चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में बदलाव के चिह्न
किसी भी प्राचीन सांस्कृतिक परम्परा में विभिन्न काल में रचित अनेकों प्रकार के ग्रंथ पाये जाते हैं. भारत में रचित ग्रंथों में सबसे प्राचीन ऋग्वेद समेत अन्य वेद, आरण्यक, और ब्राह्मण ग्रंथ हैं. इन ग्रंथों का पिछले तीन-चार हजार वर्षों में व्याख्या और पुनर्व्याख्या होता रहा है. बाद के ग्रंथों में धर्मशास्त्र, स्मृति ग्रंथ, काव्यग्रंथ और पुराणों का भंडार है. ईसापूर्व के अंतिम शताब्दियों से लेकर गुप्त काल तक रचित हुए पुराण ग्रंथों में राजवंशों के इतिहास लेखन में बदलते समय के अनुसार बदलते हुए धार्मिक प्रावधानों ने पुराने इतिहास के तथ्यों को बड़े पैमाने पर बदलने का का किया. विभिन्न पुरानों में घटनाक्रमों में भी कई जगह अंतर देखने को मिलता है. प्राचीन समाज की घटनाओं के चित्रण में उपदेशात्मक कथाओं के प्रक्षेपों द्वारा नयी सामाजिक पुर्वग्रहों को घुसेरने के प्रमाण थोड़ी सी कोशिश के बाद नजर आने लगते हैं. वास्तव में समय के साथ प्राचीन के चित्रों को परिमार्जित करने की यह कोशिश दुनिया के हर परम्परा में समान रूप से पाया जाता है.
आज जब हम आधुनिक इतिहास अन्वेषण के माध्यम से अतीत की वास्तविक तस्वीर आँकने की कोशिश करते हैं, हमारे वाङमय में विभिन्न काल में रचित ग्रंथों में उस जमाने और उससे पहले के बारे में दिये गये तस्वीरों को समय सापेक्ष्य सिलसिलेवार सजाने की आवश्यकता होती है. एक ही घटना का कई जगहों पर अलग चित्रण, उसमें तथ्यों के स्वभाव के साथ असहज छेड़-छाड़ आदि को समय-यात्रा के सापेक्ष्य समझना पड़ता है. अतीत का पारम्परिक चित्रण में सहज ही वर्तमान के पुर्वग्रहों का पश्चारोपण होता रहता है. वैज्ञानिक तरीकों से अतीत को समझना तब तक सम्भव नहीं होता, जबतक हम पुराने तथ्यों के बीच की टकराहट को निरपेक्ष भाव से विश्लेषित करने को तैयार न हों.
भारतीय समाज में वर्ण-व्यवस्था और जाति-प्रथा को लेकर काफी काफी भावनात्मक बहस होती रहती. है. ऐसी बहसों में बौद्धिक खींचतान प्राचीन ग्रंथों के सीधे अध्ययन पर आधारित नहीं होता. जो लिखा गया है, या जो लोगों द्वारा समझा गया है, उसी के इर्द-गिर्द सीमित, मगर तीखी बहस चलती रहती है. बहस किआ उद्देश्य अतीत को समझना न होकर आज के पुर्वग्रहों में लिपटे धारणाओं के लिये एक सम्मानजनक आधार तलाशना भर होता है.
विष्णुपुराण समेत अन्य कई महत्वपूर्ण पुराण गुप्त-काल में अपने वर्तमान स्वरूप में आ चुके थे, ऐसी मान्यता है. यानी, उससे पहले के अतीत को तत्कालीन पुर्वग्रहों के प्रकाश में लिखने का काम सम्पन्न हुआ. इसके बावजूद इन पुराणों के विवरण में ऐसा बहुत कुछ मिल जाता है, जो तत्कालीन सामाजिक सांस्कृतिक धारणाओं से बिल्कुल मेल नहीं खाता. वर्णव्यवस्था और जाति-प्रथा से जुड़ी मनुस्मृतीय धारणा से बेमेल घटनाओं के माध्यम से हम प्राचीन से भी प्राचीन भारतीय समाज की तस्वीर को अंकित कर सकते हैं.
