सऊदी अरब इस्लामी कट्टरपन का सबसे मजबूत किला है. पाकिस्तान तो उस कट्टरपन का बौद्धिक संस्करण है. और पाकिस्तान का नाम लेने से हमें उन करोड़ों कट्टर मुसलमानों को भी याद रखना चाहिये, जो भारत भूमि में रहने की बावजूद सऊदी अरब को एक आदर्श इस्लामी राज्य मानते हैं. सऊदी अरब वहाबी-सलाफी इस्लामी विचारधारा को बढावा देता है. सऊदी की जमीन से ही ओसामा बिन लादेन निकलकर दुनिया में कायदा की स्थापना का सशस्त्र स्वप्न देखता था.
इस्लाम में अल्लाह, पैगम्बर, और आखिरत में विश्वास मुसलमानों की आस्था का आधार माना जाता है. यही कारण है, कि हर आस्थावान का अंतिम संस्कार विशेष महत्व रखता है. अमेरिका ने जब ओसामा बिन लादेन का शिकार किया, तो दुनिया भर के कट्टर मुसलमानों ने उसके अंतिम संस्कार को लेकर अपनी आस्थागत भावना व्यक्त की थी. कारण, कि उस आतंकी को इस्लामी अंतिम संस्कार का सम्मान प्राप्त नहीं हुआ था. अभी अभी सऊदी मूल के एक ख्याति-प्राप्त पत्रकार जमाल ख्शोग्जी के अद्भुत तरीके से हत्या, और उसके पार्थिव शरीर के साथ घोर अमानवीय संस्कार की खबर माध्यमों में छाया हुआ है. पूरी दुनिया, जो सभ्य होने के तमाम दावों से सुसज्जित है, सऊदी अरब के इस घोर कृत्य से स्तब्ध है. खशोग्जी को दुर्दांत अपराधी नहीं था. वह सऊदी अरब की राजनीतिक व्यवस्था का आलोचक था. अपने देश में लोकतांत्रिक अधिकारों का पैरोकार था. उस खशोग्जी की हत्या का, जैसा की गहन संदेह है, राज्य द्वारा शड्यंत्र, और दूसरे देश में स्थित अपने कंसलेट के भीतर बर्बरता से हत्या को अंजाम दिया गया, वह एक अलग मुद्दा है. हम दुनिया भर के कट्टर मुसलमानों की दृष्टि में खशोग्जी के पार्थिव शरीर के साथ किये गये व्यवहार से जुड़ी प्रतिक्रिया पर गौर करना चाहते है. कहीं से किसी इस्लामी विद्वान ने, संस्था ने, संगठन ने एक मुसलमान के पार्थिव शरीर के प्रति किये गये सऊदी व्यवहार पर कुछ नहीं कहा है. ओसमा बिन लादेन, या भारत में मारे गये आतंकियों के पाथिव शरीर के साथ किये जाने वाले व्यवहार पर धर्मयुद्ध छेड़ेने की धमकी देने वाले भारतीय कट्टरपंथियों की जुबान भी तालू में सटे प्रतीत होते हैं.
क्या, सऊदी अरब धार्मिक सांस्कृतिक तौर पर इतना बदल चुका है, कि अपने ही मजहब के मूलभूत अवधारणाओं, पुर्वग्रहों को गैर महत्वपूर्ण मानने लगा है ? अगर ऐसा है, तो दुनिया भर के गैर मुस्लिमों को खुश होना चाहिये ! किस मुँह से दुनिया भर के कट्टरपंथी सऊदी अरब की सांस्कृतिक माहौल को आदर्श इस्लामी होने की घोषणा करते हैं ? क्या भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों को बदल रही दुनयावी वास्तविकता का आभास नहीं है?
