ग्रामीण जीवन की मस्ती का पारम्परिक स्रोत वहाँ के त्योहार, शादियाँ, कीर्तन, आरती, और ऐसे ही कितने तरह के अनुस्ठानों पर होनेवाले सामुहिक गाना-बजाना सबसे प्रमुख रहा है. मेरे गाँव में विभिन्न धार्मिक, सांस्क्रितिक एवँ सामाजिक अवसरों पर गाने-बजाने की एक सम्मृद्ध परम्परा रही है. जन्मोत्सव, पूजा-आरती, होली, चैत्र महीने जैसे अवसरों पर पुरुषों द्वारा गाने की सम्मृद्द्ग परम्परा रही है. गाने-बजाने के प्रमुख अवसरों में सबसे पहला स्थान होली गीतों का आता है. होली किसी एक दिन का अनुस्ठान नहीं होता, बल्कि यह तो एक पूरे मौसम की ओर इशारा करता है जिसमें गाँव की मस्ती ठहर-ठहर कर सूरों, तालों की थाप, और झाल-करतालों की झंकार के रूप में प्रकट होती है. होली गाने का दौर वसंत-पंचमी के दिन से शुरू होकर होली की रात तक चलता रहता है. भांग-गांजे की मस्ती तो बस कुछ लोगों के लिये ही होती है, होली के सुरों और थाप-झंकारों का सुरूर तो किसी के सर से पूरे फागुन और चढती चैत तक नहीं उतरता. वसंत-पंचमी के दिन से होली गायन का आयोजन दरवाजे-दरवाजे कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर होली के दिन तक चलता रहता है. अक्सर यह आयोजन रातों को ही किया जाता है. गाँव भर के लोगों को आयोजनकर्ता के यहाँ से होली गाने का निमंत्रण दिया जाता है. इस आयोजन के लिये ढोलक, झाल का होना लाजमीहै, इसलिये आयोजंकर्ता का मुख्य काम इन साजों को बटोरना होता है. इसके साथ-साथ होली गाने वालों के लिये चाय, भांग की ठंडई, पान-बीड़ी-सिगरेट, और साथ में थोड़ा काली-मिर्चयुक्त नमक की व्यवस्था करनी होती है. इसके साथ गाँजे की अल्प मात्रा अगर उपलब्ध रहे तो कुछ गवैय्ये के लिये विशेश प्रोत्साहन जैसा होता है.
शाम के आठ-नौ बजे लोगों का जमावड़ा होने लगता है, जो आधे-एक घंटे के अन्दर होरी हो के धूम डूब जाता है. कोई और मनोरंजन इस मस्ती से होर नही ले सकती. यह एक समाँ का रूप होता है जिसमें बच्चे-बूढे, जवान सभी मद-मस्त डूब जाते हैं. होली के ये गीत मुख्यतया धार्मिक एवं शृगारिक होते हैं. हमारे गाँव इशमेला मे गाया जानेवाला होली आस-पास के गावों से एकदम भिन्न होता है. इसके पीछे की घटना को हमारे गाँव के श्री श्याम्बहादुर सिंह ने मुझे बताया. उनके अनुसार, हमारे गाँव में भी अन्य गाँवों की तरह दोपदी होली गाने का चलन था जिसमे उसी पद को बार-बार नये जोश के साथ दुहराया जाता था. एक बार एक साधु हमारे गाँव पधारे. होली का मौका था, उन्होंने उसी पुराने होली-गायन को सुना और पूछा कि हमलोग ऐसी होली क्यो गाते हैं. जब लोगों ने साधु से पूछा कि तब कैसी होली गानी चाहिये तो उन्होंने अभी गाये जानेवाले बहुपदी होली लोगों को लिखवाया. उन होलियों में से कुछ होली के रचयिता के रूप में मेरे गाँव के नन्दकुँवर त्रिपाठी का नाम जुड़ा हुआ है. इनमें से कुछ होली की रचना दिवंगत शंकर त्रिपाठी रहे हैं. इस ब्लोग में नीचे दिये गये होली के अतिरिक्त 'बारहमासा' समेत कुछ और भी शृगारिक रचनाएँ गायी जाती हैं जो आगे कभी यहाँ डाला जायेगा.
होली के बाद चैता का भी वही रंग देखा जा सकता है. इसके अतिरिक्त बच्चे के जन्म के समय गाया जानेवाल सोहर, मंगल और बधाई जैसे गीतों को भी पुरुष वर्ग पूरी मस्ती में गाते है. नृसिन्ह भगवान की पूजा के अवसर पर गाया जानेवाला आरती इतने कठिन सुरों में बन्धा है कि उसे सभी नहीं गा पाते. सत्यनारायण की पूजा हो या हनुमानजी की ध्वजा की स्थापना आरती-गायन आवश्यक है. इन्हें भी इस ब्लोग में डाला जायेगा.
Saturday, June 20, 2009
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3 comments:
bahut khub.narayan narayan
हिंदी भाषा को इन्टरनेट जगत मे लोकप्रिय करने के लिए आपका साधुवाद |
Pahli baar aapke blog par aana hua.Ek achche anubhav ke liye dhanywaad.
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