Thursday, May 28, 2020

दक्ष-सृष्टि


दक्ष-सृष्टि बनाम कश्यप-सृष्टि

दक्ष-सृष्टि: - ब्रह्माण्डपुराण 2:02 में (चाक्षुस के बाद) ब्रह्मा ने दक्ष को सृष्टि के लिये आदेश किया. दक्ष ने मानस प्रयास से ऋषियों, देवताओं, मनुष्यों, सर्पों, राक्षसों, यक्षों, भूत-पिशाच, पक्षियों, जानवरों एवं पशुओं की रचना की. ये मानस रचनाएं आगे की सृष्टि नहीं बढा पाये. उन रचनाओं को शापित कर दिया. उसके बाद प्रजापति वीरण की पुत्री से विवाह कर साथ अनेक पुत्रियाँ उत्पन्न किया. सवाल उठता है, कि दक्ष ब्रह्मा से उत्पन्न पहले प्रजापति थे, तो वीरण या अन्य किसी के अस्तित्व का क्या अर्थ निकलता है? अतः दूसरी कहानी, ब्रह्मा द्वारा एक अंगूठे से दक्ष, और दूसरे से उसकी पत्नी के जन्म को हम अधिक तार्किक पाते हैं. दक्ष का वीरण के पुत्री असिक्नी से विवाह की कहानी बाद की बनावट है. दक्ष द्वारा अदिति की रचना वाली कहानी भी तार्किक है. उस अदिति से सारे देवता और सृष्टि के सृजन की कल्पना अधिक परिष्कृत है. लेकिन बाद में चलकर इसमें नैतिक समस्या यह उत्पन्न हो गयी कि दक्ष के अपनी रचना, अर्थात् पुत्री, अदिति से संतानोत्पत्ति की बात को कैसे स्वीकार किया जाये ! यह संकल्पना अधिक प्राचीन इसलिये है क्योंकि इस संकल्पना में ब्राह्मण पुरोहितों ने खुद को अलग नहीं किया था. ब्रह्मा की संकल्पना अपेक्षाकृत बाद की घटना है, क्योंकि इसकी जरूरत ब्राह्मणों के लिये अलग से सृष्टि-स्रोत साबित करने के लिये किया गया था. यहाँ भी वही समस्या उभर कर सामने आयी, जब ब्रह्मा द्वारा अपनी ही रचना, शतरूपा, को पत्नी रूप में रखे जाने पर आपत्ति किया गया.

वाराहपुराण 21:10 में कहा गया ‘तत्र दाक्षायणीपुत्राः सर्वे देवाः सवासवाः, वसवोऽष्टौ च रुद्राश्च आदित्या मरुतस्तथा’, अर्थात् इंद्र समेत आठों वसु, रुद्रगण, आदित्यगण, और मरुद्गण दाक्षायणी पुत्र हैं. दाक्षायणी का अर्थ दक्ष की पुत्री है. कहा यह गया है कि ब्रह्मा ने दक्ष को गौरी (दाक्षायणी) पुत्री रूप में प्रदान किया. और फिर यह कह दिया गया कि दक्ष अपने ‘दौहित्रों’ से काफी प्रसन्न हुआ. जाहिर है कि यहाँ नैतिकता के बंधन में फँसे हुए पुराण लेखक की लेखनी सच कहने में उलझ गयी ! यहाँ भी कश्यप का कोई उल्लेख नहीं है. जाहिर है कि यहाँ भी दक्ष द्वारा अपनी पुत्री से संतानोत्पत्ति (सृष्टि) का उल्लेख है. महाभारत आदिपर्व 95:07 में जो वंशावली दी गयी है ‘दक्ष- अदिति- विवस्वान- मनु------‘ का क्रम दिया गया है. यहाँ कश्यप का कोई उल्लेख नहीं है. इस प्रकार की वंशावली का अर्थ क्या हो सकता है? स्पष्ट है कि यहाँ संतति विस्तार का माध्यम वह स्त्री-पुरुष युग्म है, जिसमें पुरुष को पिता, स्त्री को उसकी पुत्री बताया गया है. इस अवधारणा में इंद्र आदि देवताओं को दक्ष और अदिति का पुत्र बताया गया. बाद में पिता और पुत्री से देवताओं के जन्म के नैतिक संकट को मिटाने के लिये एक नयी अवधारणा, कश्यप, को सामने लाया गया (मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य सुरासुराः, जज्ञिरे नृपशार्दूल लोकानां प्रभवस्तु सः’). अर्थात् दक्ष की कन्या अदिति का विवाह कश्यप से दिखा कर न सिर्फ देवताओं को उनका संतान बताया गया, बल्कि असुर, दैत्य, दानव, समेत अन्य कई महत्वपूर्ण आर्येतर जनों की उत्पत्ति इस नयी अवधारणा में समाहित कर लिया गया. इसमें एक बात और ध्यान देने योग्य है कि सृष्टि की कहानी में दक्ष की भूमिका को बदलने का प्रयास आर्य सांस्कृतिक धार्मिक पृष्ठभूमि में इस चरित्र के महत्व को नीचे गिराना था. जबकि यज्ञ-संस्कृति में मानवीकृत ब्रह्मा की अवधारणा के पहले दक्ष सबसे महत्वपूर्ण अलौकिक चरित्र है.

