Sunday, September 26, 2010

शर्म का कॉमनवेल्थ

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न जाने क्यों मुझे लगता है कि कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी को लेकर जो अफरातफरी का माहौल बना है, वह एक तरह से भारत के हित में ही रहेगा. इस आयोजन ने इंक्रेडिबल इंडिया”, “शाइनिंग इंडियाजैसे चमकदार नारों के पीछे छुपे हुए व्यवस्थागत और नैतिक कमियों को खोलकर एकबार फिर से सामने रख दिया है. हम भारतीय अपनी कमियों के बारे में बहुत कुछ जानते तो हैं, लेकिन वह जानकारी उस गहरे अहसास में नहीं बदल पाता, जिसके कारण हम अपने आप में बदलाव की जरूरत महसूस कर सकें. चीजों की जानकारी एक बात होती है, और उसके प्रति जागरुकता दूसरी बात. सिर्फ जानकारी ही बदलाव को जन्म देने के लिये काफी नहीं, इसके लिये सजगता की आवश्यकता होती है, और अक्सर जागरुकता के लिये एक झटके की जरूरत होती है. कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन में हमारी गैर-पेशेवर, भ्रष्ट और घटिया स्तर के कारण पूरी दुनिया में जो भद्द पिटी है, और उससे जो शर्म पैदा हुई है, वह हमारी जानकारियों को गहरे अहसास में बदलने में जरूर सहायक होगा.

अपनी तमाम बड़ी सफलताओं के इस दौर में भारत एक अजीब विडम्बनापूर्ण स्थितियों का सामना कर रहा है. जीवन के हर क्षेत्र में जहाँ भारतियों के झंडे फहरा रहे है, हमारी सामुहिक असफलताएँ हमारा मुँह चिढा रही हैं. भ्रष्टाचार एक समस्या से बढकर एक जीवन-पद्धति का रूप ले रही है. व्यक्तिगत क्षमताओं से परिपूर्ण हमारी व्यवस्था में सरकारी या सामुहिक संस्थाएँ बेइमानी, अक्षमता, अकुशलता, घटियापन का पर्याय जैसे लगते हैं. गाँव में स्कूल-भवन, पंचायत-भवन, के निर्माण या मरम्मत का मामला हो या कोमनवेल्थ खेल जैसे बड़े आयोजन, इन तमाम के पीछे एक अशुभ और विद्रुप चेहरा छुपा होता है. इसके बारे में सभी को पता है, सभी किसी न किसी कारण लाचार हैं, कि उसके खिलाफ कुछ नहीं बोलते. शायद ऐसा कहें कि लाचार नहीं, वरन्, सिर्फ इस बात से दुखी हैं कि पर्दे के पीछे के खेल में उन्हें मौका नहीं मिला. इस प्रकार की परिस्थिति के हम अभ्यस्त हो चुके हैं. यह अभ्यासशायद इस बार मिलनेवाली सामुहिक अपमान की झकझोर से शायद थोड़ी बदले, ऐसी उम्मीद होती है. लोग कहते हैं उम्मीद पर ही तो इतनी बड़ी दुनिया कायम है’ ! 