विष्णुपुराण के वंशावली खण्ड में प्राप्त कुछ तथ्यों पर निगाह डालना मजेदार होगा.
अर्थात, ‘जो वंश ब्राह्मण और क्षत्रियों की उत्पत्ति का कारण स्वरूप तथा नाना राजर्षियों से विभाजित है, वह कलियुग में राजा क्षेम के उत्पन्न होने पर समाप्त हो जायेगा’.
आज जब हम आधुनिक इतिहास अन्वेषण के माध्यम से अतीत की वास्तविक तस्वीर आँकने की कोशिश करते हैं, हमारे वाङमय में विभिन्न काल में रचित ग्रंथों में उस जमाने और उससे पहले के बारे में दिये गये तस्वीरों को समय सापेक्ष्य सिलसिलेवार सजाने की आवश्यकता होती है. एक ही घटना का कई जगहों पर अलग चित्रण, उसमें तथ्यों के स्वभाव के साथ असहज छेड़-छाड़ आदि को समय-यात्रा के सापेक्ष्य समझना पड़ता है. अतीत का पारम्परिक चित्रण में सहज ही वर्तमान के पुर्वग्रहों का पश्चारोपण होता रहता है. वैज्ञानिक तरीकों से अतीत को समझना तब तक सम्भव नहीं होता, जबतक हम पुराने तथ्यों के बीच की टकराहट को निरपेक्ष भाव से विश्लेषित करने को तैयार न हों.
भारतीय समाज में वर्ण-व्यवस्था और जाति-प्रथा को लेकर काफी काफी भावनात्मक बहस होती रहती. है. ऐसी बहसों में बौद्धिक खींचतान प्राचीन ग्रंथों के सीधे अध्ययन पर आधारित नहीं होता. जो लिखा गया है, या जो लोगों द्वारा समझा गया है, उसी के इर्द-गिर्द सीमित, मगर तीखी बहस चलती रहती है. बहस किआ उद्देश्य अतीत को समझना न होकर आज के पुर्वग्रहों में लिपटे धारणाओं के लिये एक सम्मानजनक आधार तलाशना भर होता है.
विष्णुपुराण समेत अन्य कई महत्वपूर्ण पुराण गुप्त-काल में अपने वर्तमान स्वरूप में आ चुके थे, ऐसी मान्यता है. यानी, उससे पहले के अतीत को तत्कालीन पुर्वग्रहों के प्रकाश में लिखने का काम सम्पन्न हुआ. इसके बावजूद इन पुराणों के विवरण में ऐसा बहुत कुछ मिल जाता है, जो तत्कालीन सामाजिक सांस्कृतिक धारणाओं से बिल्कुल मेल नहीं खाता. वर्णव्यवस्था और जाति-प्रथा से जुड़ी मनुस्मृतीय धारणा से बेमेल घटनाओं के माध्यम से हम प्राचीन से भी प्राचीन भारतीय समाज की तस्वीर को अंकित कर सकते हैं.
विष्णुपुराण के वंशावली खण्ड में प्राप्त कुछ तथ्यों पर निगाह डालना मजेदार होगा.
- विष्णुपुराण, (4-08-04) के अनुसार गृत्समद पुत्र शौनक चातुर्वर्ण्य का प्रवर्तक हुआ. अर्थात पुराणों तक में इसका जिक्र है, कि आर्य समाज में चार वर्णों की सामाजिक व्यवस्था एक लम्बे समय के बाद शुरु हुआ. स्वाभाविक है, कि सामाजिक व्यवस्था में बदलाव किसी एक व्यक्ति द्वारा एक छोटे से अंतराल में सम्भव नहीं होता. किसी नयी चीज को स्थापित होने में समय लगता है. और उसके बाद किसी बड़े व्यक्ति के नाम से उस प्रथा, या व्यवस्था को अभिहित कर दिया जाता है.
- विश्वामित्र की कहानी क्षत्रीय-ब्राह्मण अंतर्सम्बंधों की सच्चाई को बाद में कहानी के माध्यम से पुनर्व्याख्यायित करने का प्रयास है.