कूर्मपुराण 14:63 में रुद्र द्वारा दक्स को शाप दिया गया कि ‘--------, स्वस्या सुतायां मूढात्मा पुत्रमुत्पादयिष्यसि’, अर्थात्, दक्ष नामक राजा अपनी पुत्री में संतानोत्पत्ति करेगा. और यह भी शाप दिया कि प्राचेत दक्ष इस प्रकार ब्राह्मण से क्षत्रिय हो जायेगा. वैसे अन्यत्र दस प्रचेताओं को क्षत्रिय भी बताया गया है. लेकिन पुराण लेखकों का भ्रम उन्हें बार बार उटपटांग वर्णन को बाध्य करता रहा. ब्रह्मा का पुत्र बताकर दक्ष को ब्राह्मण बताया गया, और पुनः शाप केंद्रित कहानी के माध्यम से जातिवादी धारणा का निवारण करने का प्रयास किया गया है. प्रश्न यह है कि दक्ष को रुद्र द्वारा शाप का अर्थ क्या है? हमें ध्यान रखना होगा कि शाप की अवधारणा वास्तव में गाली-गलौज, आलोचना, उलाहना, हिंसा को प्रकट करने के लिये हुआ है. रुद्र-पशुपति को धार्मिक महत्व दिये जाने की वकालत करने वाले पुरोहितों ने उस समय ‘दक्ष-अदिति’ युग्म से सृष्टि की शुरुआत की अवधारणा की आलोचना आरम्भ की. उस आलोचना में इस तात्विक प्रश्न को उठाया गया कि दक्ष अपनी पुत्री के माध्यम से सृष्टि की रचना कैसे कर सकता है? दक्ष और रुद्र के बीच प्रतिष्पर्द्धा दिखा कर दक्ष-अदिति वाली प्रचलित अवधारणा की निंदा की. इस प्रतिष्पर्द्धा आ अंत आज तक नहीं हो पाया है. रुद्र-पशुपति के समर्थकों द्वारा दक्ष को शाप दिया जाना अपने आप में यह पुख्ता सबूत है कि कश्यप-सृष्टि की कहानी बाद की जातिवादी ब्राहमणवादी अवधारणा है.

