Friday, July 6, 2018
Friday, June 1, 2018
आभीर
आभीर
--------------------
आज उत्तर भारत में जो जाति समूह अपने नाम के पीछे 'यादव' शब्द धारण करते हैं, उनकी उत्पत्ति दो प्राचीन जाति समूहों से जुड़ा हुआ है. ये जाति समूह है, ग्वाला और अहिर. इन दोनों जातियों का जिक्र महाभारत ग्रंथ में मिलता है. यमुना से पूरब गोपालकों का क्षेत्र था. इन गोपालकों के यहाँ ही कृष्ण के बचपन गुजरने का पूरा आख्यान कृष्ण-लीला का विषय है. अहिर, या आभीरों का जिक्र महाभारत के मूसल पर्व में आया है. द्वारका क्षेत्र में, यादवों का गृहयुद्ध, और वंश विनाश के बाद अर्जुन बचे-खुचे यादव बच्चों एवं स्त्रियों को लेकर पंजाब के रास्ते हस्तिनापुर लौट रहे थे, कि रास्ते में लट्ठधारी आभीर लुटेरों नें यादव स्त्रियों को लूट लिया. अर्जुन, अपनी वृद्धावस्था के कारण आभीरों का प्रतिकार नहीं कर पाये. बचे हुए यादव बालकों को लेकर वो हस्तिनापुर पहुँच पाये.- (महाभारत, मूसल पर्व, अध्याय-8, श्लोक-45, श्लोक-61; अध्याय-9, श्लोक-16)उपरोक्त घटना के अलावा महाभारत में आभीरों का निम्नांकित स्थानों पर उल्लेख मिलता है,- महाभारत 2:32:10- शूद्र और आभीर कबीलों को पाण्डुपुत्र नकुल ने जीता.- महाभारत 2:51:12- निचले सिंधु के पश्चिम तट निवासी के रूप में आभीर का उल्लेख.- महाभारत 3:188:36- छल से शासन करने वाले आभीर, पुलिंद, आंध्र, शक, यवन, कंबोज, तथा बाह्लिक राज्यों का उल्लेख है.- महाभारत 6:09:47, 67 में भारत के जनपदों के वर्णन में आभीर जनपद का भी नामोल्लेख किया गया है।- महाभारत 7:20:06- द्रोण द्वारा गरुड़ व्यूह में शक और यवनों के साथ आभीर शूरवीर भी शामिल हुए थे।- महाभारत 14:29:16 में उल्लेख है कि जो क्षत्रिय परशुराम के भय से दूरदराज के इलाकों में भाग गए, वो द्रविड़, आभीर, पुंड्र, शबर जैसे कबीलों के संसर्ग में शूद्र की अवस्था में पहुंच गए।- महाभारत शल्यपर्व 37:01 में सरस्वती के तट पर बसे शूद्र और आभीरों के प्रति द्वेश के कारण सरस्वती नदी के सूख जाने का उल्लेख है.- मत्स्यपुराण 50:76 में क्षत्रिय, पारशव, शूद्र, बहिश्चर, अंध, शक, पुलिंद, चूलिक, यवन, कैवर्त, आभीर, और शबर राजाओं का उल्लेख है.- मत्स्यपुराण 114:40- आभीरों का उल्लेख मिलता है. ये उत्तर भारत में निवास करते हुए बताये गये हैं.महाभारत और मत्स्यपुराण जैसे स्रोतों में आभीरों का जिन अन्य लोगों के साथ उल्लेख है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि ईसा सन के आस पास आभीर कबीले सिंध और पंजाब के इलाकों में बसे हुए थे. दूसरी-तीसरी शताब्दी में एक आभीर राजवंश का जिक्र भी आता है. वायुपुराण 99:,, में कच्छ और सिंध के इलाके में सात आभीरवंशी राजाओं का उल्लेख है. उस इलाके लोगों को म्लेच्छ कहा गया है. और बाद में ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसे कबीलों को शूद्र कहे जाने के पीछे कारण गांगेय क्षेत्र के लोगों द्वारा पश्चिम और उत्तर पश्चिम के लोगों के प्रति पुर्वग्रह ही रहा होगा. महाभारत (कर्णपर्व) में कर्ण द्वारा पंजाब और उत्तर पश्चिम के लोगों को निम्न माने जाने का वर्णन है. लोगों के यज्ञ-कर्मकांडों के नहीं मानने की बात की गयी है. वास्तव में यज्ञ-संस्कृति काल के बाद भी पश्चिम और उत्तर से नये कबीलों का समय समय पर भारतीय उपमहाद्वीप में आगमन होता ही रहा. नये लोगों के रीति-रिवाजों को गांगेय क्षेत्र के लोग घृणा की दृष्टि से देखने लगे थे.