नकारात्मक घटनाओं से हमें अधिक सशक्त सीख प्राप्त होते हैं, बशर्ते, हम नकारात्मकता में निहित बदलाव को महसूस कर सकें
Sunday, November 18, 2018
जमाल खशोग्जी का अंतिम संस्कार
Friday, July 6, 2018
देवता, हमारे पूर्वज
अलौकिक सर्वशक्तिमान के प्रति हमारे मानस में कौन सा भाव उत्पन्न होता
है? सबसे पहला, भय
का. और दूसरा प्रेम-सम्मान-श्रद्धा-स्नेह जैसे भावों का सम्मिलित प्रभाव, जिससे
भक्ति और
दासत्व भाव उपजता है. इन दो प्रकार के
भावों, नकारात्मक और सकारात्मक,
की उत्पत्ति हमारे परिवेष में पिता
को लेकर उपजता है. पिता से भय भी उतना लगता है, जितना हम उसपर निर्भर होते
हैं. और भय और निर्भरता के भावों के साथ प्रेम-सम्मान-श्रद्धा-स्नेह का सम्मिश्रित
रूप हमारे मन में छाया रहता है. पिता के पिता, उनके पिता, एवम्
प्रकार हम जैसे जैसे इस शृंखला में पीछे जाते हैं श्रद्धा और उससे उपजी गरिमापूर्ण
आभामंडल का विस्तार का भाव बढता जाता है.
इस भाव का ही विस्तारित रूप हमारे
भीतर अलौकिक भाव में लिपटी हुई चेतना को जन्म देता है. आज हम जिन अलौकिक चरित्रों को
हमारे अतीत में देवताओं के रूप में देखते हैं, वो हमारे पूर्वजों के अलावा
और कुछ नहीं हो सकते. अलौकिक के बारे में हमारी कल्पना में जो एक तत्व रहस्य का है, वह
प्राकृतिक घटनाओं से उत्पन्न है. उस रहस्य को अगर हम अपने पूर्वजों के आभामण्डित व्यक्तित्व
से जोड़ दें, तो वही हमारे ईश्वर का व्यक्तित्व कहलायेगा.
अतीत में इंद्र, वरुण, अग्नि, विष्णु, रुद्र
जैसे वैदिक देवताओं के बारे में हम सुनते हैं. इनमें से सबसे पुराने कौन होंगे, इसपर
विचार करना चाहिये. सांस्कृतिक विकासवाद में विश्वास करने वालों के लिये यह समझना आसान
है, कि आदिम मानव के लिए अग्नि, अंधकार, काले
मेघ, वज्रपात, आंधी,
बाढ जैसी प्राकृतिक घटनाएँ भय और रहस्य
दोनों के जनक रहे. इन घटनाओं से उपजे भय ने इनके पीछे के रहस्य को सबसे पुराने अलौकिक
शक्तियों के रूप में स्थापित किया होगा. लेकिन उन अलौकिक शक्तियों के व्यक्तित्व का
निर्माण करने में आदि मानवों के पूर्वजों के बारे में श्रद्धा विकास का महत्वपूर्ण
योगदान रहा होगा. अलौकिक शक्तियों को देवताओं के रूप में
समझने की बात तब शुरु हुई होगी जब अलौकिक शक्तियों के प्रति जनित श्रद्धा का सामंजस्य
पितृ के प्रति उपजी श्रद्धा के साथ हुआ होगा. पितृ के प्रति श्रद्धा की उत्पत्ति
को मानवीय चेतना के विकास क्रम में वह स्थान माना जा सकता है, जब
मनुष्य ने पहली बार अलौकिक शक्तियों को उस रूप में देखना शुरू किया, जिस
रूप में आगे चलकर उसकी आराधना पूजा वगैरह किया जाने लगा. हमारे सबसे पुराने धार्मिक
साहित्यिक दस्तावेज ऋग्वेद में जो देवता वर्णित हैं, उनके व्यक्तित्व के बारे में
हम जानते हैं. वह व्यक्तिव मानवीय रूप गुण स्वभाव में परिभाषित हैं. यहीं किसी भी अन्य
धार्मिक परम्परा विकास में पाया जाता है.
