शिवरंजनी
गहरे निःशब्द रात्रि में
लम्हों के कारवें रुक जाते हैं जब
ठिठुरते पत्तों के आस-पास,
कराहता है कोई, उखड़े-उखड़े साँसों में
मेरे पास, मेरे रूह के गिर्द-ओ-पेश,
गुनगुनाता हूँ मैं, बेवजह
शिवरंजनी के सुरों को,
दूर कहीं, ऐसा लगता है,
जागती हो तुम चौंककर
ख्वाबों से
भटकते सुरों के दस्तक पे
गहन निःशब्द रात्रि में.
फिर, गाता हूँ मैं झूमकर
द्रुत शिवरंजनी
अपने आँसू को चूमकर
तुमको सुनाने को, या
खुद को बहलाने को-
गामजन हैं फिर से
लम्हों के कारवें
एक सुबह की ओर----
_ namit, 19.01.03 ___________