इसवी सन के आरम्भिक समय में वो इलाके धार्मिक दृष्टि से गैर-ब्राह्मण सम्प्रदायों से जुड़े थे. ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार उत्तर पश्चिम से आये शक्तिशाली लड़ाकू कबीलों को ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ संस्कार के माध्यम से यज्ञ-संस्कृति परम्परा में क्षत्रिय के तौर पर स्वीकार किया जाता रहा. सम्भावना यह है कि आभीर सरदारों को राजपूत नामवाले शासकों के नये वर्ग में शामिल कर लिया गया, कबीले के बाकी लोग कृषि और पशुपालन से जुड़े रहे.मूसलपर्व में आभीरों को बार-बार लुटेरा और म्लेच्छ कहा गया है. (महाभारत, मूसल पर्व, अध्याय-8, श्लोक-45, श्लोक-61; अध्याय-9, श्लोक-16) इस परिप्रेक्ष्य में हमें याद रखना चाहिये, कि भारत भूमि पर पश्चिम से आक्रामक लड़ाकू जातियों एवं पशुचारी कबीलों का लगातार आगमन होता रहा है. महाभारत के बाद भी लिखे गये ग्रंथों में पश्चिम से आने वालों को म्लेच्छ और लुटेरा कहा गया है. इनमें पारसी, ग्रीक, कुषाण, शक, हूण आदि का जिक्र प्रमुख है. आभीर भी आर्यों के बाद भारत में आनेवाली एक प्रमुख जाति रही है. महाभारत के हजार से भी अधिक वर्षों बाद, दूसरी तीसरी शताब्दी ईसवी में महाराष्ट्र क्षेत्र में कतिपय आभीर राजवंश का जिक्र आता है. इससे स्पष्ट होता है, कि कालांतर में आभीरों के बीच से कुछ वंश, आक्राता, लुटेरा, और म्लेच्छ जैसी सामाजिक स्थित से उन्नत होकर सम्मानजनक पद पाने में सफल रहे. स्वाभाविक तौर पर इनमें से कुछ वंश छठी सातवीं शताब्दी तक शासक वंश की हैसियत प्राप्त कर राजपूत वर्ग का हिस्सा बन गये. लेकिन, आभीरों का बहुसंख्य, धीरे धीरे, कृषि और पशुपालन में संलग्न हो गया. इसी दौरान, महाभारत उल्लिखित गोपालकों के क्रिया-कलाप से समानता के कारण कृषक-पशुपालक आभीरों का अवशोषण एक जाति के रूप में हो गया.भागवतपुराण 10:24:24, और विष्णुपुराण 5:10:26 में नंद के समाज को वनचर बताया गया है. अर्थात्, महाभारत लिखे जाने तक ग्वाले घुमक्कर स्थित में ही थे. महाभारत का पहला संस्करण लिखे जाने के समय तक पंजाब से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश सामाजिक और आर्थिक आधार कृषि के साथ पशुपालन था. इसमें पशुपालन के दो रूप नजर आते हैं. एक जो स्थायी निवासस्थानों के आस पास के चारागाहों पर आधारित था. दूसरा, घुमक्कर पशुचारियों द्वारा पशुपालन. कई ग्रंथों में कृष्ण का बचपन जिन लोगों के बीच बीतने की बात कही गयी है, वो वनवासी घुमक्कर पशुचारक थे. इस बात की पुष्टि पौराणिक ग्रंथों से होती है. वैसे महाभारत में ग्वालों को पैदल सैनिक की तरह कौरव पक्ष से लड़ते हुए दिखाया गया है. स्वाभाविक तौर पर पशुचारी कबीलों से जुड़े हुए लोग वीर लड़ाकू होते हैं. मध्यकाल में भी कृषि और पशुचारी कार्यों में लगे लोग युद्ध के समय स्थायी सम्भ्रांत सैनिकों के साथ पैदल टुकड़ियों के रूप में इसमें भाग लेते थे. ऐसे कितने ही लड़ाकू कबीलों को हम मुगलों के बाद तक भाड़े के सैनिकों के तौर पर विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के प्रति अपनी सेवायें देते हुए पाते हैं. प्राचीन काल से लेकर पिछली शताब्दियों तक ऐसे लड़ाकू कबीलों ( जातियों ) को हम सामाजिक स्तर पर सम्मानजनक स्थिति पाते हुए देखते हैं. ऐसे लोगों का कबीलों से जाति-उपजाति में परिवर्तन सामाजिक गतिशीलता के कारण ही सम्भव था.