प्राचीन ग्रंथों में देवताओं
के व्यक्तित्व रूप गुण व्यवहार आदि से हम उनके प्राचीनता का अनुमान लगा सकते हैं. इससे
हमे यह पता चल जाता है, कि मानवीय सांस्कृतिक विकास क्रम में विभिन्न देवताओं
की उत्पत्ति क्रम क्या रहा है. देवताओं के रूप गुण व्यवहार से उन्हें पूजने वालों की
सांस्कृतिक स्थिति का आभास मिल जता है. मसलन,
इंद्र ऋग्वेदिक लोगों के सबसे आभामण्डित
विश्वसनीय देवता माने गये हैं. और इंद्र, युद्ध के विशेषज्ञ देवता हैं. इससे ऋग्वेदिक लोगों
की युद्धप्रियता का सीधा निष्कर्ष निकलता है. अन्य स्रोतों से भी इसी बात की पुष्टि
होती है. वज्र इंद्र का शस्त्र है,
तो वर्षा पर उसके नियंत्रण की बात
सामने आती है. बाद के पौराणिक आख्यानों में इंद्र की सवारी हाथी, बादलों
का प्रतीक है. पौराणिक आख्यानों में दिये गये इंद्र के मानवीय व्यक्तित्व पर गौर करें
तो हम पाते हैं, कि उसका शस्त्र, वज्र, मानवीय
कंकाल में सबसे मजबूत हड्डियों से मिलकर बना था. अर्थात्, बादलों
में चमकने वाला इंद्र का वज्र के बरअक्स हम उस पूर्वज योद्धा की कल्पना कर सकते हैं
जो मजबूत हड्डियों से बने हथियारों का प्रयोग करता था. सांस्कृतिक विकासवाद के रास्ते
हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि निश्चय ही इंद्र देवता के व्यक्तित्व में हमारे उस
पूर्वज का योगदान है जो अपने जमाने में हड्डियों से बने अस्त्र-शस्त्र से बड़े कारनामों
को अंजाम देता था. इससे हम पाते हैं कि इंद्र जैसे देवता के व्यक्तित्व में हमारे पूर्वज
की कहानी छुपी हुई है.
एक दूसरा उदाहरण हम रुद्र का
लेते हैं. ऋग्वेद में रुद्र एक गौण देवता के रूप में उपस्थित हैं. युद्धप्रिय समाज
में विनाश से जुड़े नकारात्मक प्रवृत्तियों से सम्बंधित रुद्र में लोगों की रुचि कम
रही होगी. ऋग्वेदिक युग के बाद जब हम रुद्र-पाशुपत मत की स्थापना और प्रचार काल में
पहुँचते हैं, तो विभिन्न पौराणिक आख्यानों में रुद्र और उसके व्यक्तित्व
से जुड़े अन्य चरित्रों के युद्ध में संलग्न होने से जुड़ी कहानियाँ पाते हैं. सबसे पुरानी
कहाँइयों में भी रुद्र धनुषधारी के रूप में वर्णित हैं. युद्ध के सांस्कृतिक विकास
क्रम में धनुष का आविष्कार वज्र से बहुत बाद का माना जायेगा. रुद्र का योद्धा रूप धनुष
के साथ प्रकट होना इस बात का परिचायक है,
कि पूर्वज के रूप में रुद्र,
इंद्र से काफी बाद की घटना हैं. और इस बात को सिद्ध करने के लिये और भी अनेकों साक्ष्य हमारे पास उपलब्ध हैं.
इस प्रकार हम देखते हैं, कि
हर देवता अतीत में कहीं न कही हमारा पूर्वज था. और उन पूर्वजों की प्राचीनता को हम
उसके बारे में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जान सकते हैं.
Friday, June 1, 2018
आभीर
आभीर
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आज उत्तर भारत में जो जाति समूह अपने नाम के पीछे 'यादव' शब्द धारण करते हैं, उनकी उत्पत्ति दो प्राचीन जाति समूहों से जुड़ा हुआ है. ये जाति समूह है, ग्वाला और अहिर. इन दोनों जातियों का जिक्र महाभारत ग्रंथ में मिलता है. यमुना से पूरब गोपालकों का क्षेत्र था. इन गोपालकों के यहाँ ही कृष्ण के बचपन गुजरने का पूरा आख्यान कृष्ण-लीला का विषय है. अहिर, या आभीरों का जिक्र महाभारत के मूसल पर्व में आया है. द्वारका क्षेत्र में, यादवों का गृहयुद्ध, और वंश विनाश के बाद अर्जुन बचे-खुचे यादव बच्चों एवं स्त्रियों को लेकर पंजाब के रास्ते हस्तिनापुर लौट रहे थे, कि रास्ते में लट्ठधारी आभीर लुटेरों नें यादव स्त्रियों को लूट लिया. अर्जुन, अपनी वृद्धावस्था के कारण आभीरों का प्रतिकार नहीं कर पाये. बचे हुए यादव बालकों को लेकर वो हस्तिनापुर पहुँच पाये.