Tuesday, May 21, 2019

पृषध्र

वैवस्वत मनु के पुत्र, पृषध्र, ने अपने पुरोहित च्यवन के गाय को मारकर खा लिया. शापवश वह शूद्र हो गया,
‘----, पृषध्रो हिंसयित्वा तु गुरोर्गावमभक्षयत्.’ 01
शापात् शूद्रत्वम् आपन्नः च्यवनस्य महात्मनः, ----'. 02
- (वायुपुराण 86:01, 02)
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आखेट पर निकले सावर्णि मनु के पुत्र पृषध्र (पूषध्र) ने वन में मौलि नामक ‘किसी अग्निहोत्री ब्राह्मण’ के झाड़ी में आधा छिपे हुए होमधेनु को मार डाला.
 'स ददर्श तदा तत्र होमधेनुं मनोहराम्, -----'
‘गोपालः प्रेषितः पुत्रो वाभ्रव्यो नाम नामतः, ----‘
'गाय चराने के लिये भेजे गये--- . इस मौलि-पुत्र वाभ्रव्य के शाप से पृषध्र शूद्र हो गया.
- मार्कण्डेय पु. 112:--

यहाँ पृषध्र द्वारा इस ब्राह्मणपुत्र के अपमान का उल्लेख है, जिसके एवज में पृषध्र द्वारा वापस उस वाभ्रव्य को शाप देता हुआ उल्लेख किया गया है. इस कहानी से हमें वास्तविकता का अंदाजा लगा लेना चाहिये था. कबिलाई युग में योद्धा सर्वशक्तिमान था. उसके लिये किसी पुरोहित कर्म से जुड़े व्यक्ति का अपमान करना एक साधारण घटना थी. तपस्या से प्राप्त शक्ति के बल पर शाप देने की बात बहुत बाद की बौद्धिक उत्पत्ति है. ऐसे पृषध्र को बाद के पुराण-पण्डितों ने शूद्र घोषित करना अपरिहार्य समझा होगा.
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वैवस्वत मनु का पुत्र, पृषघ्र, को गुरु ने ‘गाय का पालन’ (गोपाल) करने वाला नियुक्त कर रखा था, (‘पृषध्रस्तु मनोः पुत्रो गोपालो गुरुणा कृतः, पालयामास गा यत्तो रात्र्यां वीरासनव्रतः’.) वर्षा की रात, गाय को व्याघ्र समझकर मार डाला. सुबह कुलपुरोहित ने उसे शुद्र हो जाने का शाप दिया.
- भागवतपुराण 09:02:03,,
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थोडा सा गौर करने पर इस एक घटना के तीन अलग अलग संस्करणों रचयिता के दृष्टिकोण का दर्शन होता है. तीन संस्करण, तीन अलग अलग समय और उसके सांस्कृतिक सामाजिक माणदण्डों को सामने रख कर रचा गया है. सबसे सीधा, और सबसे कम ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण वायुपुराण में वर्णित है. अर्थात्, तीनों संस्करणों में सबसे पुराणा वायुपुराण है, स्पष्ट हो जाता है.
इससे अधिक नयापन मार्कण्डेयपुराण की प्रस्तुति में है. क्योंकि इसमें पृषध्र को 'संदेह का फायदा' देते हुए, गोहत्या का दोषी माना गया है.
भागवतपुराण की कहाँई सबसे नई और सबसे अधिक दकियानूसी है. अर्थात्, भागवतपुराण में इस कहानी का समावेश सबसे नया है.
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तीनों संस्करणों में तथ्यों में भी बड़ा हेर फेर है. अनुवादों में तो और भी घपला है ! वायुपुराण में पृषध्र का पुरोहित च्यवन को बताया गया. मार्कण्डेयपुराण में गाय का मालिक 'कोई अग्निहोत्र ब्राह्मण' बन गया. और भागवतपुराण में तो पृषध्र को गुरु का गोपाल बना दिया गया. अनुवादक ने तो गुरु को बाजाब्ता वसिष्ठ नाम दे दिया है. क्योंकि प्राचीन तथ्यों को कुछ खास प्रकार से रूढ बनाने में उसे भी अपनी भूमिका निभानी थी. हाँ, एक चीज तीनों जगहों पर एक सा है कि 'गाय मारने पर पृषध्र शूद्र बन गया' !
शनैः शनैः समय के साथ पौराणिक प्रस्तुति अधिक ब्राह्मणवादी होती दिखाई देती है. मार्कण्डेयपुराण में ब्राह्मण का पुत्र 'गोपाल' है तो कोई परेशानी नहीं है. मगर भागवतपुराण लिखे जाने के समय तक इसमें परेशानी होने लगी. तो एक राजा के पुत्र को 'गोपाल' नियुक्त कर दिया गया ! ताकि स्थापित हो सके कि ब्राह्मण, राजा के ऊपर है !!       