ब्रज के गोपालक और पंजाब के आभीरों के पशुपालन में एक बहुत बड़ा अंतर यह दिखता है, कि सम्भवतः, सिंध पंजाब क्षेत्र के आभीर भैंस-पालन में अग्रणी थे. आज के अहिर-ग्वाला जाति के लोगों का अधिकांश भैंसपालन में ही पाया जाता है. इसका मतलब है, कि आभीर, संख्या में ग्वालों से अधिक रहे होंगे.‘---The Abhiras lived in scattered settlements in various parts of western and centra India as far as the deccan. Most of these tribes claimed descent from tge ancient lineage of the Puranas, and some of them were later connected with the rise of Rajput dynasties.----’ - britannica.com ( article 'Ashoka and his Successors')
Sunday, May 20, 2018
ऊँच नीच और सामाजिक जिम्मेदारी
इन बातों को लेकर रुढिग्रस्तता की दिशा में समाज आगे बढा तो इसकी जिम्मेदारी ब्राह्मणों पर नहीं थोपी जा सकती. एक अंत्यज का गाँव में प्रवेश सिर्फ ब्राह्मण की शुचिता के लिये खतरा नहीं समझा जाता था. बल्कि, इस मायने में अन्य जातियों का व्यवहार भी अंत्यजों के प्रति यथेष्ट कठोर था. आज अगर दूसरी जातियों के लोग यह कह कर पल्ला झाड़ लें, कि ऐसा तो उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा संकलित धर्मशास्त्रों के पालन के लिये किया था, और कि इसकी जिम्मेदारी ब्राहमणों पर जाती है, तो यह महज अपनी जिम्मेदारी से भागना है. जिम्मेदारी से भागने वाले समाज की हालत क्या होती है, हम उसका एक उदाहरण हैं !
अपने युग के सामाजिक दृष्टिकोणों पुर्वग्रहों, धारणाओं को ब्राहमणों ने धर्मशास्त्रों में समाहित किया. समाहित करने का यह अर्थ कदापि नहीं लिया जा सकता, कि ब्राह्मणों ने उन प्रावधानों के पीछे समाज की सामुहिक सोच को उत्पन्न किया. ब्राह्मण भी समाज का हिस्सा था. समाज की सामुहिक चेतना, पुर्वग्रह, खामी, खूबी से ब्राह्मण भी वैसे ही जुड़ा था, जैसा किसी अन्य जाति के लोग. जातिप्रथा के बारे में एक अवैज्ञानिक दुस्प्रचार (राजनीति से प्रेरित) यह पाया जाता है, कि जाति की व्यवस्था धर्मशास्त्रों के कारण अस्तित्व में आया. सच इससे उलट है. जातिप्रथा का जन्म सामाजिक धारणाओं एवं पुर्वग्रहों से उपजा, जिसे धर्मशास्त्रों में संकलित और समाहित किया गया. हाँ, यह सही है, कि उस जमाने की धारणाओं पुर्वग्रहों को धर्मशास्त्र में प्रावधानों के रूप में शामिल करने वालों (ब्राह्मणों) ने अपने फायदे का विशेष खयाल रखा. ऐसा करने के लिये, अतीत के उदाहरणों, परम्पराओं के उद्धरणों को तोड़ मड़ोर कर प्रस्तुत किया.
लेकिन, ऐसा सिर्फ भारत में हुआ है, या प्राचीन काल तक ही सीमित रहा है, ऐसा सोचना इस देश के बौद्धिक पिछड़ेपन के कारण है. इस देश के लोगों ने दूसरे समाज, देश, परम्परा के अध्ययन की बात तो दूर, अपनी परम्परा को भी जानने में रुचि नहीं दिखाई है. आधुनिक काल में प्राचीन का लगभग सारा अध्ययन पश्चिमी अध्येताओं ने किया है. ऐसे में हम दुनिया के अन्य समाज की वास्तविकताओं को नही जान पाये हैं. सत्ता से जुड़े वर्गों ने हमेशा अपने लिये विशेषाधिकारों का प्रावधान रखा और उसका उपभोग किया.
