरोधी भावना खुल कर सामने आई है, वहाँ इक्ष्वाकुओं एवं वसिष्ठ कुल के लोगों के बीच वैमनस्य और शत्रुता का उल्लेख किया गया है. इसका कुछ उदाहरन हम देख सकते हैं,

-  वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड अध्याय 65 में भी इस कहानी का एक संस्करण है. इसमें भी सौदास द्वारा दो राक्षसों में से एक को मारने का उल्लेख है. सौदास के यज्ञ समापन पर वसिष्ठरूपी राक्षस को ‘पूर्व वैर स्मरण’ होने का उल्लेख है, ‘अथावसाने यज्ञस्य पूर्ववैरमनुस्मरन्, वसिष्ठरूपी राजानमिति होवाच राक्षसः’. तात्पर्य यह है कि यज्ञ करवा रहे वसिष्ठ के मन में पुराने वैर के स्मरण से राक्षस प्रवृत्ति जाग उठी.

-वाल्मीकिरामायण 1:69:27 में इक्ष्वाकु वंश का विवरण में कहा गया है, ’रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्धः पुरुषादकः, कल्माषपादो ह्यभवत्तस्माज्जातस्तु शङ्खणः’. इस श्लोक में कल्माषपाद को ‘पुरुषादक’ (नरभक्षी) कहा गया है.

- विष्णुपुराण 1:01:12 में पराशर को यह कहते उद्धृत किया गया है कि विश्वामित्र द्वारा नियुक्त राक्षसों नें वसिष्ठ के पुत्रों को खा लिया था. इसी बात को नाटकीय बनाकर अनुशासनपर्व 03:03,04, और आदिपर्व 173:08 में लिखा गया कि विश्वामित्र ने क्रोध में ‘तेजस्वी राक्षस’ रच डाले थे. राक्षस की रचना से तात्पर्य विश्वामित्र के सहयोग से मित्रसह का कल्माषपाद हो जाना है. इस कथा में वसिष्ठ के शाप से कल्माशपाद के राक्षस हो जाने का भी उल्लेख है. वायुपुराण 01:175 में सौदास द्वारा वसिष्ठ पुत्र शक्ति के ‘निग्रह’ अर्थात् पराजित करने का उल्लेख है. अतः ‘तेजस्वी राक्षस’ सौदास को विश्वामित्र का सहयोग मिला था.

- आदिपर्व 180 में पराशर द्वारा ‘राक्षस-यज्ञ’ के आयोजन का वर्णन है. विष्णुपुराण 1:01:14 में भी इस राक्षस विनाश के लिये सत्र का उल्लेख है.

- विष्णुपुराण 1:01:14 ‘---, भस्मीभूताश्च शतशस्तस्मिन्सत्रे निशाचराः’, अर्थात् सैकड़ों राक्षसों के मारे जाने का उल्लेख है. निश्चित तौर पर यह अभियान उन विपक्षी आर्य जनों, यथा विश्वामित्र और कल्माशपाद शौदास, के विरुद्ध हुआ. इस हिंसक संघर्ष का वर्णन वामनपुराण 40:22 में भी देखा जा सकता है.

- वायुपुराण 2:26:176 में वसिष्ठ को कल्माषपाद के लिये अश्मक नामक पुत्र उत्पन्न करने का भी उल्लेख है. ब्राह्मण पौराणिकों द्वारा यह बात अपमानजनक संदर्भ में कहा गया है. महाभारत के अनुसार पराशर की माता ने कल्माशपाद को यह शाप दिया था, कि उसकी पत्नी मदयंती वसिष्ठ से संतानोत्पत्ति करेगी, जिससे सूर्यवंशियों का वंश आगे बढेगा. यह शाप धर्मशास्त्रीय युग के बाद की एक गाली है !

- शांतिपर्व 234:30 में कहा गया है, कि मित्रसह ने वसिष्ठ को अपनी पत्नी देकर उसके साथ स्वर्गलोक पाया था. मित्रसह, कल्माषपाद का नकारात्मक विशेषण है. कहने का उद्देश्य यह है राजा को अपनी पत्नी तक पुरोहितों को दान कर देना चाहिये !


Tuesday, January 19, 2021

धर्म की आड़ में

 ऋष्यशृङं द्विजश्रेष्ठं वरयिष्यति धर्मवित्,

यज्ञार्थां प्रसवार्थं च स्वर्गार्थं च नरेश्वरः.