Sunday, May 19, 2019

बौद्धिक अंतर्विरोध

सिर्फ बौद्धिकता से विज्ञान आगे नहीं बढ सकता. वकालत आगे बढती है. आँखें खुली हों, जो दिखता है, उसे समझने की ईमानदार कोशिश हो तो बुद्धि विज्ञान को जन्म देती है. वरना, दिये गये तथ्यों के आधार पर बंद आँखों से सोच-विचार हमें अवैज्ञानिक रास्तों पर ले जाता है. ऐसे में बौद्धिकता का उपयोग, मनमाने निश्कर्षों तक पहुँचने के लिये होता है. कुछ निशकषों की जाँच-परख करने पर उनमें अभिव्यक्त अंतर्विरोध प्रकट हो जाते हैं. हमें पता चल जाता है, कि हमारे देखने का तरीका क्या था.    
हमारे पूर्वजों ने बौद्धिकता के क्षेत्र में जिस प्रकार के कीर्तिमान स्थापित किये हैं, उससे इंकार नहीं किया जा सकता. फिर भी हम विज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से दुनिया के फिसड्डी प्राचीन समाज में परिणत हुए हैं.
शांतिपर्व 342वाँ अध्याय, श्लोक (हालाँकि यह गद्य जैसा है) 09 में सृष्टि के बारे में ऐसा बखान है,
तमाविष्ट (गहन अंधेरे में लिपटा अव्यक्त) ब्रह्म से ‘पुरुष’ की उत्पत्ति हुई. ‘पुरुष’ से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई. ‘पुरुष’ की आँख से सोम और अग्नि की उत्पत्ति हुई.
सोम और अग्नि के बारे में कहा गया, कि
‘यः सोमः तत् ब्रह्म, यत् ब्रह्म ते ब्राह्मणा, यः अग्निः तत् क्षत्रं, क्षत्रात् ब्रह्म बलवत्तरम्.’
अर्थात्, ‘जो सोम है वही ब्रह्म है, जो ब्रह्म है वही ब्राह्मण है. जो अग्नि है वही क्षत्र है. क्षत्र से ब्रह्म अधिक प्रबल है.’
इसी अध्याय के 12वें श्लोक में स्थिति उलट जाती है,
‘अग्निर्हि यज्ञानां होता कर्ता स चाग्निब्रह्म’.
अर्थ, ‘अग्नि यज्ञों के होता और कर्ता हैं. वे अग्निदेव ब्रह्म हैं.’
बौद्धिक मुश्किल यह है, कि आधुनिक अनुवादक जातिवादी पुर्वग्रहों से इतना ग्रसित रहा है कि 09 और 12 में प्रकट अंतर्विरोध को चुपचाप छुपा जाता है. यही नहीं, ‘ब्रह्म’ को ‘ब्राह्मण’ अनुवाद करने में उसे कोई असुविधा नहीं होती ! श्लोक 09 का तो दावा और भी अद्भुत् है; ‘ब्रह्म’ और ‘ब्राह्मण’ के अंतर को ही मिटा दिया गया ! फिर तो जहाँ जहाँ ‘ब्रह्म’ शब्द मिला, उसका अनुवाद ‘ब्राह्मण’ करने में कोई बाधा नहीं था.
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जातिवादी बौद्धिकता समाजशास्त्रीय वास्तविकताओं को नजरंदाज करते हुए अपने द्वारा प्रस्तुर निशकर्षों के अंतर्विरोध को भी नहीं सुलझा पाता. श्लोक 09 में अग्नि को क्षत्रिय बताने वाली बौद्धिकता श्लोक 12वीं में उसी को ब्राह्मण बताता है ! वह यह भी भूल जाता है कि यज्ञ में कर्ता राजा होता, पुरोहित नहीं !  
यही नहीं श्लोक 09 में सोम को ब्राह्मण बताते हुए, श्लोक 57 में सोम को राजा बताया गया है, ‘—दक्षशापात् सोमं राजानं यक्ष्मां विवेश—‘..(दक्ष के शाप से राजा सोम में यक्ष्मा का प्रवेष हुआ.)
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पौराणिक क्थाओं कें कही गयी बातों, दावों के विश्लेषण से ही हम प्राचीन समाज की विकास यात्रा के बारे में कोई खाका तैयार कर सकते हैं. जिसे एक जगह पर क्षत्रिय बताया, दूसरे स्थान पर वह ब्राह्मण हो जाता है, पुनः तीसरी जगह उसे क्षत्रिय के रूप में निरूपित किया जाता है.

