Sunday, May 10, 2020

दुष्यंत की कहानी

दुष्यंत की कहानी
दुष्यंत की कहानी

मात्स्यपु.27:09 और  वाय.पु.99:129 में दुष्यंत से जुड़ी वंशावली इस प्रकार है,
अप्रतिरथ (इलीन?)- कण्व और ऐलीन. कण्व- मेधातिथि (काण्वायन द्विज्). ऐलीन- दुष्यंत एवं अन्य. 
भाग.पु.09:20:06 रंतिभार- सुमती, ध्रुव, अप्रतिरथ. अप्रथिरथ- कण्व- मेधातिथि. सुमति (ऋभ?)- रैभ्य- दुष्यंत. अर्थात् मात्स्य, वायु, और भागवत पुराणों में थोड़ा अंतर है. गौरतलब है कि हर ग्रंथ में दुष्यंत और कण्व निकट रक्त सम्बंधी बताये गये हैं.  
आदिप.70:07 में दुष्यंत ने खुद को इलिलपुत्र कहा है. 
आदिप.70:23 में ‘अप्रतिरथ’ शब्द का प्रयोग दुष्यंत के लिये हुआ है. और इसके गीताप्रेस और किशारीमोहन के अंग्रेजी अनुवाद में भूल है. पौराणिक वंशावलियों पर ध्यान देने से यह समझ आता है  कि दुष्यंत और कण्व नजदीकी चचेरे भाई हैं. दुष्यंत और शकुंतला प्रसंग से जुड़े इस अध्याय में कण्व को काश्यप गोत्रीय बताकर उसके आश्रम का वर्णन उसी अनुसार किया गया है. ऐसी मनगढंत कहानियों का उद्देश्य समझना बहुत मुश्किल नहीं है. अप्रतिरथ के कुल में उत्पन्न दुष्यंत राजा के रूप में चित्रित हैं, तो कण्व सूक्तों के रचयिताओं में प्रमुख है. तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि शकुंतला कण्व की पुत्री थी, जिसके साथ दुष्यत का यौन सम्बंध स्थापित होने से एक बच्चे का जन्म हुआ, जिसे भरत कहा गया. इस प्रकार शकुंतला और दुष्यंत आपस में रक्त सम्बंधी हुए. लेकिन जातिवादी सोच के तहत पौराणिक लेखकों ने एक को क्षत्रिय तो दूसरे को तथाकथित काश्यप गोत्रीय ब्राह्मण बताया. शांतिप.29:49 में कण्व को दौष्यंति भरत का ऋत्विज बताया गया है. इससे पता चलता है कि उस कबीलाई युग में निकट सम्बंधी ही ऋत्विज कर्म किया करते थे.
दुष्यंत शब्द पर गौर किया जाना जरूरी है. संस्कृत में एक शब्द है ‘दूषय’, जिसका अर्थ है किसी महिला के सतीत्व या सम्मान को नष्ट करना, उसे अपवित्र करना. शकुंतला से जुड़ी इस घटना से स्पष्ट है कि इस व्यक्ति ने शकुंताला के कौमार्य को भंग किया था. सभ्यता के विकास के क्रम में इस क्षत्रिय चरित्र को उद्दात्त बनाया गया.   
देखा जा सकता है कि शकुंतला और दुष्यंत की इस कहानी में अनेक झूठ बोले गये. क्यों? 
पहली बात कि कण्व का ऋग्वेद का एक महत्वपूर्ण ऋषि होना जातिवादी व्यवस्था में उसे जातिगत ब्राह्मण साबित करने वाली प्रेरणा बनी. आदिपर्व में दुष्यंत का आख्यान कहने का उद्देश्य अध्याय 68:06 में ही प्रकट कर दिया गया है. ‘न वर्णसंकरकरो न कृष्याकरकृज्जनः, न पापकृत् कश्चित् आसीत् तस्मिन् राजनि शासति.’  अर्थात् दुष्यंत के राज्य में ‘न तो वर्णसंकर उत्पन्न होते थे, और न कृषक कृषि कर्म करते थे, न कोई पाप करने वाला था’. वर्णसंकर शब्द से भयभीत लोगों ने धर्मशास्त्रों की रचना की. ब्राह्मण पुरोहित इसमें बढ-चढ कर हिस्सा ले रहे थे. आदिप.75:15 कहता है ‘ब्राह्मणा मानवाः तेषां सांगं वेदधारयन्,--‘, अर्थात् मानवों में ब्राह्मण अंगों समेत वेद धारण करते थे’. अतः वेद पर एकाधिकार साबित करना सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा था. 
लेकिन कण्व को काश्यप गोत्रीय ब्राह्मण साबित करने के लिये साहित्य रच लेने से समस्या और उलझ जाती. कण्व को आश्रम-निवासी निःसंतान ब्रह्मचारी बता दिया गया (आदिप.71:17).  क्योंकि धर्मशास्त्रीय प्रावधानों के तहत एक ब्राह्मण कण्व की पुत्री का विवाह क्षत्रिय दुष्यंत से कैसे सम्भव था? वही वर्णसंकरता का संकट, वह भी प्रतिलोमात्मक ! एक परेशानी और, कि धर्मशास्त्रों के ज्ञाता दुष्यंत के इतने निकट रक्त सम्बंध में वैवाहिक सम्बंध को मान्यता कैसे दिया जाये? गुप्त-काल तक जाति आधारित वर्ण-व्यवस्था इतना पुख्ता हो चुका था कि रघुवंश11:64 में भार्गव राम का जनेऊ धारण ब्राह्मण पिता, और धनुष धारण करना उसकी क्षत्रिय माता की पृष्ठभूमि में दिखाया गया है.  
इसके लिये विश्वामित्र और मेनका की अलौकिक कहानी रची गयी. वैसे बु.च.04:20 और वा.रा.4:35:07 में विश्वामित्र को घृताचि के सम्बंधित किया गया है. शकुंतला को क्षत्रिय विश्वामित्र से उत्पन्न बताकर कण्व की पालित पुत्री बनाया गया. क्योंकि विश्वामित्र को पौराणिक कहानियों में वसिष्ठ से शत्रुता के कारण जातिगत क्षत्रिय माना जा चुका था. 
झूठ के जाल का बुनाव कितना ही विस्तृत हो, सच छुप नहीं पाता. विभिन्न पौराणिक स्रोतों से वह सच निकल आया है. पौराणिक लेखक यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि वो भी अतीत के उस क्षत्रिय कबीलाई संस्कृति से उत्पन्न थे, जब कृषि संस्कृति का विकास नहीं हुआ था, जैसा कि ऊपर श्लोकांश में ‘न कृष्याकरकृज्जनः’. लेकिन इस श्लोकांश का अर्थ अनुवादक ने यह लगा दिया कि दुष्यंत के राज्य में भोजन के लिये कृषि की जरूरत ही नहीं थी ! यह समझने का प्रयास नहीं किया गया, या इसे नजरंदाज किया गया कि वह आर्यों की अर्द्ध-घुमंतु सामाजिक अवस्था थी. 
और श्लोक में पापकर्म का उल्लेख है, तो वास्तविकता यह है कि उस युग में बलात्कार तक किसी अपराध की श्रेणी में नहीं था. दुष्यंत ने शकुंतला से यौन सम्बंध स्थापित किया. और जब बच्चा हुआ, तो उसे किसी हाल में स्वीकार करने को तैयार नहीं था. जैसे तैसे मामले को निपटाया गया. इसका पूरा विवरण आदिप. के इन अध्यायों में है. इस तथ्य से तो आज भी बहुत सारे लोग नाराज हो जायेंगे. आदिप.74:02 दुष्यंत शकुंतला के विवाह के तीन वर्ष बाद भरत का जन्म हुआ, ‘--- त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु दीप्तानलसमद्युतिम्’. आदिप.63:86 किसी कन्या को गभवती बनाकर छोड़ देने का ऐसा ही एक उदाहरण पराशर द्वारा सत्यवती को यमुनाद्वीप में छोड़ देना (‘न्यस्तो द्वीपे’) था.

