Sunday, November 18, 2018

जमाल खशोग्जी का अंतिम संस्कार

सऊदी अरब इस्लामी कट्टरपन का सबसे मजबूत किला है. पाकिस्तान तो उस कट्टरपन का बौद्धिक संस्करण है. और पाकिस्तान का नाम लेने से हमें उन करोड़ों कट्टर मुसलमानों को भी याद रखना चाहिये, जो भारत भूमि में रहने की बावजूद सऊदी अरब को एक आदर्श इस्लामी राज्य मानते हैं. सऊदी अरब वहाबी-सलाफी इस्लामी विचारधारा को बढावा देता है. सऊदी की जमीन से ही ओसामा बिन लादेन निकलकर दुनिया में कायदा की स्थापना का सशस्त्र स्वप्न देखता था. 
इस्लाम में अल्लाह, पैगम्बर, और आखिरत में विश्वास मुसलमानों की आस्था का आधार माना जाता है. यही कारण है, कि हर आस्थावान का अंतिम संस्कार विशेष महत्व रखता है. अमेरिका ने जब ओसामा बिन लादेन का शिकार किया, तो दुनिया भर के कट्टर मुसलमानों ने उसके अंतिम संस्कार को लेकर अपनी आस्थागत भावना व्यक्त की थी. कारण, कि उस आतंकी को इस्लामी अंतिम संस्कार का सम्मान प्राप्त नहीं हुआ था. अभी अभी सऊदी मूल के एक ख्याति-प्राप्त पत्रकार जमाल ख्शोग्जी के अद्भुत तरीके से हत्या, और उसके पार्थिव शरीर के साथ घोर अमानवीय संस्कार की खबर माध्यमों में छाया हुआ है. पूरी दुनिया, जो सभ्य होने के तमाम दावों से सुसज्जित है, सऊदी अरब के इस घोर कृत्य से स्तब्ध है. खशोग्जी को दुर्दांत अपराधी नहीं था. वह सऊदी अरब की राजनीतिक व्यवस्था का आलोचक था. अपने देश में लोकतांत्रिक अधिकारों का पैरोकार था. उस खशोग्जी की हत्या का, जैसा की गहन संदेह है, राज्य द्वारा शड्यंत्र, और दूसरे देश में स्थित अपने कंसलेट के भीतर बर्बरता से हत्या को अंजाम दिया गया, वह एक अलग मुद्दा है. हम दुनिया भर के कट्टर मुसलमानों की दृष्टि में खशोग्जी के पार्थिव शरीर के साथ किये गये व्यवहार से जुड़ी प्रतिक्रिया पर गौर करना चाहते है. कहीं से किसी इस्लामी विद्वान ने, संस्था ने, संगठन ने एक मुसलमान के पार्थिव शरीर के प्रति किये गये सऊदी व्यवहार पर कुछ नहीं कहा है. ओसमा बिन लादेन, या भारत में मारे गये आतंकियों के पाथिव शरीर के साथ किये जाने वाले व्यवहार पर धर्मयुद्ध छेड़ेने की धमकी देने वाले भारतीय कट्टरपंथियों की जुबान भी तालू में सटे प्रतीत होते हैं. 
क्या, सऊदी अरब धार्मिक सांस्कृतिक तौर पर इतना बदल चुका है, कि अपने ही मजहब के मूलभूत अवधारणाओं, पुर्वग्रहों को गैर महत्वपूर्ण मानने लगा है ? अगर ऐसा है, तो दुनिया भर के गैर मुस्लिमों को खुश होना चाहिये ! किस मुँह से दुनिया भर के कट्टरपंथी सऊदी अरब की सांस्कृतिक माहौल को आदर्श इस्लामी होने की घोषणा करते हैं ? क्या भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों को बदल रही दुनयावी वास्तविकता का आभास नहीं है? 
नकारात्मक घटनाओं से हमें अधिक सशक्त सीख प्राप्त होते हैं, बशर्ते, हम नकारात्मकता में निहित बदलाव को महसूस कर सकें

Friday, July 6, 2018

देवता, हमारे पूर्वज

अलौकिक सर्वशक्तिमान के प्रति हमारे मानस में कौन सा भाव उत्पन्न होता है? सबसे पहला, भय का. और दूसरा प्रेम-सम्मान-श्रद्धा-स्नेह जैसे भावों का सम्मिलित प्रभाव, जिससे भक्ति और दासत्व भाव उपजता है. इन दो प्रकार के भावों, नकारात्मक और सकारात्मक, की उत्पत्ति हमारे परिवेष में पिता को लेकर उपजता है. पिता से भय भी उतना लगता है, जितना हम उसपर निर्भर होते हैं. और भय और निर्भरता के भावों के साथ प्रेम-सम्मान-श्रद्धा-स्नेह का सम्मिश्रित रूप हमारे मन में छाया रहता है. पिता के पिता, उनके पिता, एवम् प्रकार हम जैसे जैसे इस शृंखला में पीछे जाते हैं श्रद्धा और उससे उपजी गरिमापूर्ण आभामंडल का विस्तार का भाव बढता जाता है. इस भाव का ही विस्तारित रूप हमारे भीतर अलौकिक भाव में लिपटी हुई चेतना को जन्म देता है. आज हम जिन अलौकिक चरित्रों को हमारे अतीत में देवताओं के रूप में देखते हैं, वो हमारे पूर्वजों के अलावा और कुछ नहीं हो सकते. अलौकिक के बारे में हमारी कल्पना में जो एक तत्व रहस्य का है, वह प्राकृतिक घटनाओं से उत्पन्न है. उस रहस्य को अगर हम अपने पूर्वजों के आभामण्डित व्यक्तित्व से जोड़ दें, तो वही हमारे ईश्वर का व्यक्तित्व कहलायेगा.
अतीत में इंद्र, वरुण, अग्नि, विष्णु, रुद्र जैसे वैदिक देवताओं के बारे में हम सुनते हैं. इनमें से सबसे पुराने कौन होंगे, इसपर विचार करना चाहिये. सांस्कृतिक विकासवाद में विश्वास करने वालों के लिये यह समझना आसान है, कि आदिम मानव के लिए अग्नि, अंधकार, काले मेघ, वज्रपात, आंधी, बाढ जैसी प्राकृतिक घटनाएँ भय और रहस्य दोनों के जनक रहे. इन घटनाओं से उपजे भय ने इनके पीछे के रहस्य को सबसे पुराने अलौकिक शक्तियों के रूप में स्थापित किया होगा. लेकिन उन अलौकिक शक्तियों के व्यक्तित्व का निर्माण करने में आदि मानवों के पूर्वजों के बारे में श्रद्धा विकास का महत्वपूर्ण योगदान रहा होगा. अलौकिक शक्तियों को देवताओं के रूप में समझने की बात तब शुरु हुई होगी जब अलौकिक शक्तियों के प्रति जनित श्रद्धा का सामंजस्य पितृ के प्रति उपजी श्रद्धा के साथ हुआ होगा. पितृ के प्रति श्रद्धा की उत्पत्ति को मानवीय चेतना के विकास क्रम में वह स्थान माना जा सकता है, जब मनुष्य ने पहली बार अलौकिक शक्तियों को उस रूप में देखना शुरू किया, जिस रूप में आगे चलकर उसकी आराधना पूजा वगैरह किया जाने लगा. हमारे सबसे पुराने धार्मिक साहित्यिक दस्तावेज ऋग्वेद में जो देवता वर्णित हैं, उनके व्यक्तित्व के बारे में हम जानते हैं. वह व्यक्तिव मानवीय रूप गुण स्वभाव में परिभाषित हैं. यहीं किसी भी अन्य धार्मिक परम्परा विकास में पाया जाता है.
प्राचीन ग्रंथों में देवताओं के व्यक्तित्व रूप गुण व्यवहार आदि से हम उनके प्राचीनता का अनुमान लगा सकते हैं. इससे हमे यह पता चल जाता है, कि मानवीय सांस्कृतिक विकास क्रम में विभिन्न देवताओं की उत्पत्ति क्रम क्या रहा है. देवताओं के रूप गुण व्यवहार से उन्हें पूजने वालों की सांस्कृतिक स्थिति का आभास मिल जता है. मसलन, इंद्र ऋग्वेदिक लोगों के सबसे आभामण्डित विश्वसनीय देवता माने गये हैं. और इंद्र, युद्ध के विशेषज्ञ देवता हैं. इससे ऋग्वेदिक लोगों की युद्धप्रियता का सीधा निष्कर्ष निकलता है. अन्य स्रोतों से भी इसी बात की पुष्टि होती है. वज्र इंद्र का शस्त्र है, तो वर्षा पर उसके नियंत्रण की बात सामने आती है. बाद के पौराणिक आख्यानों में इंद्र की सवारी हाथी, बादलों का प्रतीक है. पौराणिक आख्यानों में दिये गये इंद्र के मानवीय व्यक्तित्व पर गौर करें तो हम पाते हैं, कि उसका शस्त्र, वज्र, मानवीय कंकाल में सबसे मजबूत हड्डियों से मिलकर बना था. अर्थात्, बादलों में चमकने वाला इंद्र का वज्र के बरअक्स हम उस पूर्वज योद्धा की कल्पना कर सकते हैं जो मजबूत हड्डियों से बने हथियारों का प्रयोग करता था. सांस्कृतिक विकासवाद के रास्ते हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि निश्चय ही इंद्र देवता के व्यक्तित्व में हमारे उस पूर्वज का योगदान है जो अपने जमाने में हड्डियों से बने अस्त्र-शस्त्र से बड़े कारनामों को अंजाम देता था. इससे हम पाते हैं कि इंद्र जैसे देवता के व्यक्तित्व में हमारे पूर्वज की कहानी छुपी हुई है.
एक दूसरा उदाहरण हम रुद्र का लेते हैं. ऋग्वेद में रुद्र एक गौण देवता के रूप में उपस्थित हैं. युद्धप्रिय समाज में विनाश से जुड़े नकारात्मक प्रवृत्तियों से सम्बंधित रुद्र में लोगों की रुचि कम रही होगी. ऋग्वेदिक युग के बाद जब हम रुद्र-पाशुपत मत की स्थापना और प्रचार काल में पहुँचते हैं, तो विभिन्न पौराणिक आख्यानों में रुद्र और उसके व्यक्तित्व से जुड़े अन्य चरित्रों के युद्ध में संलग्न होने से जुड़ी कहानियाँ पाते हैं. सबसे पुरानी कहाँइयों में भी रुद्र धनुषधारी के रूप में वर्णित हैं. युद्ध के सांस्कृतिक विकास क्रम में धनुष का आविष्कार वज्र से बहुत बाद का माना जायेगा. रुद्र का योद्धा रूप धनुष के साथ प्रकट होना इस बात का परिचायक है, कि पूर्वज के रूप में रुद्र, इंद्र से काफी बाद की घटना हैं. और इस बात को सिद्ध करने के लिये और  भी अनेकों साक्ष्य हमारे पास उपलब्ध हैं.
इस प्रकार हम देखते हैं, कि हर देवता अतीत में कहीं न कही हमारा पूर्वज था. और उन पूर्वजों की प्राचीनता को हम उसके बारे में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जान सकते हैं.