Friday, March 15, 2019

त्रयी- तीन विद्या

त्रयी कहते थे (हैं), तीन को मिलाकर जो बनता है. आज यह तीन प्रकार की प्राचीनतम विद्या के लिये यह शब्द रूढ हो गया है. वो तीन विद्या थी, ऋक्, साम, और यजुष्. इनमें से ऋक् सबसे प्राचीन है. इस विद्या को सबसे पहली बार अलग पहचान मिली. स्वाभाविक है कि ध्वनियों से शब्द, और शब्दों से अर्थपूर्ण वाक्या को बनाने की क्षमता को पहचानना अपने समय में एक महान खोज थी, एक अलौकिक उपलब्धि थी. यह प्रशंसा, अनुरोध, वर्णन, आदि से जुड़ी रचना की विद्या थी. आर्य कबीलों में जो लोग किसी भी विषय पर कविता रच सकते थे, उन्हें ही ऋषि कहा गया. जब इस विद्या को मानव ने पहली बार पहचाना, उस युग में यह एक दिव्य घटना थी. ऐसी रचनाओं से जीवन और उसके परिवेष पर उत्पन्न प्रभाव को लेकर उस समय के लोगों में अद्भुत विश्वास रहा होगा, जो इन गीतों में झलकता है.दूसरी विद्या ऋकों के गायन का. अलग अलग प्रकार से उन गीतों को गाने वाले लोग जनसामान्य पर जो प्रभाव डालते थे, वह भी दिव्य था. संगीत, जब आज भी दिव्य अहसास देता है, तो फिर प्राचीन मानवों के लिये उसके महत्व को समझना आवश्यक है. वह महत्व उस युग के सापेक्ष समझा जाना चाहिये. अतः, ऋकों के गायन से जिस विद्या का जन्म हुआ वह सामन-विद्या थी.तीसरी विद्या आर्यों के जीवन में अग्नि और उससे जुड़े वो कर्मकाण्ड थे जिनके माध्यम से अलौकिक शक्तियों को प्रसन्न किया जाता था. उस धार्मिक कर्मकाण्ड को हम यज्ञ कहते हैं. तो यज्ञों के आयोजन, विधि-विधान, क्रियान्वयन से जुड़ी विद्या यजुष् विद्या थी.
वेद और विद्या में कोई अंतर नहीं है. ये दोनों एक ही शब्द के अलग रूपांतर है.एक चौथी विद्या बहुत बाद में पूर्व की त्रयी के साथ जुड़ गयी. वह था मंत्रों के मायावी प्रभावों, जादू-टोना आदि से. आर्यों के ज्ञात अलौकिक शक्तियों से अलग अनेक अनार्य शक्तियों का नकारात्मक प्रभाव उन्हें परेशान किया करता था. सम्भव है कि कुछ अनार्य पुरोहितों ने इस विद्या को आर्यों को उपलब्ध कराया. इस विद्या को किसी अथर्वन् नामक पुरोहित के वंशजों ने सजोया था. यज्ञों के आयोजन को अनार्य मायावी शक्तियों से रक्षा करने के लिये अथर्व-विद्या के ज्ञाता पुरोहितों को दायित्व सौंपा जाता था. उन्हें ही ब्राह्मण कहते थे. क्योंकि उनका दावा था, कि वो ब्रह्म नामक परा अलौकिक शक्ति को अपने जादू-टोना से प्रभावित करने में सक्षम थे.
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Sunday, November 18, 2018

जमाल खशोग्जी का अंतिम संस्कार

सऊदी अरब इस्लामी कट्टरपन का सबसे मजबूत किला है. पाकिस्तान तो उस कट्टरपन का बौद्धिक संस्करण है. और पाकिस्तान का नाम लेने से हमें उन करोड़ों कट्टर मुसलमानों को भी याद रखना चाहिये, जो भारत भूमि में रहने की बावजूद सऊदी अरब को एक आदर्श इस्लामी राज्य मानते हैं. सऊदी अरब वहाबी-सलाफी इस्लामी विचारधारा को बढावा देता है. सऊदी की जमीन से ही ओसामा बिन लादेन निकलकर दुनिया में कायदा की स्थापना का सशस्त्र स्वप्न देखता था. 
इस्लाम में अल्लाह, पैगम्बर, और आखिरत में विश्वास मुसलमानों की आस्था का आधार माना जाता है. यही कारण है, कि हर आस्थावान का अंतिम संस्कार विशेष महत्व रखता है. अमेरिका ने जब ओसामा बिन लादेन का शिकार किया, तो दुनिया भर के कट्टर मुसलमानों ने उसके अंतिम संस्कार को लेकर अपनी आस्थागत भावना व्यक्त की थी. कारण, कि उस आतंकी को इस्लामी अंतिम संस्कार का सम्मान प्राप्त नहीं हुआ था. अभी अभी सऊदी मूल के एक ख्याति-प्राप्त पत्रकार जमाल ख्शोग्जी के अद्भुत तरीके से हत्या, और उसके पार्थिव शरीर के साथ घोर अमानवीय संस्कार की खबर माध्यमों में छाया हुआ है. पूरी दुनिया, जो सभ्य होने के तमाम दावों से सुसज्जित है, सऊदी अरब के इस घोर कृत्य से स्तब्ध है. खशोग्जी को दुर्दांत अपराधी नहीं था. वह सऊदी अरब की राजनीतिक व्यवस्था का आलोचक था. अपने देश में लोकतांत्रिक अधिकारों का पैरोकार था. उस खशोग्जी की हत्या का, जैसा की गहन संदेह है, राज्य द्वारा शड्यंत्र, और दूसरे देश में स्थित अपने कंसलेट के भीतर बर्बरता से हत्या को अंजाम दिया गया, वह एक अलग मुद्दा है. हम दुनिया भर के कट्टर मुसलमानों की दृष्टि में खशोग्जी के पार्थिव शरीर के साथ किये गये व्यवहार से जुड़ी प्रतिक्रिया पर गौर करना चाहते है. कहीं से किसी इस्लामी विद्वान ने, संस्था ने, संगठन ने एक मुसलमान के पार्थिव शरीर के प्रति किये गये सऊदी व्यवहार पर कुछ नहीं कहा है. ओसमा बिन लादेन, या भारत में मारे गये आतंकियों के पाथिव शरीर के साथ किये जाने वाले व्यवहार पर धर्मयुद्ध छेड़ेने की धमकी देने वाले भारतीय कट्टरपंथियों की जुबान भी तालू में सटे प्रतीत होते हैं. 
क्या, सऊदी अरब धार्मिक सांस्कृतिक तौर पर इतना बदल चुका है, कि अपने ही मजहब के मूलभूत अवधारणाओं, पुर्वग्रहों को गैर महत्वपूर्ण मानने लगा है ? अगर ऐसा है, तो दुनिया भर के गैर मुस्लिमों को खुश होना चाहिये ! किस मुँह से दुनिया भर के कट्टरपंथी सऊदी अरब की सांस्कृतिक माहौल को आदर्श इस्लामी होने की घोषणा करते हैं ? क्या भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों को बदल रही दुनयावी वास्तविकता का आभास नहीं है? 
नकारात्मक घटनाओं से हमें अधिक सशक्त सीख प्राप्त होते हैं, बशर्ते, हम नकारात्मकता में निहित बदलाव को महसूस कर सकें