#दुश्यंत‌कीकहानी

Thursday, May 7, 2020

जीवन, समय, और कर्मकांंड

आज हम व्यक्तिगत या सार्वजनिक तौर पर जो कुछ भी करते हैं, वह प्राचीन विकासक्रम में कभी न कभी किसी न किसी अनुष्ठान का हिस्सा रहा है. जीवन की दिनचर्या में सहज होकर चीजें अलौकिक से लौकिक या सांसारिक हो जाती हैं. यहीं अलौकिक से लौकिक का विकासक्रम रहा है. आज हम किसी भोज का आयोजन करते हैं तो उससे जुड़ी तैयारी में जाने कितनी ही कड़ियाँ होती हैं, जो अलग अलग प्रकार के समुदायों में अलग अलग प्रकार से अंजाम दी जाती हैं. आजकल बड़े शहरों में आयोजन का सारा दायित्व विशेषज्ञता प्राप्त व्यावसायिक संस्था पर होता है. पहले ऐसे आयोजन समुदायों के भीतर आपसी सहयोग से होता था. आयोजन की रूपरेखा, आवश्यक सामान का जुगाड़, आमंत्रित लोगों के रहने खाने की व्यवस्था, अलग अलग प्रकार आमंत्रितों की अलग अलग व्यवस्था, लोगों को निमंत्रित करना, सब समुदाय के भीतर कार्यविभाजित तरीके से होता था. हर कार्य के लिये अलग प्रकार के लोग हुआ करते थे. लोगों का जीवन प्रकृति से निकट था, आयोजन के समय निर्धारण में भी प्राकृतिक घटनाओं की बड़ी भूमिका थी. आसपास उपलब्ध संसाधन अनुष्ठान आयोजन में प्रयुक्त चीजों को प्रभावित करते थे.   
अनुष्ठानों के इस आयोजन को हम जैसे जैसे समय में पीछे की ओर ले जाते हैं, एक स्तर पर चीजें अगर सहज होती नजर आती हैं, तो दूसरे स्तर पर क्लिष्टता के अलग प्रकार हमारे सामने प्रकट होते हैं. आज जो चीजें बिल्कुल लौकिक महत्व की हैं, आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व उनके साथ गहन कर्मकाण्ड जुड़े थे. मसलन, यज्ञ के लिये खरही काटना होता था, तो उसके साथ भी एक कर्मकाण्ड जुड़ा था. उसके लिये शुभ दिन, मुहूर्त, उसे काटने के लिये किसी सौभाग्यशाली व्यक्ति, कुछ मंत्र, कुछ तौर तरीके की जरूरत होती थी. लोग जब पंक्ति में बैठकर खाते, तो भोजन शुरु करने का कर्मकाण्ड होता था. कौन सी चीज पहले , और कौन सी बाद में परोसी जायेगी, इसका भी कर्मकाण्डीय अर्थ होता था. कौन पहले खायेगा, कौन बाद में, यह भी कर्मकाड़ का हिस्सा था. विशिष्ट जन को भोजन के लिये आग्रह करने का अपना खास तौर तरीका हुआ करता. और इन तमाम छोटी छोटी चीजों को कहने, आदेश करने, मना करने, अनुरोध करने, विनती करने से जुड़ी चीजों को ही मंत्र कहा जाता था. वे मंत्र बद्धमूल तरीके से समुदाय के पुरोहितों द्वारा संकलित, संगृहित, सुरक्षित रखे जाते, क्योंकि इसी प्रकार किसी आयोजन से जुड़ी तैयारियों की मानक रूपरेखा को अगली पीढी के लिये सुरक्षित किया जा सकथा था. 
समुदाय जब भौतिक दृष्टि से बदलता है, तो अतीत की चीजें धार्मिक कर्मकाण्डों के रूप में उसके जीवन में बची रह जाती हैं. लम्बी परम्परा से उपजे धार्मिक कर्मकाण्ड लोगों के लिये श्रद्धा की चीज होती हैं. श्रद्धा इसलिये भी कि उसके माध्यम से अतीत से जुड़ा हुआ महसूस होता है. इतिहास लेखन युग से पहले समुदाय इसी प्रकार अपने अतीत से जुड़ने का प्रयास करते थे.

