ऋग्वेद के दशम मण्डल के पुरुषसूक्त के ‘पुरुष’ के शरीर के विभिन्न अंग यथा मुख, हाथ, पाँव, जंघा, और पाँव से चार वर्णों की उत्पत्ति की व्याख्या समाज में कार्य विभाजन को लेकर शायद दुनिया में पहली अभिव्यक्ति है. बोलने, अर्थात यज्ञ में वेदोच्चार का काम करने वाला ब्राह्मण, उस यज्ञ में हवि करने और उसकी रक्षा करने वाला राजन्य, यज्ञ के लिये हर प्रकार के उत्पादन का दायित्व निभाने वाला वैश्य, और इस कार्य में हर प्रकार की सेवा कर्म को निभाने वाला शुद्र था. सभी जानते हैं, कि ऋग्वेद कालीन समाज यज्ञ के इर्द-गीर्द घूमता था. यज्ञ में आर्य समाज के लोगों की भूमिकाओं को अगर हम चार हिस्सों में बाँटे, तो कर्म के आधार पर क्या, वेदोच्चार पाँव से, हवन मुख से, और ऐसे ही अन्य कामों को कहीं और से सम्पन्न किया जा सकता है? इत्तेफाक है, कि शरीर में ध्वनि बोलने वाला यंत्र ऊपर स्थित है, और चलने वाला नीचे. और सबका कुछ न कुछ नाम तो होना ही था. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह, कि जब सामाजिक व्यवस्था में चार वर्णों की संकल्पना उभरी तब यह निहायत की कर्म आधारित था. इस तथ्य को सिद्ध करने के लिये प्राचीन ग्रंथों के विश्लेषण से पर्याप्त सबूत उपलब्ध हैं. कालांतर में यह जाति आधारित कैसे हो गया, इसे समझना एक अलग विषय है. वर्ण की इस प्रकार की व्याख्या से परेशानी हमारी आज का हमारा पुर्वाग्रह है. पुर्वाग्रह, इस तथ्य को लेकर कि सिर सबसे ऊपर स्थित है, और पाँव सबसे नीचे. और ऊपर-नीचे के चक्कर को हम व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का प्रयास नहीं कर रहे. मानव समाज का वर्गों में विभाजन सांस्कृतिक तौर पर एक प्राकृतिक घटना है.
जिन लोगों को यह भ्रम है, कि ब्राह्मण वर्ण की संकल्पना समाज के बौद्धिक नेतृत्व के रूप में हुआ, तो सम्भवतः ऐसा मानने का कोई ठोस सबूत उपलब्ध नहीं है. उस समय बौद्धिक काम से तात्पर्य अगर ऋचाओं की रचना से है तो हमे याद रखना चाहिये, कि ऋषि हर वर्ण से थे. हमें इसका अहसास नहीं होता कि उस वक्त लोगों को यही विश्वास था, कि आध्यात्मिक भावों के उभरने का स्थल हृदय है. मस्तिष्क के प्रति मनुष्य की जागरुकता बाद की बात है. तभी तो लोग वेदों को हृदयंगम करते थे. और हृदय-स्थल, मुख से काफी नीचे स्थित होता है! सांस्कृतिक तौर पर हृदय के महत्व को सिर्फ इस बात से ही समझा जा सकता है, कि आज भी हम अपने सबसे प्रिय व्यक्ति या वस्तु से जुड़ी भावना को हृदय में ही रखते हैं. कर्मकाण्डों से भरा हुआ आर्यों का सामाजिक जीवन ध्यान-योग आधारित बाद के ब्राहमणवादी धर्म से बहुत अलग था, जब मस्तिष्क और उससे जुड़ी अवधारणाओं की खोज हुई. और इन्हीं खोजों के बाद ब्राह्मण वर्ण के लोगों ने समाज की जाति आधारित वर्ण-विभाजन पर बल देना शुरु किया. ऋग्वेद के समय के कुछ समय(सैकड़ों वर्षों) के बाद सामाजिक संरचना में ब्राह्मण बौद्धिक नेतृत्व करने वाले ‘जाति आधारित’ वर्ग के रूप में स्थापित हुए. निष्कर्ण यह कि समाज में ब्राहमणों की बौद्धिक सर्वोच्चता की स्थापना एक सामाजिक प्रक्रिया से उपजी, जिसने वर्णव्यस्था को जाति-व्यवस्था में बदल डाला.
Saturday, April 21, 2018
चार वर्ण
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