वह धर्मवित् (दशरथ) द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृङ का यज्ञ, प्रसव, और स्वर्ग के लिये वरण करेगा. इसका एक अर्थ यह हो सकता है कि शांता को प्रसव करवाने में विशेषज्ञता रही हो. दूसरा अर्थ यह हो सकता  है कि क्षत्रिय-ब्राह्मण द्वेष से प्रेरित रचनाकार क्षत्रियों को वीर्यहीन साबित करने की मंशा रखता हो. 

'लभते च स तं कामं द्विजमुख्याद्विशांपतीः

पुत्राश्च भविष्यंति चत्वारः अमितविक्रमाः.'

उस द्विजमुख्य से कामना के अनुकूल वह राजा चार महावीर (अमितविक्रम) पुत्र की प्राप्ति करेगा'. 

क्योंकि इस प्रकार की मंशा का प्रकटिकरण कई प्रसंगों में देखा जाता है. जैसे भागवतपुराण 09:01:13 कहता है 

अप्रजस्य मनोः पूर्वं वसिष्ठो भगवान् किल, 

मित्रावरुणयोरिष्टिं प्रजार्थमकरोत् प्रभुः.

तत्र श्रद्धा मनोः पत्नी होतारं समयाचत,

दुहित्रर्थमुपागम्य प्रणिपत्य पयोव्रता.'

अर्थात्, 'कहा जाता है कि पहले मनु संतानहीन था. भगवान वसिष्ठ ने संतान के लिये मित्रावरुण यज्ञ किया. वहाँ मनु की पत्नी श्रद्धा ने होतृ के पास जाकर एक पुत्री की याचना की.'

अगले दो श्लोकों में इस यज्ञ के होता और अध्वर्यु के सम्मिलित 'व्यभिचार' का उल्लेख है. यह अजीब बात है कि यज्ञकर्ता मनु है, और उसकी पत्नी श्रद्धा को अपने पति की इच्छा के विरुद्ध होतृ को 'व्यभिचार' के लिये उकसाने की बात लिखना लेखक के नकारात्मक मंतव्य का द्योतक है. इसी 'व्यभिचार' को इला के जन्म का कारण बताया गया है. भागवतपुराण से पहले संकलित पौराणिक आख्यानों में इला की उत्पत्ति की अलग कहानी दी गयी है. जैसे जैसे पौराणिक आख्यानोंं के नये संस्करण सामने आते गये, क्षत्रिय द्वेष की प्रेरणा बढती गयी है.     

इस प्रकार का उल्लेख दोहरे अर्थ को धारण करता है. एक अर्थ निश्चय ही अपमानजनक उद्देश्य से प्रेरित है. 

भरत द्वारा भरद्वाज (वितथ) को गोद लेने के संदर्भ में भी बाद में रचित पौराणिक आख्यान अपमानजनक अर्थयुक्त है.

महाभारत आदिपर्व 94:18 में यह कहा गया कि, 

‘ततो महद्भिः क्रतुभिरीजानो भरतस्तदा,

लेभे पुत्रं भरद्वाजाद्भुमन्युं नाम भारत’, 

अर्थात्, 'यज्ञ में भरद्वाज से मन्यु नामक पुत्र प्राप्त किया.'  

अन्यत्र वसिष्ठ को राम के पूर्वज ऐक्ष्वाक कल्माषपाद की पत्नी में अश्मक नामक पुत्र उत्पन्न करता हुआ बताया गया है. जबकि इसी कहानी में कल्माषपाद और विश्वासमित्र द्वारा वसिष्ठ के सौ पुत्रों के विनाश का वर्णन भी है ! 

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और दक्ष के साथ तो और भी अन्याय किया गया है. गाली-गलौज, अपमान की हद पाई जाती है. इसे अलग से देखना होगा !