Sunday, April 12, 2020

दक्ष-रुद्र-गौरी

दक्ष नामक राजा ने अपनी पुत्री में संतानोत्पत्ति की. ‘--------, स्वस्या सुतायां मूढात्मा पुत्रमुत्पादयिष्यसि.’ (कूर्मपुराण 14:63) (रुद्र का शाप, कि ब्राह्मण से क्षत्रिय हो जाना, और अपनी पुत्री में संतानोत्पत्ति ! ब्रह्मा का पुत्र बताकर दक्ष को ब्राह्मण बताया गया, और पुनः शाप केंद्रित कहानी के माध्यम से जातिवादी ब्राह्मणवाद की कुंठा का निवारण करने का प्रयास किया गया है. प्राचीन कहानी के पुनर्लेखन का यह एक उदाहरण है. पुरानी कहानी यह होगा कि प्रचेतों से उत्पन्न दक्ष ने अपनी पुत्री में संतति विस्तार किया था. और यह आदिम मानवों के लिये एक सहज घटना थी. उत्पत्ति की कहानी में ब्रह्मा के चरित्र का सृजन एक बौद्धिक विकास की प्रक्रिया का परिणाम है. इस चरित्र की कल्पना के बाद दक्ष को ब्रह्मा के अंगुठे से (या प्राण से) उत्पन्न बता दिया गया. मगर कहानियों में छुपे हुए तथ्यों को पूरी तरह से मिटाया नहीं जा सका.)
‘दाक्षायणीपुत्रा सर्वे देवाः सवासवाः, --------‘ (दाक्षायणी का अर्थ दक्ष की पुत्री है. यहाँ भी दक्ष द्वारा अपनी पुत्री से संतानोत्पत्ति (सृष्टि) का उल्लेख है. रुद्र को दी गयी गौरी ('- गौरीनाम्नीं स्वयं देवीं भारतीं तां ददौ पिता') को पुनः ब्रह्मा द्वारा पुत्री रूप में दक्ष को प्रदान किया गया; यही दाक्षायणी है. इससे जो अर्थ निकलता है, वह तथाकथित नैतिक बंधन वाले को असहज कर देता है. इससे यह संकेत भी मिलता है, कि रुद्र गौरी से संतान उत्पत्ति में अक्षम रहे थे, और उसी गौरी से दक्ष ने अपनी संतति विस्तार किया. रुद्र और दक्ष के बीच शत्रुता के पीछे असल कारण यह रहा होगा ! प्राचीन काल में एक ही स्त्री एकाधिक पुरुषों द्वारा संतान प्राप्ति के अनेको उदाहरण पाये जाते हैं. और इस क्रम में स्त्री के लिये प्रतिष्पर्द्धा और शत्रुता एक आम बात रही होगी. इस प्राचीन कहानी को बाद में अलग प्रकार से नया रूप दिया गया.  दक्ष‌-रुद्र ) (वाराहपुराण 21:10)
{ब्रह्मा का अपनी पुत्री (ब्रह्माणी) से  या दक्ष का अपनी पुत्री (दाक्षायणी) से संतानोत्पत्ति के नैतिक प्रश्न पर मत्स्यपुराण के चौथे अध्याय में विचार किया गया है, कि क्यों ब्रह्मा की संतानों को आपस में विवाह करने की अनुमति मिली? और कहा यह गया कि देवताओं की बात देवता ही समझें ! आगे शतरूपा को स्वायम्भुव मनु (अधिपुरुष) की पत्नी बताया गया है. विष्णुपुराण 1:07:17 में शतरूपा को स्वायम्भुव मनु की पत्नी बताया गया है. मत्स्यपुराण 04:33 में ‘अनंता’ को स्वायम्भुव मनु की पत्नी बताया गया है; क्योंकि शतरूपा को तो ब्रह्मा के साथ जोड़ दिया गया था !! तमाम तरह के उदाहरणों में यह एक है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि लोक कथाओं को अलग अलग लेखकों ने अपनी सोच के अनुसार पुराणों के अपने अपने संकलनों में प्रस्तुत कर दिया. वैसे ‘शतम्’ को अनंत भी कहा गया है (आदिपर्व 216:07- शत और शतसहस्त्र अनंत संख्या के वाचक हैं.) ब्रह्मा को एक व्यक्ति के रूप में कल्पित किये जाने से पहले मनु ही सृष्टि का प्रथम पुरुष रहा होगा, और अनंत रूपों वाली, अर्थात् शतरूपा को उसकी पत्नी बताया गया होगा. ब्राह्मणवादी परम्परा के सशक्त होने के साथ ब्रह्मा की व्यक्तिरूप अवधारणा को नई नई कहानियों के माध्यम से स्थापित किया गया.}