आर्य सांस्कृतिक परिवेश में सृष्टि की प्राचीन कहानी के पुनर्लेखन का यह एक उदाहरण है. सम्भव है कि प्रचेताओं से उत्पन्न संततियों से जुड़ी पुरानी कोई किम्वदंती रही होगी, जिसे यज्ञ-संस्कृति के प्रजापति दक्ष की अवधारणा से जोड़ा गया. यज्ञ-संस्कृति में अदिति पृथिवी का प्रतीक है, जो स्वयं दक्ष से उत्पन्न मानी गयी. इस लिहाज से दक्ष ने अपनी पुत्री में संतति उत्पन्न किया. दुनिया के अन्य संस्कृतियों में भी ऐसी कहानियाँ प्रचलित हैं जिसमें स्रष्टा ने अपने लिये पत्नी की रचना की. अतः आर्यों के मन में सृष्टि की इस अवधारणा का जन्म कोई बहुत अजीबोगरीब बात नहीं थी. प्रतिकात्मक अर्थ को भूल जाने पर भी, उस युग में ऐसा होना आदिम मानवों के लिये एक सहज बात थी. उत्पत्ति की कहानी में ब्रह्मा के चरित्र का सृजन एक बौद्धिक विकास की प्रक्रिया का परिणाम है. इस चरित्र की कल्पना के बाद दक्ष को ब्रह्मा के अंगुठे से उत्पन्न बता दिया गया. हालाँकि व्याख्या के माध्यम से कहानियों में छुपे हुए प्राचीन सामाजिक तथ्य को पूरी तरह से मिटाया नहीं जा सका.

ब्रह्मा से मरिचि, मरिचि से कश्यप, कश्यप और दक्ष की पुत्रियों से सभी प्रकार के जीव-जंतु. दक्ष की पुत्रियों को ‘लोकमातृ’ कहा गया. मेरी समझ में यह स्त्री से सृष्टि के आरम्भ की किसी आर्येतर अवधारणा को आर्यों की दक्ष-सृष्टि वाली अवधारणा के साथ मिलाने से कश्यप और मातृका वाली कहानी का जन्म हुआ. यह देखा गया है कि भारत में हम जैसे जैसे पश्चिम से पूरब की ओर बढते हैं समाज में मातृ प्रधानता बढता दिखाई देता है. सृष्टि की कहानी में परिवर्तन का इस घटना से सम्बंध होना बहुत सम्भव है. कश्यप-सृष्टि

ब्रह्माण्डपुराण 2:07 के अंतिम हिस्से में कुछ श्लोक निहातय ही आधुनिक स्वर लिये हुए हैं. कहा गया कि देवता की उत्पत्ति दक्ष की पुत्रियों, जो मनुष्य थीं, में हुआ. अतः सभी मन्वंतर में मनुष्य सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है, ‘यस्माच्च संभवः कृत्स्नो देवानां मानुषेष्विह, मन्वन्तरेषु सर्वेषु तस्माच्छ्रेष्ठास्तु मानुषाः’. तात्पर्य कि दक्ष- अदिति- विवस्वान- मनु रेखा से इंद्र-पूजक आर्यों ने अपनी उत्पत्ति मानते हुए जिस श्रेष्ठता का दावा किया था, उस दावा को कुंठित करने के लिये ब्राह्मण पुरोहितों ने ब्रह्मा- मरिचि- कश्यप- अदिति, , ---- रेखा का आविष्कार किया. यह ब्राह्मण पुरोहितों की सर्वहारा चेतना थी, जिसने आर्यों के दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत के दावे के उलट देवताओं के मानवीय उत्पत्ति का सिद्धांत प्रतिपादित किया. हालाँकि दक्ष और अदिति से सृष्टि की परिकल्पना में भी देवताओं के पार्थिव उत्पत्ति का भाव उपस्थित है. अदिति पृथ्वी है, और दक्ष, यज्ञ करने वाला पुरुष. पृथ्वी पर यज्ञ की स्थापना ही सृष्टि की शुरुआत है. ब्रह्मा, ब्रह्म और इससे मिलते जुलते शब्द का अर्थ किसी मानवीकृत चरित्र से नहीं है. यह बाद की घटना है कि ब्रह्मा को एक व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया. सम्भवतः यज्ञ-संस्कृति में दक्ष उस पुरुष का प्रतीक है जो सृष्टि का कारण है, और यज्ञ सृष्टि का साधन. ब्रह्मा की अवधारणा दक्ष से ऊपर आरोपित किया गया. और फिर उसमें नई नई चीजे जुड़ती चली गयीं.