Friday, July 6, 2018

देवता, हमारे पूर्वज

अलौकिक सर्वशक्तिमान के प्रति हमारे मानस में कौन सा भाव उत्पन्न होता है? सबसे पहला, भय का. और दूसरा प्रेम-सम्मान-श्रद्धा-स्नेह जैसे भावों का सम्मिलित प्रभाव, जिससे भक्ति और दासत्व भाव उपजता है. इन दो प्रकार के भावों, नकारात्मक और सकारात्मक, की उत्पत्ति हमारे परिवेष में पिता को लेकर उपजता है. पिता से भय भी उतना लगता है, जितना हम उसपर निर्भर होते हैं. और भय और निर्भरता के भावों के साथ प्रेम-सम्मान-श्रद्धा-स्नेह का सम्मिश्रित रूप हमारे मन में छाया रहता है. पिता के पिता, उनके पिता, एवम् प्रकार हम जैसे जैसे इस शृंखला में पीछे जाते हैं श्रद्धा और उससे उपजी गरिमापूर्ण आभामंडल का विस्तार का भाव बढता जाता है. इस भाव का ही विस्तारित रूप हमारे भीतर अलौकिक भाव में लिपटी हुई चेतना को जन्म देता है. आज हम जिन अलौकिक चरित्रों को हमारे अतीत में देवताओं के रूप में देखते हैं, वो हमारे पूर्वजों के अलावा और कुछ नहीं हो सकते. अलौकिक के बारे में हमारी कल्पना में जो एक तत्व रहस्य का है, वह प्राकृतिक घटनाओं से उत्पन्न है. उस रहस्य को अगर हम अपने पूर्वजों के आभामण्डित व्यक्तित्व से जोड़ दें, तो वही हमारे ईश्वर का व्यक्तित्व कहलायेगा.
अतीत में इंद्र, वरुण, अग्नि, विष्णु, रुद्र जैसे वैदिक देवताओं के बारे में हम सुनते हैं. इनमें से सबसे पुराने कौन होंगे, इसपर विचार करना चाहिये. सांस्कृतिक विकासवाद में विश्वास करने वालों के लिये यह समझना आसान है, कि आदिम मानव के लिए अग्नि, अंधकार, काले मेघ, वज्रपात, आंधी, बाढ जैसी प्राकृतिक घटनाएँ भय और रहस्य दोनों के जनक रहे. इन घटनाओं से उपजे भय ने इनके पीछे के रहस्य को सबसे पुराने अलौकिक शक्तियों के रूप में स्थापित किया होगा. लेकिन उन अलौकिक शक्तियों के व्यक्तित्व का निर्माण करने में आदि मानवों के पूर्वजों के बारे में श्रद्धा विकास का महत्वपूर्ण योगदान रहा होगा. अलौकिक शक्तियों को देवताओं के रूप में समझने की बात तब शुरु हुई होगी जब अलौकिक शक्तियों के प्रति जनित श्रद्धा का सामंजस्य पितृ के प्रति उपजी श्रद्धा के साथ हुआ होगा. पितृ के प्रति श्रद्धा की उत्पत्ति को मानवीय चेतना के विकास क्रम में वह स्थान माना जा सकता है, जब मनुष्य ने पहली बार अलौकिक शक्तियों को उस रूप में देखना शुरू किया, जिस रूप में आगे चलकर उसकी आराधना पूजा वगैरह किया जाने लगा. हमारे सबसे पुराने धार्मिक साहित्यिक दस्तावेज ऋग्वेद में जो देवता वर्णित हैं, उनके व्यक्तित्व के बारे में हम जानते हैं. वह व्यक्तिव मानवीय रूप गुण स्वभाव में परिभाषित हैं. यहीं किसी भी अन्य धार्मिक परम्परा विकास में पाया जाता है.
प्राचीन ग्रंथों में देवताओं के व्यक्तित्व रूप गुण व्यवहार आदि से हम उनके प्राचीनता का अनुमान लगा सकते हैं. इससे हमे यह पता चल जाता है, कि मानवीय सांस्कृतिक विकास क्रम में विभिन्न देवताओं की उत्पत्ति क्रम क्या रहा है. देवताओं के रूप गुण व्यवहार से उन्हें पूजने वालों की सांस्कृतिक स्थिति का आभास मिल जता है. मसलन, इंद्र ऋग्वेदिक लोगों के सबसे आभामण्डित विश्वसनीय देवता माने गये हैं. और इंद्र, युद्ध के विशेषज्ञ देवता हैं. इससे