Wednesday, November 25, 2009

अर्थवान क्षण

अर्थवान क्षण

शाम उतरी, झुकी

शीशम के नये पत्तों पर

झुकी-

गुलदाउदी के मुरझाये फूलों पर

अचेतन को छूकर

एक संगीत उभरा---

आम्र मंजरियाँ अलसा गयीं

और शाम

अवश उदास मिली टहनियों से

विदा लेती हुई

अन्धेरा व्यापने लगा

उस अकेली झोपड़ी के पास

अकेला खड़ा मैं

देखता हूँ -

अन्धकार की छाया में

उभरती-डूबती स्मृतियाँ

और सोचता हूँ

उतना नहीं जिया

जितनी उम्र है अपनी ।

रंगों की गन्धों की, आकाश की नीलिमा

ठंडी बयारों की,

कुनमुनायी धूप, और तपती दोपहरी,

चेतना सी उषा ,

और उदासी सी शाम

तुम्हारी गदरायी बाँहों के क्षण

जो गले पड़े

कितनी बार तुम्हारी आँखों को

सपना मैं बना

कितने आँसू मेरे मन में उतरे

तैरे, बहे

उन सबकी स्मृतियाँ, (अनुभूतियों के)

उनके क्षण-पल

उनकी अनुभूतियाँ

कितनी कम हैं ?

तब लगता है-

सभी क्षण बरसों के जिये नहीं गये

जीवित-क्षण थोड़े हैं-गहरे हैं,

भीतर कहीं ठहरे हैं ।

-अशोक "अशु"

अर्थवान क्षण

शाम उतरी,

शीशम के नये पत्तों पर

झुकी--

गुलदाउदी के मुरझाये फूलों पर

अचेतन को छूकर

एक संगीत उभरा---

आम्र मंजरियाँ अलसा गयीं

और शाम

अवश, उदास मिली टहनियों से

विदा लेती हुई,

अन्धेरा व्यापने लगा

उस अकेली झोपड़ी के पास

अकेला खड़ा मैं

देखता हूँ -

अन्धकार की छाया में

उभरती-डूबती स्मृतियाँ

और सोचता हूँ

उतना नहीं जिया

जितनी उम्र है अपनी ।

रंगों की गन्धों की, आकाश की नीलिमा

ठंडी बयारों की,

कुनमुनायी धूप, और तपती दोपहरी,

चेतना सी उषा ,

और उदासी सी शाम

तुम्हारी गदरायी बाँहों के क्षण

जो गले पड़े

कितनी बार तुम्हारी आँखों का

सपना मैं बना

कितने आँसू मेरे मन में उतरे

तैरे, बहे

उन सबकी स्मृतियाँ, (अनुभूतियों के)

उनके क्षण-पल

उनकी अनुभूतियाँ

कितनी कम हैं ?

तब लगता है-

सभी क्षण बरसों के जिये नहीं गये

जीवित-क्षण थोड़े हैं-गहरे हैं,

भीतर कहीं ठहरे हैं ।

-अशोक "अशु"

Monday, September 21, 2009

टॉर्च और हक़ीकत्

य़ह एक टॉर्च है
इससे ख्वाब नहीं देखे जाते ,
हाँ
टूटे ख्वाबों के टुकड़े
बिखड़े पड़े होते हैं जो
दिन के उजालों में ,
चुभते हैं जो
बदन के अन्दर छुपे
मुरझाये हुए
अहसासों को ,
या
जो खटकते हैं
पुरानी तस्वीरों के
चटखते रंगों में
नागवार धब्बे की तरह,
उन्हें देखना
इस टॉर्च के उजालों के बाहर
फैले गहन अन्धकार में
जो इंसान की
ख्वाबीदा हक़ीक़तों को
मुँह चिढाते हैं
-19सेप2009