Saturday, September 19, 2020

आर्यों में रक्त-शुद्धता और ब्राह्मण प्रगतिशीलता

दिग्घनिकाय में अम्बट्ठ सुत्त का लब्ब-ओ-लुबाब यह है कि अम्बष्ठ नामक एक ब्राह्मण गौतम बुद्ध से मिलने आता है. उसे अपने ब्राह्मण होने का गर्व है. बुद्ध से वह शिकायत करता है, कि उनका शाक्य जन बड़ा ही असभ्य है. क्योंकि एक बार जब वह ब्राह्मण शाक्यों के सभागार में पहुँचा, तो सारे लोग आपस में खूब मजाक और चुहलबाजी कर रहे थे. किसी ने अम्बष्ठा का अभिवादन नहीं किया. अम्बष्ठ के अनुसार ‘क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ब्राह्मणों के सेवक हैं’(यहाँ ब्राह्मण शब्द जातिवादी नहीं है). बुद्ध ने अम्बष्ठ के कुल के बारे में पूछ तो उसने कान्ह(काला) गोत्र का कान्हायन बताया. तब बुद्ध उसे कान्ह की उत्पत्ति की बात बताते हैं. बुद्ध का शाक्य वंश इक्ष्वाकु से उत्पन्न बताया गया है. इक्ष्वाकु की दासी से कान्ह की उत्पत्ति बतायी गयी है. इस आधार पर शाक्यों की कान्हायनों के ऊपर सामाजिक श्रेष्ठता का दावा किया गया है. इसपर बुद्ध ने अम्बष्ठ को उन तमाम तर्कों का सामना कराया जिससे ब्राह्मणों की तुलना में क्षत्रिय श्रेष्ठता साबित होता है. इस स्थान पर बुद्ध ने ब्राह्मण सनत्कुमार के एक प्रसिद्ध कथन को अम्बष्ठ के सामने उद्धृत किया है. कहा,

‘क्षत्रिय वो श्रेष्ट है जो अपनी वंशगत शुद्धता को महत्व देता है. लेकिन देवताओं एवं मनुष्यों में श्रेष्ठ उसे माना जाता है, जो बुद्धि और सदाचार में श्रेष्ठ है’.

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बुद्ध के समय आर्य समुदाय के बीच पहले से चले आ रहे पुर्वग्रह, और विकसित होती हुई नई सोच के बीच के अंतर को प्रदर्शित समझने में यह प्रसंग महत्वपूर्ण है. क्षत्रियों की श्रेष्ठता के दावे के पीछे का कारण हम वंशगत रक्त शुद्धता को पाते है. वहीं ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के दावे का आधार उस समय की यह प्रगतिशील सोच थी कि आर्यों के बीच बुद्धि और सदाचार में श्रेष्ठ होना ही श्रेष्ठता का मानदण्ड है. शाक्यों की उत्पत्ति की कहानी भी वंशगत रक्त शुद्धता को उजागर करता है. कहा गया है कि इक्ष्वाकु की प्रिय रानी के पुत्र को राजा बनाने के लिये इक्ष्वाकु ने अपने अन्य पुत्रों को हिमालय की तराई में निष्कासित कर दिया. शाक(टीक) वन में रहने वाले उन भाइयों ने अपनी रक्त शुद्धता को बचाये रखने के लिये अपनी बहनों से ही संतान उत्पत्ति की. और रक्त शुद्धता के इसी आधार पर शाक्य खुद को श्रेष्ठ मानते थे. 

इस कहानी से प्राचीन आर्यों के बीच रक्त शुद्धता के महत्व को समझा जा सकता है. ब्राह्मणवादी पौराणिक ग्रंथों के मुआयना से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन क्षत्रियों की वंशावलियों में सारे विवाह सम्बंध निकट रक्त सम्बंधियों में पाये जाते हैं. दूसरी तरफ धर्मशास्त्रीय ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण, जो कि अधिक आधुनिक माना जा सकता है, के तहत सगोत्रियों में विवाह को वर्जित माना गया है. स्वाभाविक है कि आर्यों के बीच रक्त-शुद्धता को बल देने वाली धारणा को शुरुआत में ब्राह्मणों ने सकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा होगा. सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करने वाले कारणों पर गौर करने से स्पष्ट हो जाता है कि युद्ध-प्रिय कबीलाई युग में सबसे ताकतवर लोग सामाजिक सीढी में सबसे ऊपर स्थित थे. संघर्षपूर्ण जीवन में पिछड़े लोग पौरोहित्य, पशुपालन, या कृषि-कर्म से जुड़ते थे. स्त्रियों की प्राप्ति के लिये होने वाले संघर्ष में कबीले के पिछड़े हुए लोगों को अनार्य औरतों से सम्बध स्थापित करना पड़ता होगा. यही कारण है कि प्राचीनतम ब्राह्मणों की उत्पत्ति और उनके वैवाहिक जीवन को लेकर अलौकिक कथाएँ लिखी गयी हैं. अधिकांश पौराणिक ब्राह्मण चरित्रों को या तो अप्सराओं से उत्पन्न बताया गया, या राजाओं से कन्याएँ उपहार में पाया गया बताया गया. उस युग में कबीले के राजा से किसी पुरोहित का कन्या उपहार में पाना, एक कपोल कल्पना है. पौरणिक ग्रंथों में इसका कई बार उल्लेख आता है कि निर्धन व्यक्ति का विवाह करना कठिन था. इन परिस्थितियों में पुरोहित और तपस्वी समुदाय रक्त-शुद्धता के सिद्धांत का पालन नहीं कर सकता. और इस मजबूरी ने भी वैवाहिक सम्बंधों में गोत्र-वर्जना के सिद्धांत को जन्म देने में अपनी भूमिका निभाई. 