ऋग्वेदिक लोगों की युद्धप्रियता का सीधा निष्कर्ष निकलता है. अन्य स्रोतों से भी इसी बात की पुष्टि होती है. वज्र इंद्र का शस्त्र है, तो वर्षा पर उसके नियंत्रण की बात सामने आती है. बाद के पौराणिक आख्यानों में इंद्र की सवारी हाथी, बादलों का प्रतीक है. पौराणिक आख्यानों में दिये गये इंद्र के मानवीय व्यक्तित्व पर गौर करें तो हम पाते हैं, कि उसका शस्त्र, वज्र, मानवीय कंकाल में सबसे मजबूत हड्डियों से मिलकर बना था. अर्थात्, बादलों में चमकने वाला इंद्र का वज्र के बरअक्स हम उस पूर्वज योद्धा की कल्पना कर सकते हैं जो मजबूत हड्डियों से बने हथियारों का प्रयोग करता था. सांस्कृतिक विकासवाद के रास्ते हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि निश्चय ही इंद्र देवता के व्यक्तित्व में हमारे उस पूर्वज का योगदान है जो अपने जमाने में हड्डियों से बने अस्त्र-शस्त्र से बड़े कारनामों को अंजाम देता था. इससे हम पाते हैं कि इंद्र जैसे देवता के व्यक्तित्व में हमारे पूर्वज की कहानी छुपी हुई है.
एक दूसरा उदाहरण हम रुद्र का लेते हैं. ऋग्वेद में रुद्र एक गौण देवता के रूप में उपस्थित हैं. युद्धप्रिय समाज में विनाश से जुड़े नकारात्मक प्रवृत्तियों से सम्बंधित रुद्र में लोगों की रुचि कम रही होगी. ऋग्वेदिक युग के बाद जब हम रुद्र-पाशुपत मत की स्थापना और प्रचार काल में पहुँचते हैं, तो विभिन्न पौराणिक आख्यानों में रुद्र और उसके व्यक्तित्व से जुड़े अन्य चरित्रों के युद्ध में संलग्न होने से जुड़ी कहानियाँ पाते हैं. सबसे पुरानी कहाँइयों में भी रुद्र धनुषधारी के रूप में वर्णित हैं. युद्ध के सांस्कृतिक विकास क्रम में धनुष का आविष्कार वज्र से बहुत बाद का माना जायेगा. रुद्र का योद्धा रूप धनुष के साथ प्रकट होना इस बात का परिचायक है, कि पूर्वज के रूप में रुद्र, इंद्र से काफी बाद की घटना हैं. और इस बात को सिद्ध करने के लिये और  भी अनेकों साक्ष्य हमारे पास उपलब्ध हैं.
इस प्रकार हम देखते हैं, कि हर देवता अतीत में कहीं न कही हमारा पूर्वज था. और उन पूर्वजों की प्राचीनता को हम उसके बारे में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जान सकते हैं.

                       

Friday, June 1, 2018

आभीर

आभीर

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आज उत्तर भारत में जो जाति समूह अपने नाम के पीछे 'यादव' शब्द धारण करते हैं, उनकी उत्पत्ति दो प्राचीन जाति समूहों से जुड़ा हुआ है. ये जाति समूह है, ग्वाला और अहिर. इन दोनों जातियों का जिक्र महाभारत ग्रंथ में मिलता है. यमुना से पूरब गोपालकों का क्षेत्र था. इन गोपालकों के यहाँ ही कृष्ण के बचपन गुजरने का पूरा आख्यान कृष्ण-लीला का विषय है. अहिर, या आभीरों का जिक्र महाभारत के मूसल पर्व में आया है. द्वारका क्षेत्र में, यादवों का गृहयुद्ध, और वंश विनाश के बाद अर्जुन बचे-खुचे यादव बच्चों एवं स्त्रियों को लेकर पंजाब के रास्ते हस्तिनापुर लौट रहे थे, कि रास्ते में लट्ठधारी आभीर लुटेरों नें यादव स्त्रियों को लूट लिया. अर्जुन, अपनी वृद्धावस्था के कारण आभीरों का प्रतिकार नहीं कर पाये. बचे हुए यादव बालकों को लेकर वो हस्तिनापुर पहुँच पाये.