(प्राचीन कथाओं में प्रतीकों के माध्यम से बातों को कहने का चलन रहा है. ब्रह्मा, रुद्र, दक्ष, गौरी जैसे प्रतीकों के तौर पर ग्रहण कर हम चीजों को अलग प्रकार से समझ सकते हैं. ब्रह्म्, ऋचाओं में अभिव्यक्त प्रार्थानाओं, स्तुतियों, आवाहनों, एवं मंत्रों को कहा गया है. उसपर आधारित सृष्टि सम्बंधी अवधारणा में देवताओं को छंदों से उत्पन्न माना गया. उन छंदों में आबद्ध ऋचाओं, अर्थात् ब्रह्म्, का मानवीकरण करके ब्रह्मा की अवधारणा सामने आयी. यही ब्रह्मा सृष्टि का प्रथम कारक के रूप में देखा गया. ऋचाओं, अर्थात् ब्रह्म् के माध्यम से यज्ञ में देवताओं का आह्वान होता था. और यज्ञ को ही सृष्टि की उत्पत्ति का कारक माना गया है.
अतः मानवीकृत ब्रह्म् या ब्रह्मा के मन में सृष्टि को लेकर उहापोह की स्थिति होने से क्रोध और क्षोभ ('-- कोपात्संजज्ञे स च रुद्रः प्रतापवान्, --) उत्पन्न होता है. वही क्रोध रुद्र का मानवीकृत रूप में अभिव्यक्त है. गौरी को ऋचाओं की अभिव्यक्ति की देवी का प्रतीक कहा जा सकता है . गौरी, भारती, सर्वशुक्ला आदि सरस्वती के पर्याय हैं. सरस्वती, मुख से उच्चारित शुभ ध्वनियाँ हैं. उन ध्वनियों से ऋचाओं का जन्म हुआ है. ऋक् और यज्ञ के युग में सरस्वती के माध्यम से तमाम दैवी शक्तियों को प्रभावित किया जा सकता था. ऋचाओं में अभिव्यक्त मंत्रों के माध्यम से ही देवताओं को शौर्य, शक्ति, ऐश्वर्य, आरोग्य, बल प्राप्त होता था. ब्रह्मा के  क्रोध से उत्पन्न रुद्र, गौरी, अर्थात् ऋचाओं एवं मंत्रों, के माध्यम से यज्ञ संस्कृति को विकसित नहीं कर सकता था. क्योंकि रुद्र नकारात्मक प्रतीक है. जीवन का अंत है. उससे सृष्टि का आरम्भ नहीं दर्शाया जा सकता. इसके विपरीत दक्ष (दक्षता), यज्ञ संस्कृति के विकास और विस्तार के माध्यम से सृष्टि के सबसे महत्वपूर्ण प्रजापति का प्रतीक है. यह यज्ञ संस्कृति की रचनात्मकता का मानवीयकरण है. दक्ष, कर्त्ता है, गौरी माध्यम है, और यज्ञ आधारित सांस्कृतिक जीवन आर्यों का संतति विस्तार है. यह उस इतिहास को उद्घाटित करता है, जिसमें यज्ञ आधारित जीवन यापन करने वाले लोगों ने भारत में अपना वंश विस्तार किया.
रुद्र का पुनरुत्थान उस नयी संस्कृति का द्योतक है, जिसे हम रुद्र-पाशुपत मत के फैलाव के रूप में पाते हैं. पुरोहितों के एक वर्ग ने जब पशुबलि आधारित यज्ञ संस्कृति को अपने आर्थिक सामाजिक हितों के विरुद्ध पाया, उन्होंने ऐसे यज्ञ का विरोध करना शुरु किया जिसमें गौवंश की होती थी. इस मत ने गौरी अर्थात् सती को उस उज्ज्वल सत्य का प्रतीक माना, जो बदले हुए सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में यज्ञ की दक्षता से अलग हटकर रुद्र-पशुपति केंद्रित नयी धार्मिकता के प्रति समर्पित होने की घोषणा करता है. वाराहपुराण के इस कहानी में दक्ष और रुद्र की शत्रुता वर्गीय हितों के टकराव या संघर्ष का प्रतीक है. बदली हुई परिस्थितियों में रुद्र-पाशुपत मतावलम्बी पुरोहितों ने रुद्र द्वारा दक्ष को शाप दिये जाने की कल्पना की. यह शाप पशु-बलि आधारित यज्ञ संस्कृति की निंदा का प्रतीक है. निंदा की तीक्ष्णता को हम गौरी या सती, अर्थात् धार्मिक सत्य द्वारा को रुद्र के पक्ष में स्वयम् को भस्म किये जाने के रूप में पाते हैं. धार्मिक सत्य की दावेदारी का नया मानदण्ड रुद्र-पाशुपत मत की दावेदारी में प्रकट हुई. और उस दावेदारी की घोषणा को हम ब्रह्माण्डपुराण 1:13:60 में पाते हैं, जहाँ सत्य का मानवीकृत रूप सती स्वयम् को हमेशा रुद्र से जुड़े होने की बात करती है.
अतीत की सामाजिक सांस्कृतिक प्रतिष्पर्द्धा और संघर्ष ऐसी कहानियों के माध्यम से ही पौराणिक ग्रंथों में अभिव्यक्त हुआ है. धीरे धीरे, बाद के समय में कम रचनात्मक क्षमता वाले लोगों ने अपने सीमित वर्गीय हितों की रक्षा करने, उसे और अधिक फैलाव देने के लिये प्रतीकात्मकताओं के निहित अर्थों को भुला दिया.
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Tuesday, June 11, 2019