Thursday, May 21, 2020

प्राचीन क्षत्रिय कबीलों से निकले ऋत्विज वंश का वर्णन

प्राचीन क्षत्रिय कबीलों से निकले पुरोहित वंश का वर्णन 

सूर्यवंश से जुड़े-

- इक्ष्वाकु वंश में नाभाग और अम्बरीश के बाद एक कोई रथीतर हुए, जिनके वंशज, क्षत्रीय होते हुए भी आंगिरस क्षत्रोपेत द्विज हुए. (वि.पु. (4-02-09)
‘एते क्षत्रप्रसूता वै पुनश्चांग़िरसः स्मृताः, रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः’. (वायुपुराण 88:07)
- अम्बरीश- युवनाश्व- हारीत. ‘तस्मात् हारीतः यत: अंगिरसः हारीताः’ (विष्णुपुराण 4:03:03)
- ‘हरितो युवनाश्वस्य हारिता शूरय स्मृता, एते ह्यंगिरस पुत्रा क्षत्रोपेतेता द्विजातयः’ (युवनाश्व का पुत्र हारीत, और उसका पुत्र सूर विख्यात हुए. ये महर्षि अंगिरा के पुत्र क्षत्रिय धर्मपरायण द्विजाति कहे जाते थे.) (वायुपुराण 88:73)
- वायुपुराण 88:79 में सत्यव्रत (त्रिशंकु), जिससे वसिष्ठों की शत्रुता रही, उसके पुत्र विष्णुवृद्ध की संतानों में अनेक अंगिरा गोत्रीय क्षत्रोपेत ब्राह्मण हो गये, ऐसा लिखा गया.
- त्रसदस्यु से उत्पन्न वंश परम्परा में भी आगे चलकर विष्णुबृद्ध की संतति अंगिरा के पुत्र क्षत्रिय मिश्रित द्विजाति वर्ण के हुए. (वायुपुराण 88:79)

