Monday, August 24, 2020

क्षत्रियों का अंत और पुनरुद्धार

 क्षत्रियों का अंत और पुनरुद्धार 

वायुपुराण 99:445 में 

‘क्षत्रस्यैव समुच्छेदः सम्बंधः वै द्विजैः स्मृतः, मन्वन्तराणां सप्तानां संतानाश्च सुताश्च ते’

 अर्थात् ‘सातों मन्वन्तरों में क्षत्रियों का उच्छेद होता है, और सम्बंध में वे ब्राह्मणों के संतान और पुत्र होते है’. 

इस बात को समस्त पौराणिक साहित्य में बार बार अलौकिक कहानियों के माध्यम से दुहराया गया है. 

वायुपुराण 99:447 में 

‘सप्तर्षयो विदुस्तेषां दीर्घायुः अक्षयाः तु, एतेनं क्रमयोगेण ऐलेक्ष्वाक्वन्वया द्विजाः’

अर्थात् ‘सप्तर्षि लम्बी उम्र के कारण युगों एवं ब्रह्म क्षत्र के उद्भव, प्रवृत्ति, और उनके क्षय के बारे में जानते हैं. विद्वान सप्तर्षि दीर्घायु और अक्षय हैं’. 

इसके साथ वायुपुराण 99:433 में यह भी स्वीकारोक्ति है कि विवस्वान के वंश के 

‘ब्राह्मणाः वैश्याः शूद्राश्चैवान्वये स्मृताः’, 

अतः ‘विवस्वान के वंश में ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र जुड़े हुए हैं’. 

आगे यह भी कहा गया कि ऐल (चंद्रवंशी) और इक्ष्वाकु (सूर्यवंशी) वंश में उत्पन्न होने वाले द्विज (ब्राह्मण) त्रेता में जन्म लेते हैं, कलियुग में क्षय को प्राप्त होते हैं. अतः क्षत्रिय वंश में उत्पन्न होने वाले ब्राह्मण कुल को कम महत्वपूर्ण मानने की भी धारणा यहाँ पाई जाती है. अतः पुरोहितों के बीच भी दो प्रकार के स्रोत समझने की बात की गयी है, 

  1.  वो जो सीधे ब्रह्मा के मानस पुत्रों की वंश परम्परा के है, और 
  2.  वो जिनका जन्म क्षत्रिय वंशों में हुआ है.

प्रतिक्रियावादी पुरोहितों को इस बात की व्याख्या करना था, कि आर्य संस्कृति का सबसे सम्मानित ऋक, यजुष, और अथर्वन की रचना करने वाले क्षत्रियों या उनकी संतानों को ब्राह्मण मानकर धर्मशास्त्रीय उलझन से कैसे बचा जाये ! 

विभिन्न स्रोतों से आये हुए आर्य जनों को एक साझे स्रोत में बांधने के लिये मनु और मन्वन्तरों की एक शृन्खला वाली अवधारणा तैयार करने के साथ सप्तर्षियों और मानस पुत्रों की कल्पना की गयी, जो ब्रह्मा के आदेश पर सृष्टि रचते हैं. ये सप्तर्षि और मानस-पुत्र ब्राह्मण माने गये, क्योंकि वो ब्रह्मा से उत्प्पन्न थे. इससे यह साबित किया गया, कि जो पुरोहित सीधे मानसपुत्रों से उत्पन्न हैं, वो विशुद्ध ब्राह्मण हैं. और जो क्षत्रियों से उत्पन्न हुए, वह भी घुमा फिरा कर ब्राह्मण थे, क्योंकि यज्ञ के सभी देवताओं समेत क्षत्रियों को कश्यप से उत्पन्न बताया गया था, जो ब्रह्मा का एक मानस पुत्र था. धर्मशास्त्रीय जातिवादी सोच ने ऐसी कल्पनाशीलता को उड़ने के लिये मजबूत पंख दिया.