- (महाभारत, मूसल पर्व, अध्याय-8, श्लोक-45, श्लोक-61; अध्याय-9, श्लोक-16)

उपरोक्त घटना के अलावा महाभारत में आभीरों का निम्नांकित स्थानों पर उल्लेख मिलता है,

- महाभारत 2:32:10- शूद्र और आभीर कबीलों को पाण्डुपुत्र नकुल ने जीता. 

- महाभारत 2:51:12- निचले सिंधु के पश्चिम तट निवासी के रूप में आभीर का उल्लेख.

- महाभारत 3:188:36- छल से शासन करने वाले आभीर, पुलिंद, आंध्र, शक, यवन, कंबोज, तथा बाह्लिक राज्यों का उल्लेख है.  

- महाभारत 6:09:47, 67 में भारत के जनपदों के वर्णन में आभीर जनपद का भी नामोल्लेख किया गया है।  

- महाभारत 7:20:06- द्रोण द्वारा गरुड़ व्यूह में शक और यवनों के साथ आभीर शूरवीर भी शामिल हुए थे। 

- महाभारत 14:29:16 में उल्लेख है कि जो क्षत्रिय परशुराम के भय से दूरदराज के इलाकों में भाग गए, वो द्रविड़, आभीर, पुंड्र, शबर जैसे कबीलों के संसर्ग में शूद्र की अवस्था में पहुंच गए। 

- महाभारत शल्यपर्व 37:01 में सरस्वती के तट पर बसे शूद्र और आभीरों के प्रति द्वेश के कारण सरस्वती नदी के सूख जाने का उल्लेख है.

- मत्स्यपुराण 50:76 में क्षत्रिय, पारशव, शूद्र, बहिश्चर, अंध, शक, पुलिंद, चूलिक, यवन, कैवर्त, आभीर, और शबर राजाओं का उल्लेख है.  

- मत्स्यपुराण 114:40- आभीरों का उल्लेख मिलता है. ये उत्तर भारत में निवास करते हुए बताये गये हैं.

महाभारत और मत्स्यपुराण जैसे स्रोतों में आभीरों का जिन अन्य लोगों के साथ उल्लेख है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि ईसा सन के आस पास आभीर कबीले सिंध और पंजाब के इलाकों में बसे हुए थे. दूसरी-तीसरी शताब्दी में एक आभीर राजवंश का जिक्र भी आता है. वायुपुराण 99:,, में कच्छ और सिंध के इलाके में सात आभीरवंशी राजाओं का उल्लेख है. उस इलाके लोगों को म्लेच्छ कहा गया है. और बाद में ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसे कबीलों को शूद्र कहे जाने के पीछे कारण गांगेय क्षेत्र के लोगों द्वारा पश्चिम और उत्तर पश्चिम के लोगों के प्रति पुर्वग्रह ही रहा होगा. महाभारत (कर्णपर्व) में कर्ण द्वारा पंजाब और उत्तर पश्चिम के लोगों को निम्न माने जाने का वर्णन है. लोगों के यज्ञ-कर्मकांडों के नहीं मानने की बात की गयी है. वास्तव में यज्ञ-संस्कृति काल के बाद भी पश्चिम और उत्तर से नये कबीलों का समय समय पर भारतीय उपमहाद्वीप में आगमन होता ही रहा. नये लोगों के रीति-रिवाजों को गांगेय क्षेत्र के लोग घृणा की दृष्टि से देखने लगे थे.

इसवी सन के आरम्भिक समय में वो इलाके धार्मिक दृष्टि से गैर-ब्राह्मण सम्प्रदायों से जुड़े थे. ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार उत्तर पश्चिम से आये शक्तिशाली लड़ाकू कबीलों को ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ संस्कार के माध्यम से यज्ञ-संस्कृति परम्परा में क्षत्रिय के तौर पर स्वीकार किया जाता रहा. सम्भावना यह है कि आभीर सरदारों को राजपूत नामवाले शासकों के नये वर्ग में शामिल कर लिया गया, कबीले के बाकी लोग कृषि और पशुपालन से जुड़े रहे.      