                       

Friday, June 1, 2018

आभीर

आभीर

-------------------- 

आज उत्तर भारत में जो जाति समूह अपने नाम के पीछे 'यादव' शब्द धारण करते हैं, उनकी उत्पत्ति दो प्राचीन जाति समूहों से जुड़ा हुआ है. ये जाति समूह है, ग्वाला और अहिर. इन दोनों जातियों का जिक्र महाभारत ग्रंथ में मिलता है. यमुना से पूरब गोपालकों का क्षेत्र था. इन गोपालकों के यहाँ ही कृष्ण के बचपन गुजरने का पूरा आख्यान कृष्ण-लीला का विषय है. अहिर, या आभीरों का जिक्र महाभारत के मूसल पर्व में आया है. द्वारका क्षेत्र में, यादवों का गृहयुद्ध, और वंश विनाश के बाद अर्जुन बचे-खुचे यादव बच्चों एवं स्त्रियों को लेकर पंजाब के रास्ते हस्तिनापुर लौट रहे थे, कि रास्ते में लट्ठधारी आभीर लुटेरों नें यादव स्त्रियों को लूट लिया. अर्जुन, अपनी वृद्धावस्था के कारण आभीरों का प्रतिकार नहीं कर पाये. बचे हुए यादव बालकों को लेकर वो हस्तिनापुर पहुँच पाये.

- (महाभारत, मूसल पर्व, अध्याय-8, श्लोक-45, श्लोक-61; अध्याय-9, श्लोक-16)

उपरोक्त घटना के अलावा महाभारत में आभीरों का निम्नांकित स्थानों पर उल्लेख मिलता है,

- महाभारत 2:32:10- शूद्र और आभीर कबीलों को पाण्डुपुत्र नकुल ने जीता. 

- महाभारत 2:51:12- निचले सिंधु के पश्चिम तट निवासी के रूप में आभीर का उल्लेख.

- महाभारत 3:188:36- छल से शासन करने वाले आभीर, पुलिंद, आंध्र, शक, यवन, कंबोज, तथा बाह्लिक राज्यों का उल्लेख है.  

- महाभारत 6:09:47, 67 में भारत के जनपदों के वर्णन में आभीर जनपद का भी नामोल्लेख किया गया है।  

- महाभारत 7:20:06- द्रोण द्वारा गरुड़ व्यूह में शक और यवनों के साथ आभीर शूरवीर भी शामिल हुए थे। 

- महाभारत 14:29:16 में उल्लेख है कि जो क्षत्रिय परशुराम के भय से दूरदराज के इलाकों में भाग गए, वो द्रविड़, आभीर, पुंड्र, शबर जैसे कबीलों के संसर्ग में शूद्र की अवस्था में पहुंच गए। 

- महाभारत शल्यपर्व 37:01 में सरस्वती के तट पर बसे शूद्र और आभीरों के प्रति द्वेश के कारण सरस्वती नदी के सूख जाने का उल्लेख है.

- मत्स्यपुराण 50:76 में क्षत्रिय, पारशव, शूद्र, बहिश्चर, अंध, शक, पुलिंद, चूलिक, यवन, कैवर्त, आभीर, और शबर राजाओं का उल्लेख है.  

- मत्स्यपुराण 114:40- आभीरों का उल्लेख मिलता है. ये उत्तर भारत में निवास करते हुए बताये गये हैं.

महाभारत और मत्स्यपुराण जैसे स्रोतों में आभीरों का जिन अन्य लोगों के साथ उल्लेख है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि ईसा सन के आस पास आभीर कबीले सिंध और पंजाब के इलाकों में बसे हुए थे. दूसरी-तीसरी शताब्दी में एक आभीर राजवंश का जिक्र भी आता है. वायुपुराण 99:,, में कच्छ और सिंध के इलाके में सात आभीरवंशी राजाओं का उल्लेख है. उस इलाके लोगों को म्लेच्छ कहा गया है. और बाद में ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसे कबीलों को शूद्र कहे जाने के पीछे कारण गांगेय क्षेत्र के लोगों द्वारा पश्चिम और उत्तर पश्चिम के लोगों के प्रति पुर्वग्रह ही रहा होगा. महाभारत (कर्णपर्व) में कर्ण द्वारा पंजाब और उत्तर पश्चिम के लोगों को निम्न माने जाने का वर्णन है. लोगों के यज्ञ-कर्मकांडों के नहीं मानने की बात की गयी है. वास्तव में यज्ञ-संस्कृति काल के बाद भी पश्चिम और उत्तर से नये कबीलों का समय समय पर भारतीय उपमहाद्वीप में आगमन होता ही रहा. नये लोगों के रीति-रिवाजों को गांगेय क्षेत्र के लोग घृणा की दृष्टि से देखने लगे थे.

इसवी सन के आरम्भिक समय में वो इलाके धार्मिक दृष्टि से गैर-ब्राह्मण सम्प्रदायों से जुड़े थे. ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार उत्तर पश्चिम से आये शक्तिशाली लड़ाकू कबीलों को ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ संस्कार के माध्यम से यज्ञ-संस्कृति परम्परा में क्षत्रिय के तौर पर स्वीकार किया जाता रहा. सम्भावना यह है कि आभीर सरदारों को राजपूत नामवाले शासकों के नये वर्ग में शामिल कर लिया गया, कबीले के बाकी लोग कृषि और पशुपालन से जुड़े रहे.      

मूसलपर्व में आभीरों को बार-बार लुटेरा और म्लेच्छ कहा गया है. (महाभारत, मूसल पर्व, अध्याय-8, श्लोक-45, श्लोक-61; अध्याय-9, श्लोक-16) इस परिप्रेक्ष्य में हमें याद रखना चाहिये, कि भारत भूमि पर पश्चिम से आक्रामक लड़ाकू जातियों एवं पशुचारी कबीलों का लगातार आगमन होता रहा है. महाभारत के बाद भी लिखे गये ग्रंथों में पश्चिम से आने वालों को म्लेच्छ और लुटेरा कहा गया है. इनमें पारसी, ग्रीक, कुषाण, शक, हूण आदि का जिक्र प्रमुख है. आभीर भी आर्यों के बाद भारत में आनेवाली एक प्रमुख जाति रही है. महाभारत के हजार से भी अधिक वर्षों बाद, दूसरी तीसरी शताब्दी ईसवी में महाराष्ट्र क्षेत्र में कतिपय आभीर राजवंश का जिक्र आता है. इससे स्पष्ट होता है, कि कालांतर में आभीरों के बीच से कुछ वंश, आक्राता, लुटेरा, और म्लेच्छ जैसी सामाजिक स्थित से उन्नत होकर सम्मानजनक पद पाने में सफल रहे. स्वाभाविक तौर पर इनमें से कुछ वंश छठी सातवीं शताब्दी तक शासक वंश की हैसियत प्राप्त कर राजपूत वर्ग का हिस्सा बन गये. लेकिन, आभीरों का बहुसंख्य, धीरे धीरे, कृषि और पशुपालन में संलग्न हो गया. इसी दौरान, महाभारत उल्लिखित गोपालकों के क्रिया-कलाप से समानता के कारण कृषक-पशुपालक आभीरों का अवशोषण एक जाति के रूप में हो गया.

