आभीर
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आज उत्तर भारत में जो जाति समूह अपने नाम के पीछे 'यादव' शब्द धारण करते हैं, उनकी उत्पत्ति दो प्राचीन जाति समूहों से जुड़ा हुआ है. ये जाति समूह है, ग्वाला और अहिर. इन दोनों जातियों का जिक्र महाभारत ग्रंथ में मिलता है. यमुना से पूरब गोपालकों का क्षेत्र था. इन गोपालकों के यहाँ ही कृष्ण के बचपन गुजरने का पूरा आख्यान कृष्ण-लीला का विषय है. अहिर, या आभीरों का जिक्र महाभारत के मूसल पर्व में आया है. द्वारका क्षेत्र में, यादवों का गृहयुद्ध, और वंश विनाश के बाद अर्जुन बचे-खुचे यादव बच्चों एवं स्त्रियों को लेकर पंजाब के रास्ते हस्तिनापुर लौट रहे थे, कि रास्ते में लट्ठधारी आभीर लुटेरों नें यादव स्त्रियों को लूट लिया. अर्जुन, अपनी वृद्धावस्था के कारण आभीरों का प्रतिकार नहीं कर पाये. बचे हुए यादव बालकों को लेकर वो हस्तिनापुर पहुँच पाये.- (महाभारत, मूसल पर्व, अध्याय-8, श्लोक-45, श्लोक-61; अध्याय-9, श्लोक-16)उपरोक्त घटना के अलावा महाभारत में आभीरों का निम्नांकित स्थानों पर उल्लेख मिलता है,- महाभारत 2:32:10- शूद्र और आभीर कबीलों को पाण्डुपुत्र नकुल ने जीता.- महाभारत 2:51:12- निचले सिंधु के पश्चिम तट निवासी के रूप में आभीर का उल्लेख.- महाभारत 3:188:36- छल से शासन करने वाले आभीर, पुलिंद, आंध्र, शक, यवन, कंबोज, तथा बाह्लिक राज्यों का उल्लेख है.- महाभारत 6:09:47, 67 में भारत के जनपदों के वर्णन में आभीर जनपद का भी नामोल्लेख किया गया है।- महाभारत 7:20:06- द्रोण द्वारा गरुड़ व्यूह में शक और यवनों के साथ आभीर शूरवीर भी शामिल हुए थे।- महाभारत 14:29:16 में उल्लेख है कि जो क्षत्रिय परशुराम के भय से दूरदराज के इलाकों में भाग गए, वो द्रविड़, आभीर, पुंड्र, शबर जैसे कबीलों के संसर्ग में शूद्र की अवस्था में पहुंच गए।- महाभारत शल्यपर्व 37:01 में सरस्वती के तट पर बसे शूद्र और आभीरों के प्रति द्वेश के कारण सरस्वती नदी के सूख जाने का उल्लेख है.- मत्स्यपुराण 50:76 में क्षत्रिय, पारशव, शूद्र, बहिश्चर, अंध, शक, पुलिंद, चूलिक, यवन, कैवर्त, आभीर, और शबर राजाओं का उल्लेख है.- मत्स्यपुराण 114:40- आभीरों का उल्लेख मिलता है. ये उत्तर भारत में निवास करते हुए बताये गये हैं.महाभारत और मत्स्यपुराण जैसे स्रोतों में आभीरों का जिन अन्य लोगों के साथ उल्लेख है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि ईसा सन के आस पास आभीर कबीले सिंध और पंजाब के इलाकों में बसे हुए थे. दूसरी-तीसरी शताब्दी में एक आभीर राजवंश का जिक्र भी आता है. वायुपुराण 99:,, में कच्छ और सिंध के इलाके में सात आभीरवंशी राजाओं का उल्लेख है. उस इलाके लोगों को म्लेच्छ कहा गया है. और बाद में ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसे कबीलों को शूद्र कहे जाने के पीछे कारण गांगेय क्षेत्र के लोगों द्वारा पश्चिम और उत्तर पश्चिम के लोगों के प्रति पुर्वग्रह ही रहा होगा. महाभारत (कर्णपर्व) में कर्ण द्वारा पंजाब और उत्तर पश्चिम के लोगों को निम्न माने जाने का वर्णन है. लोगों के यज्ञ-कर्मकांडों के नहीं मानने की बात की गयी है. वास्तव में यज्ञ-संस्कृति काल के बाद भी पश्चिम और उत्तर से नये कबीलों का समय समय पर भारतीय उपमहाद्वीप में आगमन होता ही रहा. नये लोगों के रीति-रिवाजों को गांगेय क्षेत्र के लोग घृणा की दृष्टि से देखने लगे थे.इसवी सन के आरम्भिक समय में वो इलाके धार्मिक दृष्टि से गैर-ब्राह्मण सम्प्रदायों से जुड़े थे. ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार उत्तर पश्चिम से आये शक्तिशाली लड़ाकू कबीलों को ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ संस्कार के माध्यम से यज्ञ-संस्कृति परम्परा में क्षत्रिय के तौर पर स्वीकार किया जाता रहा. सम्भावना यह है कि आभीर सरदारों को राजपूत नामवाले शासकों के नये वर्ग में शामिल कर लिया गया, कबीले के बाकी लोग कृषि और पशुपालन से जुड़े रहे.