Monday, July 22, 2024

कौरव देवापि और भृगुवंश

 कुरुओं के वंश-वर्णन के क्रम में,  

ब्रह्मपु.13:117 कहता है कि प्रतीप का ज्येष्ठ पुत्र देवापि मुनि हो गया. आगे, देवापि को देवताओं का ‘उपाध्याय’ कहा गया है. ‘उपाध्यायस्तु देवानां देवापिरभवन्मुनिः, च्यवनपुत्रः कृतक इष्ट आसीन्महात्मनः‘. साथ में कहा गया कि च्यवनपुत्र कृतक माहात्मा देवापि का इष्ट था. 

हरि.पु.1:32:71 भी कुल मिलाकर ब्रह्मपु.13:117 की बात को ही कहता है. लेकिन,  

‘उपाध्यायस्तु देवानां देवापिरभवन्मुनिः, च्यवनस्य कृतः इष्टः च आसीन्महात्मन:’. अनुवाद है, ‘देवापि देवताओं का उपाध्याय और मुनि हुआ. महात्मा च्यवन ने उसे अपना पुत्र बना लिया’. 

अब वाय.पु.99:236 और 237 को देखते हैं. यह कहता है, 

‘देवापिस्तु प्रवव्राज वनं धर्म्मपरीप्सया, उपाध्यायस्तु देवानां देवापिरभवन्मुनिः’. 99:236 

‘च्यवनोऽस्य हि पुत्रस्तु इष्टकश्च महात्मनः, शन्तनुस्त्वभवद्राजा विद्वान् वै स महाभिषः’. 99:237

अनुवाद है, ‘धर्म की इप्सा (चाहत) से देवापि वन को प्रव्रजित हो गया. यह देवताओं का उपाध्याय और मुनि हो गया. च्यवन और इष्टक इसके पुत्र थे. शंतनु राजा हुआ, जो विद्वान् और महाभिष (चिकित्सक) था’. 

देखते हैं कि मात्स्यपु.50:39 क्या कहता है. 

‘वाह्लीकस्य तु दायादाः सप्त वाह्लीश्वरा नृपाः, देवापिस्तु ह्यपध्यातः प्रजाभिरभवन्मुनिः’. 

यहाँ बाह्लीक पुत्रों को सप्त बाह्लीश्वर कहा गया है. श्लोक के दूसरे हिस्से पर गौर करना महत्वपूर्ण है. यह कहता है कि प्रजा द्वारा भला-बुरा कहे जाने पर देवापि मुनि हो गया.’ इसके बाद देवापि के मुनि होने के कारण को विस्तार दिया गया है. कहा गया है कि ‘राजपुत्र देवापि कुष्ठग्रस्त हो गया था, जिसके कारण उसकी प्रजा ने उसका तिरष्कार किया (नाभ्यपूजयन्). और मजबूर होकर उसे वनवासी होना पड़ा. देवापि के दो पुत्रों, च्यवन और इष्टक, का मात्स्यपु. में उल्लेख नहीं है. 

पौराणिक साहित्य के बदलते हुए गल्प से निकलकर हम अधिक विश्वसनीय कर्मकाण्डीय साहित्य की ओर चलते हैं. श.ब्रा.13:05:03:05 और 13:05:04:01 में ‘इंद्रोत दैवाप शौनक’ का उल्लेख है. इंद्रोत शौनक को दैवाप कहने का तात्पर्य है कि यह व्यक्ति शांतनु के भाई देवापि के वंश का था. इसी दैवाप शौनक को पौराणिक साहित्य में जनमेजय का भार्गववंशी ऋत्विज बताया गया है. और वायव्यपुराण के अनुसार च्यवन और इष्टक को देवापि के पुत्र बताया गया है. च्यवन पौराणिक साहित्य में भृगुवंशी चरित्र है. सोचने समझने में सक्षम व्यक्ति के लिये देवापि, दैवाप शुनक, च्यवन की आपसी रिश्तेदारी पानी की तरह साफ हो जाता है. 

अपने समय के नकारात्मक चरित्र देवापि के लिये ‘अपध्यात’ शब्द को क्रमशः बदलकर ‘उपाध्याय’ कैसे किया, यह भी देखना मजेदार है. देवापि के पुत्र च्यवन होने के सच को उलटकर च्यवन द्वारा देवापि को पुत्र के तौर पर स्वीकार किये जाने की कहानी कैसे गढी गयी, यह भी महत्वपूर्ण है.

-------------- 

और यह महज हल्की सी झाँकी है. पौराणिक साहित्य का समाशास्त्रीय अध्ययन बहुत जरूरी है.


Thursday, May 16, 2024

राम द्वारा सीता परित्याग की पृष्ठभूमि

- वाल्मीकिरामायण 7:43:15 के अनुसार भद्र नामक सहचर और विदूषक ने राम को जनसाधारण में सीता के चारित्रिक शुद्धता को लेकर लोकापवाद के बारे में विस्तार से बताया. 7:45:12 में सीता को लेकर ‘पौरापवाद’ और जनपद में ‘अकीर्ति’ फैलने के कारण राम ने सीता को तपोवन भेजने का निर्णय किया. 

- वाल्मीकि रामायण की एकदम यही बात रघुवंशम 14:32 में वर्णित है. 

- उत्तररामचरितम 1:40 में दुर्मुख नामक गुप्तचर राम को नगर और जनपद के लोगों के बीच सीता के चरित्र को लेकर फैले अफवाह के बारे में बताता है. 

- पद्मपुराण1:36:09 में सीता के त्याग का भी उल्लेख है, ‘लोकवाक्याद्विसर्जिता’. पद्मपुराण 5:56:23 में गुप्तचर राम को एक धोबी (रजक) द्वारा सीता की पवित्रता पर संदेह को लेकर राजा की निंदा करने वाली बात कही.

- भागवतपुराण 09:11:08 अपनी प्रजा की स्थिति जानने के लिये रात में घूमते हुए राम ने किसी व्यक्ति द्वारा उसकी पत्नी से सीता की पवित्रता पर संदेह वाली बात खुद सुनी.

- रामचरितमानस में राम द्वारा सीता के परित्याग का पूरा प्रसंग ही छोड़ दिया गया.