Saturday, January 15, 2011

शिवरंजनी

शिवरंजनी

गहरे निःशब्द रात्रि में

लम्हों के कारवें रुक जाते हैं जब

ठिठुरते पत्तों के आस-पास,

कराहता है कोई, उखड़े-उखड़े साँसों में

मेरे पास, मेरे रूह के गिर्द-ओ-पेश,

गुनगुनाता हूँ मैं, बेवजह

शिवरंजनी के सुरों को,

दूर कहीं, ऐसा लगता है,

जागती हो तुम चौंककर

ख्वाबों से

भटकते सुरों के दस्तक पे

गहन निःशब्द रात्रि में.

फिर, गाता हूँ मैं झूमकर

द्रुत शिवरंजनी

अपने आँसू को चूमकर

तुमको सुनाने को, या

खुद को बहलाने को-

गामजन हैं फिर से

लम्हों के कारवें

एक सुबह की ओर----

_ namit, 19.01.03 ___________

Sunday, January 9, 2011

शिकायती शुभकामना

मैनें उससे नहीं कहा
हैप्पी न्यू ईयर
सुबह उठकर, पहली किरण के साथ ;
शायद ये सोचकर
कि वो मुझे भूल चुका है
पिछले साल के किसी गुमनाम दिन की तरह .
कि, उसके मन के कोने में
होंगे कितने ही लोगों कि तस्वीरें
कितनी ही और बातें,
जो ज्यादा जरूरी हैं
मेरे बेमतलब चेहरे के.
मेरी यादों के पुरानेपन के सिवा;
कई काम होंगें जरूरी,
साल के पहले दिन, सुनहले दिन.
जब उसके यादों में
उभरा नहीं मैं कोई अहसास बनकर.
मैंनें फोन की घंटी नहीं बजाई
कहने को 'सुप्रभात'
'नया प्रभात उसके जीवन में
जगमगाये, खुशियाँ नई लहराये
ताजे मस्तियों के झुँड
उसे दुलराये,
जो प्यारे हैं उसे, और भी मनभाये
जिसे वो भूलता है
वो भी उसे, मन ही मन,
चुपके से उसके लिये आँसू बहाये'!