दक्ष-सृष्टि बनाम कश्यप-सृष्टि
दक्ष-सृष्टि: - ब्रह्माण्डपुराण 2:02 में (चाक्षुस के बाद) ब्रह्मा ने दक्ष को सृष्टि के लिये आदेश किया. दक्ष ने मानस प्रयास से ऋषियों, देवताओं, मनुष्यों, सर्पों, राक्षसों, यक्षों, भूत-पिशाच, पक्षियों, जानवरों एवं पशुओं की रचना की. ये मानस रचनाएं आगे की सृष्टि नहीं बढा पाये. उन रचनाओं को शापित कर दिया. उसके बाद प्रजापति वीरण की पुत्री से विवाह कर साथ अनेक पुत्रियाँ उत्पन्न किया. सवाल उठता है, कि दक्ष ब्रह्मा से उत्पन्न पहले प्रजापति थे, तो वीरण या अन्य किसी के अस्तित्व का क्या अर्थ निकलता है? अतः दूसरी कहानी, ब्रह्मा द्वारा एक अंगूठे से दक्ष, और दूसरे से उसकी पत्नी के जन्म को हम अधिक तार्किक पाते हैं. दक्ष का वीरण के पुत्री असिक्नी से विवाह की कहानी बाद की बनावट है. दक्ष द्वारा अदिति की रचना वाली कहानी भी तार्किक है. उस अदिति से सारे देवता और सृष्टि के सृजन की कल्पना अधिक परिष्कृत है. लेकिन बाद में चलकर इसमें नैतिक समस्या यह उत्पन्न हो गयी कि दक्ष के अपनी रचना, अर्थात् पुत्री, अदिति से संतानोत्पत्ति की बात को कैसे स्वीकार किया जाये ! यह संकल्पना अधिक प्राचीन इसलिये है क्योंकि इस संकल्पना में ब्राह्मण पुरोहितों ने खुद को अलग नहीं किया था. ब्रह्मा की संकल्पना अपेक्षाकृत बाद की घटना है, क्योंकि इसकी जरूरत ब्राह्मणों के लिये अलग से सृष्टि-स्रोत साबित करने के लिये किया गया था. यहाँ भी वही समस्या उभर कर सामने आयी, जब ब्रह्मा द्वारा अपनी ही रचना, शतरूपा, को पत्नी रूप में रखे जाने पर आपत्ति किया गया.
वाराहपुराण 21:10 में कहा गया ‘तत्र दाक्षायणीपुत्राः सर्वे देवाः सवासवाः, वसवोऽष्टौ च रुद्राश्च आदित्या मरुतस्तथा’, अर्थात् इंद्र समेत आठों वसु, रुद्रगण, आदित्यगण, और मरुद्गण दाक्षायणी पुत्र हैं. दाक्षायणी का अर्थ दक्ष की पुत्री है. कहा यह गया है कि ब्रह्मा ने दक्ष को गौरी (दाक्षायणी) पुत्री रूप में प्रदान किया. और फिर यह कह दिया गया कि दक्ष अपने ‘दौहित्रों’ से काफी प्रसन्न हुआ. जाहिर है कि यहाँ नैतिकता के बंधन में फँसे हुए पुराण लेखक की लेखनी सच कहने में उलझ गयी ! यहाँ भी कश्यप का कोई उल्लेख नहीं है. जाहिर है कि यहाँ भी दक्ष द्वारा अपनी पुत्री से संतानोत्पत्ति (सृष्टि) का उल्लेख है. महाभारत आदिपर्व 95:07 में जो वंशावली दी गयी है ‘दक्ष- अदिति- विवस्वान- मनु------‘ का क्रम दिया गया है. यहाँ कश्यप का कोई उल्लेख नहीं है. इस प्रकार की वंशावली का अर्थ क्या हो सकता है? स्पष्ट है कि