भारत का बौद्धिक पिछड़ापन आज भी उतना ही गहरा है, जितना पहले कभी रहा था. जो लोग भारतीय समाज के पिछड़ेपन के लिये तथाकथित उच्च जातियों को दोष देते हैं, वो आज भी पिछड़ेपन से बाहर निकलने का सार्थक प्रयास नहीं कर रहे. पिछड़ेपन से निकलने के उपायों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाता है, कि ये उपाय अपने आप में पिछड़ेपन को और अधिक बढावा देने वाला है. तथाकथित उच्च जातियों में बौद्धिक और आर्थिक पिछड़ेपन का स्तर तथाकथित पिछड़ी जातियों से कम नहीं है. और ये दोनों प्रकार के पिछड़ेपन इस देश की उन्नति में सबसे बड़े बाधक है. वैश्विकृत दुनिया में पिछड़ेपन के माणदंड बिल्कुल अलग हैं. सामाजिक स्तर पर उस माणदंड को ध्यान में रखे बगैर देश के पिछड़ेपन से निबटना मुश्किल होगा.
Saturday, April 21, 2018
चार वर्ण
ऋग्वेद के दशम मण्डल के पुरुषसूक्त के ‘पुरुष’ के शरीर के विभिन्न अंग यथा मुख, हाथ, पाँव, जंघा, और पाँव से चार वर्णों की उत्पत्ति की व्याख्या समाज में कार्य विभाजन को लेकर शायद दुनिया में पहली अभिव्यक्ति है. बोलने, अर्थात यज्ञ में वेदोच्चार का काम करने वाला ब्राह्मण, उस यज्ञ में हवि करने और उसकी रक्षा करने वाला राजन्य, यज्ञ के लिये हर प्रकार के उत्पादन का दायित्व निभाने वाला वैश्य, और इस कार्य में हर प्रकार की सेवा कर्म को निभाने वाला शुद्र था. सभी जानते हैं, कि ऋग्वेद कालीन समाज यज्ञ के इर्द-गीर्द घूमता था. यज्ञ में आर्य समाज के लोगों की भूमिकाओं को अगर हम चार हिस्सों में बाँटे, तो कर्म के आधार पर क्या, वेदोच्चार पाँव से, हवन मुख से, और ऐसे ही अन्य कामों को कहीं और से सम्पन्न किया जा सकता है? इत्तेफाक है, कि शरीर में ध्वनि बोलने वाला यंत्र ऊपर स्थित है, और चलने वाला नीचे. और सबका कुछ न कुछ नाम तो होना ही था. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह, कि जब सामाजिक व्यवस्था में चार वर्णों की संकल्पना उभरी तब यह निहायत की कर्म आधारित था. इस तथ्य को सिद्ध करने के लिये प्राचीन ग्रंथों के विश्लेषण से पर्याप्त सबूत उपलब्ध हैं. कालांतर में यह जाति आधारित कैसे हो गया, इसे समझना एक अलग विषय है. वर्ण की इस प्रकार की व्याख्या से परेशानी हमारी आज का हमारा पुर्वाग्रह है. पुर्वाग्रह, इस तथ्य को लेकर कि सिर सबसे ऊपर स्थित है, और पाँव सबसे नीचे. और ऊपर-नीचे के चक्कर को हम व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का प्रयास नहीं कर रहे. मानव समाज का वर्गों में विभाजन सांस्कृतिक तौर पर एक प्राकृतिक घटना है.