चंद्रवंश से जुड़े-

- पुरुरवा- क्षत्रवृद्ध- सुहोत्र- काश्य, काश, गृत्समद (ऋषि)- सुचेत (इससे सुचेत नामक ब्राह्मण हुए, अनुशासनपर्व 30:61)
- गृत्समद- सुचेता- वर्चा- विहव्य- वितव्य- सत्य- संत- श्रवा- तम- प्रकाश- वागिंद्र- प्रमिति (+ घृताचि)- रुरु (+ प्रमद्वरा)- शुनक- शौनक -  महाभारत अनुशासनपर्व 30वाँ अध्याय (भार्गव गोत्रीय)
- विश्वामित्र- देवरात (शुनःशेप), मधुच्छंद, धनंजय, कृतदेव, अष्टक, कच्छप, हारितक. (कौशिक-गोत्र)
- अजमीढ- जह्नु- सिंधुद्वीप- बलाकाश्व- बल्लभ- कुशिक- गाधि- विश्वामित्र, सत्यवती) (अनुशासनपर्व 04) इस वंश में सिंधुद्वीप, विश्वामित्र, शुनःशेफ, मधुच्छंद, अष्टक आदि ऋषि हैं.
- पुरुवंशी अप्रतिरथ का पुत्र कण्व, और उसका मेधातिथि हुआ. इसी से काण्वायण द्विज हुए. (‘यतः काण्वायना द्विजा बभुवः’. वि.पु. 4-19-07)
- भरत की संतति में गर्ग से गार्ग्य और शिनि से शैन्य नामक क्षेत्रोपेता ब्राह्मण हुए. आगे चलकर भी इस वंश में कई लोग द्विज हो गये.(4-19-26)
- दुष्यंत- भरत- भरद्वाज (वितथ)- महावीर्य- दुरुक्षय- (त्रय्यारुणि, पुष्करिण्य, कपि, तीनों बाद में ब्राह्मण हो गये) (द्वाज- दो पिता से उत्पन्न) (वि.पु., 4-19--)
- हर्यश्व- मुद्गल, सृजय, बृहदिषु, यवीनर, काम्पिल्य (पांचाल कहलाये)
मुद्गल से (मौद्गल्य नामक क्षत्रोपेत ब्राह्मण) (वि. पु. 4-19-59)
(अग्निपुराण 278:20 में वंशक्रम ऐसे है, पुरुजात- बाह्यश्व- मुकुल, सृन्जय, बृहदिषु, यवीनर, कृमिल.)
‘मुकुलस्य तु मौकुल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः,-----‘. (अग्निपुराण 278:21)
- वायुपुराण 99:198 में लिखा है कि मुद्गल के वंशज क्षत्रिय गुणधर्म वाले ब्राह्मण हुए. कण्ठ (कण्व) और मुद्गल के वंशज अंगिरस गोत्र में सम्मिलित हो गये.
- (वायुपुराण 99:206, दिवोदास- मित्रयु (ब्रह्मिष्ठ)- च्यवन- सुदासु- सहदेव- सोमक- जंतु- अजमीढ-,,,,, पृषत्. मैत्रेयवंशी भार्गव गोत्रीय ब्राह्मण हुए.)
इस पृषत के पुत्र द्रुपद से द्रोण की शत्रुता थी. और द्रोण को कई जगह भार्गवों से सहायता लेता हुआ दिखाया गया है. द्रोण का जन्म भरद्वाज नामक अस्त्रवेत्ता के एक घृताची नामक अप्सरा के संसर्ग से हुआ. अस्त्रवेत्ता को बाद में ब्राह्मण सिद्ध करने का क्या अर्थ हो सकता है ? विदित रहे कि यह भरद्वाज कोई और नहीं स्वयं भरत के गोद लिये पुत्र वितथ थे, जिनसे सारा कुरुवंश निकला. इस प्रकार द्रोण का जन्म अगर भरद्वाज कुल से जुड़ा था तो वह कौरवों के सगोत्रीय रक्त सम्बंधी हुए. पुराणों के पुनर्लेखन में इन सारे तथ्यों को गड्डमड्ड करके छुपाकर द्रोण को ब्रह्मण दिखाने का प्रयास किया गया है. (आदिपर्व 63:106, 130:37 (द्रोण में ऋषि के वीर्य से द्रोण का जन्म) भरद्वाज के मित्र राजा प्रिषत थे. प्रिषत के पुत्र द्रुपद हुए. द्रुपद द्रोण का मित्र हो गया. कृप की बहन का विवाह द्रोण से हुआ. द्रुपद द्वारा दोण का तिरष्कार. द्रोण का वर्ण श्याम था (आदिपर्व 130:20). द्रोण द्वारा क्षत्रिय बल को धिक्कारने वाली बात का उल्लेख ( आदिपर्व 130:23). सींकी को अभिमंत्रित कर अंगुठी को निकालना. (आदिपर्व 67:69)   
 ‘ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वंशों राजर्षिसत्कृतः,
क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थानं प्राप्स्यसे कलौ.’ (विष्णु पुराण, 4-21-18)
अर्थात, ‘जो वंश ब्राह्मण और क्षत्रियों की उत्पत्ति का कारण स्वरूप तथा नाना राजर्षियों से विभाजित है, वह कलियुग में राजा क्षेम के उत्पन्न होने पर समाप्त हो जायेगा’.
‘ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिर्वशो देवर्षिसत्कृतः, क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थास्यति कुलौ युगे.’ (मत्स्य पुराण 50:88)
भलंदन, वत्स, संकील को वैश्य ऋषि बताया गया है. (ब्रह्माण्डपुराण 32:121)
चाक्षुश मनु से ब्राह्मण क्षत्रिय का प्रवर्त्तक (ब्रह्माण्डपुराण 36:102)
‘काशः शलश्च द्वावेतौ तथा गृत्समदः प्रभुः, पुत्रो गृत्समदस्यापि शुनको यस्य शौनकः.’
ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव वैश्याः शूद्रास्तथैव च, शलात्मजः आर्ष्टिसेणस्तनयस्य काश्यपः.’ (ब्रह्मपुराण 09:33, 34)
‘ब्रह्मक्षत्रादयः तस्मान् मनुः जात अस्तु मानवाः, ततः अभवन् महाराज ब्रह्म क्षत्रेण संगतम्’. (आदिपर्व 75:14)
क्षत्रिय-ब्राह्मण सम्बंध – आदिपर्व 136:14 (दुर्योधन ने भीम से कहा), आदिपर्व 81:19 (देवयानी ने ययाति से कहा, “संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रेण ब्रह्म संहितम, ऋषिश्चाप्यृषिपुत्रश्च नाहुषांग़ वहस्व माम”)