स्त्री-क्षेत्र

कल ‘भैयाजी कहिन’ कार्यक्रम में छोटी छोटी बच्चियों के प्रति जघन्य अपराधों एवं उसे लेकर उठने वाले राजनीतिक छीछालेदर पर बहस के दौरान एक हिंदुत्ववादी प्रवक्ता ने बड़े रोष में आकर कुरान से वो आयत का उल्लेख किया जिसमें औरत को मर्द का ‘खेत’ बताया गया है, जिसे वह अपनी इच्छानुसार ‘जोतने’ के लिये स्वतंत्र है( कुरान 2:223). उन उत्तेजित महाशय के अनुसार कुरान की ऐसी ‘अस्वीकार्य दृष्टिकोण के धार्मिक मान्यता’ के कारण इसे मानने वाले बलात्कार जैसी घटना को अंजाम देने की प्रेरणा पाता है !
पहली बात, कि कुरान में ऐसा कहा गया है. लेकिन इसके बाद जानने वाली बात यह है, कि ऐसा सिर्फ कुरान में ही नहीं कहा गया है !
भारतीय पौराणिक साहित्यों (धर्मशास्त्र समेत) में स्त्री को संतानोत्पत्ति एवं वंशवृद्धि के संदर्भ में बार-बार ‘क्षेत्र’ गया है. और साथ ही पुरुष को वंशवृद्धि के लिये पूर्ण क्षेत्राधिकार दिया गया है. उदाहरण के लिये,
‘नियोगात् ब्रह्मणः पूर्वे मया स्वेन बलेन च, वैचित्रवीर्यके क्षेत्रे जातः स सुमहामतिः.’ (महाभारत, आश्रमवासिकपर्व 28:15)
अर्थात्, व्यास ने कहा, ‘ब्रह्मा के कहने पर मैंने अपने बल से विचित्रवीर्य के ‘क्षेत्र’ (भार्या) में सुमहामति विदुर को उत्पन्न किया.’
प्राचीन साहित्य ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जहाँ स्त्री को उसके पुरुष के लिये क्षेत्र (खेत) की संज्ञा दी गयी है.
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वास्तविकता यही है कि प्राचीन संस्कृतियों में संतानोत्पत्ति के लिये बलात्कार को भी स्वीकार किया गया था. वह उस समय की बात है. सभ्यता के विकास के साथ मानव समाज ने अपने पूर्व के पिछड़े हुए अमानवीय तौर-तरीकों को परिमार्जित किया, और विकसित हुआ. भारतीय सांस्कृतिक परम्परा की विशेषता यह रही है कि पूर्व के अमानवीय प्रावधानों को हर पीढी ने अपने समय के नैतिक मूल्यों के अनुसार ढाला. धर्मशास्त्रीय प्रावधान और उसकी व्याख्या हर युग में बदले गये.
इस्लाम जैसी परम्परा में यह काम मुश्किल इसलिये हो जाता है, क्योंकि अधिकांश मुसलमान कुरान को अपने ईश्वर की वाणी समझते हैं, जिसके प्रति श्रद्धा-भाव रखा जाना अनिवार्य होता है. लेकिन यह मानना कि इस कारण से छोटी छोटी बच्चियों के साथ कुकर्म को बढावा मिलता है, अनुचित है. सम्भव है, कि इस्लामी शिक्षा में छोटी छोटी बच्चियों से यौन सम्बंधों को लेकर आधुनिक मानदंडों के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश नहीं हो रही हो, परंतु इसे यौन कुकर्मों के पीछे का आधार मान लेने को स्वीकार नहीं किया जा सकता. कुछ कुकर्मों के पीछे सामुदायिक बदले की भावना होने की बात को स्वीकार किया जा सकता है, मगर इसे जरूरत से ज्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता. आधुनिक समय में नयी पीढी अगर मानसिक यौन-विकृति का शिकार हो रहा है तो इसके लिए आज के सामाजिक सांस्कृतिक कारण जिम्मेदार हैं, न कि प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में लिखे हुए कुछ वक्तव्य !
और सबसे बड़ी बात कि धर्मग्रंथों के प्रावधान संतानोत्पत्ति के संदर्भ में हैं, न कि यौन-शोषण के संदर्भ में ! इन दो अलग चीजों का हम घालमेल नहीं कर सकते.

Tuesday, May 21, 2019

पृषध्र

वैवस्वत मनु के पुत्र, पृषध्र, ने अपने पुरोहित च्यवन के गाय को मारकर खा लिया. शापवश वह शूद्र हो गया,
‘----, पृषध्रो हिंसयित्वा तु गुरोर्गावमभक्षयत्.’ 01
शापात् शूद्रत्वम् आपन्नः च्यवनस्य महात्मनः, ----'. 02
- (वायुपुराण 86:01, 02)
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आखेट पर निकले सावर्णि मनु के पुत्र पृषध्र (पूषध्र) ने वन में मौलि नामक ‘किसी अग्निहोत्री ब्राह्मण’ के झाड़ी में आधा छिपे हुए होमधेनु को मार डाला.
 'स ददर्श तदा तत्र होमधेनुं मनोहराम्, -----'
‘गोपालः प्रेषितः पुत्रो वाभ्रव्यो नाम नामतः, ----‘
'गाय चराने के लिये भेजे गये--- . इस मौलि-पुत्र वाभ्रव्य के शाप से पृषध्र शूद्र हो गया.
- मार्कण्डेय पु. 112:--