अब प्रश्न उठता है, कि आर्य समुदाय के भीतर जो ब्राह्मण रक्त-सम्बंधों समेत अन्य कई सामाजिक सम्बंधों में रक्त-शुद्धता जैसी प्राचीन नस्लीय पुर्वग्रहों का विरोध करता रहा, वही, धीरे धीरे स्वयँ जातिवादी बंधनों का किलेदार कैसे बन गया?


Monday, August 24, 2020

क्षत्रियों का अंत और पुनरुद्धार

 क्षत्रियों का अंत और पुनरुद्धार 

वायुपुराण 99:445 में 

‘क्षत्रस्यैव समुच्छेदः सम्बंधः वै द्विजैः स्मृतः, मन्वन्तराणां सप्तानां संतानाश्च सुताश्च ते’

 अर्थात् ‘सातों मन्वन्तरों में क्षत्रियों का उच्छेद होता है, और सम्बंध में वे ब्राह्मणों के संतान और पुत्र होते है’. 

इस बात को समस्त पौराणिक साहित्य में बार बार अलौकिक कहानियों के माध्यम से दुहराया गया है. 

वायुपुराण 99:447 में 

‘सप्तर्षयो विदुस्तेषां दीर्घायुः अक्षयाः तु, एतेनं क्रमयोगेण ऐलेक्ष्वाक्वन्वया द्विजाः’

अर्थात् ‘सप्तर्षि लम्बी उम्र के कारण युगों एवं ब्रह्म क्षत्र के उद्भव, प्रवृत्ति, और उनके क्षय के बारे में जानते हैं. विद्वान सप्तर्षि दीर्घायु और अक्षय हैं’. 

इसके साथ वायुपुराण 99:433 में यह भी स्वीकारोक्ति है कि विवस्वान के वंश के 

‘ब्राह्मणाः वैश्याः शूद्राश्चैवान्वये स्मृताः’, 

अतः ‘विवस्वान के वंश में ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र जुड़े हुए हैं’. 

आगे यह भी कहा गया कि ऐल (चंद्रवंशी) और इक्ष्वाकु (सूर्यवंशी) वंश में उत्पन्न होने वाले द्विज (ब्राह्मण) त्रेता में जन्म लेते हैं, कलियुग में क्षय को प्राप्त होते हैं. अतः क्षत्रिय वंश में उत्पन्न होने वाले ब्राह्मण कुल को कम महत्वपूर्ण मानने की भी धारणा यहाँ पाई जाती है. अतः पुरोहितों के बीच भी दो प्रकार के स्रोत समझने की बात की गयी है, 

  1.  वो जो सीधे ब्रह्मा के मानस पुत्रों की वंश परम्परा के है, और 
  2.  वो जिनका जन्म क्षत्रिय वंशों में हुआ है.

प्रतिक्रियावादी पुरोहितों को इस बात की व्याख्या करना था, कि आर्य संस्कृति का सबसे सम्मानित ऋक, यजुष, और अथर्वन की रचना करने वाले क्षत्रियों या उनकी संतानों को ब्राह्मण मानकर धर्मशास्त्रीय उलझन से कैसे बचा जाये ! 