भागवतपुराण 10:24:24, और विष्णुपुराण 5:10:26 में नंद के समाज को वनचर बताया गया है. अर्थात्, महाभारत लिखे जाने तक ग्वाले घुमक्कर स्थित में ही थे. महाभारत का पहला संस्करण लिखे जाने के समय तक पंजाब से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश सामाजिक और आर्थिक आधार कृषि के साथ पशुपालन था. इसमें पशुपालन के दो रूप नजर आते हैं. एक जो स्थायी निवासस्थानों के आस पास के चारागाहों पर आधारित था. दूसरा, घुमक्कर पशुचारियों द्वारा पशुपालन. कई ग्रंथों में कृष्ण का बचपन जिन लोगों के बीच बीतने की बात कही गयी है, वो वनवासी घुमक्कर पशुचारक थे. इस बात की पुष्टि पौराणिक ग्रंथों से होती है. वैसे महाभारत में ग्वालों को पैदल सैनिक की तरह कौरव पक्ष से लड़ते हुए दिखाया गया है. स्वाभाविक तौर पर पशुचारी कबीलों से जुड़े हुए लोग वीर लड़ाकू होते हैं. मध्यकाल में भी कृषि और पशुचारी कार्यों में लगे लोग युद्ध के समय स्थायी सम्भ्रांत सैनिकों के साथ पैदल टुकड़ियों के रूप में इसमें भाग लेते थे. ऐसे कितने ही लड़ाकू कबीलों को हम मुगलों के बाद तक भाड़े के सैनिकों के तौर पर विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के प्रति अपनी सेवायें देते हुए पाते हैं. प्राचीन काल से लेकर पिछली शताब्दियों तक ऐसे लड़ाकू कबीलों ( जातियों ) को हम सामाजिक स्तर पर सम्मानजनक स्थिति पाते हुए देखते हैं. ऐसे लोगों का कबीलों से जाति-उपजाति में परिवर्तन सामाजिक गतिशीलता के कारण ही सम्भव था.             

ब्रज के गोपालक और पंजाब के आभीरों के पशुपालन में एक बहुत बड़ा अंतर यह दिखता है, कि सम्भवतः, सिंध पंजाब क्षेत्र के आभीर भैंस-पालन में अग्रणी थे. आज के अहिर-ग्वाला जाति के लोगों का अधिकांश भैंसपालन में ही पाया जाता है. इसका मतलब है, कि आभीर, संख्या में ग्वालों से अधिक रहे होंगे.

‘---The Abhiras lived in scattered settlements in various parts of western and centra India as far as the deccan. Most of these tribes claimed descent from tge ancient lineage of the Puranas, and some of them were later connected with the rise of Rajput dynasties.----’ - britannica.com ( article 'Ashoka and his Successors')

Sunday, May 20, 2018

ऊँच नीच और सामाजिक जिम्मेदारी

जाति का ऊँचा नीचा होना उस जाति के कर्म के प्रति समाज की दृष्टि पर निर्भर करता था. जिस जाति का काम अलौकिक प्रभाव उत्पन्न करने वाले पूजा-पाठ, यज्ञ-याजन करना, भविष्य-दर्शन करना, शिक्षा-दीक्षा देना था, समाज उसे सहज ही उच्च मानता था. अस्त्र-शस्त्र पर अधिकारयुक्त लोगों का काम समाज में व्यवस्था कायम करना था, तो उस काम से जुड़े जाति को उच्च माना गया. शराब, मांसाहार जैसे कर्मों के प्रति सामाजिक असम्मान ने उस कर्म से जुड़े लोगों के जाति को निम्न माना. मरे हुए प्राणियों का निपटारा करना, या ऐसे ही अन्य अशौच से जुड़े लोगों को अंत्यज समझने के पीछे समाज का दृष्टिकोण सामुहिक था. शौच-अशौच को लेकर भारतीय समाज की सम्वेदनशीलता को हम नकारात्मक ढंग से नहीं ले सकते. जिस जलवायविक परिस्थिति में छुआ-छूत की बीमारी से निबटने का कोई अन्य कारगर उपाय नहीं था, वहाँ शौच-अशौच की अवधारणा ने लोगों को हमेशा उत्पन्न होने वाले महामारियों से बचाने का काम किया. शौच-अशौच की सामाजिक धारणा को मानने में ब्राहमणों की कठोरता का तात्पर्य यह नहीं, कि दूसरे लोग उससे जुड़ी सावधानी के महत्व को स्वीकार नहीं करते थे. सच तो यह है, कि ब्राह्मणों के अशौच निवारण के उपाय निम्न समझी जाने वाली जातियों में उनके प्रति श्रद्धा भाव को और अधिक बढाता था.
इन बातों को लेकर रुढिग्रस्तता की दिशा में समाज आगे बढा तो इसकी जिम्मेदारी ब्राह्मणों पर नहीं थोपी जा सकती. एक अंत्यज का गाँव में प्रवेश सिर्फ ब्राह्मण की शुचिता के लिये खतरा नहीं समझा जाता था. बल्कि, इस मायने में अन्य जातियों का व्यवहार भी अंत्यजों के प्रति यथेष्ट कठोर था. आज अगर दूसरी जातियों के लोग यह कह कर पल्ला झाड़ लें, कि ऐसा तो उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा संकलित धर्मशास्त्रों के पालन के लिये किया था, और कि इसकी जिम्मेदारी ब्राहमणों पर जाती है, तो यह महज अपनी जिम्मेदारी से भागना है. जिम्मेदारी से भागने वाले समाज की हालत क्या होती है, हम उसका एक उदाहरण हैं !
 अपने युग के सामाजिक दृष्टिकोणों पुर्वग्रहों, धारणाओं को ब्राहमणों ने धर्मशास्त्रों में समाहित किया. समाहित करने का यह अर्थ कदापि नहीं लिया जा सकता, कि ब्राह्मणों ने उन प्रावधानों के पीछे समाज की सामुहिक सोच को उत्पन्न किया. ब्राह्मण भी समाज का हिस्सा था. समाज की सामुहिक चेतना, पुर्वग्रह, खामी, खूबी से ब्राह्मण भी वैसे ही जुड़ा था, जैसा किसी अन्य जाति के लोग. जातिप्रथा के बारे में एक अवैज्ञानिक दुस्प्रचार (राजनीति से प्रेरित) यह पाया जाता है, कि जाति की व्यवस्था धर्मशास्त्रों के कारण अस्तित्व में आया. सच इससे उलट है. जातिप्रथा का जन्म सामाजिक धारणाओं एवं पुर्वग्रहों से उपजा, जिसे धर्मशास्त्रों में संकलित और समाहित किया गया. हाँ, यह सही है, कि उस जमाने की धारणाओं पुर्वग्रहों को धर्मशास्त्र में प्रावधानों के रूप में शामिल करने वालों (ब्राह्मणों) ने अपने फायदे का विशेष खयाल रखा. ऐसा करने के लिये, अतीत के उदाहरणों, परम्पराओं के उद्धरणों को तोड़ मड़ोर कर प्रस्तुत किया.
लेकिन, ऐसा सिर्फ भारत में हुआ है, या प्राचीन काल तक ही सीमित रहा है, ऐसा सोचना इस देश के बौद्धिक पिछड़ेपन के कारण है. इस देश के लोगों ने दूसरे समाज, देश, परम्परा के अध्ययन की बात तो दूर, अपनी परम्परा को भी जानने में रुचि नहीं दिखाई है. आधुनिक काल में प्राचीन का लगभग सारा अध्ययन पश्चिमी अध्येताओं ने किया है. ऐसे में हम दुनिया के अन्य समाज की वास्तविकताओं को नही जान पाये हैं. सत्ता से जुड़े वर्गों ने हमेशा अपने लिये विशेषाधिकारों का प्रावधान रखा और उसका उपभोग किया.
भारत का बौद्धिक पिछड़ापन आज भी उतना ही गहरा है, जितना पहले कभी रहा था. जो लोग भारतीय समाज के पिछड़ेपन के लिये तथाकथित उच्च जातियों को दोष देते हैं, वो आज भी पिछड़ेपन से बाहर निकलने का सार्थक प्रयास नहीं कर रहे. पिछड़ेपन से निकलने के उपायों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाता है, कि ये उपाय अपने आप में पिछड़ेपन को और अधिक बढावा देने वाला है. तथाकथित उच्च जातियों में बौद्धिक और आर्थिक पिछड़ेपन का स्तर तथाकथित पिछड़ी जातियों से कम नहीं है. और ये दोनों प्रकार के पिछड़ेपन इस देश की उन्नति में सबसे बड़े बाधक है. वैश्विकृत दुनिया में पिछड़ेपन के माणदंड बिल्कुल अलग हैं. सामाजिक स्तर पर उस माणदंड को ध्यान में रखे बगैर देश के पिछड़ेपन से निबटना मुश्किल होगा.