- (महाभारत, मूसल पर्व, अध्याय-8, श्लोक-45, श्लोक-61; अध्याय-9, श्लोक-16)उपरोक्त घटना के अलावा महाभारत में आभीरों का निम्नांकित स्थानों पर उल्लेख मिलता है,- महाभारत 2:32:10- शूद्र और आभीर कबीलों को पाण्डुपुत्र नकुल ने जीता.- महाभारत 2:51:12- निचले सिंधु के पश्चिम तट निवासी के रूप में आभीर का उल्लेख.- महाभारत 3:188:36- छल से शासन करने वाले आभीर, पुलिंद, आंध्र, शक, यवन, कंबोज, तथा बाह्लिक राज्यों का उल्लेख है.- महाभारत 6:09:47, 67 में भारत के जनपदों के वर्णन में आभीर जनपद का भी नामोल्लेख किया गया है।- महाभारत 7:20:06- द्रोण द्वारा गरुड़ व्यूह में शक और यवनों के साथ आभीर शूरवीर भी शामिल हुए थे।- महाभारत 14:29:16 में उल्लेख है कि जो क्षत्रिय परशुराम के भय से दूरदराज के इलाकों में भाग गए, वो द्रविड़, आभीर, पुंड्र, शबर जैसे कबीलों के संसर्ग में शूद्र की अवस्था में पहुंच गए।- महाभारत शल्यपर्व 37:01 में सरस्वती के तट पर बसे शूद्र और आभीरों के प्रति द्वेश के कारण सरस्वती नदी के सूख जाने का उल्लेख है.- मत्स्यपुराण 50:76 में क्षत्रिय, पारशव, शूद्र, बहिश्चर, अंध, शक, पुलिंद, चूलिक, यवन, कैवर्त, आभीर, और शबर राजाओं का उल्लेख है.- मत्स्यपुराण 114:40- आभीरों का उल्लेख मिलता है. ये उत्तर भारत में निवास करते हुए बताये गये हैं.महाभारत और मत्स्यपुराण जैसे स्रोतों में आभीरों का जिन अन्य लोगों के साथ उल्लेख है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि ईसा सन के आस पास आभीर कबीले सिंध और पंजाब के इलाकों में बसे हुए थे. दूसरी-तीसरी शताब्दी में एक आभीर राजवंश का जिक्र भी आता है. वायुपुराण 99:,, में कच्छ और सिंध के इलाके में सात आभीरवंशी राजाओं का उल्लेख है. उस इलाके लोगों को म्लेच्छ कहा गया है. और बाद में ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसे कबीलों को शूद्र कहे जाने के पीछे कारण गांगेय क्षेत्र के लोगों द्वारा पश्चिम और उत्तर पश्चिम के लोगों के प्रति पुर्वग्रह ही रहा होगा. महाभारत (कर्णपर्व) में कर्ण द्वारा पंजाब और उत्तर पश्चिम के लोगों को निम्न माने जाने का वर्णन है. लोगों के यज्ञ-कर्मकांडों के नहीं मानने की बात की गयी है. वास्तव में यज्ञ-संस्कृति काल के बाद भी पश्चिम और उत्तर से नये कबीलों का समय समय पर भारतीय उपमहाद्वीप में आगमन होता ही रहा. नये लोगों के रीति-रिवाजों को गांगेय क्षेत्र के लोग घृणा की दृष्टि से देखने लगे थे.इसवी सन के आरम्भिक समय में वो इलाके धार्मिक दृष्टि से गैर-ब्राह्मण सम्प्रदायों से जुड़े थे. ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार उत्तर पश्चिम से आये शक्तिशाली लड़ाकू कबीलों को ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ संस्कार के माध्यम से यज्ञ-संस्कृति परम्परा में क्षत्रिय के तौर पर स्वीकार किया जाता रहा. सम्भावना यह है कि आभीर सरदारों को राजपूत नामवाले शासकों के नये वर्ग में शामिल कर लिया गया, कबीले के बाकी लोग कृषि और पशुपालन से जुड़े रहे.मूसलपर्व में आभीरों को बार-बार लुटेरा और म्लेच्छ कहा गया है. (महाभारत, मूसल पर्व, अध्याय-8, श्लोक-45, श्लोक-61; अध्याय-9, श्लोक-16) इस परिप्रेक्ष्य में हमें याद रखना चाहिये, कि भारत भूमि पर पश्चिम से आक्रामक लड़ाकू जातियों एवं पशुचारी कबीलों का लगातार आगमन होता रहा है. महाभारत के बाद भी लिखे गये ग्रंथों में पश्चिम से आने वालों को म्लेच्छ और लुटेरा कहा गया है. इनमें पारसी, ग्रीक, कुषाण, शक, हूण आदि का जिक्र प्रमुख है. आभीर भी आर्यों के बाद भारत में आनेवाली एक प्रमुख जाति रही है. महाभारत के हजार से भी अधिक वर्षों बाद, दूसरी