विभिन्न स्रोतों से आये हुए आर्य जनों को एक साझे स्रोत में बांधने के लिये मनु और मन्वन्तरों की एक शृन्खला वाली अवधारणा तैयार करने के साथ सप्तर्षियों और मानस पुत्रों की कल्पना की गयी, जो ब्रह्मा के आदेश पर सृष्टि रचते हैं. ये सप्तर्षि और मानस-पुत्र ब्राह्मण माने गये, क्योंकि वो ब्रह्मा से उत्प्पन्न थे. इससे यह साबित किया गया, कि जो पुरोहित सीधे मानसपुत्रों से उत्पन्न हैं, वो विशुद्ध ब्राह्मण हैं. और जो क्षत्रियों से उत्पन्न हुए, वह भी घुमा फिरा कर ब्राह्मण थे, क्योंकि यज्ञ के सभी देवताओं समेत क्षत्रियों को कश्यप से उत्पन्न बताया गया था, जो ब्रह्मा का एक मानस पुत्र था. धर्मशास्त्रीय जातिवादी सोच ने ऐसी कल्पनाशीलता को उड़ने के लिये मजबूत पंख दिया.

सृष्टि में क्षत्रियों के आत्याचार और निरंकुशता को समाप्त करने के लिये परशुराम जैसे चरित्र की कल्पना की गयी. वायुपुराण 99:449 में परशुराम द्वारा सभी क्षत्रियों को शेष करने का उल्लेख है. यह कहानी अन्य तमाम पुराणों में अलौकिक विवरण के साथ प्रस्तुत किया गया है. परशुराम द्वारा क्षत्रिय कुलों का उच्छेद होने के बाद क्षत्रिय राजवंशों के पुनरोद्धार का उल्लेख है. मगर वायुपुराण पुनरुद्धार की प्रक्रिया के बारे में यहाँ कुछ नहीं कहता. पौराणिक (महाभारत समेत) आख्यानों में अन्य स्थानों पर इसके बारे में यह कहा गया कि क्षत्राणियों ने पुरोहितों से अपने वंश के लिये संतान उत्पन्न किये. इस प्रकार की कहानियों से पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है, जिसमें कथित पुरोहित को रानियों के साथ संतान उत्पन्न करते हुए बताया गया है. 

इस प्रकार की अपमानजनक अवधारणा को बाद वाले पौराणिक संस्करणों में तो और भी शातिर तरीके से स्थापित किया गया है. जिस युग में पुराण साहित्य लिखा गया उस समय उत्तर भारतीय समाज बाहर में यवन, शक, कुशान, हूण, आभीर समेत उत्तर पश्चिम से अनेक अनार्य कबीलों के आगमन से बाहरी लोगों का राजनीतिक वर्चश्व बढा. प्राचीन क्षत्रिय राजवंशों का प्रभाव नये क्षत्रियों के सामने फीका पड़ रहा था. नये लोग पहले से स्थापित समाज के पुरोहित वर्ग से इसी बात को लेकर संतुष्ट था कि नये क्षत्रियों को प्राचीन राजवंशावलियों से जोड़ दिया गया था. ऐसे क्षत्रियों का आर्यों के प्राचीन साहित्य से कोई सम्बंध नहीं था. इस स्थिति का उपयोग प्रतिक्रियावादी पुरोहितों ने धार्मिक क्षेत्र में अपनी मनमानी करने में की.

Friday, August 21, 2020

जनमेजय और क्षत्रिय-पुरोहित सम्बंध

 वायुपुराण 99:250 में इसका उल्लेख है कि परिक्षित पुत्र जनमेजय ने वाजसनेयिक पुरोहितों को संरक्षण देकर उनकी मर्यादा प्रतिष्ठा की, 

‘परीक्षितस्तु दायादः राजा आसीत जनमेजयः, 

ब्राह्मणान्स्थापयामास स वै वाजसनेयिकान्’.

अर्थात्, 'परीक्षितपुत्र राजा जनमेजय ने वाजसनेयी ब्राह्मणों की स्थापना की'. 

