जो सोचता हूँ मैं
महसूसता हूँ जो
वह नहीं
इस कमरे जैसी छोटी
सिमटी, उदास रंगों की लिबास में
,
दिवारों पे उकेरी गयी
बेडौल हर्फों-लकीरों जैसी
या, इस मच्छरदानी जैसी
जिसका हुदूद
इक बदन के सिमटेपन से भी
शिकस्त है
इस बिछावन की
चौराई की तरह।
मैं जो चाहता हूँ सोचना
वह फैला है
तुम्हारी लम्बी जुल्फों की
बेहुदूद कैद सी
,
तुम्हारे ख्वाब की
उन मखमली सिलवटों की
अंतहीन कैफियत जैसी,
जिसमें डूबकर
हम भूल जाते हैं
हिकारत
इंसानी हैसीयत और
कायनाती आसमानियत को ।
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Friday, July 17, 2009
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