Sunday, May 19, 2019

बौद्धिक अंतर्विरोध

सिर्फ बौद्धिकता से विज्ञान आगे नहीं बढ सकता. वकालत आगे बढती है. आँखें खुली हों, जो दिखता है, उसे समझने की ईमानदार कोशिश हो तो बुद्धि विज्ञान को जन्म देती है. वरना, दिये गये तथ्यों के आधार पर बंद आँखों से सोच-विचार हमें अवैज्ञानिक रास्तों पर ले जाता है. ऐसे में बौद्धिकता का उपयोग, मनमाने निश्कर्षों तक पहुँचने के लिये होता है. कुछ निशकषों की जाँच-परख करने पर उनमें अभिव्यक्त अंतर्विरोध प्रकट हो जाते हैं. हमें पता चल जाता है, कि हमारे देखने का तरीका क्या था.    
हमारे पूर्वजों ने बौद्धिकता के क्षेत्र में जिस प्रकार के कीर्तिमान स्थापित किये हैं, उससे इंकार नहीं किया जा सकता. फिर भी हम विज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से दुनिया के फिसड्डी प्राचीन समाज में परिणत हुए हैं.
शांतिपर्व 342वाँ अध्याय, श्लोक (हालाँकि यह गद्य जैसा है) 09 में सृष्टि के बारे में ऐसा बखान है,
तमाविष्ट (गहन अंधेरे में लिपटा अव्यक्त) ब्रह्म से पुरुषकी उत्पत्ति हुई. पुरुषसे ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई. पुरुषकी आँख से सोम और अग्नि की उत्पत्ति हुई.
सोम और अग्नि के बारे में कहा गया, कि
यः सोमः तत् ब्रह्म, यत् ब्रह्म ते ब्राह्मणा, यः अग्निः तत् क्षत्रं, क्षत्रात् ब्रह्म बलवत्तरम्.
अर्थात्, ‘जो सोम है वही ब्रह्म है, जो ब्रह्म है वही ब्राह्मण है. जो अग्नि है वही क्षत्र है. क्षत्र से ब्रह्म अधिक प्रबल है.
इसी अध्याय के 12वें श्लोक में स्थिति उलट जाती है,
अग्निर्हि यज्ञानां होता कर्ता स चाग्निब्रह्म’.
अर्थ, ‘अग्नि यज्ञों के होता और कर्ता हैं. वे अग्निदेव ब्रह्म हैं.
बौद्धिक मुश्किल यह है, कि आधुनिक अनुवादक जातिवादी पुर्वग्रहों से इतना ग्रसित रहा है कि 09 और 12 में प्रकट अंतर्विरोध को चुपचाप छुपा जाता है. यही नहीं, ब्रह्मको ब्राह्मणअनुवाद करने में उसे कोई असुविधा नहीं होती ! श्लोक 09 का तो दावा और भी अद्भुत् है; ‘ब्रह्मऔर ब्राह्मणके अंतर को ही मिटा दिया गया ! फिर तो जहाँ जहाँ ब्रह्मशब्द मिला, उसका अनुवाद ब्राह्मणकरने में कोई बाधा नहीं था.
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जातिवादी बौद्धिकता समाजशास्त्रीय वास्तविकताओं को नजरंदाज करते हुए अपने द्वारा प्रस्तुर निशकर्षों के अंतर्विरोध को भी नहीं सुलझा पाता. श्लोक 09 में अग्नि को क्षत्रिय बताने वाली बौद्धिकता श्लोक 12वीं में उसी को ब्राह्मण बताता है ! वह यह भी भूल जाता है कि यज्ञ में कर्ता राजा होता, पुरोहित नहीं !  
यही नहीं श्लोक 09 में सोम को ब्राह्मण बताते हुए, श्लोक 57 में सोम को राजा बताया गया है, ‘—दक्षशापात् सोमं राजानं यक्ष्मां विवेश—‘..(दक्ष के शाप से राजा सोम में यक्ष्मा का प्रवेष हुआ.)
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पौराणिक क्थाओं कें कही गयी बातों, दावों के विश्लेषण से ही हम प्राचीन समाज की विकास यात्रा के बारे में कोई खाका तैयार कर सकते हैं. जिसे एक जगह पर क्षत्रिय बताया, दूसरे स्थान पर वह ब्राह्मण हो जाता है, पुनः तीसरी जगह उसे क्षत्रिय के रूप में निरूपित किया जाता है.

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