मत्स्यपुराण 50:60 के अनुसार जनमेजय द्वारा शुक्ल यजुर्वेद को प्रोत्साहन देने को ब्राह्मणों के ऊपर क्षत्रियों की जीत कहा गया है, 

‘क्षत्रस्य विजयं ज्ञात्वा ततः प्रभृति सर्वशः, 

अभिगम्य स्थिताश्चैव नृपं च जनमेजयम्’, 

अर्थात् ‘तब से क्षत्रियों का ब्राह्मणों के ऊपर विजय की बात जानकर दूर दूर से लोग शुक्ल यजुर्वेद को प्रोत्साहन देने वाले राजा जनमेजय के निकट रहना प्रारम्भ किया’. 

इससे यह बात निकल कर आती है कि तत्कालीन क्षत्रियों, ब्राह्मणों के एक समूह, और वैश्यों ने जनमेजय के धार्मिक सुधार वाले कदम का समर्थन किया. वैशम्पायन ने उसके इस कार्य को सहन नहीं किया. जनमेजय ने वाजसनेय को अपने यज्ञों का ब्रह्मा(पर्यवेक्षक पुरोहित) नियुक्त किया, जिससे वैशम्पायन ने उसे शाप दिया, कि वाजसनेयी सम्हिता को आनेवाले समय में सम्मान प्राप्त नहीं हो पायेगा. उसने अपने जीवन काल तक जनमेजय का विरोध करने की ठान ली. इसके समर्थक पुरोहितों ने जनमेजय के लिये कदम कदम पर मुश्किलें खड़ी कीं. जनमेजय ने वाजसनेयी सम्हिता के आधार पर दो अश्वमेध यज्ञ किये.

‘द्विरश्वमेधमाहृत्य ततो वाजसनेयकम्, प्रवर्तयित्वा तद्ब्रह्म त्रिखर्वी जनमेजय’ (वायुपुराण 99:254). 

 पुरोहितों के तीन विरोधी समूहों (त्रिखर्वी); अश्वकमुख्य, अंगनिवासी, और मध्यदेशीय, ने जनमेजय और वाजसनेयी सम्हिता का बहिष्कार किया. आगे चलकर मध्यदेशीय पुरोहित वर्ग धार्मिक तौर पर सबसे कट्टर होकर उभरा, यह एक तथ्य है. जनमेजय के शापित होकर उसके नष्ट होने का उल्लेख है. हालाँकि, वास्तविकता यही है कि आने वाले समय में शुक्ल यजुर्वेद की लोकप्रियता बढती गयी. ब्रह्मपुराण 231:12 इस बात की गवाही देता है. वाजसनेयिक पुरोहितों की लोकप्रियता को कलियुग के प्रभाव के तौर पर उल्लेख किया गया है,

सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति द्विजा वाजसनेयिकाः, शूद्राभा वादिनश्चैव ब्राह्मणाश्चान्त्यवासिनः॥ २३१.१२॥

अर्थात्, 'सभी वाजसनेयिक ब्रह्मवादी होंगे, ब्राह्मण शूद्र के समान तेजोहीन एवं विवादी होंगे'.

सम्भव है कि वैशम्पायन की संततियों समर्थकों ने आने वाले समय में अन्य प्रकार से क्षत्रिय वर्चश्व का विरोध किया हो !  

इससे स्पष्ट है कि जनमेजय के समय में कुलीन पुरोहित वर्ग दो धड़ों में विभक्त हो गया. इसका प्रभाव राजाओं एवं पुरोहित वर्ग के बीच गहन धार्मिक मतभेद के रूप में सामने आया. 

आगे चलकर धार्मिक कारण से उभरे मतभेदों को बाद के पौराणिकों ने कई अन्य कारण से भी काफी बढा चढा कर दिखाया. उसके तीक्ष्ण होने में सामाजिक संरचना से जुड़े अन्य कारणों की बड़ी भूमिका रही होगी. विदेशी क्षत्रियों, नये उभरे अनार्य राजाओं की भारतीय सामाजिक राजनीतिक जीवन में बहुलता, एवं ब्राह्मणेतर धार्मिक मतों के प्रति समर्थन रखने वाले राजाओं के प्रति पुरोहितों के भीतर प्रतिर्किया निर्मित हुआ, यह चौथी पाँचवीं शताब्दी में संकलित पौराणिक विवरणों से स्पष्ट है.      