Saturday, April 21, 2018

चार वर्ण

ऋग्वेद के दशम मण्डल के पुरुषसूक्त के ‘पुरुष’ के शरीर के विभिन्न अंग यथा मुख, हाथ, पाँव, जंघा, और पाँव से चार वर्णों की उत्पत्ति की व्याख्या समाज में कार्य विभाजन को लेकर शायद दुनिया में पहली अभिव्यक्ति है. बोलने, अर्थात यज्ञ में वेदोच्चार का काम करने वाला ब्राह्मण, उस यज्ञ में हवि करने और उसकी रक्षा करने वाला राजन्य, यज्ञ के लिये हर प्रकार के उत्पादन का दायित्व निभाने वाला वैश्य, और इस कार्य में हर प्रकार की सेवा कर्म को निभाने वाला शुद्र था. सभी जानते हैं, कि ऋग्वेद कालीन समाज यज्ञ के इर्द-गीर्द घूमता था. यज्ञ में आर्य समाज के लोगों की भूमिकाओं को अगर हम चार हिस्सों में बाँटे, तो कर्म के आधार पर क्या, वेदोच्चार पाँव से, हवन मुख से, और ऐसे ही अन्य कामों को कहीं और से सम्पन्न किया जा सकता है? इत्तेफाक है, कि शरीर में ध्वनि बोलने वाला यंत्र ऊपर स्थित है, और चलने वाला नीचे. और सबका कुछ न कुछ नाम तो होना ही था. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह, कि जब सामाजिक व्यवस्था में चार वर्णों की संकल्पना उभरी तब यह निहायत की कर्म आधारित था. इस तथ्य को सिद्ध करने के लिये प्राचीन ग्रंथों के विश्लेषण से पर्याप्त सबूत उपलब्ध हैं. कालांतर में यह जाति आधारित कैसे हो गया, इसे समझना एक अलग विषय है. वर्ण की इस प्रकार की व्याख्या से परेशानी हमारी आज का हमारा पुर्वाग्रह है. पुर्वाग्रह, इस तथ्य को लेकर कि सिर सबसे ऊपर स्थित है, और पाँव सबसे नीचे. और ऊपर-नीचे के चक्कर को हम व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का प्रयास नहीं कर रहे. मानव समाज का वर्गों में विभाजन सांस्कृतिक तौर पर एक प्राकृतिक घटना है.
जिन लोगों को यह भ्रम है, कि ब्राह्मण वर्ण की संकल्पना समाज के बौद्धिक नेतृत्व के रूप में हुआ, तो सम्भवतः ऐसा मानने का कोई ठोस सबूत उपलब्ध नहीं है. उस समय बौद्धिक काम से तात्पर्य  अगर ऋचाओं की रचना से है तो हमे याद रखना चाहिये, कि ऋषि हर वर्ण से थे. हमें इसका अहसास नहीं होता कि उस वक्त लोगों को यही विश्वास था, कि आध्यात्मिक भावों के उभरने का स्थल हृदय है. मस्तिष्क के प्रति मनुष्य की जागरुकता बाद की बात है. तभी तो लोग वेदों को हृदयंगम करते थे. और हृदय-स्थल, मुख से काफी नीचे स्थित होता है! सांस्कृतिक तौर पर हृदय के महत्व को सिर्फ इस बात से ही समझा जा सकता है, कि आज भी हम अपने सबसे प्रिय व्यक्ति या वस्तु से जुड़ी भावना को हृदय में ही रखते हैं. कर्मकाण्डों से भरा हुआ आर्यों का सामाजिक जीवन ध्यान-योग आधारित बाद के ब्राहमणवादी धर्म से बहुत अलग था, जब मस्तिष्क और उससे जुड़ी अवधारणाओं की खोज हुई. और इन्हीं खोजों के बाद ब्राह्मण वर्ण के लोगों ने समाज की जाति आधारित वर्ण-विभाजन पर बल देना शुरु किया. ऋग्वेद के समय के कुछ समय(सैकड़ों वर्षों) के बाद सामाजिक संरचना में ब्राह्मण बौद्धिक नेतृत्व करने वाले ‘जाति आधारित’ वर्ग के रूप में स्थापित हुए. निष्कर्ण यह कि समाज में ब्राहमणों की बौद्धिक सर्वोच्चता की स्थापना एक सामाजिक प्रक्रिया से उपजी, जिसने वर्णव्यस्था को जाति-व्यवस्था में बदल डाला.

Tuesday, April 17, 2018

विष्णु पुराण के अनुसार क्षत्रियों की वंशावली

विष्णु पुराण के अनुसार क्षत्रियों की वंशावली

विष्णु- ब्रह्मा- ब्रह्मा के दाएँ अंगुठे से दक्ष- अदिति- विवश्वान- मनु- (इक्ष्वाकू, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यंत, प्रांशु, $नाभाग, दिष्ट, करुष, पृषघ्न (पृषध्र)) + इला, 
इला (स्त्री रूप में) + बुध- पुरुरवा
इला (पुरुष रूप में) = सुद्युम्न- उत्कल, गय, विनत

पुरुरवा से सारे क्षत्रियों का जन्म. (4-01-- )
करुष- कारुष क्षत्रियगण
पृषध्र शूद्र हो गया.  
दिष्ट का पुत्र नाभाग वैश्य हो गया. लेकिन नाभाग के पुत्र बलंधन से जो वंश आगे बढा उसमें प्रतापी चक्रवर्त्ती राजा हुए. आगे चलकर और भी क्षत्रिय वंशों का विस्तार हुआ. 
दिष्ट- नाभाग- बलंधन (ब्रह्माण्डपुराण 32:121 में इसे ऋषि बताया गया)- वत्सप्रीति- प्रांशु- प्रजापति- खनित्र- चाक्षुष- विंश- विविंशक- खनिनेत्र- अतिविभूति- करंधम- अविक्षित- मरुत्त1- नरिष्यंत- दम- राजवर्द्धन- सुवृद्धि- केवल- सुधृति- नर- चंद्र- केवल- बंधुमान- वेगवान- बुध- तृणबिंदु- इलविला नामक कन्या, जिसपर अलम्बुसा नामक सुंदरी अप्सरा उसपर अनुरक्त हो गयी. उससे तृणबिंदु को विशाल नामक पुत्र हुआ. विशाल- हेमचंद्र- चंद्र- धूम्राक्ष- सृन्जय- सहदेव- कुशाश्व- सोमदत्त- जनमेजय- सुमति. 
मनुपुत्र शर्याति – सुकन्या (च्यवन ऋषि की पत्नी) 
शर्याति पुत्र से आनर्त्त- रेवत-रैवत ककुद्मी, रेवती का विवाह बलराम से हुआ (बलराम, विष्णु अंश अवतार) (4-01-90)
मनु पुत्र $नाभाग- नाभाग- अम्बरीष- विरूप- पृवदश्व- रथीतर 
‘रथीतर के वंशज क्षत्रिय संतान होते हुए भी आंगिरस कहलाये; अतः वे क्षत्रोपेत ब्राह्मण कहलाये’- (4-02-10) 
(राथीतर, मौद्गल्य का नामोल्लेख तैत्तिरियोपनिषद के नवम अनुवाक में.)
----------------