यहाँ पृषध्र द्वारा इस ब्राह्मणपुत्र के अपमान का उल्लेख है, जिसके एवज में पृषध्र द्वारा वापस उस वाभ्रव्य को शाप देता हुआ उल्लेख किया गया है. इस कहानी से हमें वास्तविकता का अंदाजा लगा लेना चाहिये था. कबिलाई युग में योद्धा सर्वशक्तिमान था. उसके लिये किसी पुरोहित कर्म से जुड़े व्यक्ति का अपमान करना एक साधारण घटना थी. तपस्या से प्राप्त शक्ति के बल पर शाप देने की बात बहुत बाद की बौद्धिक उत्पत्ति है. ऐसे पृषध्र को बाद के पुराण-पण्डितों ने शूद्र घोषित करना अपरिहार्य समझा होगा.
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वैवस्वत मनु का पुत्र, पृषघ्र, को गुरु ने ‘गाय का पालन’ (गोपाल) करने वाला नियुक्त कर रखा था, (‘पृषध्रस्तु मनोः पुत्रो गोपालो गुरुणा कृतः, पालयामास गा यत्तो रात्र्यां वीरासनव्रतः’.) वर्षा की रात, गाय को व्याघ्र समझकर मार डाला. सुबह कुलपुरोहित ने उसे शुद्र हो जाने का शाप दिया.
- भागवतपुराण 09:02:03,,
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थोडा सा गौर करने पर इस एक घटना के तीन अलग अलग संस्करणों रचयिता के दृष्टिकोण का दर्शन होता है. तीन संस्करण, तीन अलग अलग समय और उसके सांस्कृतिक सामाजिक माणदण्डों को सामने रख कर रचा गया है. सबसे सीधा, और सबसे कम ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण वायुपुराण में वर्णित है. अर्थात्, तीनों संस्करणों में सबसे पुराणा वायुपुराण है, स्पष्ट हो जाता है.
इससे अधिक नयापन मार्कण्डेयपुराण की प्रस्तुति में है. क्योंकि इसमें पृषध्र को 'संदेह का फायदा' देते हुए, गोहत्या का दोषी माना गया है.
भागवतपुराण की कहाँई सबसे नई और सबसे अधिक दकियानूसी है. अर्थात्, भागवतपुराण में इस कहानी का समावेश सबसे नया है.
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तीनों संस्करणों में तथ्यों में भी बड़ा हेर फेर है. अनुवादों में तो और भी घपला है ! वायुपुराण में पृषध्र का पुरोहित च्यवन को बताया गया. मार्कण्डेयपुराण में गाय का मालिक 'कोई अग्निहोत्र ब्राह्मण' बन गया. और भागवतपुराण में तो पृषध्र को गुरु का गोपाल बना दिया गया. अनुवादक ने तो गुरु को बाजाब्ता वसिष्ठ नाम दे दिया है. क्योंकि प्राचीन तथ्यों को कुछ खास प्रकार से रूढ बनाने में उसे भी अपनी भूमिका निभानी थी. हाँ, एक चीज तीनों जगहों पर एक सा है कि 'गाय मारने पर पृषध्र शूद्र बन गया' !
शनैः शनैः समय के साथ पौराणिक प्रस्तुति अधिक ब्राह्मणवादी होती दिखाई देती है. मार्कण्डेयपुराण में ब्राह्मण का पुत्र 'गोपाल' है तो कोई परेशानी नहीं है. मगर भागवतपुराण लिखे जाने के समय तक इसमें परेशानी होने लगी. तो एक राजा के पुत्र को 'गोपाल' नियुक्त कर दिया गया ! ताकि स्थापित हो सके कि ब्राह्मण, राजा के ऊपर है !!       

Sunday, May 19, 2019

बौद्धिक अंतर्विरोध