तीसरी शताब्दी ईसवी में महाराष्ट्र क्षेत्र में कतिपय आभीर राजवंश का जिक्र आता है. इससे स्पष्ट होता है, कि कालांतर में आभीरों के बीच से कुछ वंश, आक्राता, लुटेरा, और म्लेच्छ जैसी सामाजिक स्थित से उन्नत होकर सम्मानजनक पद पाने में सफल रहे. स्वाभाविक तौर पर इनमें से कुछ वंश छठी सातवीं शताब्दी तक शासक वंश की हैसियत प्राप्त कर राजपूत वर्ग का हिस्सा बन गये. लेकिन, आभीरों का बहुसंख्य, धीरे धीरे, कृषि और पशुपालन में संलग्न हो गया. इसी दौरान, महाभारत उल्लिखित गोपालकों के क्रिया-कलाप से समानता के कारण कृषक-पशुपालक आभीरों का अवशोषण एक जाति के रूप में हो गया.भागवतपुराण 10:24:24, और विष्णुपुराण 5:10:26 में नंद के समाज को वनचर बताया गया है. अर्थात्, महाभारत लिखे जाने तक ग्वाले घुमक्कर स्थित में ही थे. महाभारत का पहला संस्करण लिखे जाने के समय तक पंजाब से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश सामाजिक और आर्थिक आधार कृषि के साथ पशुपालन था. इसमें पशुपालन के दो रूप नजर आते हैं. एक जो स्थायी निवासस्थानों के आस पास के चारागाहों पर आधारित था. दूसरा, घुमक्कर पशुचारियों द्वारा पशुपालन. कई ग्रंथों में कृष्ण का बचपन जिन लोगों के बीच बीतने की बात कही गयी है, वो वनवासी घुमक्कर पशुचारक थे. इस बात की पुष्टि पौराणिक ग्रंथों से होती है. वैसे महाभारत में ग्वालों को पैदल सैनिक की तरह कौरव पक्ष से लड़ते हुए दिखाया गया है. स्वाभाविक तौर पर पशुचारी कबीलों से जुड़े हुए लोग वीर लड़ाकू होते हैं. मध्यकाल में भी कृषि और पशुचारी कार्यों में लगे लोग युद्ध के समय स्थायी सम्भ्रांत सैनिकों के साथ पैदल टुकड़ियों के रूप में इसमें भाग लेते थे. ऐसे कितने ही लड़ाकू कबीलों को हम मुगलों के बाद तक भाड़े के सैनिकों के तौर पर विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के प्रति अपनी सेवायें देते हुए पाते हैं. प्राचीन काल से लेकर पिछली शताब्दियों तक ऐसे लड़ाकू कबीलों ( जातियों ) को हम सामाजिक स्तर पर सम्मानजनक स्थिति पाते हुए देखते हैं. ऐसे लोगों का कबीलों से जाति-उपजाति में परिवर्तन सामाजिक गतिशीलता के कारण ही सम्भव था.ब्रज के गोपालक और पंजाब के आभीरों के पशुपालन में एक बहुत बड़ा अंतर यह दिखता है, कि सम्भवतः, सिंध पंजाब क्षेत्र के आभीर भैंस-पालन में अग्रणी थे. आज के अहिर-ग्वाला जाति के लोगों का अधिकांश भैंसपालन में ही पाया जाता है. इसका मतलब है, कि आभीर, संख्या में ग्वालों से अधिक रहे होंगे.‘---The Abhiras lived in scattered settlements in various parts of western and centra India as far as the deccan. Most of these tribes claimed descent from tge ancient lineage of the Puranas, and some of them were later connected with the rise of Rajput dynasties.----’ - britannica.com ( article 'Ashoka and his Successors')
Sunday, May 20, 2018
ऊँच नीच और सामाजिक जिम्मेदारी
इन बातों को लेकर रुढिग्रस्तता की दिशा में समाज आगे बढा तो इसकी जिम्मेदारी ब्राह्मणों पर नहीं थोपी जा सकती. एक अंत्यज का गाँव में प्रवेश सिर्फ ब्राह्मण की शुचिता के लिये खतरा नहीं समझा जाता था. बल्कि, इस मायने में अन्य जातियों का व्यवहार भी अंत्यजों के प्रति यथेष्ट कठोर था. आज अगर दूसरी जातियों के लोग यह कह कर पल्ला झाड़ लें, कि ऐसा तो उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा संकलित धर्मशास्त्रों के पालन के लिये किया था, और कि इसकी जिम्मेदारी ब्राहमणों पर जाती है, तो यह महज अपनी जिम्मेदारी से भागना है. जिम्मेदारी से भागने वाले समाज की हालत क्या होती है, हम उसका एक उदाहरण हैं !