मूसलपर्व में आभीरों को बार-बार लुटेरा और म्लेच्छ कहा गया है. (महाभारत, मूसल पर्व, अध्याय-8, श्लोक-45, श्लोक-61; अध्याय-9, श्लोक-16) इस परिप्रेक्ष्य में हमें याद रखना चाहिये, कि भारत भूमि पर पश्चिम से आक्रामक लड़ाकू जातियों एवं पशुचारी कबीलों का लगातार आगमन होता रहा है. महाभारत के बाद भी लिखे गये ग्रंथों में पश्चिम से आने वालों को म्लेच्छ और लुटेरा कहा गया है. इनमें पारसी, ग्रीक, कुषाण, शक, हूण आदि का जिक्र प्रमुख है. आभीर भी आर्यों के बाद भारत में आनेवाली एक प्रमुख जाति रही है. महाभारत के हजार से भी अधिक वर्षों बाद, दूसरी तीसरी शताब्दी ईसवी में महाराष्ट्र क्षेत्र में कतिपय आभीर राजवंश का जिक्र आता है. इससे स्पष्ट होता है, कि कालांतर में आभीरों के बीच से कुछ वंश, आक्राता, लुटेरा, और म्लेच्छ जैसी सामाजिक स्थित से उन्नत होकर सम्मानजनक पद पाने में सफल रहे. स्वाभाविक तौर पर इनमें से कुछ वंश छठी सातवीं शताब्दी तक शासक वंश की हैसियत प्राप्त कर राजपूत वर्ग का हिस्सा बन गये. लेकिन, आभीरों का बहुसंख्य, धीरे धीरे, कृषि और पशुपालन में संलग्न हो गया. इसी दौरान, महाभारत उल्लिखित गोपालकों के क्रिया-कलाप से समानता के कारण कृषक-पशुपालक आभीरों का अवशोषण एक जाति के रूप में हो गया.भागवतपुराण 10:24:24, और विष्णुपुराण 5:10:26 में नंद के समाज को वनचर बताया गया है. अर्थात्, महाभारत लिखे जाने तक ग्वाले घुमक्कर स्थित में ही थे. महाभारत का पहला संस्करण लिखे जाने के समय तक पंजाब से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश सामाजिक और आर्थिक आधार कृषि के साथ पशुपालन था. इसमें पशुपालन के दो रूप नजर आते हैं. एक जो स्थायी निवासस्थानों के आस पास के चारागाहों पर आधारित था. दूसरा, घुमक्कर पशुचारियों द्वारा पशुपालन. कई ग्रंथों में कृष्ण का बचपन जिन लोगों के बीच बीतने की बात कही गयी है, वो वनवासी घुमक्कर पशुचारक थे. इस बात की पुष्टि पौराणिक ग्रंथों से होती है. वैसे महाभारत में ग्वालों को पैदल सैनिक की तरह कौरव पक्ष से लड़ते हुए दिखाया गया है. स्वाभाविक तौर पर पशुचारी कबीलों से जुड़े हुए लोग वीर लड़ाकू होते हैं. मध्यकाल में भी कृषि और पशुचारी कार्यों में लगे लोग युद्ध के समय स्थायी सम्भ्रांत सैनिकों के साथ पैदल टुकड़ियों के रूप में इसमें भाग लेते थे. ऐसे कितने ही लड़ाकू कबीलों को हम मुगलों के बाद तक भाड़े के सैनिकों के तौर पर विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के प्रति अपनी सेवायें देते हुए पाते हैं. प्राचीन काल से लेकर पिछली शताब्दियों तक ऐसे लड़ाकू कबीलों ( जातियों ) को हम सामाजिक स्तर पर सम्मानजनक स्थिति पाते हुए देखते हैं. ऐसे लोगों का कबीलों से जाति-उपजाति में परिवर्तन सामाजिक गतिशीलता के कारण ही सम्भव था.ब्रज के गोपालक और पंजाब के आभीरों के पशुपालन में एक बहुत बड़ा अंतर यह दिखता है, कि सम्भवतः, सिंध पंजाब क्षेत्र के आभीर भैंस-पालन में अग्रणी थे. आज के अहिर-ग्वाला जाति के लोगों का अधिकांश भैंसपालन में ही पाया जाता है. इसका मतलब है, कि आभीर, संख्या में ग्वालों से अधिक रहे होंगे.‘---The Abhiras lived in scattered settlements in various parts of western and centra India as far as the deccan. Most of these tribes claimed descent from tge ancient lineage of the Puranas, and some of them were later connected with the rise of Rajput dynasties.----’ - britannica.com ( article 'Ashoka and his Successors')

3 comments:
Abheer ek caste nhi thi blki tribe thi......aaj bhi Abheer ko kai naam se jana jata hai aaj bhi Aheer Ahar Aveer ya simply Heer ye log alag alag jaatiyo me paaye jaate hai...kisi ek jaati me nhi Dusri baat Abheer Sindh punjab se dusri jagah par pahunche.....na ki eastern up or Bihar se.Aheer aaj bhi kheti or dairy farming dono krte hai....jo ki north west ka culture tha....bihar eastern up ka culture dusra tha...Aheer lambe chaude or gore hote the....baad me local jaatio me mil gye....aaj bhi Aheer brahman sunar koli jat tamam jaatiyo me paaye jaate hai....Aheer caste nhi hoti blki Kabila hota tha.
Bihari or purabiye ahir kehte hai jobki galat hai.....Hota hai Aheer ya Heer.
The Seeker, You are right that Abhir was a tribe, and not a caste name. Numerous castes today are simply a transformation from tribes to caste status. However, it should be kept in mind that the upper echelon of ancient tribes like Abhirs were absorbed in the early medieval ruling class known as Rajputs. Rajput as succh is not mentioned in the medieval literature as a caste. Chauhan, Chandel, Rathor, etc.. are enumerated as castes before the British surveyors clubbed innumerable castes into a common name Rajput. There are many Rajput sub-castes of today are simply derived from the ruling echelon of tribes like Gurjars, Abhirs, etc...
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