मूसलपर्व में आभीरों को बार-बार लुटेरा और म्लेच्छ कहा गया है. (महाभारत, मूसल पर्व, अध्याय-8, श्लोक-45, श्लोक-61; अध्याय-9, श्लोक-16) इस परिप्रेक्ष्य में हमें याद रखना चाहिये, कि भारत भूमि पर पश्चिम से आक्रामक लड़ाकू जातियों एवं पशुचारी कबीलों का लगातार आगमन होता रहा है. महाभारत के बाद भी लिखे गये ग्रंथों में पश्चिम से आने वालों को म्लेच्छ और लुटेरा कहा गया है. इनमें पारसी, ग्रीक, कुषाण, शक, हूण आदि का जिक्र प्रमुख है. आभीर भी आर्यों के बाद भारत में आनेवाली एक प्रमुख जाति रही है. महाभारत के हजार से भी अधिक वर्षों बाद, दूसरी तीसरी शताब्दी ईसवी में महाराष्ट्र क्षेत्र में कतिपय आभीर राजवंश का जिक्र आता है. इससे स्पष्ट होता है, कि कालांतर में आभीरों के बीच से कुछ वंश, आक्राता, लुटेरा, और म्लेच्छ जैसी सामाजिक स्थित से उन्नत होकर सम्मानजनक पद पाने में सफल रहे. स्वाभाविक तौर पर इनमें से कुछ वंश छठी सातवीं शताब्दी तक शासक वंश की हैसियत प्राप्त कर राजपूत वर्ग का हिस्सा बन गये. लेकिन, आभीरों का बहुसंख्य, धीरे धीरे, कृषि और पशुपालन में संलग्न हो गया. इसी दौरान, महाभारत उल्लिखित गोपालकों के क्रिया-कलाप से समानता के कारण कृषक-पशुपालक आभीरों का अवशोषण एक जाति के रूप में हो गया.

भागवतपुराण 10:24:24, और विष्णुपुराण 5:10:26 में नंद के समाज को वनचर बताया गया है. अर्थात्, महाभारत लिखे जाने तक ग्वाले घुमक्कर स्थित में ही थे. महाभारत का पहला संस्करण लिखे जाने के समय तक पंजाब से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश सामाजिक और आर्थिक आधार कृषि के साथ पशुपालन था. इसमें पशुपालन के दो रूप नजर आते हैं. एक जो स्थायी निवासस्थानों के आस पास के चारागाहों पर आधारित था. दूसरा, घुमक्कर पशुचारियों द्वारा पशुपालन. कई ग्रंथों में कृष्ण का बचपन जिन लोगों के बीच बीतने की बात कही गयी है, वो वनवासी घुमक्कर पशुचारक थे. इस बात की पुष्टि पौराणिक ग्रंथों से होती है. वैसे महाभारत में ग्वालों को पैदल सैनिक की तरह कौरव पक्ष से लड़ते हुए दिखाया गया है. स्वाभाविक तौर पर पशुचारी कबीलों से जुड़े हुए लोग वीर लड़ाकू होते हैं. मध्यकाल में भी कृषि और पशुचारी कार्यों में लगे लोग युद्ध के समय स्थायी सम्भ्रांत सैनिकों के साथ पैदल टुकड़ियों के रूप में इसमें भाग लेते थे. ऐसे कितने ही लड़ाकू कबीलों को हम मुगलों के बाद तक भाड़े के सैनिकों के तौर पर विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के प्रति अपनी सेवायें देते हुए पाते हैं. प्राचीन काल से लेकर पिछली शताब्दियों तक ऐसे लड़ाकू कबीलों ( जातियों ) को हम सामाजिक स्तर पर सम्मानजनक स्थिति पाते हुए देखते हैं. ऐसे लोगों का कबीलों से जाति-उपजाति में परिवर्तन सामाजिक गतिशीलता के कारण ही सम्भव था.             

ब्रज के गोपालक और पंजाब के आभीरों के पशुपालन में एक बहुत बड़ा अंतर यह दिखता है, कि सम्भवतः, सिंध पंजाब क्षेत्र के आभीर भैंस-पालन में अग्रणी थे. आज के अहिर-ग्वाला जाति के लोगों का अधिकांश भैंसपालन में ही पाया जाता है. इसका मतलब है, कि आभीर, संख्या में ग्वालों से अधिक रहे होंगे.

‘---The Abhiras lived in scattered settlements in various parts of western and centra India as far as the deccan. Most of these tribes claimed descent from tge ancient lineage of the Puranas, and some of them were later connected with the rise of Rajput dynasties.----’ - britannica.com ( article 'Ashoka and his Successors')