इक्ष्वाकु वंश

मनु के छींकने से इक्ष्वाकु- विकुक्षि, निमि, दण्ड. (4-02-11)
इक्ष्वाकु ने अष्टका श्राद्ध आरम्भ किया. (इस श्राद्ध के लिये मांस) (4-02-15)   
विकुक्षि (शशाद का पिता द्वारा त्याग) – पुरंजय (विष्णु का अंश, त्रेता में देवासुर संग्राम का नेतृत्व)(4-02-25) - अनेना- पृथु- विष्टराश्व- चांद्र युवनाश्व- शास्वत- वृहद्रथ- कुवलयाश्व (धुंधुमार)- दृढाश्व, चंद्राश्व, कपिलाश्व. 
(पुरंजय ने देवासुर संग्राम में वृषभ पर चढकर युद्ध लड़ा था, ककुत्स्थ नाम पड़ा) 
दृढाश्व- हर्यश्व- निकुम्भ- अमिताश्व- कुशाश्व- प्रसेनजित- युवनाश्व- मांधाता (पिता से उत्पन्न, चक्रवर्त्ति)- @पुरुकुत्स ( नागों के अनुरोध पर विष्णु द्वारा प्रवेश, गंधर्वों का नाश. वि.पु.4-03-05), अम्बरीश, मुचुकुंद. 
अम्बरीश- युवनाश्व- हारीत- अंगिरस हारीतगण हुए (‘तस्मात् हारीतः यत: अंगिरसः हारीताः’) (विष्णुपुराण 4:03:03)
(वायुपुराण 26(II):117,, त्रिशंकु- हरिश्चंद्र (त्रैशंकव)- रोहित- हरित- चंचु (हारीत)- विजय- रुरुक- हृतक(धृतक)- बाहु.)
@पुरुकुत्स ने गंधर्वों का नाश किया.
पुरुकुत्स + नर्मदा – त्रसदस्यु- अनरण्य- पृषदश्व- हर्यश्व- हस्त- सुमना- त्रिधन्वा- त्रय्यारुणि- सत्यव्रत (त्रिशंकु, चांडाल हो गया था)- हरिश्चंद्र- रोहिताश्व- हरित- चक्षु- विजय, (वसुदेव) ) 4-03-22
विजय- रुरुक—वृकबाहु- सगर (हैहय और तालजंधीय राजाओं का नाश) 4:02:48
सगर- असमंजस- अंशुमान- दिलीप- भगीरथ- सुहोत्र- श्रुति- नाभाग- अम्बरीश- सिंधुद्वीप- अयुतायु- ऋतुपर्ण- सर्वकाम- सुदास- सौदास मित्रसह (कल्माषपाद)- अश्मक (वशिष्ठ द्वारा गर्भाधान)- मूलक (नारीकवच)- दशरथ- इलिविल- विश्वसह- खट्वांग- दीर्घबाहु रघु- अज- दशरथ- राम, लक्षमण, भरत, शत्रुघ्न (चारो में विष्णु का अंश)  
कुश- अतिथि- निषध- अनल- नभ- पुण्डरीक- क्षेमधन्वा- देवानीक- अहीनक- रुरु- पारियात्रक- देवल- वच्चल- उत्क- वज्रनाभ- शंखण- युषिताश्व- विश्वसह- हिरण्यनाभ- पुष्य- ध्रुवसंधि- सुदर्शन- अग्निवर्ण- शीघ्रक- मरु- प्रसुश्रुत- सुसंधि- अमर्ष-सहस्वान- विश्वभव- बृहद्बल (महाभारत में अभिमन्यु के हाथों मारा गया)  
(हैहय कुलीन क्षत्रियों के लिये अग्निस्वरूप परशुराम)  
मनुष्य का मांस (4-04-45)  
सगरपुत्रों का यज्ञादि से विमुख होना (4-04-12) 
सगर ने सागर को अपना पुत्र माना 
शत्रुघ्न द्वारा मथुरा की स्थापना. इसके पुत्र, सुबाहु और शूरसेन, ने मथुरा पर शासन किया.  
निमि-वशिष्ठ परस्पर शाप (4-05-09
पलक खुलना-बंद होना राजा निमि का अमरत्व है. 
निमि- जनक (वैदेह, मिथि)- उदावसु- नंदिवर्द्धन- सुकेतु- देवरात- वृहदुक्थ – माहावीर्य- सुधृति- धृष्टकेतु- हर्यश्व- मनु- प्रतिक- कृत्रथ- देवमीढ- विबुध- महाधृति- कृतरात- महारोमा- सुवर्ण्रोमा- स्रस्वरोमा- सीरध्वज, कुशध्वज-   
सीरध्वज- भानुमान- शतद्युम्न- शुचि- उर्जनामा- शतध्वज- कृति- अंजन- कुरुजित- अरिष्टनेमि- श्रुतायु- सुपार्श्व- सृन्जय- क्षेमावी- अनेना- भौमरथ- सत्यरथ- उपगु- उपगुप्त- स्वागत- स्वानंद- सुवर्चा- सुपार्श्व- सुभाव- सुश्रुत- जय- विजय- ऋत- सुनय- वीतहव्य- धृति- बहुलाश्व- कृति. आत्मविद्या को आश्रय (आत्मविद्याश्रयी) देनेवाले (4-05-34) 
---------------
ब्रह्माजी के पुत्र अत्रि प्रजापति थे.

चंद्रवंशी क्षत्रिय 

अत्रि- चंद्रमा- बुध- पुरुरवा ( + उर्वशी)- आयु, अमावसु, विश्वावसु, श्रुतायु, शतायु, अयुतायु
(आदिपर्व 75:25 पुरुरवा- आयु, धीमान्, अमावसु, दृढायु, वनायु, शतायु) 
अमावसु- भीम- कांचन, सुहोत्र- जह्णु- सुमंतु- अजक- बलाकाश्व- कुश- कुशाम्ब, कुशनाभ, अधूर्त्तरजा, वसु 
(अजमीढ- जह्नु- सिंधुद्वीप- बलाकाश्व- बल्लभ- कुशिक- गाधि- विश्वामित्र, सत्यवती) (अनुशासनपर्व 04)
कुशाम्ब- गाधि- सत्यवती, विश्वामित्र 
विश्वामित्र- देवरात (शुनःशेप), मधुच्छंद, धनंजय, कृतदेव, अष्टक, कच्छप, हारितक. (कौशिक-गोत्र)   
सत्यवति + ऋचीक- जमदग्नि (+ इक्ष्वाकु कुलीन रेणुका)- परशुराम (विष्णु अंश) (4:07:24, 25) 
पुरुरवा पुत्र आयु (+ राहु की कन्या)- नहुष, **क्षत्रवृद्ध, रम्भ, रजि, अनेना. 
(आदिपर्व 75:26 आयु (+ स्वरभानु की पुत्री)- नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, गय, अनेन) 
**क्षत्रवृद्ध- सुहोत्र- ##काश्य, काश, गृत्समद (4:08:04). 
गृत्समद- शौनक (चातुर्वर्ण्य का प्रवर्तक)
[वायुपुराण 92:03 धर्मवृद्ध- सुतहोत्र- काश, शल, गृत्समद]  [कौ.ब्रा.22:04 गृत्समद भार्गव]
[अनुशासनपर्व 30:61 गृत्समद का पुत्र सुचेता नामक ब्राह्मण हुआ.  गृत्समद- सुचेता- वर्चा- विहव्य- वितव्य- सत्य- संत- श्रवा- तम- प्रकाश- वागिंद्र- प्रमिति (+ घृताचि)- रुरु (+ प्रमद्वरा)- शुनक- शौनक ]. आदिपर्व 08:02 में च्यवन (सुकन्या)- प्रमिति (+ घृताचि)- रुरु (+ प्रमद्वरा)- शुनक- शौनक]
   
  
**क्षत्रवृद्ध- प्रतिक्षत्र- संजय- जय- विजय- कृत- हर्यधन- सहदेव- अदीन- जयत्सेन- संस्कृति – क्षत्रधर्मा (4:08:25)
##काश्य- काशेय (काशिराज) - राष्ट्र- दीर्घतपा- धन्वंतरी (शरीर और इंद्रियाँ जरा आदि विकारों से रहित, आयुर्वेद का स्थापक, यज्ञ भाग के भोक्ता) - केतुमान- भीमरथ- दिवोदास- प्रतर्दन (शत्रुजित, वत्स, ऋतध्वज, कुवलयाश्व) - अलर्क- सन्नति- सुनीथ- सुकेतु- धर्मकेतु- सत्यकेतु- विभु- सुविभु- सुकुमार- धृष्टकेतु- वीतिहोत्र- भार्ग- भार्गभूमि (चातुर्वर्ण्य का प्रचार) (4-08-20) {वायुपुराण 92:23 दीर्घतपा- धन्वंतरी- केतुमान- दिवोदास (भीमरथ)}  
रजि- वेदविमुख हो गये   
नहुष- यति, ययाति, सन्याति, आयाति, वियति, कृति. 
यति ने राजपद ग्रहण नहीं किया. 
ययाति (+ देवयानी & शर्मिष्ठा) – यदु, तुर्वसु; द्रुह्यु, अनु, पुरु. 
ययाति का राज्य पुरु को. दक्षिण-पूर्व दिशा में तुर्वसु. पश्चिम द्रुह्यु, दक्षिण में यदु. उत्तर में अनु को मांडलिक पद पर नियुक्त किया. 
(वायुपुराण 99 तुर्वसु- वह्नि- गोभानु- तृसानु- करंधम- मरुत्त- दुष्कृत(पुरु के वंश से गोद लिया गया.)
------------------