सृष्टि में क्षत्रियों के आत्याचार और निरंकुशता को समाप्त करने के लिये परशुराम जैसे चरित्र की कल्पना की गयी. वायुपुराण 99:449 में परशुराम द्वारा सभी क्षत्रियों को शेष करने का उल्लेख है. यह कहानी अन्य तमाम पुराणों में अलौकिक विवरण के साथ प्रस्तुत किया गया है. परशुराम द्वारा क्षत्रिय कुलों का उच्छेद होने के बाद क्षत्रिय राजवंशों के पुनरोद्धार का उल्लेख है. मगर वायुपुराण पुनरुद्धार की प्रक्रिया के बारे में यहाँ कुछ नहीं कहता. पौराणिक (महाभारत समेत) आख्यानों में अन्य स्थानों पर इसके बारे में यह कहा गया कि क्षत्राणियों ने पुरोहितों से अपने वंश के लिये संतान उत्पन्न किये. इस प्रकार की कहानियों से पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है, जिसमें कथित पुरोहित को रानियों के साथ संतान उत्पन्न करते हुए बताया गया है. 

इस प्रकार की अपमानजनक अवधारणा को बाद वाले पौराणिक संस्करणों में तो और भी शातिर तरीके से स्थापित किया गया है. जिस युग में पुराण साहित्य लिखा गया उस समय उत्तर भारतीय समाज बाहर में यवन, शक, कुशान, हूण, आभीर समेत उत्तर पश्चिम से अनेक अनार्य कबीलों के आगमन से बाहरी लोगों का राजनीतिक वर्चश्व बढा. प्राचीन क्षत्रिय राजवंशों का प्रभाव नये क्षत्रियों के सामने फीका पड़ रहा था. नये लोग पहले से स्थापित समाज के पुरोहित वर्ग से इसी बात को लेकर संतुष्ट था कि नये क्षत्रियों को प्राचीन राजवंशावलियों से जोड़ दिया गया था. ऐसे क्षत्रियों का आर्यों के प्राचीन साहित्य से कोई सम्बंध नहीं था. इस स्थिति का उपयोग प्रतिक्रियावादी पुरोहितों ने धार्मिक क्षेत्र में अपनी मनमानी करने में की.

Friday, August 21, 2020

जनमेजय और क्षत्रिय-पुरोहित सम्बंध

 वायुपुराण 99:250 में इसका उल्लेख है कि परिक्षित पुत्र जनमेजय ने वाजसनेयिक पुरोहितों को संरक्षण देकर उनकी मर्यादा प्रतिष्ठा की, 

‘परीक्षितस्तु दायादः राजा आसीत जनमेजयः, 

ब्राह्मणान्स्थापयामास स वै वाजसनेयिकान्’.

अर्थात्, 'परीक्षितपुत्र राजा जनमेजय ने वाजसनेयी ब्राह्मणों की स्थापना की'. 

मत्स्यपुराण 50:60 के अनुसार जनमेजय द्वारा शुक्ल यजुर्वेद को प्रोत्साहन देने को ब्राह्मणों के ऊपर क्षत्रियों की जीत कहा गया है, 

‘क्षत्रस्य विजयं ज्ञात्वा ततः प्रभृति सर्वशः, 

अभिगम्य स्थिताश्चैव नृपं च जनमेजयम्’, 

अर्थात् ‘तब से क्षत्रियों का ब्राह्मणों के ऊपर विजय की बात जानकर दूर दूर से लोग शुक्ल यजुर्वेद को प्रोत्साहन देने वाले राजा जनमेजय के निकट रहना प्रारम्भ किया’. 

इससे यह बात निकल कर आती है कि तत्कालीन क्षत्रियों, ब्राह्मणों के एक समूह, और वैश्यों ने जनमेजय के धार्मिक सुधार वाले कदम का समर्थन किया. वैशम्पायन ने उसके इस कार्य को सहन नहीं किया. जनमेजय ने वाजसनेय को अपने यज्ञों का ब्रह्मा(पर्यवेक्षक पुरोहित) नियुक्त किया, जिससे वैशम्पायन ने उसे शाप दिया, कि वाजसनेयी सम्हिता को आनेवाले समय में सम्मान प्राप्त नहीं हो पायेगा. उसने अपने जीवन काल तक जनमेजय का विरोध करने की ठान ली. इसके समर्थक पुरोहितों ने जनमेजय के लिये कदम कदम पर मुश्किलें खड़ी कीं. जनमेजय ने वाजसनेयी सम्हिता के आधार पर दो अश्वमेध यज्ञ किये.