Saturday, September 18, 2010

दुनियावाद

दुनिया का दुनियाकरण(वैश्वीकरण, globalisation) हो रहा है. अमरीका में किसी पास्टर की फितूर का सीधा असर भारत की अपनी पहले से उलझी हुई मर्ज को और उलझा देती है, अफगानिस्तान में अमरीकी सैनिक कार्रवाई पर पूरी दुनिया की निगाह लगी होती है, तो बीबीसी का हिन्दी कार्यक्रम अब लन्दन के बुश हाउस से प्रसारित न होकर दिल्ली के किसी गली से निकलकर हम तक पहुँच रही है. आतंकवाद का अंतर्राष्ट्रिय नेटवर्क हो या सूचनातंत्र का अंतर्जाल, हर समाज जाने-अनजाने ही एक वैश्विक व्यवस्था से जुड़ा हुआ पाता है. राष्ट्र की अवधारणा सिमटती हुई खेल-कूद में फहराये जानेवाले झंडो के ईर्द-गीर्द सिमटने लगी है. किसी भी घटना का विश्लेषण अब सिर्फ स्थानीय परिदृष्य का हिस्सा नही रहा, उसके बाहरी, और बाहरी आयामों की चर्चा जरूरी होती जा रही है. पेट्रॉल का दाम हो, या गेहूँ-सब्जी की, देशों की सीमाओं के आर-पार होनेवाले लेन-देन से सीधे-सीधे निर्धारित होने लगी हैं. लेकिन, ये सच का महज एक पक्ष है. दूसरी तरफ भारत जैसे देश में स्थानीय, गुटीय, जातीय पहचानों को स्थापित करने की एक बाढ सी आई हुई है. विकासशील देशों के भीतर सांस्कृतिक और आर्थिक स्वायत्तता की मारा-मारी के बीच यह भ्रम हो उठता है कि वास्तव में दुनियाकरण जैसी कोई बात कहीं घटित भी हो रही है या नहीं.
स्थानीयकरण और वैश्वीकरण को अगर हम एक साथ मिलाकर देखें तो इनके अंतर्विरोधों के बीच एक बड़ा घनिष्ठ अंतर्सम्बन्ध देखने को मिलता है. एक तथ्य तो यह सामने आता है कि लोगों की निगाहें अब बड़े परिदृष्य को एक साथ देख पाती हैं. दुनिया के एक छोर पर की स्थानीय घटना दूसरे जगहों पर अपना असर छोड़ती हैं. एक जगह का मजदूरों का प्रदर्शन दुनिया के अन्य भागों में मजदूर असंतोष को बल देता है. फैशन की दुनिया में स्थानीयता का असर सुदूर भागों में फैशन के ट्रेंड में भी देखने को मिलता है. 1990 के दशक में इस दुनियाकरण की अवधारणा के प्रति लोगों में जो भय और आशंका देखने में आई थी वह आज की हकीकत बन गयी है. स्थानीयकरण का भी वैश्वीकरण हो गया है. आज का मंत्र think globally, act locally ऐसे ही नहीं बन गया है. आज की हकीकत तो यही है कि बिना वैश्वुक सोच के हम अपनी किसी भी समस्या से सफलतापूर्वक नहीं लड़ सकते. मार्क्सवाद अपने जमाने में वैश्विकता की ओर ही एक प्रयास था. आज हम सचमुच वैश्विक आयामों में जीने की ओर उन्मुख हो रहे हैं.
1990 के शुरुआती दौर में वैश्विकरण जैसे शब्दों के प्रति एक बड़े वर्ग में इसके प्रति आशंका फैलाया गया कि यह राष्ट्रीय और स्थानीय पहचानों और स्वायत्तताओं के लिये एक बड़ा खतरा है. कि यह पश्चिमी पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा लाई गयी ऐसी साजिश है जिसका उद्देश्य मुख्यतः विकाशशील देशों के संसाधनों और रोजगारों को अपने हित में उपयोग करना है. हो सकता है ऐसी आशंकाओं का अपना आधार हो. लेकिन, सभी बातों की एक बात कि दुनियावाद आज की बड़ी ताकतवर हकीकत के रूप में हमारे सामने है, और कि यह किसी अन्य वाद की महज corollary भर नहीं है. , वह चाहे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद हो, गरमाती पर्यावरण का मसला हो, या दुनिया की गरीबी के खिलाफ जंग हो, इन सब का निदान सिर्फ स्थानीय प्रयासों से सम्भव नहीं.

Wednesday, September 8, 2010

इस्लाम को जानते हुए


दुनिया के लोकप्रिय धर्मों सम्प्रदायों के वैचारिक बनावट, उसकी विशेषता और स्वरूप को जानने के लिये महज उस धर्म से जुड़े ग्रंथों का अद्ध्ययन ही काफी नहीं, ऐसा मेरा मानना है. किताबों मे लिखे हुए धर्म का स्वरूप बद्धमूल अवधारणाओं का वो फॉसिलाईज्ड ब्लूप्रिंट कहा जा सकता है जो उस धर्म के ऐतिहासिक विकास को समझने में सहायक होता है. धर्म का किताबी स्वरूप उस धर्म के जीवंत संस्करण से बहुत कुछ अलग होता है. धर्म का व्यवहारिक पक्ष किताबों में बताये गये सीमा रेखाओं से बाहर दूसरी सांस्कृतिक धार्मिक व्यवहारों के साथ ऐसा घुला मिला होता है जिसे हम किताबों के अन्दर ढूँढने की कोशिश करते है. समाज के अन्दर धर्मों के मूलभूत स्वरूप के प्रतीक बाहरी तौर पर जितने अलग-अलग दिखते हैं वैसा इंसानों के अन्दर उनकी सोचों में नहीं होता. अन्दर से एक व्यक्ति का धार्मिक सोच बड़ा ही जटिल और जीवंत होता है. बाहरी तौर पर धार्मिक किताबें जिस प्रकार की सीमांकण करती हैं वो आंतरिक सोच के स्तर पर ज्यादा उद्दात्त और दूसरे सोचों के साथ गुँथे होते है.
मेरी समझ में ये बात नहीं आती कि इस्लाम जैसे धर्म के बारे में हमारी अवधारणा महज उन बातों पर आधारित होती है जो कुछ कट्टर सोचवाले लोगों द्वारा प्रचारित होता है. हम इस्लाम के बारे जो कुछ सोचते या कहते हैं वो महज धार्मिक किताबों में वर्णित अवधारणाओं में से कुछ खास पर ही आधारित होती हैं. और यह तब जब हमारी उस धार्मिक किताब के बारे में जानकारी काफि सीमित होती है. हम अगर इस्लाम के बारे में कुछ कहना चाहते हैं तो हमें उन तमाम वैचारिक और धार्मिक विचारों को परिप्रेक्ष्य में रखकर कहना होगा जो इस्लाम को माननेवाले महान विचारकों ने पिछले लगभग 1500 वर्षों में कहा है और उसे जिया है. इस्लाम धर्म सिर्फ वही कुछ नहीं है जो इस्लामी धर्म ग्रंथों में अभिव्यक्त हुआ है, परंतु वह, वह सब भी है जो पिछले युगों में दुनिया के विभिन्न कोनों में इस्लाम को माननेवालों ने बौद्धिक स्तर पर जिया, सोचा, और इस्लाम को एक सम्मृद्ध वैचारिक परिदृष्य प्रदान किया है.