यदुवंश

यदु- सहस्त्रजित, क्रोष्टु, नल, नहुष.
सहस्त्रजित- शतजित- हैहय, हेहय, वेणुहय. 
हैहय- धर्म- धर्मनेत्र- कुंति- सहजित- महिष्मान (महिष्मतिपुर को बसाया)- भद्रश्रेण्य- दुर्दम- धनक- कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतधर्म, कृतौजा.
कृतवीर्य- अर्जुन (कार्तवीर्य, परशुराम द्वारा मारा गया)-शूर, शूरसेन, वृषसेन, मधु, जयध्वज. 
{अत्रि कुल के दत्तात्रेय (विष्णु अंश)} 
जयध्वज- तालजंघ- वितिहोत्र, भरत. 
भरत- वृष- मधु- वृष्णि,,,, सौ पुत्र. 
यदु पुत्र क्रोष्टु- ध्वजिनीवान- स्वाति- रुशंकु- चित्ररथ- शशिबिंदु (शशबिंदु)- पृथुश्रवा, पृथुकर्मा, पृथुकीर्ति, पृथुयशा, पृथुजय, पृथुदान. 
पृथुश्रवा- पृथुतम- उशना, शितपु- रुक्मकवच- परावृत्- रुक्मेषु, पृथु, ज्यामघ, वलित, हरित. 
(वा.पु.95:23 सौ अश्वमेध करने वाला उत्तम धार्मिक उशना- (राजर्षि) मरुत्त2- कम्बलबर्हि- रुक्मकवच- रुक्मेषु, पृथुरुक्म, ज्यामघ, परिघ, हरि. 
ज्यामघ- विदर्भ (प्राकृतिक रूप से नहीं)- क्रथ, कैशिक, रोमपाद या लोमपाद (दार्शनिक)- बभ्रु(1)- धृति- कैशिक- चेदि. (वा.पु.95 में कैशिक को कौशिक कहा गया है. लोमपाद- आहृति. कौशिक- चिदि (चेदि- चैद्य राजागण---) 
क्रथ- कुंति- धृष्टि- निधृति- दशार्ह- व्योमा- जिमूत- विकृति- भीमरथ- नवरथ (वा.पु. रथवर- नवरथ)- दशरथ- (वा.पु. एकादशरथ)- शकुनि- करम्भि(करम्भक)- देवरात- देवक्षत्र- मधु- कुमारवंश- अनु- पुरुमित्र- अंशु- सत्वत (सात्वतवंश) 
सत्वत- भजन, भजमान, दिव्य, *अंधक, देवावृध महाभोज- वृष्णि- सुमित्र, युधाजित, 
सुमित्र- अनमित्र- निघ्न- प्रसेन- सत्राजित (सूर्य से स्यमंतक मणि प्राप्त)
(प्रसेन को सत्राजित का भाई कहा गया है. लगता है)  
सत्राजित- सत्यभामा( + कृष्ण)  
भजमान- निमि, कृकण, वृष्णि, शतजित, सहश्रजित, अयुतजित. 
देवावृध- बभ्रु(2) (दोनों दार्शनिक) (4-13-04) 
महाभोज से भोजवंश 
वृष्णि-            
अनमित्र--- पृश्रि- श्वफल्क {+ गांदिनी(काशिराज की पुत्री)}, चित्रक 
अनमित्र- शिनि- सत्यक- सात्यकि(युयुधान)-संजय- कुणि- युगंधर
श्वफल्क- (+ गांदिनी(काशिराज की पुत्री))- अक्रूर, उपमद्रु, मृदामृद, विश्वारि, मेजय, गिरिक्षत्र, उपक्षत्र, शतघ्न, अरिमर्दन, धर्मदृक, दृष्टधर्म, गंधमोज, वाह, और प्रतिवास, सुतारा(पुत्री) 
अक्रूर- देववान, उपदेव 
श्वफल्क पुत्र चित्रक- पृथु, विपृथु,,,, 
* अंधक- कुकुर, भजमान, शुचिकम्बल, बर्हिष. 
कुकुर- धृष्ट- कपोतरोमा- विलोमा- तुम्बुरु- मित्र- अनु- आनकदुंदुभि- अभिजित- पुनर्वसु- आहूक, आहूकी. 
आहूक- देवक, उग्रसेन. 
देवक- देववान, उपदेव, सहदेव, देवरक्षित, (वृकदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शांतिदेवा, सहदेवा, देवकी; सात पुत्रियों का विवाह वसुदेव से हुआ था) 
उग्रसेन- कंस, न्यग्रोध, सुनाम, आनकाह्न, शंक, सुभूमि, राष्ट्रपाल, युद्धतुष्टि, सुतुष्टिमान, ( कंसा, कसवती, सुतनु, राष्ट्रपालिका; पुत्रियाँ)  
अंधकपुत्र भजमान- विदूरथ- शूर- शमी (शमीक)- प्रतिक्षत्र- स्वयंभोज- हृदिक- कृतवर्मा, शतधन्वा, देवार्ह, देवगर्भ. 
देवगर्भ- शूरसेन(+ मारिषा)- वसुदेव (आनकदुंदुभि), देवभाग, देवश्रवा, अष्टक, ककुच्चक, वत्सधारक, सृन्जय, श्याम, शमिक, गंडूष, (पृथा, श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा, राजाधिदेवी; पाँच पुत्रियाँ) 
शूरसेन के मित्र कुंति- पृथा (दत्तक पुत्री)(+पांडु) 
श्रुतदेवा + वृद्धधर्मा (कारूश नरेश)  – दंतवक्र महादैत्य       
श्रुतकीर्ति + केकयराज-संतर्दन 
वसुदेव- (+ पौरवी + रोहिनी + मदिरा + भद्रा + देवकी)  
वसुदेव + रोहिणी- बलभद्र, शठ, सारण, दुर्मद, भद्राश्व, भद्रबाहु, दुर्दम, भूत. 
वसुदेव + मदिरा- नंद, उपनंद, कृतक, 
वसुदेव + भद्रा- उपनिधि, गद
वसुदेव + वैशाली- कौशिक 
वसुदेव + देवकी- कीर्तिमान, सुषेण, उदायु, भद्रसेन, ऋजुदास, भद्रदेव.( सब कंस के द्वारा मारा गया)   
बलभद्र + रेवती- विशठ, उल्मुक 
सारण- सार्ष्ठि, मार्ष्ठि, सत्य, धृति 
कृष्ण (+ रुक्मिणी)- प्रद्युम्न- अनिरुद्ध- वज्र    
     ---------------- 

ययाती पुत्र अनु- सभानल, चक्षु, परमेषु. (वा.पु.99:13-- अनु- सभानर, पक्ष, परपक्ष. सभानर- कालानल- सृंजय- पुरंजय- जनमेजय- महाशाल- महामना- उशीनर, तितिक्षु. उशीनर- मृग, नव, कृमि, सुव्रत, शिबि.-----)
सभानल- कालानल- सृन्जय- पुरंजय- जनमेजय- महाशाल- महामना- उशीनर, *तितिक्षु. 
उशीनर (वृषदर्भ)- शिबि, नृग, नर, कृमि, वर्म.
शिबि- पृषदर्भ, सुवीर, केकय, मद्रक.
*तितिक्षु- रुशद्रथ- हेम- सुतपा- बलि
(बलि के क्षेत्र, अर्थात, पत्नी से दीर्घतमस ने अंग, वंग, कलिंग, सुह्य, और पौंड्र नामक बालेय क्षत्रिय उत्पन्न किया) 
अंग- अनपान-दिविरथ- धर्मरथ- चित्ररथ (रोमपाद) 
रोमपाद ने दशरथ पुत्री शांता को गोद लिया.
(वायुपुराण 99:103 के अनुसार चित्ररथ का पुत्र दशरथ हुआ, जिसे रोमपाद भी कहा गया. इसकी पुत्री शांता थी.) 
रोमपाद- चतुरंग- पृथुलाक्ष- चम्प (चम्पापुरी बसाया)- हर्यंक- भद्ररथ- बृहद्रथ- बृहत्कर्मा- बृहद्भानु- बृहन्मना- जयद्रथ- विजय-धृति- धृतव्रत- सत्यकर्मा- अतिरथ (अधिरथ)- कुंतीपुत्र (पृथा) कर्ण - वृषसेन. (4-18-) (मत्स्य पुराण 26:37) 
--------------

पुरुवंश

पुरु- जनमेजय- प्रचिन्वान- प्रवीर- मनस्यु- अभयपद- सुद्यु- बहुगत- संयाति- अहंयाति- रौद्राश्व- ऋतेषु, कक्षेषु, स्थंडिलेषु, कृतेषु, जलेषु, धर्मेषु, श्रुतेषु, स्थलेषु, सत्रतेषु, वनेषु. 
ऋतेषु—अंतिनार- सुमति, अप्रतिरथ, ध्रुव.       
अप्रतिरथ- कण्व(1), ऐलीन (यम की पुत्री इलीना का पुत्र मत्स्यपुराण 49:09). (ईलीन) (आदिपर्व 95)
(वायुपुराण 99:129 अप्रतिरथ- धुर्य- कण्ठ- मेधातिथि- काण्ठायन ब्राह्मण) 
कण्व- मेधातिथि (काण्वायन द्विज) & (मत्स्य पु. 27:09, श्रीराम शर्मा आचार्य ने इन द्विजों को ब्रह्मवाद के पराक्रांत लिखा है) 
ऐलीन- दुष्यंत, -----. (ईलीन (+ रथंतरी)- दुष्यंत और अन्य चार) (आदिपर्व 95:28) 
दुष्यंत- भरत- भरद्वाज (वितथ)- मन्यु- ^^वृहत्क्षत्र, महावीर्य, नर, गर्ग. ( विष्णु पुराण 4:19:10, 11,,,) 
नर- संकृति- गुरुप्रीति, रंतिदेव. 
(भ्रद्वाज का जन्म बृहस्पति का उसकी भाभी, ममता (भद्रा) (उतथ्य की पत्नी), के संसर्ग से हुआ था. द्वाज का अर्थ है, दो पिता से उत्पन्न) (विष्णु पु. 4:19:18) (वायुपुराण 99:151)
(‘----, संक्रामितो भरद्वाजो मरुद्भिर्भरतस्य तु.’ - मत्स्यपुराण 49:15) 
{द्वाज- दो पिता से उत्पन्न, भरत + द्वाज = भरद्वाज)}
गर्ग- शिनि ( गार्ग्य शैन्य क्षत्रोपेत द्विज हुए)
महावीर्य- दुरुक्षय- त्रय्यारुणि, पुष्करिण्य, कपि ( बाद में ब्राह्मण हो गये) 
^^बृहत्क्षत्र- सुहोत्र- हस्ती (अग्निपुराण का वृहत्पुत्र)- अजमीढ, # द्विजमीढ, पुरुमीढ. 
अजमीढ- कण्व (2)- मेधातिथि (कण्वायन ब्राह्मण) & {‘मेधातिथि गौतम’ ? (शांतिपर्व 266:45)}
^अजमीढ- बृहदिषु- बृहद्धनु- बृहत्कर्मा- जयद्रथ- विश्वजित- सेनजित- रुचिराश्व, काश्य, दृढहनु, वत्सहनु.
रुचिराश्व- पृथुसेन- पार- नील- समर ( काम्पिल्य नरेश), ,,,,,,. 
समर- पार, सुपार, सदश्व. 
सुपार- पृथु- सुकृति- विभ्राज- आणुह (+ शुक कन्या कीर्ति )- ब्रह्मदत्त- विश्वक्सेन- उदक्सेन- भल्लाभ.
# द्विजमीढ- यवीनर- धृतिमान- सत्यधृति- दृधनेमि- सुपार्श्व- सुमति- सन्नतिमान- कृत (प्राच्य सामग श्रुतियों की चौबिस संहिताएँ रची थी)- उग्रायुध (नीपवंशीय क्षत्रियों का नाश किया)- क्षेम्य- सुधीर- रिपुंजय- बहुरथ.
कृत ने कौथुमीयशाखाध्यायी सामग-सम्हिताओं का प्रवक्ता था. (वायुपुराण 99:190) (विष्णुपुराण 3:06:07) (ब्रह्माण्डपुराण 35:49)
^अजमीढ (+ नलिनी)- नील- शांति- सुशांति- पुरंजय- *ऋक्ष- हर्यश्व- मुद्गल, सृंजय, बृहदिषु, यवीनर, काम्पिल्य (पांचाल कहलाये) 
मुद्गल (मौद्गल्य नामक क्षत्रोपेत ब्राह्मण)- बृहदश्व- दिवोदास, अहल्या (पुत्री)
(अग्निपुराण 278:20, पुरुजात- बाह्यश्व- मुकुल, सृन्जय, बृहदिषु, यवीनर, कृमिल.)
मुकुल- चंचाश्व- दिवोदास, अहल्या
अहल्या (+ शरद्वत)- शतानंद- सत्यधृक्- कृप-कृपी) 

