न जाने क्यों मुझे लगता है कि कॉमनवेल्थ खेलों की
तैयारी को लेकर जो अफरातफरी का माहौल बना है, वह एक तरह से
भारत के हित में ही रहेगा. इस आयोजन ने “इंक्रेडिबल इंडिया”,
“शाइनिंग
इंडिया” जैसे चमकदार नारों के पीछे छुपे हुए व्यवस्थागत और नैतिक कमियों को
खोलकर एकबार फिर से सामने रख दिया है. हम भारतीय अपनी कमियों के बारे में बहुत
कुछ जानते तो हैं, लेकिन वह जानकारी उस गहरे अहसास में नहीं बदल
पाता, जिसके कारण हम अपने आप में बदलाव की जरूरत महसूस कर सकें. चीजों की
जानकारी एक बात होती है, और उसके प्रति जागरुकता दूसरी बात. सिर्फ
जानकारी ही बदलाव को जन्म देने के लिये काफी नहीं, इसके लिये
सजगता की आवश्यकता होती है, और अक्सर जागरुकता के लिये एक झटके की
जरूरत होती है. कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन में हमारी गैर-पेशेवर, भ्रष्ट
और घटिया स्तर के कारण पूरी दुनिया में जो भद्द पिटी है, और उससे जो
शर्म पैदा हुई है, वह हमारी जानकारियों को गहरे अहसास में बदलने में जरूर सहायक
होगा.
अपनी तमाम बड़ी सफलताओं के इस दौर में भारत एक अजीब
विडम्बनापूर्ण स्थितियों का सामना कर रहा है. जीवन के हर क्षेत्र में जहाँ
भारतियों के झंडे फहरा रहे है, हमारी सामुहिक असफलताएँ हमारा मुँह चिढा
रही हैं. भ्रष्टाचार एक समस्या से बढकर एक जीवन-पद्धति का रूप ले
रही है. व्यक्तिगत क्षमताओं से परिपूर्ण हमारी व्यवस्था में सरकारी या सामुहिक
संस्थाएँ बेइमानी, अक्षमता, अकुशलता, घटियापन
का पर्याय जैसे लगते हैं. गाँव में स्कूल-भवन, पंचायत-भवन, के निर्माण या मरम्मत का मामला हो या कोमनवेल्थ खेल जैसे बड़े आयोजन, इन
तमाम के पीछे एक अशुभ और विद्रुप चेहरा छुपा होता है. इसके बारे में सभी को पता है,
सभी
किसी न किसी कारण लाचार हैं, कि उसके खिलाफ कुछ नहीं बोलते. शायद ऐसा
कहें कि लाचार नहीं, वरन्, सिर्फ इस बात से
दुखी हैं कि पर्दे के पीछे के खेल में उन्हें मौका नहीं मिला. इस प्रकार की परिस्थिति
के हम अभ्यस्त हो चुके हैं. यह “अभ्यास” शायद इस बार
मिलनेवाली सामुहिक अपमान की झकझोर से शायद थोड़ी बदले, ऐसी उम्मीद
होती है. लोग कहते हैं ‘उम्मीद पर ही तो इतनी बड़ी दुनिया कायम है’
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