Sunday, May 10, 2020

दुष्यंत की कहानी

दुष्यंत की कहानी
दुष्यंत की कहानी

मात्स्यपु.27:09 और  वाय.पु.99:129 में दुष्यंत से जुड़ी वंशावली इस प्रकार है,
अप्रतिरथ (इलीन?)- कण्व और ऐलीन. कण्व- मेधातिथि (काण्वायन द्विज्). ऐलीन- दुष्यंत एवं अन्य. 
भाग.पु.09:20:06 रंतिभार- सुमती, ध्रुव, अप्रतिरथ. अप्रथिरथ- कण्व- मेधातिथि. सुमति (ऋभ?)- रैभ्य- दुष्यंत. अर्थात् मात्स्य, वायु, और भागवत पुराणों में थोड़ा अंतर है. गौरतलब है कि हर ग्रंथ में दुष्यंत और कण्व निकट रक्त सम्बंधी बताये गये हैं.  
आदिप.70:07 में दुष्यंत ने खुद को इलिलपुत्र कहा है. 
आदिप.70:23 में ‘अप्रतिरथ’ शब्द का प्रयोग दुष्यंत के लिये हुआ है. और इसके गीताप्रेस और किशारीमोहन के अंग्रेजी अनुवाद में भूल है. पौराणिक वंशावलियों पर ध्यान देने से यह समझ आता है  कि दुष्यंत और कण्व नजदीकी चचेरे भाई हैं. दुष्यंत और शकुंतला प्रसंग से जुड़े इस अध्याय में कण्व को काश्यप गोत्रीय बताकर उसके आश्रम का वर्णन उसी अनुसार किया गया है. ऐसी मनगढंत कहानियों का उद्देश्य समझना बहुत मुश्किल नहीं है. अप्रतिरथ के कुल में उत्पन्न दुष्यंत राजा के रूप में चित्रित हैं, तो कण्व सूक्तों के रचयिताओं में प्रमुख है. तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि शकुंतला कण्व की पुत्री थी, जिसके साथ दुष्यत का यौन सम्बंध स्थापित होने से एक बच्चे का जन्म हुआ, जिसे भरत कहा गया. इस प्रकार शकुंतला और दुष्यंत आपस में रक्त सम्बंधी हुए. लेकिन जातिवादी सोच के तहत पौराणिक लेखकों ने एक को क्षत्रिय तो दूसरे को तथाकथित काश्यप गोत्रीय ब्राह्मण बताया. शांतिप.29:49 में कण्व को दौष्यंति भरत का ऋत्विज बताया गया है. इससे पता चलता है कि उस कबीलाई युग में निकट सम्बंधी ही ऋत्विज कर्म किया करते थे.
दुष्यंत शब्द पर गौर किया जाना जरूरी है. संस्कृत में एक शब्द है ‘दूषय’, जिसका अर्थ है किसी महिला के सतीत्व या सम्मान को नष्ट करना, उसे अपवित्र करना. शकुंतला से जुड़ी इस घटना से स्पष्ट है कि इस व्यक्ति ने शकुंताला के कौमार्य को भंग किया था. सभ्यता के विकास के क्रम में इस क्षत्रिय चरित्र को उद्दात्त बनाया गया.   
देखा जा सकता है कि शकुंतला और दुष्यंत की इस कहानी में अनेक झूठ बोले गये. क्यों? 
पहली बात कि कण्व का ऋग्वेद का एक महत्वपूर्ण ऋषि होना जातिवादी व्यवस्था में उसे जातिगत ब्राह्मण साबित करने वाली प्रेरणा बनी. आदिपर्व में दुष्यंत का आख्यान कहने का उद्देश्य अध्याय 68:06 में ही प्रकट कर दिया गया है. ‘न वर्णसंकरकरो न कृष्याकरकृज्जनः, न पापकृत् कश्चित् आसीत् तस्मिन् राजनि शासति.’  अर्थात् दुष्यंत के राज्य में ‘न तो वर्णसंकर उत्पन्न होते थे, और न कृषक कृषि कर्म करते थे, न कोई पाप करने वाला था’. वर्णसंकर शब्द से भयभीत लोगों ने धर्मशास्त्रों की रचना की. ब्राह्मण पुरोहित इसमें बढ-चढ कर हिस्सा ले रहे थे. आदिप.75:15 कहता है ‘ब्राह्मणा मानवाः तेषां सांगं वेदधारयन्,--‘, अर्थात् मानवों में ब्राह्मण अंगों समेत वेद धारण करते थे’. अतः वेद पर एकाधिकार साबित करना सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा था. 