जिन लोगों को यह भ्रम है, कि ब्राह्मण वर्ण की संकल्पना समाज के बौद्धिक नेतृत्व के रूप में हुआ, तो सम्भवतः ऐसा मानने का कोई ठोस सबूत उपलब्ध नहीं है. उस समय बौद्धिक काम से तात्पर्य अगर ऋचाओं की रचना से है तो हमे याद रखना चाहिये, कि ऋषि हर वर्ण से थे. हमें इसका अहसास नहीं होता कि उस वक्त लोगों को यही विश्वास था, कि आध्यात्मिक भावों के उभरने का स्थल हृदय है. मस्तिष्क के प्रति मनुष्य की जागरुकता बाद की बात है. तभी तो लोग वेदों को हृदयंगम करते थे. और हृदय-स्थल, मुख से काफी नीचे स्थित होता है! सांस्कृतिक तौर पर हृदय के महत्व को सिर्फ इस बात से ही समझा जा सकता है, कि आज भी हम अपने सबसे प्रिय व्यक्ति या वस्तु से जुड़ी भावना को हृदय में ही रखते हैं. कर्मकाण्डों से भरा हुआ आर्यों का सामाजिक जीवन ध्यान-योग आधारित बाद के ब्राहमणवादी धर्म से बहुत अलग था, जब मस्तिष्क और उससे जुड़ी अवधारणाओं की खोज हुई. और इन्हीं खोजों के बाद ब्राह्मण वर्ण के लोगों ने समाज की जाति आधारित वर्ण-विभाजन पर बल देना शुरु किया. ऋग्वेद के समय के कुछ समय(सैकड़ों वर्षों) के बाद सामाजिक संरचना में ब्राह्मण बौद्धिक नेतृत्व करने वाले ‘जाति आधारित’ वर्ग के रूप में स्थापित हुए. निष्कर्ण यह कि समाज में ब्राहमणों की बौद्धिक सर्वोच्चता की स्थापना एक सामाजिक प्रक्रिया से उपजी, जिसने वर्णव्यस्था को जाति-व्यवस्था में बदल डाला.
Tuesday, April 17, 2018
विष्णु पुराण के अनुसार क्षत्रियों की वंशावली
Monday, April 16, 2018
चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में बदलाव के चिह्न
चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में बदलाव के चिह्न
आज जब हम आधुनिक इतिहास अन्वेषण के माध्यम से अतीत की वास्तविक तस्वीर आँकने की कोशिश करते हैं, हमारे वाङमय में विभिन्न काल में रचित ग्रंथों में उस जमाने और उससे पहले के बारे में दिये गये तस्वीरों को समय सापेक्ष्य सिलसिलेवार सजाने की आवश्यकता होती है. एक ही घटना का कई जगहों पर अलग चित्रण, उसमें तथ्यों के स्वभाव के साथ असहज छेड़-छाड़ आदि को समय-यात्रा के सापेक्ष्य समझना पड़ता है. अतीत का पारम्परिक चित्रण में सहज ही वर्तमान के पुर्वग्रहों का पश्चारोपण होता रहता है. वैज्ञानिक तरीकों से अतीत को समझना तब तक सम्भव नहीं होता, जबतक हम पुराने तथ्यों के बीच की टकराहट को निरपेक्ष भाव से विश्लेषित करने को तैयार न हों.
भारतीय समाज में वर्ण-व्यवस्था और जाति-प्रथा को लेकर काफी काफी भावनात्मक बहस होती रहती. है. ऐसी बहसों में बौद्धिक खींचतान प्राचीन ग्रंथों के सीधे अध्ययन पर आधारित नहीं होता. जो लिखा गया है, या जो लोगों द्वारा समझा गया है, उसी के इर्द-गिर्द सीमित, मगर तीखी बहस चलती रहती है. बहस किआ उद्देश्य अतीत को समझना न होकर आज के पुर्वग्रहों में लिपटे धारणाओं के लिये एक सम्मानजनक आधार तलाशना भर होता है.
विष्णुपुराण समेत अन्य कई महत्वपूर्ण पुराण गुप्त-काल में अपने वर्तमान स्वरूप में आ चुके थे, ऐसी मान्यता है. यानी, उससे पहले के अतीत को तत्कालीन पुर्वग्रहों के प्रकाश में लिखने का काम सम्पन्न हुआ. इसके बावजूद इन पुराणों के विवरण में ऐसा बहुत कुछ मिल जाता है, जो तत्कालीन सामाजिक सांस्कृतिक धारणाओं से बिल्कुल मेल नहीं खाता. वर्णव्यवस्था और जाति-प्रथा से जुड़ी मनुस्मृतीय धारणा से बेमेल घटनाओं के माध्यम से हम प्राचीन से भी प्राचीन भारतीय समाज की तस्वीर को अंकित कर सकते हैं.
विष्णुपुराण के वंशावली खण्ड में प्राप्त कुछ तथ्यों पर निगाह डालना मजेदार होगा.
- विष्णुपुराण, (4-08-04) के अनुसार गृत्समद पुत्र शौनक चातुर्वर्ण्य का प्रवर्तक हुआ. अर्थात पुराणों तक में इसका जिक्र है, कि आर्य समाज में चार वर्णों की सामाजिक व्यवस्था एक लम्बे समय के बाद शुरु हुआ. स्वाभाविक है, कि सामाजिक व्यवस्था में बदलाव किसी एक व्यक्ति द्वारा एक छोटे से अंतराल में सम्भव नहीं होता. किसी नयी चीज को स्थापित होने में समय लगता है. और उसके बाद किसी बड़े व्यक्ति के नाम से उस प्रथा, या व्यवस्था को अभिहित कर दिया जाता है.