अपने युग के सामाजिक दृष्टिकोणों पुर्वग्रहों, धारणाओं को ब्राहमणों ने धर्मशास्त्रों में समाहित किया. समाहित करने का यह अर्थ कदापि नहीं लिया जा सकता, कि ब्राह्मणों ने उन प्रावधानों के पीछे समाज की सामुहिक सोच को उत्पन्न किया. ब्राह्मण भी समाज का हिस्सा था. समाज की सामुहिक चेतना, पुर्वग्रह, खामी, खूबी से ब्राह्मण भी वैसे ही जुड़ा था, जैसा किसी अन्य जाति के लोग. जातिप्रथा के बारे में एक अवैज्ञानिक दुस्प्रचार (राजनीति से प्रेरित) यह पाया जाता है, कि जाति की व्यवस्था धर्मशास्त्रों के कारण अस्तित्व में आया. सच इससे उलट है. जातिप्रथा का जन्म सामाजिक धारणाओं एवं पुर्वग्रहों से उपजा, जिसे धर्मशास्त्रों में संकलित और समाहित किया गया. हाँ, यह सही है, कि उस जमाने की धारणाओं पुर्वग्रहों को धर्मशास्त्र में प्रावधानों के रूप में शामिल करने वालों (ब्राह्मणों) ने अपने फायदे का विशेष खयाल रखा. ऐसा करने के लिये, अतीत के उदाहरणों, परम्पराओं के उद्धरणों को तोड़ मड़ोर कर प्रस्तुत किया.
लेकिन, ऐसा सिर्फ भारत में हुआ है, या प्राचीन काल तक ही सीमित रहा है, ऐसा सोचना इस देश के बौद्धिक पिछड़ेपन के कारण है. इस देश के लोगों ने दूसरे समाज, देश, परम्परा के अध्ययन की बात तो दूर, अपनी परम्परा को भी जानने में रुचि नहीं दिखाई है. आधुनिक काल में प्राचीन का लगभग सारा अध्ययन पश्चिमी अध्येताओं ने किया है. ऐसे में हम दुनिया के अन्य समाज की वास्तविकताओं को नही जान पाये हैं. सत्ता से जुड़े वर्गों ने हमेशा अपने लिये विशेषाधिकारों का प्रावधान रखा और उसका उपभोग किया.
भारत का बौद्धिक पिछड़ापन आज भी उतना ही गहरा है, जितना पहले कभी रहा था. जो लोग भारतीय समाज के पिछड़ेपन के लिये तथाकथित उच्च जातियों को दोष देते हैं, वो आज भी पिछड़ेपन से बाहर निकलने का सार्थक प्रयास नहीं कर रहे. पिछड़ेपन से निकलने के उपायों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाता है, कि ये उपाय अपने आप में पिछड़ेपन को और अधिक बढावा देने वाला है. तथाकथित उच्च जातियों में बौद्धिक और आर्थिक पिछड़ेपन का स्तर तथाकथित पिछड़ी जातियों से कम नहीं है. और ये दोनों प्रकार के पिछड़ेपन इस देश की उन्नति में सबसे बड़े बाधक है. वैश्विकृत दुनिया में पिछड़ेपन के माणदंड बिल्कुल अलग हैं. सामाजिक स्तर पर उस माणदंड को ध्यान में रखे बगैर देश के पिछड़ेपन से निबटना मुश्किल होगा.