सिर्फ बौद्धिकता से विज्ञान आगे नहीं बढ सकता. वकालत आगे बढती है. आँखें खुली हों, जो दिखता है, उसे समझने की ईमानदार कोशिश हो तो बुद्धि विज्ञान को जन्म देती है. वरना, दिये गये तथ्यों के आधार पर बंद आँखों से सोच-विचार हमें अवैज्ञानिक रास्तों पर ले जाता है. ऐसे में बौद्धिकता का उपयोग, मनमाने निश्कर्षों तक पहुँचने के लिये होता है. कुछ निशकषों की जाँच-परख करने पर उनमें अभिव्यक्त अंतर्विरोध प्रकट हो जाते हैं. हमें पता चल जाता है, कि हमारे देखने का तरीका क्या था.    
हमारे पूर्वजों ने बौद्धिकता के क्षेत्र में जिस प्रकार के कीर्तिमान स्थापित किये हैं, उससे इंकार नहीं किया जा सकता. फिर भी हम विज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से दुनिया के फिसड्डी प्राचीन समाज में परिणत हुए हैं.
शांतिपर्व 342वाँ अध्याय, श्लोक (हालाँकि यह गद्य जैसा है) 09 में सृष्टि के बारे में ऐसा बखान है,
तमाविष्ट (गहन अंधेरे में लिपटा अव्यक्त) ब्रह्म से ‘पुरुष’ की उत्पत्ति हुई. ‘पुरुष’ से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई. ‘पुरुष’ की आँख से सोम और अग्नि की उत्पत्ति हुई.
सोम और अग्नि के बारे में कहा गया, कि
‘यः सोमः तत् ब्रह्म, यत् ब्रह्म ते ब्राह्मणा, यः अग्निः तत् क्षत्रं, क्षत्रात् ब्रह्म बलवत्तरम्.’
अर्थात्, ‘जो सोम है वही ब्रह्म है, जो ब्रह्म है वही ब्राह्मण है. जो अग्नि है वही क्षत्र है. क्षत्र से ब्रह्म अधिक प्रबल है.’
इसी अध्याय के 12वें श्लोक में स्थिति उलट जाती है,
‘अग्निर्हि यज्ञानां होता कर्ता स चाग्निब्रह्म’.
अर्थ, ‘अग्नि यज्ञों के होता और कर्ता हैं. वे अग्निदेव ब्रह्म हैं.’
बौद्धिक मुश्किल यह है, कि आधुनिक अनुवादक जातिवादी पुर्वग्रहों से इतना ग्रसित रहा है कि 09 और 12 में प्रकट अंतर्विरोध को चुपचाप छुपा जाता है. यही नहीं, ‘ब्रह्म’ को ‘ब्राह्मण’ अनुवाद करने में उसे कोई असुविधा नहीं होती ! श्लोक 09 का तो दावा और भी अद्भुत् है; ‘ब्रह्म’ और ‘ब्राह्मण’ के अंतर को ही मिटा दिया गया ! फिर तो जहाँ जहाँ ‘ब्रह्म’ शब्द मिला, उसका अनुवाद ‘ब्राह्मण’ करने में कोई बाधा नहीं था.
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जातिवादी बौद्धिकता समाजशास्त्रीय वास्तविकताओं को नजरंदाज करते हुए अपने द्वारा प्रस्तुर निशकर्षों के अंतर्विरोध को भी नहीं सुलझा पाता. श्लोक 09 में अग्नि को क्षत्रिय बताने वाली बौद्धिकता श्लोक 12वीं में उसी को ब्राह्मण बताता है ! वह यह भी भूल जाता है कि यज्ञ में कर्ता राजा होता, पुरोहित नहीं !  
यही नहीं श्लोक 09 में सोम को ब्राह्मण बताते हुए, श्लोक 57 में सोम को राजा बताया गया है, ‘—दक्षशापात् सोमं राजानं यक्ष्मां विवेश—‘..(दक्ष के शाप से राजा सोम में यक्ष्मा का प्रवेष हुआ.)
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पौराणिक क्थाओं कें कही गयी बातों, दावों के विश्लेषण से ही हम प्राचीन समाज की विकास यात्रा के बारे में कोई खाका तैयार कर सकते हैं. जिसे एक जगह पर क्षत्रिय बताया, दूसरे स्थान पर वह ब्राह्मण हो जाता है, पुनः तीसरी जगह उसे क्षत्रिय के रूप में निरूपित किया जाता है.