प्राचीन भारतीय समाज में जनमेजय के इस धार्मिक भूमिका का बहुत महत्व माना जाना चाहिये. इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि उस युग में यज्ञ और उससे जुड़े कर्मकाण्डों में राजन्य वर्ग का अच्छा खासा दखल होता था, जिसे पुरोहित वर्ग सहजता से स्वीकार नहीं करना चाहते. जनमेजय ने यज्ञ के आयोजन में अपने द्वारा प्रतिष्ठित वाजसनेय का प्रवर्तन किया, 

ब्राह्मण पुरोहितों के बीच यज्ञ कर्मकाण्ड के नियमों वगैरह को लेकर हुए वैचारिक विभाजन में जनमेजय ने सक्रिय भूमिका निभाई थी. और इस विभाजन का प्रभाव यजुर्वेद की शुक्ल और कृष्ण सम्हिताओं के रूप में सामने आया. जनमेजय के राज्याश्रय में शुक्ल यजुर्वेद को पर्याप्त समर्थन मिला. सम्भव है कि इसके बाद से ही कृष्ण यजुर्वेद शाखा से जुड़े पुरोहितों ने परीक्षित समेत जनमेजय, और सम्भवतः राजन्य वर्ग के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया. यह ध्यान देनेवाली बात है कि महाभारत कथा वाचन और पौराणिक साहित्य लेखन में कृष्ण द्वैपायन व्यास के जिस शिष्य, वैशम्पायन, की अग्रणी भूमिका रही, वह परीक्षित और जनमेजय के प्रति शत्रुता से ग्रसित था. क्या इस पुर्वग्रह और शत्रुता भाव का पुराण लेखन पर प्रभाव नहीं पड़ा? सच यह है कि पौराणिक साहित्य में क्षत्रिय विरोधी पुर्वग्रह बार बार उभरकर दिखता है.    

जनमेजय का सर्पयज्ञ – घटनाक्रम यह है कि परीक्षित ने एक ब्राह्मण पुरोहित का अपमान किया, और उस पुरोहित के पुत्र ने बदले में राजा को शर्प-दंश से मृत्यु का शाप दिया. ठीक वैसी ही बात जैसी कार्तवीर्य अर्जुन और जामदग्न्य राम को लेकर हुई थी. इसमें संकेत यह छुपा है कि परिक्षित द्वारा ब्राह्मण के अपमान का बदला बादवाले ने सँपेरों(या सर्प-पूजक किसी कबीले) के साथ मिलकर लिया. राजा के विरुद्ध बदले के षडयंत्र के तहत सर्प-विष का इलाज जानने वाले वैद्य को भी घूस देकर अनुपलब्ध कर दिया गया. राजा के पुत्र ने बदले की ठानी, और सँपेरों के विरुद्ध अभियान चलाया. इसी अभियान को सर्प-यज्ञ कहा गया. यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या इस षडयंत्र में शामिल ब्राह्मण पुरोहितों को छोड़ दिया गया? भागवतपुराण 01:19 में इस कहानी के स्वभाव को बहुत कुछ बदल दिया गया है. 

पौराणिक कहानियों में परीक्षित को शापग्रस्त बताने के पीछे कोई तो कारण होगा ! 

इस कहानी में सर्प-पूजक कबीलों के साथ ब्राह्मण पुरोहितों के वैवाहिक सम्बंध की भी बात गौर करने योग्य है. ब्राह्मण पुरोहित जरत्कारू का विवाह वासुकी की बहन से उल्लिखित है. जनमेजय के इस अभियान को जरत्कारू-पुत्र आस्तिक द्वारा स्तुति प्रशंसा ने रुकवाया. यजुर्वेद की सम्हिता को लेकर जनमेजय ने जो भूमिका निभाई, सर्प-यज्ञ को हमें उसी सन्दर्भ में एक प्रतिकात्मक कहानी के तौर पर लें, यही उचित होगा.         

वायुपुराण 99:256 कहता है कि जनमेजय की कुछ पीढी के  बाद दीर्घसत्र का आयोजन (नैमिष) दृषद्वति के तट पर कुरुक्षेत्र में हुआ. सम्भवतः इसी सत्र में प्रतिक्रियावादी पुरोहितों ने धार्मिक परिदृष्य पर अपना प्रभाव स्थापित किया. 