Friday, July 17, 2009

अहसास्

जो सोचता हूँ मैं

महसूसता हूँ जो

वह नहीं
इस कमरे जैसी छोटी

सिमटी, उदास रंगों की लिबास में
,

दिवारों पे उकेरी गयी

बेडौल हर्फों-लकीरों जैसी

या, इस मच्छरदानी जैसी

जिसका हुदूद

इक बदन के सिमटेपन से भी

शिकस्त है

इस बिछावन की
चौराई की तरह।


मैं जो चाहता हूँ सोचना

वह फैला है
तुम्हारी लम्बी जुल्फों की
बेहुदूद कैद सी
,

तुम्हारे ख्वाब की
उन मखमली सिलवटों की

अंतहीन कैफियत जैसी,

जिसमें डूबकर
हम भूल जाते हैं
हिकारत
इंसानी हैसीयत और
कायनाती आसमानियत को ।

Saturday, June 20, 2009

इशमेला गाँव की होली

ग्रामीण जीवन की मस्ती का पारम्परिक स्रोत वहाँ के त्योहार, शादियाँ, कीर्तन, आरती, और ऐसे ही कितने तरह के अनुस्ठानों पर होनेवाले सामुहिक गाना-बजाना सबसे प्रमुख रहा है. मेरे गाँव में विभिन्न धार्मिक, सांस्क्रितिक एवँ सामाजिक अवसरों पर गाने-बजाने की एक सम्मृद्ध परम्परा रही है. जन्मोत्सव, पूजा-आरती, होली, चैत्र महीने जैसे अवसरों पर पुरुषों द्वारा गाने की सम्मृद्द्ग परम्परा रही है. गाने-बजाने के प्रमुख अवसरों में सबसे पहला स्थान होली गीतों का आता है. होली किसी एक दिन का अनुस्ठान नहीं होता, बल्कि यह तो एक पूरे मौसम की ओर इशारा करता है जिसमें गाँव की मस्ती ठहर-ठहर कर सूरों, तालों की थाप, और झाल-करतालों की झंकार के रूप में प्रकट होती है. होली गाने का दौर वसंत-पंचमी के दिन से शुरू होकर होली की रात तक चलता रहता है. भांग-गांजे की मस्ती तो बस कुछ लोगों के लिये ही होती है, होली के सुरों और थाप-झंकारों का सुरूर तो किसी के सर से पूरे फागुन और चढती चैत तक नहीं उतरता. वसंत-पंचमी के दिन से होली गायन का आयोजन दरवाजे-दरवाजे कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर होली के दिन तक चलता रहता है. अक्सर यह आयोजन रातों को ही किया जाता है. गाँव भर के लोगों को आयोजनकर्ता के यहाँ से होली गाने का निमंत्रण दिया जाता है. इस आयोजन के लिये ढोलक, झाल का होना लाजमीहै, इसलिये आयोजंकर्ता का मुख्य काम इन साजों को बटोरना होता है. इसके साथ-साथ होली गाने वालों के लिये चाय, भांग की ठंडई, पान-बीड़ी-सिगरेट, और साथ में थोड़ा काली-मिर्चयुक्त नमक की व्यवस्था करनी होती है. इसके साथ गाँजे की अल्प मात्रा अगर उपलब्ध रहे तो कुछ गवैय्ये के लिये विशेश प्रोत्साहन जैसा होता है.
शाम के आठ-नौ बजे लोगों का जमावड़ा होने लगता है, जो आधे-एक घंटे के अन्दर होरी हो के धूम डूब जाता है. कोई और मनोरंजन इस मस्ती से होर नही ले सकती. यह एक समाँ का रूप होता है जिसमें बच्चे-बूढे, जवान सभी मद-मस्त डूब जाते हैं. होली के ये गीत मुख्यतया धार्मिक एवं शृगारिक होते हैं. हमारे गाँव इशमेला मे गाया जानेवाला होली आस-पास के गावों से एकदम भिन्न होता है. इसके पीछे की घटना को हमारे गाँव के श्री श्याम्बहादुर सिंह ने मुझे बताया. उनके अनुसार, हमारे गाँव में भी अन्य गाँवों की तरह दोपदी होली गाने का चलन था जिसमे उसी पद को बार-बार नये जोश के साथ दुहराया जाता था. एक बार एक साधु हमारे गाँव पधारे. होली का मौका था, उन्होंने उसी पुराने होली-गायन को सुना और पूछा कि हमलोग ऐसी होली क्यो गाते हैं. जब लोगों ने साधु से पूछा कि तब कैसी होली गानी चाहिये तो उन्होंने अभी गाये जानेवाले बहुपदी होली लोगों को लिखवाया. उन होलियों में से कुछ होली के रचयिता के रूप में मेरे गाँव के नन्दकुँवर त्रिपाठी का नाम जुड़ा हुआ है. इनमें से कुछ होली की रचना दिवंगत शंकर त्रिपाठी रहे हैं. इस ब्लोग में नीचे दिये गये होली के अतिरिक्त 'बारहमासा' समेत कुछ और भी शृगारिक रचनाएँ गायी जाती हैं जो आगे कभी यहाँ डाला जायेगा.
होली के बाद चैता का भी वही रंग देखा जा सकता है. इसके अतिरिक्त बच्चे के जन्म के समय गाया जानेवाल सोहर, मंगल और बधाई जैसे गीतों को भी पुरुष वर्ग पूरी मस्ती में गाते है. नृसिन्ह भगवान की पूजा के अवसर पर गाया जानेवाला आरती इतने कठिन सुरों में बन्धा है कि उसे सभी नहीं गा पाते. सत्यनारायण की पूजा हो या हनुमानजी की ध्वजा की स्थापना आरती-गायन आवश्यक है. इन्हें भी इस ब्लोग में डाला जायेगा.