Friday, March 15, 2019

त्रयी- तीन विद्या

त्रयी कहते थे (हैं), तीन को मिलाकर जो बनता है. आज यह तीन प्रकार की प्राचीनतम विद्या के लिये यह शब्द रूढ हो गया है. वो तीन विद्या थी, ऋक्, साम, और यजुष्. इनमें से ऋक् सबसे प्राचीन है. इस विद्या को सबसे पहली बार अलग पहचान मिली. स्वाभाविक है कि ध्वनियों से शब्द, और शब्दों से अर्थपूर्ण वाक्या को बनाने की क्षमता को पहचानना अपने समय में एक महान खोज थी, एक अलौकिक उपलब्धि थी. यह प्रशंसा, अनुरोध, वर्णन, आदि से जुड़ी रचना की विद्या थी. आर्य कबीलों में जो लोग किसी भी विषय पर कविता रच सकते थे, उन्हें ही ऋषि कहा गया. जब इस विद्या को मानव ने पहली बार पहचाना, उस युग में यह एक दिव्य घटना थी. ऐसी रचनाओं से जीवन और उसके परिवेष पर उत्पन्न प्रभाव को लेकर उस समय के लोगों में अद्भुत विश्वास रहा होगा, जो इन गीतों में झलकता है.दूसरी विद्या ऋकों के गायन का. अलग अलग प्रकार से उन गीतों को गाने वाले लोग जनसामान्य पर जो प्रभाव डालते थे, वह भी दिव्य था. संगीत, जब आज भी दिव्य अहसास देता है, तो फिर प्राचीन मानवों के लिये उसके महत्व को समझना आवश्यक है. वह महत्व उस युग के सापेक्ष समझा जाना चाहिये. अतः, ऋकों के गायन से जिस विद्या का जन्म हुआ वह सामन-विद्या थी.तीसरी विद्या आर्यों के जीवन में अग्नि और उससे जुड़े वो कर्मकाण्ड थे जिनके माध्यम से अलौकिक शक्तियों को प्रसन्न किया जाता था. उस धार्मिक कर्मकाण्ड को हम यज्ञ कहते हैं. तो यज्ञों के आयोजन, विधि-विधान, क्रियान्वयन से जुड़ी विद्या यजुष् विद्या थी.
वेद और विद्या में कोई अंतर नहीं है. ये दोनों एक ही शब्द के अलग रूपांतर है.एक चौथी विद्या बहुत बाद में पूर्व की त्रयी के साथ जुड़ गयी. वह था मंत्रों के मायावी प्रभावों, जादू-टोना आदि से. आर्यों के ज्ञात अलौकिक शक्तियों से अलग अनेक अनार्य शक्तियों का नकारात्मक प्रभाव उन्हें परेशान किया करता था. सम्भव है कि कुछ अनार्य पुरोहितों ने इस विद्या को आर्यों को उपलब्ध कराया. इस विद्या को किसी अथर्वन् नामक पुरोहित के वंशजों ने सजोया था. यज्ञों के आयोजन को अनार्य मायावी शक्तियों से रक्षा करने के लिये अथर्व-विद्या के ज्ञाता पुरोहितों को दायित्व सौंपा जाता था. उन्हें ही ब्राह्मण कहते थे. क्योंकि उनका दावा था, कि वो ब्रह्म नामक परा अलौकिक शक्ति को अपने जादू-टोना से प्रभावित करने में सक्षम थे.
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