‘द्विरश्वमेधमाहृत्य ततो वाजसनेयकम्, प्रवर्तयित्वा तद्ब्रह्म त्रिखर्वी जनमेजय’ (वायुपुराण 99:254). 

 पुरोहितों के तीन विरोधी समूहों (त्रिखर्वी); अश्वकमुख्य, अंगनिवासी, और मध्यदेशीय, ने जनमेजय और वाजसनेयी सम्हिता का बहिष्कार किया. आगे चलकर मध्यदेशीय पुरोहित वर्ग धार्मिक तौर पर सबसे कट्टर होकर उभरा, यह एक तथ्य है. जनमेजय के शापित होकर उसके नष्ट होने का उल्लेख है. हालाँकि, वास्तविकता यही है कि आने वाले समय में शुक्ल यजुर्वेद की लोकप्रियता बढती गयी. ब्रह्मपुराण 231:12 इस बात की गवाही देता है. वाजसनेयिक पुरोहितों की लोकप्रियता को कलियुग के प्रभाव के तौर पर उल्लेख किया गया है,

सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति द्विजा वाजसनेयिकाः, शूद्राभा वादिनश्चैव ब्राह्मणाश्चान्त्यवासिनः॥ २३१.१२॥

अर्थात्, 'सभी वाजसनेयिक ब्रह्मवादी होंगे, ब्राह्मण शूद्र के समान तेजोहीन एवं विवादी होंगे'.

सम्भव है कि वैशम्पायन की संततियों समर्थकों ने आने वाले समय में अन्य प्रकार से क्षत्रिय वर्चश्व का विरोध किया हो !  

इससे स्पष्ट है कि जनमेजय के समय में कुलीन पुरोहित वर्ग दो धड़ों में विभक्त हो गया. इसका प्रभाव राजाओं एवं पुरोहित वर्ग के बीच गहन धार्मिक मतभेद के रूप में सामने आया. 

आगे चलकर धार्मिक कारण से उभरे मतभेदों को बाद के पौराणिकों ने कई अन्य कारण से भी काफी बढा चढा कर दिखाया. उसके तीक्ष्ण होने में सामाजिक संरचना से जुड़े अन्य कारणों की बड़ी भूमिका रही होगी. विदेशी क्षत्रियों, नये उभरे अनार्य राजाओं की भारतीय सामाजिक राजनीतिक जीवन में बहुलता, एवं ब्राह्मणेतर धार्मिक मतों के प्रति समर्थन रखने वाले राजाओं के प्रति पुरोहितों के भीतर प्रतिर्किया निर्मित हुआ, यह चौथी पाँचवीं शताब्दी में संकलित पौराणिक विवरणों से स्पष्ट है.      

प्राचीन भारतीय समाज में जनमेजय के इस धार्मिक भूमिका का बहुत महत्व माना जाना चाहिये. इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि उस युग में यज्ञ और उससे जुड़े कर्मकाण्डों में राजन्य वर्ग का अच्छा खासा दखल होता था, जिसे पुरोहित वर्ग सहजता से स्वीकार नहीं करना चाहते. जनमेजय ने यज्ञ के आयोजन में अपने द्वारा प्रतिष्ठित वाजसनेय का प्रवर्तन किया, 