सर्पयज्ञ के दौरान खाली समय में ब्राह्मण पुरोहित ज्ञान दर्शन से जुड़ी कथाएँ कहते थे, तो व्यास भरतवंश की विचित्र कथाएं सुनाते. महाभारत आदिपर्व 59:05 से पता चलता है कि सम्भ्रांत पुरोहित वर्ग यज्ञ कर्मकाण्डों से जुड़ा था, तो व्यास और सूत आम लोगों को, जिसमें ब्राह्मण जाति के सामन्य लोग भी शामिल थे, रोचक वंशावलियां सुनाया करते. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि कृष्ण द्वैपायन को विद्वान् ब्राह्मणों के बीच ऋक्, यजुष पर चर्चा करते नहीं बताया गया है. वह जनमेजय को भरतवंशियों की कथा सुनाता हुआ दर्शाया गया है. फिर उन्हें चार वेदों को व्यवस्थित करने का श्रेय देने का क्या अर्थ है? 


Tuesday, August 4, 2020

सर्वक्षत्रांतक सर्वक्षत्रप्रणाशक

उदाहरण एक -
द्रोणपर्व 03:02 कहता है, ‘दृष्ट्वा पितामहं भीष्मं सर्वक्षत्रांतकं गुरुम्, दिवैरस्त्रैर्महेष्वासं पातितं सव्यसाचिना’. अर्थात्, समस्य क्षत्रियों का अंत करनेवाला गुरु, महाधनुर्धर, पितामह भीष्म को सव्यसाची अर्जुन ने अपने दिव्यास्त्रों से गिरा दिया.’
उदाहरण दो -
ब्रह्मपुराण 13:67 ‘दिवोदास इति ख्यातः सर्वक्षत्रप्रणाशनः, दिवोदासस्य पुत्रस्तु वीरो राजा प्रतर्दनः’.
अर्थात्, दिवोदास सर्वक्षत्रप्रनाशक के रूप में प्रसिद्ध हुआ. उसका पुत्र वीर प्रतर्दन हुआ'.
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उपरोक्त दो शब्दों, 'सर्वक्षत्रांतक' और 'सर्वक्षत्रप्रणाशक' का अर्थ एक ही है. भीष्म के लिये 'सर्वक्षत्रांतक' और दिवोदास के लिये 'सर्वक्षत्रप्रनाशक' का प्रयोग हुआ है. लेकिन इसके आधार पर आम धारणा में यह प्रचार नहीं हुआ कि इन राजाओं ने 'सारे क्षत्रियों' का नाश कर दिया था.
लेकिन, परशुराम के लिये जब कहीं 'सर्वक्षत्रांतक' का इस्तेमाल हुआ, तो इसे लेकर इतनी सारी कहानियाँ लिखी गयीं कि आज खुद को ब्राह्मण जाति का मानने वाला हरेक शख्स, और दूसरे लोग भी, इस बात को याद रखते हैं कि परशुराम ने इक्कीस बार क्षत्रियों का सफाया किया था. क्योंकि पौराणिक साहित्य में इसे इतनी बार दुहराया गया है, कि किसी को कंठस्थ हो जाये.
इसी को कहते हैं दुस्प्रचार का प्रभाव !
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यही नहीं, मगध के राजा नंद के बारे में भी पुराणों में 'सर्वक्षत्रांतक' शब्द का उपयोग हुआ है. और इसका तात्पर्य इतिहासकारों ने यह लगाया कि वास्तव में वह शूद्र था, इसीलिये सारे क्षत्रियों का सफाया कर दिया. और इस प्रकार का तर्क देने वालों में घोर ब्राह्मणवादी से लेकर वामपंथी इतिहासकार शामिल हैं. सवाल है कि क्यों हैं? तो दोनों के अपने अपने कारण है. घोर ब्राह्मणवादी नंद को शूद्र कहते हैं, क्योंकि उनकी धर्मशास्त्रीय निगाह में बुद्ध और महावीर जैसे प्रज्ञा-पुरुष भी 'शूद्र' ही थे, क्योंकि वो ब्राह्मणवादी जाति आधारित श्रेष्ठता को स्वीकार नहीं करते थे.
दूसरी तरफ वामपंथी इतिहासकारों ने नंद को शूद्र मानकर ब्राह्मणवादी जाति आधारित वर्णव्यवस्था को इसी के मुहावरे में जवाब देकर परास्त करनी चाहते थे. इस फेर में अगर कोई पराजित होता है, तो वह है इस देश की बौद्धिक-चेतना.