लेकिन कण्व को काश्यप गोत्रीय ब्राह्मण साबित करने के लिये साहित्य रच लेने से समस्या और उलझ जाती. कण्व को आश्रम-निवासी निःसंतान ब्रह्मचारी बता दिया गया (आदिप.71:17).  क्योंकि धर्मशास्त्रीय प्रावधानों के तहत एक ब्राह्मण कण्व की पुत्री का विवाह क्षत्रिय दुष्यंत से कैसे सम्भव था? वही वर्णसंकरता का संकट, वह भी प्रतिलोमात्मक ! एक परेशानी और, कि धर्मशास्त्रों के ज्ञाता दुष्यंत के इतने निकट रक्त सम्बंध में वैवाहिक सम्बंध को मान्यता कैसे दिया जाये? गुप्त-काल तक जाति आधारित वर्ण-व्यवस्था इतना पुख्ता हो चुका था कि रघुवंश11:64 में भार्गव राम का जनेऊ धारण ब्राह्मण पिता, और धनुष धारण करना उसकी क्षत्रिय माता की पृष्ठभूमि में दिखाया गया है.  
इसके लिये विश्वामित्र और मेनका की अलौकिक कहानी रची गयी. वैसे बु.च.04:20 और वा.रा.4:35:07 में विश्वामित्र को घृताचि के सम्बंधित किया गया है. शकुंतला को क्षत्रिय विश्वामित्र से उत्पन्न बताकर कण्व की पालित पुत्री बनाया गया. क्योंकि विश्वामित्र को पौराणिक कहानियों में वसिष्ठ से शत्रुता के कारण जातिगत क्षत्रिय माना जा चुका था. 
झूठ के जाल का बुनाव कितना ही विस्तृत हो, सच छुप नहीं पाता. विभिन्न पौराणिक स्रोतों से वह सच निकल आया है. पौराणिक लेखक यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि वो भी अतीत के उस क्षत्रिय कबीलाई संस्कृति से उत्पन्न थे, जब कृषि संस्कृति का विकास नहीं हुआ था, जैसा कि ऊपर श्लोकांश में ‘न कृष्याकरकृज्जनः’. लेकिन इस श्लोकांश का अर्थ अनुवादक ने यह लगा दिया कि दुष्यंत के राज्य में भोजन के लिये कृषि की जरूरत ही नहीं थी ! यह समझने का प्रयास नहीं किया गया, या इसे नजरंदाज किया गया कि वह आर्यों की अर्द्ध-घुमंतु सामाजिक अवस्था थी. 
और श्लोक में पापकर्म का उल्लेख है, तो वास्तविकता यह है कि उस युग में बलात्कार तक किसी अपराध की श्रेणी में नहीं था. दुष्यंत ने शकुंतला से यौन सम्बंध स्थापित किया. और जब बच्चा हुआ, तो उसे किसी हाल में स्वीकार करने को तैयार नहीं था. जैसे तैसे मामले को निपटाया गया. इसका पूरा विवरण आदिप. के इन अध्यायों में है. इस तथ्य से तो आज भी बहुत सारे लोग नाराज हो जायेंगे. आदिप.74:02 दुष्यंत शकुंतला के विवाह के तीन वर्ष बाद भरत का जन्म हुआ, ‘--- त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु दीप्तानलसमद्युतिम्’. आदिप.63:86 किसी कन्या को गभवती बनाकर छोड़ देने का ऐसा ही एक उदाहरण पराशर द्वारा सत्यवती को यमुनाद्वीप में छोड़ देना (‘न्यस्तो द्वीपे’) था.