- इस सम्बंध में उत्पन्न होने वाला तनाव, जो परशुराम की कथा में उभरकर दिखता है, बाद में चलकर वर्णव्यवस्था के दो ऊपरी कर्मों से जुड़े समुदाय के अलग होने की प्रक्रिया का हिस्सा लगता है.
- इक्ष्वाकु वंश में नाभाग और अम्बरीश के बाद एक कोई रथीतर हुए, जिनके वंशज, क्षत्रीय होते हुए भी क्षत्रोपेता द्विज हुए. वि.पु. (4-02-09)
- पुरुवंशी अप्रतिरथ का पुत्र कण्व, और उसका मेधातिथि हुआ. इसी से काण्वायण द्विज हुए. वि.पु.(4-19-05)
- भरत की संतति में गर्ग से गार्ग्य और शिनि से शैन्य नामक क्षेत्रोपेता ब्राह्मण हुए. आगे चलकर भी इस वंश में कई लोग द्विज हो गये.(4-19-26)
- दुष्यंत- भरत- भरद्वाज (वितथ)- महावीर्य- दुरुक्षय- (त्रय्यारुणि, पुष्करिण्य, कपि, तीनों बाद में ब्राह्मण हो गये) (वि.पु., 4-19--)
- हर्यश्व- मुद्गल, सृजय, बृहदिषु, यवीनर, काम्पिल्य (पांचाल कहलाये). मुद्गल से (मौद्गल्य नामक क्षत्रोपेत ब्राह्मण) (वि. पु. 4-19-59)
- ‘ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशों राजर्षिसत्कृतः, क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थानं प्राप्स्यसे कलौ.’ (विष्णु पुराण, 4-21-18).
अर्थात, ‘जो वंश ब्राह्मण और क्षत्रियों की उत्पत्ति का कारण स्वरूप तथा नाना राजर्षियों से विभाजित है, वह कलियुग में राजा क्षेम के उत्पन्न होने पर समाप्त हो जायेगा’.
उपरोक्त क्षत्रिय वंशावलियों में ब्राह्मन बन गये लोगों के उदाहरण प्राचीन समय में क्षत्रिय और ब्राह्मणों के साझे सामाजिक संघठन की ओर इशारा करते हैं. ऐसे उदाहरण प्राचीन वंशावलियों को बाद में कठोर चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के समय परिमार्जित और पुनर्विश्लेषित करने के बाद भी यहाँ वहाँ पुराणों में बचे रह गये उदाहरण प्राचीन वास्तविकता की तस्वीर की ओर इशारा करते हैं. ऊपर में उल्लिखित श्लोक तो एक प्रकार से वह पक्का सबूत है, जिसके आधार पर हम कह सकते हैं, कि आर्यों के प्राचीन इतिहास में निहित वंशावलियाँ वास्तव में क्षत्रिय-ब्राह्मण वंशावली ही थे. ऊपर के इन दो वर्णों के बीच सामुदायिक विभेद की दीवार बहुत बाद में जाकर कठोर हुईं. कालांतर में पश्चिमोत्तर से आने वाले नये कबीलों, जिन्हें महाभारत आदि ग्रंथों में म्लेच्छ क्षत्रिय के रूप में चिह्नित किया गया है, के भारतीय समाज में मिलने जुलने से वर्णव्यवस्था में कठोरता आई. साथ में सामाजिक आर्थिक विकास क्रम में आर्थिक गतिविधियों में होने वाले स्वाभाविक विकास विस्तार के कारण जातियों की संख्या लगातार बढती रही. इसके बावजूद यह एक वास्तविकता है कि जातियों की सामाजिक हैसियत किसी कठोर साँचे में ढला हुआ नहीं रहा. जाति का साँचा कठोर होने के पीछे हूणों और तत्पश्चात मुसलमानों का आक्रमण काफी हद तक जिम्मेदार रहा.
प्रसिद्ध क्षत्रिय वंशों में ब्राह्मण संतति के ऐसे विवरणों को समझने की जरूरत है.

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