Sunday, May 20, 2018

ऊँच नीच और सामाजिक जिम्मेदारी

जाति का ऊँचा नीचा होना उस जाति के कर्म के प्रति समाज की दृष्टि पर निर्भर करता था. जिस जाति का काम अलौकिक प्रभाव उत्पन्न करने वाले पूजा-पाठ, यज्ञ-याजन करना, भविष्य-दर्शन करना, शिक्षा-दीक्षा देना था, समाज उसे सहज ही उच्च मानता था. अस्त्र-शस्त्र पर अधिकारयुक्त लोगों का काम समाज में व्यवस्था कायम करना था, तो उस काम से जुड़े जाति को उच्च माना गया. शराब, मांसाहार जैसे कर्मों के प्रति सामाजिक असम्मान ने उस कर्म से जुड़े लोगों के जाति को निम्न माना. मरे हुए प्राणियों का निपटारा करना, या ऐसे ही अन्य अशौच से जुड़े लोगों को अंत्यज समझने के पीछे समाज का दृष्टिकोण सामुहिक था. शौच-अशौच को लेकर भारतीय समाज की सम्वेदनशीलता को हम नकारात्मक ढंग से नहीं ले सकते. जिस जलवायविक परिस्थिति में छुआ-छूत की बीमारी से निबटने का कोई अन्य कारगर उपाय नहीं था, वहाँ शौच-अशौच की अवधारणा ने लोगों को हमेशा उत्पन्न होने वाले महामारियों से बचाने का काम किया. शौच-अशौच की सामाजिक धारणा को मानने में ब्राहमणों की कठोरता का तात्पर्य यह नहीं, कि दूसरे लोग उससे जुड़ी सावधानी के महत्व को स्वीकार नहीं करते थे. सच तो यह है, कि ब्राह्मणों के अशौच निवारण के उपाय निम्न समझी जाने वाली जातियों में उनके प्रति श्रद्धा भाव को और अधिक बढाता था.
इन बातों को लेकर रुढिग्रस्तता की दिशा में समाज आगे बढा तो इसकी जिम्मेदारी ब्राह्मणों पर नहीं थोपी जा सकती. एक अंत्यज का गाँव में प्रवेश सिर्फ ब्राह्मण की शुचिता के लिये खतरा नहीं समझा जाता था. बल्कि, इस मायने में अन्य जातियों का व्यवहार भी अंत्यजों के प्रति यथेष्ट कठोर था. आज अगर दूसरी जातियों के लोग यह कह कर पल्ला झाड़ लें, कि ऐसा तो उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा संकलित धर्मशास्त्रों के पालन के लिये किया था, और कि इसकी जिम्मेदारी ब्राहमणों पर जाती है, तो यह महज अपनी जिम्मेदारी से भागना है. जिम्मेदारी से भागने वाले समाज की हालत क्या होती है, हम उसका एक उदाहरण हैं !
 अपने युग के सामाजिक दृष्टिकोणों पुर्वग्रहों, धारणाओं को ब्राहमणों ने धर्मशास्त्रों में समाहित किया. समाहित करने का यह अर्थ कदापि नहीं लिया जा सकता, कि ब्राह्मणों ने उन प्रावधानों के पीछे समाज की सामुहिक सोच को उत्पन्न किया. ब्राह्मण भी समाज का हिस्सा था. समाज की सामुहिक चेतना, पुर्वग्रह, खामी, खूबी से ब्राह्मण भी वैसे ही जुड़ा था, जैसा किसी अन्य जाति के लोग. जातिप्रथा के बारे में एक अवैज्ञानिक दुस्प्रचार (राजनीति से प्रेरित) यह पाया जाता है, कि जाति की व्यवस्था धर्मशास्त्रों के कारण अस्तित्व में आया. सच इससे उलट है. जातिप्रथा का जन्म सामाजिक धारणाओं एवं पुर्वग्रहों से उपजा, जिसे धर्मशास्त्रों में संकलित और समाहित किया गया. हाँ, यह सही है, कि उस जमाने की धारणाओं पुर्वग्रहों को धर्मशास्त्र में प्रावधानों के रूप में शामिल करने वालों (ब्राह्मणों) ने अपने फायदे का विशेष खयाल रखा. ऐसा करने के लिये, अतीत के उदाहरणों, परम्पराओं के उद्धरणों को तोड़ मड़ोर कर प्रस्तुत किया.
लेकिन, ऐसा सिर्फ भारत में हुआ है, या प्राचीन काल तक ही सीमित रहा है, ऐसा सोचना इस देश के बौद्धिक पिछड़ेपन के कारण है. इस देश के लोगों ने दूसरे समाज, देश, परम्परा के अध्ययन की बात तो दूर, अपनी परम्परा को भी जानने में रुचि नहीं दिखाई है. आधुनिक काल में प्राचीन का लगभग सारा अध्ययन पश्चिमी अध्येताओं ने किया है. ऐसे में हम दुनिया के अन्य समाज की वास्तविकताओं को नही जान पाये हैं. सत्ता से जुड़े वर्गों ने हमेशा अपने लिये विशेषाधिकारों का प्रावधान रखा और उसका उपभोग किया.
भारत का बौद्धिक पिछड़ापन आज भी उतना ही गहरा है, जितना पहले कभी रहा था. जो लोग भारतीय समाज के पिछड़ेपन के लिये तथाकथित उच्च जातियों को दोष देते हैं, वो आज भी पिछड़ेपन से बाहर निकलने का सार्थक प्रयास नहीं कर रहे. पिछड़ेपन से निकलने के उपायों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाता है, कि ये उपाय अपने आप में पिछड़ेपन को और अधिक बढावा देने वाला है. तथाकथित उच्च जातियों में बौद्धिक और आर्थिक पिछड़ेपन का स्तर तथाकथित पिछड़ी जातियों से कम नहीं है. और ये दोनों प्रकार के पिछड़ेपन इस देश की उन्नति में सबसे बड़े बाधक है. वैश्विकृत दुनिया में पिछड़ेपन के माणदंड बिल्कुल अलग हैं. सामाजिक स्तर पर उस माणदंड को ध्यान में रखे बगैर देश के पिछड़ेपन से निबटना मुश्किल होगा.