#दुश्यंत‌कीकहानी

Thursday, May 7, 2020

जीवन, समय, और कर्मकांंड

आज हम व्यक्तिगत या सार्वजनिक तौर पर जो कुछ भी करते हैं, वह प्राचीन विकासक्रम में कभी न कभी किसी न किसी अनुष्ठान का हिस्सा रहा है. जीवन की दिनचर्या में सहज होकर चीजें अलौकिक से लौकिक या सांसारिक हो जाती हैं. यहीं अलौकिक से लौकिक का विकासक्रम रहा है. आज हम किसी भोज का आयोजन करते हैं तो उससे जुड़ी तैयारी में जाने कितनी ही कड़ियाँ होती हैं, जो अलग अलग प्रकार के समुदायों में अलग अलग प्रकार से अंजाम दी जाती हैं. आजकल बड़े शहरों में आयोजन का सारा दायित्व विशेषज्ञता प्राप्त व्यावसायिक संस्था पर होता है. पहले ऐसे आयोजन समुदायों के भीतर आपसी सहयोग से होता था. आयोजन की रूपरेखा, आवश्यक सामान का जुगाड़, आमंत्रित लोगों के रहने खाने की व्यवस्था, अलग अलग प्रकार आमंत्रितों की अलग अलग व्यवस्था, लोगों को निमंत्रित करना, सब समुदाय के भीतर कार्यविभाजित तरीके से होता था. हर कार्य के लिये अलग प्रकार के लोग हुआ करते थे. लोगों का जीवन प्रकृति से निकट था, आयोजन के समय निर्धारण में भी प्राकृतिक घटनाओं की बड़ी भूमिका थी. आसपास उपलब्ध संसाधन अनुष्ठान आयोजन में प्रयुक्त चीजों को प्रभावित करते थे.   
अनुष्ठानों के इस आयोजन को हम जैसे जैसे समय में पीछे की ओर ले जाते हैं, एक स्तर पर चीजें अगर सहज होती नजर आती हैं, तो दूसरे स्तर पर क्लिष्टता के अलग प्रकार हमारे सामने प्रकट होते हैं. आज जो चीजें बिल्कुल लौकिक महत्व की हैं, आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व उनके साथ गहन कर्मकाण्ड जुड़े थे. मसलन, यज्ञ के लिये खरही काटना होता था, तो उसके साथ भी एक कर्मकाण्ड जुड़ा था. उसके लिये शुभ दिन, मुहूर्त, उसे काटने के लिये किसी सौभाग्यशाली व्यक्ति, कुछ मंत्र, कुछ तौर तरीके की जरूरत होती थी. लोग जब पंक्ति में बैठकर खाते, तो भोजन शुरु करने का कर्मकाण्ड होता था. कौन सी चीज पहले , और कौन सी बाद में परोसी जायेगी, इसका भी कर्मकाण्डीय अर्थ होता था. कौन पहले खायेगा, कौन बाद में, यह भी कर्मकाड़ का हिस्सा था. विशिष्ट जन को भोजन के लिये आग्रह करने का अपना खास तौर तरीका हुआ करता. और इन तमाम छोटी छोटी चीजों को कहने, आदेश करने, मना करने, अनुरोध करने, विनती करने से जुड़ी चीजों को ही मंत्र कहा जाता था. वे मंत्र बद्धमूल तरीके से समुदाय के पुरोहितों द्वारा संकलित, संगृहित, सुरक्षित रखे जाते, क्योंकि इसी प्रकार किसी आयोजन से जुड़ी तैयारियों की मानक रूपरेखा को अगली पीढी के लिये सुरक्षित किया जा सकथा था. 
समुदाय जब भौतिक दृष्टि से बदलता है, तो अतीत की चीजें धार्मिक कर्मकाण्डों के रूप में उसके जीवन में बची रह जाती हैं. लम्बी परम्परा से उपजे धार्मिक कर्मकाण्ड लोगों के लिये श्रद्धा की चीज होती हैं. श्रद्धा इसलिये भी कि उसके माध्यम से अतीत से जुड़ा हुआ महसूस होता है. इतिहास लेखन युग से पहले समुदाय इसी प्रकार अपने अतीत से जुड़ने का प्रयास करते थे.