Saturday, April 21, 2018
चार वर्ण
ऋग्वेद के दशम मण्डल के पुरुषसूक्त के ‘पुरुष’ के शरीर के विभिन्न अंग यथा मुख, हाथ, पाँव, जंघा, और पाँव से चार वर्णों की उत्पत्ति की व्याख्या समाज में कार्य विभाजन को लेकर शायद दुनिया में पहली अभिव्यक्ति है. बोलने, अर्थात यज्ञ में वेदोच्चार का काम करने वाला ब्राह्मण, उस यज्ञ में हवि करने और उसकी रक्षा करने वाला राजन्य, यज्ञ के लिये हर प्रकार के उत्पादन का दायित्व निभाने वाला वैश्य, और इस कार्य में हर प्रकार की सेवा कर्म को निभाने वाला शुद्र था. सभी जानते हैं, कि ऋग्वेद कालीन समाज यज्ञ के इर्द-गीर्द घूमता था. यज्ञ में आर्य समाज के लोगों की भूमिकाओं को अगर हम चार हिस्सों में बाँटे, तो कर्म के आधार पर क्या, वेदोच्चार पाँव से, हवन मुख से, और ऐसे ही अन्य कामों को कहीं और से सम्पन्न किया जा सकता है? इत्तेफाक है, कि शरीर में ध्वनि बोलने वाला यंत्र ऊपर स्थित है, और चलने वाला नीचे. और सबका कुछ न कुछ नाम तो होना ही था. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह, कि जब सामाजिक व्यवस्था में चार वर्णों की संकल्पना उभरी तब यह निहायत की कर्म आधारित था. इस तथ्य को सिद्ध करने के लिये प्राचीन ग्रंथों के विश्लेषण से पर्याप्त सबूत उपलब्ध हैं. कालांतर में यह जाति आधारित कैसे हो गया, इसे समझना एक अलग विषय है. वर्ण की इस प्रकार की व्याख्या से परेशानी हमारी आज का हमारा पुर्वाग्रह है. पुर्वाग्रह, इस तथ्य को लेकर कि सिर सबसे ऊपर स्थित है, और पाँव सबसे नीचे. और ऊपर-नीचे के चक्कर को हम व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का प्रयास नहीं कर रहे. मानव समाज का वर्गों में विभाजन सांस्कृतिक तौर पर एक प्राकृतिक घटना है.
जिन लोगों को यह भ्रम है, कि ब्राह्मण वर्ण की संकल्पना समाज के बौद्धिक नेतृत्व के रूप में हुआ, तो सम्भवतः ऐसा मानने का कोई ठोस सबूत उपलब्ध नहीं है. उस समय बौद्धिक काम से तात्पर्य अगर ऋचाओं की रचना से है तो हमे याद रखना चाहिये, कि ऋषि हर वर्ण से थे. हमें इसका अहसास नहीं होता कि उस वक्त लोगों को यही विश्वास था, कि आध्यात्मिक भावों के उभरने का स्थल हृदय है. मस्तिष्क के प्रति मनुष्य की जागरुकता बाद की बात है. तभी तो लोग वेदों को हृदयंगम करते थे. और हृदय-स्थल, मुख से काफी नीचे स्थित होता है! सांस्कृतिक तौर पर हृदय के महत्व को सिर्फ इस बात से ही समझा जा सकता है, कि आज भी हम अपने सबसे प्रिय व्यक्ति या वस्तु से जुड़ी भावना को हृदय में ही रखते हैं. कर्मकाण्डों से भरा हुआ आर्यों का सामाजिक जीवन ध्यान-योग आधारित बाद के ब्राहमणवादी धर्म से बहुत अलग था, जब मस्तिष्क और उससे जुड़ी अवधारणाओं की खोज हुई. और इन्हीं खोजों के बाद ब्राह्मण वर्ण के लोगों ने समाज की जाति आधारित वर्ण-विभाजन पर बल देना शुरु किया. ऋग्वेद के समय के कुछ समय(सैकड़ों वर्षों) के बाद सामाजिक संरचना में ब्राह्मण बौद्धिक नेतृत्व करने वाले ‘जाति आधारित’ वर्ग के रूप में स्थापित हुए. निष्कर्ण यह कि समाज में ब्राहमणों की बौद्धिक सर्वोच्चता की स्थापना एक सामाजिक प्रक्रिया से उपजी, जिसने वर्णव्यस्था को जाति-व्यवस्था में बदल डाला.
