क्षत्रियों का अंत और पुनरुद्धार
वायुपुराण 99:445 में
‘क्षत्रस्यैव समुच्छेदः सम्बंधः वै द्विजैः स्मृतः, मन्वन्तराणां सप्तानां संतानाश्च सुताश्च ते’
अर्थात् ‘सातों मन्वन्तरों में क्षत्रियों का उच्छेद होता है, और सम्बंध में वे ब्राह्मणों के संतान और पुत्र होते है’.
इस बात को समस्त पौराणिक साहित्य में बार बार अलौकिक कहानियों के माध्यम से दुहराया गया है.
वायुपुराण 99:447 में
‘सप्तर्षयो विदुस्तेषां दीर्घायुः अक्षयाः तु, एतेनं क्रमयोगेण ऐलेक्ष्वाक्वन्वया द्विजाः’
अर्थात् ‘सप्तर्षि लम्बी उम्र के कारण युगों एवं ब्रह्म क्षत्र के उद्भव, प्रवृत्ति, और उनके क्षय के बारे में जानते हैं. विद्वान सप्तर्षि दीर्घायु और अक्षय हैं’.
इसके साथ वायुपुराण 99:433 में यह भी स्वीकारोक्ति है कि विवस्वान के वंश के
‘ब्राह्मणाः वैश्याः शूद्राश्चैवान्वये स्मृताः’,
अतः ‘विवस्वान के वंश में ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र जुड़े हुए हैं’.
आगे यह भी कहा गया कि ऐल (चंद्रवंशी) और इक्ष्वाकु (सूर्यवंशी) वंश में उत्पन्न होने वाले द्विज (ब्राह्मण) त्रेता में जन्म लेते हैं, कलियुग में क्षय को प्राप्त होते हैं. अतः क्षत्रिय वंश में उत्पन्न होने वाले ब्राह्मण कुल को कम महत्वपूर्ण मानने की भी धारणा यहाँ पाई जाती है. अतः पुरोहितों के बीच भी दो प्रकार के स्रोत समझने की बात की गयी है,
- वो जो सीधे ब्रह्मा के मानस पुत्रों की वंश परम्परा के है, और
- वो जिनका जन्म क्षत्रिय वंशों में हुआ है.
प्रतिक्रियावादी पुरोहितों को इस बात की व्याख्या करना था, कि आर्य संस्कृति का सबसे सम्मानित ऋक, यजुष, और अथर्वन की रचना करने वाले क्षत्रियों या उनकी संतानों को ब्राह्मण मानकर धर्मशास्त्रीय उलझन से कैसे बचा जाये !
विभिन्न स्रोतों से आये हुए आर्य जनों को एक साझे स्रोत में बांधने के लिये मनु और मन्वन्तरों की एक शृन्खला वाली अवधारणा तैयार करने के साथ सप्तर्षियों और मानस पुत्रों की कल्पना की गयी, जो ब्रह्मा के आदेश पर सृष्टि रचते हैं. ये सप्तर्षि और मानस-पुत्र ब्राह्मण माने गये, क्योंकि वो ब्रह्मा से उत्प्पन्न थे. इससे यह साबित किया गया, कि जो पुरोहित सीधे मानसपुत्रों से उत्पन्न हैं, वो विशुद्ध ब्राह्मण हैं. और जो क्षत्रियों से उत्पन्न हुए, वह भी घुमा फिरा कर ब्राह्मण थे, क्योंकि यज्ञ के सभी देवताओं समेत क्षत्रियों को कश्यप से उत्पन्न बताया गया था, जो ब्रह्मा का एक मानस पुत्र था. धर्मशास्त्रीय जातिवादी सोच ने ऐसी कल्पनाशीलता को उड़ने के लिये मजबूत पंख दिया.
सृष्टि में क्षत्रियों के आत्याचार और निरंकुशता को समाप्त करने के लिये परशुराम जैसे चरित्र की कल्पना की गयी. वायुपुराण 99:449 में परशुराम द्वारा सभी क्षत्रियों को शेष करने का उल्लेख है. यह कहानी अन्य तमाम पुराणों में अलौकिक विवरण के साथ प्रस्तुत किया गया है. परशुराम द्वारा क्षत्रिय कुलों का उच्छेद होने के बाद क्षत्रिय राजवंशों के पुनरोद्धार का उल्लेख है. मगर वायुपुराण पुनरुद्धार की प्रक्रिया के बारे में यहाँ कुछ नहीं कहता. पौराणिक (महाभारत समेत) आख्यानों में अन्य स्थानों पर इसके बारे में यह कहा गया कि क्षत्राणियों ने पुरोहितों से अपने वंश के लिये संतान उत्पन्न किये. इस प्रकार की कहानियों से पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है, जिसमें कथित पुरोहित को रानियों के साथ संतान उत्पन्न करते हुए बताया गया है.
इस प्रकार की अपमानजनक अवधारणा को बाद वाले पौराणिक संस्करणों में तो और भी शातिर तरीके से स्थापित किया गया है. जिस युग में पुराण साहित्य लिखा गया उस समय उत्तर भारतीय समाज बाहर में यवन, शक, कुशान, हूण, आभीर समेत उत्तर पश्चिम से अनेक अनार्य कबीलों के आगमन से बाहरी लोगों का राजनीतिक वर्चश्व बढा. प्राचीन क्षत्रिय राजवंशों का प्रभाव नये क्षत्रियों के सामने फीका पड़ रहा था. नये लोग पहले से स्थापित समाज के पुरोहित वर्ग से इसी बात को लेकर संतुष्ट था कि नये क्षत्रियों को प्राचीन राजवंशावलियों से जोड़ दिया गया था. ऐसे क्षत्रियों का आर्यों के प्राचीन साहित्य से कोई सम्बंध नहीं था. इस स्थिति का उपयोग प्रतिक्रियावादी पुरोहितों ने धार्मिक क्षेत्र में अपनी मनमानी करने में की.