(वध्वश्व + (मेनका)- दिवोदास, अहल्या. अहल्या + (शरद्वत या शरद्वान)- शतानंद- सत्यधृति- कृप, कृपि (गौतमी). वायुपुराण 99:200) (सभी धनुर्वेद के पारंगत)  
{अहल्या (+ गौतम)- शतानंद- सत्यधृति (धनुर्वेद का पारदर्शी)- कृप, कृपी (पुत्री)}
(मत्स्य पु. 50:08 में अहल्या+शरद्वान का उल्लेख है)  
दिवोदास- मित्रायु- च्यवन- सुदास- सौदास- सहदेव- सोमक- जंतु,,,,, पृषत.
(वायुपुराण 99:206, दिवोदास- मित्रयु (ब्रह्मिष्ठ)- च्यवन- सुदासु- सहदेव- सोमक- जंतु- अजमीढ-,,,,, पृषत्. मैत्रेयवंशी भार्गव गोत्रीय ब्राह्मण हुए.)    
पृषत- द्रुपद (यज्ञसेन)- धृष्टद्युम्न- धृष्टकेतु. 
^अजमीढ- *ऋक्ष- सम्वरण- कुरु- सुधनु, जह्नु%, परिक्षित,,,. 
(वायुपुराण 99:214 के अनुसार ऋक्ष बहुत काला था.)
सुधनु- सुहोत्र- च्यवन- कृतक- उपरिचर वसु- बृहद्रथ, प्रत्यग, कुशाम्बु, कुचेल, मात्स्य,,,. 
बृहद्रथ- कुशाग्र- वृषभ- पुष्पवान- सत्यहित- सुधन्वा- जतु. 
बृहद्रथ- जरासंध- सहदेव- सिमप- श्रुतिश्रवा
परीक्षित- जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन, भीमसेन. 
%जह्नु- सुरथ- विदूरथ- सार्वभौम- जयत्सेन- आराधित- अयुतायु- अक्रोधन- देवातिथि- ऋक्ष (अजमीढ के ऋक्ष से भिन्न)- भीमसेन- दिलीप- प्रतीप- देवापि, शांतनु, बाह्लीक. (देवापि ब्राह्मण हो गये)
ब्रह्माण्डपु. 2:10:69 शंतनु (शांतनु या महाभिष) को आदिपर्व 96:01 में इसे ऐक्ष्वाक बताया गया.
सुरथ, शाकल जनपद, अर्थात् श्यालकोट का था. (वामन पुराण 03:01)
देवापि बाल्यावस्था में ही वन में चला गया था, अतः शांतनु (परिवेत्ता, जो बड़े योग्य भाई की जगह राजा हुआ) ही राजा हुआ.
बाह्लीक- सोमदत्त- भूरि, भूरिष्रवा, शल्य.
(वायुपुराण 99:235, सोमदत्त- भूरि, भूरिश्रवा, शल)
शांतनु- भीष्म, कृप, कृपी.             
शांतनु (+ सत्यवती)-चित्रांगद, विचित्रवीर्य, 
-------- 

 द्रुह्यु- बभ्रु(3)- सेतु- आरब्ध (अन्य संस्करण में आरद्वान) - गांधार- धर्म- धृत- दुर्दम- प्रचेता- शतधर्म( लिखा गया, कि इसने उत्तरवर्त्ती बहुत से म्लेच्छों का आधिपत्य किया) वि. पु. 4:17:5 
(मत्स्य पुराण के अनुसार द्रुह्यु का वंश 
द्रुह्यु- सेतु, केतु. 
सेतु- शरद्वान- गांधार (गांधार देश का स्थापक)- धर्म- धृत- विदूष- प्रचेता- सौ पुत्र जो उत्तर में म्लेच्छों का राजा हुए. 
सेतु पुत्र शरद्वान का) 
महाभारत में पंजाब क्षेत्र के लोगों को नीच समझे जाने का उल्लेख है.   
-------------------------

महाभारत आदिपर्व 94 में पुरुवंश

{पुरु- प्रवीर, ईश्वर, रौद्राश्व। 
प्रवीर (+सूरसेनी)- मनस्यु- शक्त, संहनन, वाग्ग्मी
पुरु-पुत्र रौद्राश्व- अन्वग्भानु, ऋचेयु (विद्वान् और पराक्रमी अनाधृष्टि), कक्षेयु, कृकणेयु, स्थण्डिलेयु, वनेयु, जलेयु, तेजेयु, सत्येयु, धर्मेयु, संतनेयु.
ऋचेयु (अनाधृष्टि)- मतिनार- तंसु, महान्, अतिरथ, द्रुह्यु.
तंसु- ईलिन (+रथन्तरी)- दुष्यंत(1)(दुश्मंत), शूर, भीम, प्रवसु, वसु.
दुष्यंत- शाकुंतल भरत- भुमन्यु- दिविरथ, सुहोत्र, सुहोता, सुहवि, सुयजु, ऋचीक.  
सुहोत्र (+ऐक्ष्वाकी)- अजमीढ, सुमीढ, पुरुमीढ. 
अजमीढ- ऋक्ष(धूमिनी से), दुष्यंत(2) और परमेष्ठी (नीली से), जह्नु, व्रजन और रूपिण (केशिनी से)
ऋक्ष- सम्वरण (+ तपति)- कुरु. (दुष्यंत(2) और परमेष्ठि के पुत्र पंचाल कहलाये) 
कुरु- अश्ववान्(अविक्षित्), अभिष्यंत, चैत्ररथ, मुनि, @जनमेजय
अश्ववान्(अविक्षित्)- परीक्षित्, शबलाश्व, आदिराज, विराज, शाल्मलि, उच्चैश्रवा, भंगकर, जितारी. (आदिपर्व 94:50,,,) 
परीक्षित्(अथवा परीक्षित्)- कक्षसेन, उग्रसेन, चित्रसेन, इंद्रसेन, सुषेण, भीमसेन,.
@जनमेजय- धृतराष्ट्र(1), पाण्डु, बाह्लीक, निषध, जाम्बुनद, कुण्डोदर, पदाति, वसाति.  
धृतराष्ट्र- कुण्डिक, हस्ती, वितर्क, क्राथ, कुण्डिन, हविःश्रवा, इंद्राभ, भुमन्यु, अपराजित. इसके अलावा तीन पुत्र और थे, प्रतीप, धर्मनेत्र, सुनेत्र.
प्रतीप- देवापि, शांतनु, बाह्लीक.
---------------