ब्राह्मण पुरोहितों के बीच यज्ञ कर्मकाण्ड के नियमों वगैरह को लेकर हुए वैचारिक विभाजन में जनमेजय ने सक्रिय भूमिका निभाई थी. और इस विभाजन का प्रभाव यजुर्वेद की शुक्ल और कृष्ण सम्हिताओं के रूप में सामने आया. जनमेजय के राज्याश्रय में शुक्ल यजुर्वेद को पर्याप्त समर्थन मिला. सम्भव है कि इसके बाद से ही कृष्ण यजुर्वेद शाखा से जुड़े पुरोहितों ने परीक्षित समेत जनमेजय, और सम्भवतः राजन्य वर्ग के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया. यह ध्यान देनेवाली बात है कि महाभारत कथा वाचन और पौराणिक साहित्य लेखन में कृष्ण द्वैपायन व्यास के जिस शिष्य, वैशम्पायन, की अग्रणी भूमिका रही, वह परीक्षित और जनमेजय के प्रति शत्रुता से ग्रसित था. क्या इस पुर्वग्रह और शत्रुता भाव का पुराण लेखन पर प्रभाव नहीं पड़ा? सच यह है कि पौराणिक साहित्य में क्षत्रिय विरोधी पुर्वग्रह बार बार उभरकर दिखता है.    

जनमेजय का सर्पयज्ञ – घटनाक्रम यह है कि परीक्षित ने एक ब्राह्मण पुरोहित का अपमान किया, और उस पुरोहित के पुत्र ने बदले में राजा को शर्प-दंश से मृत्यु का शाप दिया. ठीक वैसी ही बात जैसी कार्तवीर्य अर्जुन और जामदग्न्य राम को लेकर हुई थी. इसमें संकेत यह छुपा है कि परिक्षित द्वारा ब्राह्मण के अपमान का बदला बादवाले ने सँपेरों(या सर्प-पूजक किसी कबीले) के साथ मिलकर लिया. राजा के विरुद्ध बदले के षडयंत्र के तहत सर्प-विष का इलाज जानने वाले वैद्य को भी घूस देकर अनुपलब्ध कर दिया गया. राजा के पुत्र ने बदले की ठानी, और सँपेरों के विरुद्ध अभियान चलाया. इसी अभियान को सर्प-यज्ञ कहा गया. यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या इस षडयंत्र में शामिल ब्राह्मण पुरोहितों को छोड़ दिया गया? भागवतपुराण 01:19 में इस कहानी के स्वभाव को बहुत कुछ बदल दिया गया है. 

पौराणिक कहानियों में परीक्षित को शापग्रस्त बताने के पीछे कोई तो कारण होगा ! 

इस कहानी में सर्प-पूजक कबीलों के साथ ब्राह्मण पुरोहितों के वैवाहिक सम्बंध की भी बात गौर करने योग्य है. ब्राह्मण पुरोहित जरत्कारू का विवाह वासुकी की बहन से उल्लिखित है. जनमेजय के इस अभियान को जरत्कारू-पुत्र आस्तिक द्वारा स्तुति प्रशंसा ने रुकवाया. यजुर्वेद की सम्हिता को लेकर जनमेजय ने जो भूमिका निभाई, सर्प-यज्ञ को हमें उसी सन्दर्भ में एक प्रतिकात्मक कहानी के तौर पर लें, यही उचित होगा.         

वायुपुराण 99:256 कहता है कि जनमेजय की कुछ पीढी के  बाद दीर्घसत्र का आयोजन (नैमिष) दृषद्वति के तट पर कुरुक्षेत्र में हुआ. सम्भवतः इसी सत्र में प्रतिक्रियावादी पुरोहितों ने धार्मिक परिदृष्य पर अपना प्रभाव स्थापित किया. 

सर्पयज्ञ के दौरान खाली समय में ब्राह्मण पुरोहित ज्ञान दर्शन से जुड़ी कथाएँ कहते थे, तो व्यास भरतवंश की विचित्र कथाएं सुनाते. महाभारत आदिपर्व 59:05 से पता चलता है कि सम्भ्रांत पुरोहित वर्ग यज्ञ कर्मकाण्डों से जुड़ा था, तो व्यास और सूत आम लोगों को, जिसमें ब्राह्मण जाति के सामन्य लोग भी शामिल थे, रोचक वंशावलियां सुनाया करते. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि कृष्ण द्वैपायन को विद्वान् ब्राह्मणों के बीच ऋक्, यजुष पर चर्चा करते नहीं बताया गया है. वह जनमेजय को भरतवंशियों की कथा सुनाता हुआ दर्शाया गया है. फिर उन्हें चार वेदों को व्यवस्थित करने का श्रेय देने का क्या अर्थ है? 