यहाँ संतति विस्तार का माध्यम वह स्त्री-पुरुष युग्म है, जिसमें पुरुष को पिता, स्त्री को उसकी पुत्री बताया गया है. इस अवधारणा में इंद्र आदि देवताओं को दक्ष और अदिति का पुत्र बताया गया. बाद में पिता और पुत्री से देवताओं के जन्म के नैतिक संकट को मिटाने के लिये एक नयी अवधारणा, कश्यप, को सामने लाया गया (मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य सुरासुराः, जज्ञिरे नृपशार्दूल लोकानां प्रभवस्तु सः’). अर्थात् दक्ष की कन्या अदिति का विवाह कश्यप से दिखा कर न सिर्फ देवताओं को उनका संतान बताया गया, बल्कि असुर, दैत्य, दानव, समेत अन्य कई महत्वपूर्ण आर्येतर जनों की उत्पत्ति इस नयी अवधारणा में समाहित कर लिया गया. इसमें एक बात और ध्यान देने योग्य है कि सृष्टि की कहानी में दक्ष की भूमिका को बदलने का प्रयास आर्य सांस्कृतिक धार्मिक पृष्ठभूमि में इस चरित्र के महत्व को नीचे गिराना था. जबकि यज्ञ-संस्कृति में मानवीकृत ब्रह्मा की अवधारणा के पहले दक्ष सबसे महत्वपूर्ण अलौकिक चरित्र है.
कूर्मपुराण 14:63 में रुद्र द्वारा दक्स को शाप दिया गया कि ‘--------, स्वस्या सुतायां मूढात्मा पुत्रमुत्पादयिष्यसि’, अर्थात्, दक्ष नामक राजा अपनी पुत्री में संतानोत्पत्ति करेगा. और यह भी शाप दिया कि प्राचेत दक्ष इस प्रकार ब्राह्मण से क्षत्रिय हो जायेगा. वैसे अन्यत्र दस प्रचेताओं को क्षत्रिय भी बताया गया है. लेकिन पुराण लेखकों का भ्रम उन्हें बार बार उटपटांग वर्णन को बाध्य करता रहा. ब्रह्मा का पुत्र बताकर दक्ष को ब्राह्मण बताया गया, और पुनः शाप केंद्रित कहानी के माध्यम से जातिवादी धारणा का निवारण करने का प्रयास किया गया है. प्रश्न यह है कि दक्ष को रुद्र द्वारा शाप का अर्थ क्या है? हमें ध्यान रखना होगा कि शाप की अवधारणा वास्तव में गाली-गलौज, आलोचना, उलाहना, हिंसा को प्रकट करने के लिये हुआ है. रुद्र-पशुपति को धार्मिक महत्व दिये जाने की वकालत करने वाले पुरोहितों ने उस समय ‘दक्ष-अदिति’ युग्म से सृष्टि की शुरुआत की अवधारणा की आलोचना आरम्भ की. उस आलोचना में इस तात्विक प्रश्न को उठाया गया कि दक्ष अपनी पुत्री के माध्यम से सृष्टि की रचना कैसे कर सकता है? दक्ष और रुद्र के बीच प्रतिष्पर्द्धा दिखा कर दक्ष-अदिति वाली प्रचलित अवधारणा की निंदा की. इस प्रतिष्पर्द्धा आ अंत आज तक नहीं हो पाया है. रुद्र-पशुपति के समर्थकों द्वारा दक्ष को शाप दिया जाना अपने आप में यह पुख्ता सबूत है कि कश्यप-सृष्टि की कहानी बाद की जातिवादी ब्राहमणवादी अवधारणा है.