- विश्वामित्र की कहानी क्षत्रीय-ब्राह्मण अंतर्सम्बंधों की सच्चाई को बाद में कहानी के माध्यम से पुनर्व्याख्यायित करने का प्रयास है.
- इस सम्बंध में उत्पन्न होने वाला तनाव, जो परशुराम की कथा में उभरकर दिखता है, बाद में चलकर वर्णव्यवस्था के दो ऊपरी कर्मों से जुड़े समुदाय के अलग होने की प्रक्रिया का हिस्सा लगता है.
- इक्ष्वाकु वंश में नाभाग और अम्बरीश के बाद एक कोई रथीतर हुए, जिनके वंशज, क्षत्रीय होते हुए भी क्षत्रोपेता द्विज हुए. वि.पु. (4-02-09)
- पुरुवंशी अप्रतिरथ का पुत्र कण्व, और उसका मेधातिथि हुआ. इसी से काण्वायण द्विज हुए. वि.पु.(4-19-05)
- भरत की संतति में गर्ग से गार्ग्य और शिनि से शैन्य नामक क्षेत्रोपेता ब्राह्मण हुए. आगे चलकर भी इस वंश में कई लोग द्विज हो गये.(4-19-26)
- दुष्यंत- भरत- भरद्वाज (वितथ)- महावीर्य- दुरुक्षय- (त्रय्यारुणि, पुष्करिण्य, कपि, तीनों बाद में ब्राह्मण हो गये) (वि.पु., 4-19--)
- हर्यश्व- मुद्गल, सृजय, बृहदिषु, यवीनर, काम्पिल्य (पांचाल कहलाये). मुद्गल से (मौद्गल्य नामक क्षत्रोपेत ब्राह्मण) (वि. पु. 4-19-59)
- ‘ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशों राजर्षिसत्कृतः, क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थानं प्राप्स्यसे कलौ.’ (विष्णु पुराण, 4-21-18).
अर्थात, ‘जो वंश ब्राह्मण और क्षत्रियों की उत्पत्ति का कारण स्वरूप तथा नाना राजर्षियों से विभाजित है, वह कलियुग में राजा क्षेम के उत्पन्न होने पर समाप्त हो जायेगा’.
उपरोक्त क्षत्रिय वंशावलियों में ब्राह्मन बन गये लोगों के उदाहरण प्राचीन समय में क्षत्रिय और ब्राह्मणों के साझे सामाजिक संघठन की ओर इशारा करते हैं. ऐसे उदाहरण प्राचीन वंशावलियों को बाद में कठोर चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के समय परिमार्जित और पुनर्विश्लेषित करने के बाद भी यहाँ वहाँ पुराणों में बचे रह गये उदाहरण प्राचीन वास्तविकता की तस्वीर की ओर इशारा करते हैं. ऊपर में उल्लिखित श्लोक तो एक प्रकार से वह पक्का सबूत है, जिसके आधार पर हम कह सकते हैं, कि आर्यों के प्राचीन इतिहास में निहित वंशावलियाँ वास्तव में क्षत्रिय-ब्राह्मण वंशावली ही थे. ऊपर के इन दो वर्णों के बीच सामुदायिक विभेद की दीवार बहुत बाद में जाकर कठोर हुईं. कालांतर में पश्चिमोत्तर से आने वाले नये कबीलों, जिन्हें महाभारत आदि ग्रंथों में म्लेच्छ क्षत्रिय के रूप में चिह्नित किया गया है, के भारतीय समाज में मिलने जुलने से वर्णव्यवस्था में कठोरता आई. साथ में सामाजिक आर्थिक विकास क्रम में आर्थिक गतिविधियों में होने वाले स्वाभाविक विकास विस्तार के कारण जातियों की संख्या लगातार बढती रही. इसके बावजूद यह एक वास्तविकता है कि जातियों की सामाजिक हैसियत किसी कठोर साँचे में ढला हुआ नहीं रहा. जाति का साँचा कठोर होने के पीछे हूणों और तत्पश्चात मुसलमानों का आक्रमण काफी हद तक जिम्मेदार रहा.
प्रसिद्ध क्षत्रिय वंशों में ब्राह्मण संतति के ऐसे विवरणों को समझने की जरूरत है.