Tuesday, August 4, 2020

सर्वक्षत्रांतक सर्वक्षत्रप्रणाशक

उदाहरण एक -
द्रोणपर्व 03:02 कहता है, ‘दृष्ट्वा पितामहं भीष्मं सर्वक्षत्रांतकं गुरुम्, दिवैरस्त्रैर्महेष्वासं पातितं सव्यसाचिना’. अर्थात्, समस्य क्षत्रियों का अंत करनेवाला गुरु, महाधनुर्धर, पितामह भीष्म को सव्यसाची अर्जुन ने अपने दिव्यास्त्रों से गिरा दिया.’
उदाहरण दो -
ब्रह्मपुराण 13:67 ‘दिवोदास इति ख्यातः सर्वक्षत्रप्रणाशनः, दिवोदासस्य पुत्रस्तु वीरो राजा प्रतर्दनः’.
अर्थात्, दिवोदास सर्वक्षत्रप्रनाशक के रूप में प्रसिद्ध हुआ. उसका पुत्र वीर प्रतर्दन हुआ'.
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उपरोक्त दो शब्दों, 'सर्वक्षत्रांतक' और 'सर्वक्षत्रप्रणाशक' का अर्थ एक ही है. भीष्म के लिये 'सर्वक्षत्रांतक' और दिवोदास के लिये 'सर्वक्षत्रप्रनाशक' का प्रयोग हुआ है. लेकिन इसके आधार पर आम धारणा में यह प्रचार नहीं हुआ कि इन राजाओं ने 'सारे क्षत्रियों' का नाश कर दिया था.
लेकिन, परशुराम के लिये जब कहीं 'सर्वक्षत्रांतक' का इस्तेमाल हुआ, तो इसे लेकर इतनी सारी कहानियाँ लिखी गयीं कि आज खुद को ब्राह्मण जाति का मानने वाला हरेक शख्स, और दूसरे लोग भी, इस बात को याद रखते हैं कि परशुराम ने इक्कीस बार क्षत्रियों का सफाया किया था. क्योंकि पौराणिक साहित्य में इसे इतनी बार दुहराया गया है, कि किसी को कंठस्थ हो जाये.
इसी को कहते हैं दुस्प्रचार का प्रभाव !
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यही नहीं, मगध के राजा नंद के बारे में भी पुराणों में 'सर्वक्षत्रांतक' शब्द का उपयोग हुआ है. और इसका तात्पर्य इतिहासकारों ने यह लगाया कि वास्तव में वह शूद्र था, इसीलिये सारे क्षत्रियों का सफाया कर दिया. और इस प्रकार का तर्क देने वालों में घोर ब्राह्मणवादी से लेकर वामपंथी इतिहासकार शामिल हैं. सवाल है कि क्यों हैं? तो दोनों के अपने अपने कारण है. घोर ब्राह्मणवादी नंद को शूद्र कहते हैं, क्योंकि उनकी धर्मशास्त्रीय निगाह में बुद्ध और महावीर जैसे प्रज्ञा-पुरुष भी 'शूद्र' ही थे, क्योंकि वो ब्राह्मणवादी जाति आधारित श्रेष्ठता को स्वीकार नहीं करते थे.
दूसरी तरफ वामपंथी इतिहासकारों ने नंद को शूद्र मानकर ब्राह्मणवादी जाति आधारित वर्णव्यवस्था को इसी के मुहावरे में जवाब देकर परास्त करनी चाहते थे. इस फेर में अगर कोई पराजित होता है, तो वह है इस देश की बौद्धिक-चेतना.