आर्य सांस्कृतिक परिवेश में सृष्टि की प्राचीन कहानी के पुनर्लेखन का यह एक उदाहरण है. सम्भव है कि प्रचेताओं से उत्पन्न संततियों से जुड़ी पुरानी कोई किम्वदंती रही होगी, जिसे यज्ञ-संस्कृति के प्रजापति दक्ष की अवधारणा से जोड़ा गया. यज्ञ-संस्कृति में अदिति पृथिवी का प्रतीक है, जो स्वयं दक्ष से उत्पन्न मानी गयी. इस लिहाज से दक्ष ने अपनी पुत्री में संतति उत्पन्न किया. दुनिया के अन्य संस्कृतियों में भी ऐसी कहानियाँ प्रचलित हैं जिसमें स्रष्टा ने अपने लिये पत्नी की रचना की. अतः आर्यों के मन में सृष्टि की इस अवधारणा का जन्म कोई बहुत अजीबोगरीब बात नहीं थी. प्रतिकात्मक अर्थ को भूल जाने पर भी, उस युग में ऐसा होना आदिम मानवों के लिये एक सहज बात थी. उत्पत्ति की कहानी में ब्रह्मा के चरित्र का सृजन एक बौद्धिक विकास की प्रक्रिया का परिणाम है. इस चरित्र की कल्पना के बाद दक्ष को ब्रह्मा के अंगुठे से उत्पन्न बता दिया गया. हालाँकि व्याख्या के माध्यम से कहानियों में छुपे हुए प्राचीन सामाजिक तथ्य को पूरी तरह से मिटाया नहीं जा सका.
ब्रह्मा से मरिचि, मरिचि से कश्यप, कश्यप और दक्ष की पुत्रियों से सभी प्रकार के जीव-जंतु. दक्ष की पुत्रियों को ‘लोकमातृ’ कहा गया. मेरी समझ में यह स्त्री से सृष्टि के आरम्भ की किसी आर्येतर अवधारणा को आर्यों की दक्ष-सृष्टि वाली अवधारणा के साथ मिलाने से कश्यप और मातृका वाली कहानी का जन्म हुआ. यह देखा गया है कि भारत में हम जैसे जैसे पश्चिम से पूरब की ओर बढते हैं समाज में मातृ प्रधानता बढता दिखाई देता है. सृष्टि की कहानी में परिवर्तन का इस घटना से सम्बंध होना बहुत सम्भव है. कश्यप-सृष्टि
ब्रह्माण्डपुराण 2:07 के अंतिम हिस्से में कुछ श्लोक निहातय ही आधुनिक स्वर लिये हुए हैं. कहा गया कि देवता की उत्पत्ति दक्ष की पुत्रियों, जो मनुष्य थीं, में हुआ. अतः सभी मन्वंतर में मनुष्य सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है, ‘यस्माच्च संभवः कृत्स्नो देवानां मानुषेष्विह, मन्वन्तरेषु सर्वेषु तस्माच्छ्रेष्ठास्तु मानुषाः’. तात्पर्य कि दक्ष- अदिति- विवस्वान- मनु रेखा से इंद्र-पूजक आर्यों ने अपनी उत्पत्ति मानते हुए जिस श्रेष्ठता का दावा किया था, उस दावा को कुंठित करने के लिये ब्राह्मण पुरोहितों ने ब्रह्मा- मरिचि- कश्यप- अदिति, , ---- रेखा का आविष्कार किया. यह ब्राह्मण पुरोहितों की सर्वहारा चेतना थी, जिसने आर्यों के दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत के दावे के उलट देवताओं के मानवीय उत्पत्ति का सिद्धांत प्रतिपादित किया. हालाँकि दक्ष और अदिति से सृष्टि की परिकल्पना में भी देवताओं के पार्थिव उत्पत्ति का भाव उपस्थित है. अदिति पृथ्वी है, और दक्ष, यज्ञ करने वाला पुरुष. पृथ्वी पर यज्ञ की स्थापना ही सृष्टि की शुरुआत है. ब्रह्मा, ब्रह्म और इससे मिलते जुलते शब्द का अर्थ किसी मानवीकृत चरित्र से नहीं है. यह बाद की घटना है कि ब्रह्मा को एक व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया. सम्भवतः यज्ञ-संस्कृति में दक्ष उस पुरुष का प्रतीक है जो सृष्टि का कारण है, और यज्ञ सृष्टि का साधन. ब्रह्मा की अवधारणा दक्ष से ऊपर आरोपित किया गया. और फिर उसमें नई नई चीजे जुड़ती चली गयीं.