महाभारत आदिपर्व 95 में पुरुवंश 

आदिपर्व 95 में पुरु से लेकर पाण्डवों तक की वंशावली और कथा बड़ा संक्षिप्त है.  
पुरु (+कौसल्या)- जनमेजय(1)- प्राचिन्वान्- संयाति- अहंयाति- सार्वभौम- जयत्सेन- अवाचीन- अरिह(1)- महाभौम- अयुतनायी- अक्रोधन- देवातिथि- अरिह(2)- ऋक्ष- मतिनार(+सरस्वती)- तंसु- ईलिन(+ रथंतरी)- दुष्यंत (एवं अन्य)- भरत- भुमन्यु- सुहोत्र- हस्ती- विकुंठन- अजमीढ- सम्वरण- कुरु- विदूर- अनश्वा- परिक्षित- भीमसेन- प्रतिश्रवा- प्रतीप- देवापि, शांतनु, बाह्लीक.
शांतनु- देवव्रत------
*********** 


प्रथम अध्याय 
1.01.03- विभिन्न पुरोहित परिवारों में विद्वेष
1.01.12- विश्वामित्र की प्रेरणा से पराशर के पिता का राक्षसों अर्थात पुलत्स्य के परिवार द्वारा द्वारा वध. पराशर द्वारा सैकड़ों निरपराध राक्षसों (पुलत्स्य के वंशज) का वध. अर्थात, आर्यों के विभिन्न परिवारों के बीच के झगड़ों में राक्षसों की भूमिका. पराशर के पितामह वशिष्ठ का बीच बचाव से पराशर और पुलत्स्य के बीच समझौता.   
1.03.10- देवताओं के बारह हजार वर्ष का एक कल्प, अर्थात चतुर्युग होता है.
संध्यां(400)-सतयुग(4000)-संध्यांश(400) संध्यां(300)- त्रेता(3000)-संध्यांश (300) संध्यां(200)- द्वापर(2000)-संध्यांश(200) संध्यां(100)- कलियुग(1000)- संध्यांश(100) = 4800+3600+2400+1200=12000 
4:24:104- परिक्षित के जन्म से नंद के अभिषेक तक 1050 वर्ष का समय जानना चाहिये. 
(यावत्परिक्षितो जन्म यावन्नंदाभिषेचनम, एतद्वर्षसहस्त्रं तु ज्ञेयं पंचाशदुत्तरम)  
1.04.25- वराह अवतार (हालाँकि, स्तुति गोविंद कह के की गयी है)
1.06.30- यज्ञ विरोधियों का उल्लेख 
1.06.24, 26- याज्ञिक ओषधियाँ, यज्ञ से उत्पन्न ( आर्यों का कृषिकार्य भी यज्ञ था) 
1.07.20- यज्ञ और दक्षिणा जुड़वाँ भाई बहन थे. बाद में पति-पत्नी हुए. 
1.07.26- दक्ष पुत्री सती का विवाह भाव ( गाव, शिव) के साथ 
1.09-02- दुर्वासा (उन्मत्त वृत्ति वाले), शंकर के अंशावतार (अनर्गल व्यवहार से परिपूर्ण ऐसे पौराणिक चरित्रों का रुद्र से जुड़ा होना स्वाभाविक ही था. क्योंकि रुद्र को जीवन के नकारात्मकताओं से ही सम्बंधित माना गया है.)
दुर्वासा द्वारा सरस्वति को शाप देने पर सावित्री द्वारा क्रोधाअत्मक वक्तव्य- ‘आः पाप, क्रोधोपहत, दुरात्मन्, अज्ञ, अनात्मज्ञ, ब्रह्मबंधो, मुनिखेट, अपसद, निराकृत, कथमात्मस्खलितविलक्षः-----‘ (हर्षचरित प्रथम उच्च्वास) 
संस्काररहित दुर्वासा को जाति से ब्राह्मण होने के कारण शाप नहीं दिया.
    
1:09:63- त्रिलोचन के साथ रुद्रों की अवधारणा 
1.09.43, 55, 71 - ईश्वर की विस्तृत परिभाषा, (quality not defined in terms of expanse of time) विद्या वेद और सम्पूर्ण जगत
1.09.97- समुद्र-मंथन में विष को नागों ने प्राप्त किया (शिव द्वारा विष ग्रहण करने का उल्लेख नहीं है). चंद्रमा को शिव ने प्राप्त किया. 
समुद्र मंथन से निकले विष को पी गये – (आदिपर्व 18:43)
1.09.144- कृष्णावतार में रुक्मिणी. 
1.10.17- पूर्वजन्म कर्म-फल वाद 
1.11.38- ध्रुव संदर्भ- बालक होने पर भी क्षात्र तेज से अक्षमा का अतिरेक. 
1:08 में रुद्र का वर्णन 
नाम रुद्र भव सर्व ईशान पशुपति भीम उग्र महादेव
स्थान सूर्य जल पृथिवी वायु अग्नि आकाश दीक्षित ब्राह्मण चंद्रमा
पत्नि सुवर्चला ऊषा विकेशी अपरा शिवा स्वाहा दिशा रोहिणी
पुत्र शनि शुक्र लोहितांग मनोजव स्कंद सर्ग संतान बुध
रुद्र+सती (दक्षपुत्री)
यज्ञ को कबीलाई आर्य समाज के धनोत्पादक गतिविधि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है. वेन उन प्रारम्भिक राजाओं में से एक है जिसने यज्ञ का भाग पारम्परिक हिस्सेदारों को देने से इंकार किया. विद्रोह स्वरूप कबीले के पुरोहित एवं अन्य योद्धाओं ने मिलकर उसकी हत्या कर दी. उसके पुत्र पृथु ने पुनः पारम्परिक व्यवस्था को स्वीकार किया, और प्रतापी राजा हुआ. 
ध्रुव- शिष्टि, भव्य ((ब्रह्माण्डपुराण 36:96 में सृष्टि. इसने अपने छाया को स्त्री होने को कहा.) 
भव्य- शम्भु
शिष्टि- रिपु, रिपुंजय, विप्र, वृकल, वृकतेजा
रिपु- चाक्षुष- मनु(छठे मंवंतर के अधिपति) + नड्वला( प्रजापति वैराज की पुत्री)- कुरु (उरु), पुरु, शतद्युम्न, सत्यवान, शुचि, अग्निष्टोम, अतिरात्र, सुद्युम्न, अभिमन्यु (अतिमन्यु), (अग्निपुराण के अनुसार कवि भी)
कुरु (उरु) + आग्नेयी- अंग, सुमना, ख्याति (स्वाति), क्रतु, अंगिरा, शिबि (अग्निपुराण में, जप)
अंग + सुनीथा (मृत्यु की पुत्री)- वेन (खुद को यज्ञपुरुष घोषणा किया)- निषाद, पृथु, 1:13:38, 40,,, 
{अंगिरा + सुनीथा (पितृ की पुत्री)- वेन} (मत्स्यपुराण 04:44)(वैसे यहीं पर सुनीथा (अथवा सुनृता) को धर्म की पुत्री बताकर स्वायम्भुव मनु के उत्तानपाद की पत्नी बताया गया है. दूसरी तरफ स्वायम्भुव मनु का पौत्र ध्रुव को पहले के पुत्री धन्या से शिष्ट नामक पुत्र की प्राप्ति बताया गया है.)    
पृथु- अंतर्द्धान, वादी 
अंतर्द्धान (+शिकगंडिनी)- हविर्द्धान (+ अग्निकुलीना धिषणा)- प्राचीनबर्हि (प्रजापति) (+ समुद्रकन्या सवर्णा)- प्रचेताओं की उत्पत्ति (+ मारिषा)- दक्ष (कर्मकाण्ड में दक्ष) प्रजापति    
कण्डु की पुत्री मारिषा (वृक्षों की कन्या, अयोनिजा) का विवाह दस पतियों (प्रचेताओं) से. इनसे दक्ष प्रजापति- 1:15:73
दक्ष के समय से ही स्त्री-पुरुष सम्बंध से संतति उत्पन्न होना शुरु हुआ. (विष्णुपुराण 1:15:79) 
ज्येष्ठता कनिष्ठता की अवधारणा नहीं था. दक्ष, सोम (वनस्पति का राजा) के नाती, फिर भी उनके स्वसुर हुए. (विष्णुपुराण 1:15:81, वायुपुराण 63:51)  
प्रभास (आठवाँ वसु)- विश्वकर्मा- अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, त्वष्टा, रुद्र, 
त्वष्टा- विश्वरूप
रुद्र- (हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, सर, कपाली)-1:15:125   
कश्यप (+ दनु)- द्विमूर्द्धा, शम्बर, अयोमुखा, शंकुशिरा, कपि, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, पुलोम, विप्रचित्ति
शम्भु, प्रह्लाद का पुत्र था. (वायुपुराण 67:76) 
स्वर्भानु की पुत्री प्रभा
वृषपर्वा- शर्मिष्ठा, उपदानी, और हयशिरा. 
वैश्वानर- पुलोमा और कालका. (ये दोनों मरिचिनंदन कश्यप की भार्या हुईं) (अन्यत्र, पुलोमा को भृगु की पत्नी कहा गया है)  
वर्ण-विभाजन – वि.पु. 3:08:27 
भृगु (+ ख्याति)- लक्ष्मी, धाता, विधाता 
मेरु पुत्रियाँ आयति और नियति, धाता और विधाता की पत्नी हुई. 
धाता और विधाता से क्रमशः प्राण और मृकण्डु हुए. मृकण्डु- मार्कण्डेय- वेदशिरा.
प्राण- द्युतिमान्- राजवान्