वैवस्वत मनु के पुत्र, पृषध्र, ने अपने पुरोहित च्यवन के गाय को मारकर खा लिया. शापवश वह शूद्र हो गया,
‘----, पृषध्रो हिंसयित्वा तु गुरोर्गावमभक्षयत्.’ 01
शापात् शूद्रत्वम् आपन्नः च्यवनस्य महात्मनः, ----'. 02
- (वायुपुराण 86:01, 02)
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आखेट पर निकले सावर्णि मनु के पुत्र पृषध्र (पूषध्र) ने वन में मौलि नामक ‘किसी अग्निहोत्री ब्राह्मण’ के झाड़ी में आधा छिपे हुए होमधेनु को मार डाला.
'स ददर्श तदा तत्र होमधेनुं मनोहराम्, -----'
‘गोपालः प्रेषितः पुत्रो वाभ्रव्यो नाम नामतः, ----‘
'गाय चराने के लिये भेजे गये--- . इस मौलि-पुत्र वाभ्रव्य के शाप से पृषध्र शूद्र हो गया.
- मार्कण्डेय पु. 112:--
यहाँ पृषध्र द्वारा इस ब्राह्मणपुत्र के अपमान का उल्लेख है, जिसके एवज में पृषध्र द्वारा वापस उस वाभ्रव्य को शाप देता हुआ उल्लेख किया गया है. इस कहानी से हमें वास्तविकता का अंदाजा लगा लेना चाहिये था. कबिलाई युग में योद्धा सर्वशक्तिमान था. उसके लिये किसी पुरोहित कर्म से जुड़े व्यक्ति का अपमान करना एक साधारण घटना थी. तपस्या से प्राप्त शक्ति के बल पर शाप देने की बात बहुत बाद की बौद्धिक उत्पत्ति है. ऐसे पृषध्र को बाद के पुराण-पण्डितों ने शूद्र घोषित करना अपरिहार्य समझा होगा.
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वैवस्वत मनु का पुत्र, पृषघ्र, को गुरु ने ‘गाय का पालन’ (गोपाल) करने वाला नियुक्त कर रखा था, (‘पृषध्रस्तु मनोः पुत्रो गोपालो गुरुणा कृतः, पालयामास गा यत्तो रात्र्यां वीरासनव्रतः’.) वर्षा की रात, गाय को व्याघ्र समझकर मार डाला. सुबह कुलपुरोहित ने उसे शुद्र हो जाने का शाप दिया.
- भागवतपुराण 09:02:03,,
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थोडा सा गौर करने पर इस एक घटना के तीन अलग अलग संस्करणों रचयिता के दृष्टिकोण का दर्शन होता है. तीन संस्करण, तीन अलग अलग समय और उसके सांस्कृतिक सामाजिक माणदण्डों को सामने रख कर रचा गया है. सबसे सीधा, और सबसे कम ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण वायुपुराण में वर्णित है. अर्थात्, तीनों संस्करणों में सबसे पुराणा वायुपुराण है, स्पष्ट हो जाता है.
इससे अधिक नयापन मार्कण्डेयपुराण की प्रस्तुति में है. क्योंकि इसमें पृषध्र को 'संदेह का फायदा' देते हुए, गोहत्या का दोषी माना गया है.
भागवतपुराण की कहाँई सबसे नई और सबसे अधिक दकियानूसी है. अर्थात्, भागवतपुराण में इस कहानी का समावेश सबसे नया है.
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तीनों संस्करणों में तथ्यों में भी बड़ा हेर फेर है. अनुवादों में तो और भी घपला है ! वायुपुराण में पृषध्र का पुरोहित च्यवन को बताया गया. मार्कण्डेयपुराण में गाय का मालिक 'कोई अग्निहोत्र ब्राह्मण' बन गया. और भागवतपुराण में तो पृषध्र को गुरु का गोपाल बना दिया गया. अनुवादक ने तो गुरु को बाजाब्ता वसिष्ठ नाम दे दिया है. क्योंकि प्राचीन तथ्यों को कुछ खास प्रकार से रूढ बनाने में उसे भी अपनी भूमिका निभानी थी. हाँ, एक चीज तीनों जगहों पर एक सा है कि 'गाय मारने पर पृषध्र शूद्र बन गया' !
शनैः शनैः समय के साथ पौराणिक प्रस्तुति अधिक ब्राह्मणवादी होती दिखाई देती है. मार्कण्डेयपुराण में ब्राह्मण का पुत्र 'गोपाल' है तो कोई परेशानी नहीं है. मगर भागवतपुराण लिखे जाने के समय तक इसमें परेशानी होने लगी. तो एक राजा के पुत्र को 'गोपाल' नियुक्त कर दिया गया ! ताकि स्थापित हो सके कि ब्राह्मण, राजा के ऊपर है !!
‘----, पृषध्रो हिंसयित्वा तु गुरोर्गावमभक्षयत्.’ 01
शापात् शूद्रत्वम् आपन्नः च्यवनस्य महात्मनः, ----'. 02
- (वायुपुराण 86:01, 02)
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आखेट पर निकले सावर्णि मनु के पुत्र पृषध्र (पूषध्र) ने वन में मौलि नामक ‘किसी अग्निहोत्री ब्राह्मण’ के झाड़ी में आधा छिपे हुए होमधेनु को मार डाला.
'स ददर्श तदा तत्र होमधेनुं मनोहराम्, -----'
‘गोपालः प्रेषितः पुत्रो वाभ्रव्यो नाम नामतः, ----‘
'गाय चराने के लिये भेजे गये--- . इस मौलि-पुत्र वाभ्रव्य के शाप से पृषध्र शूद्र हो गया.
- मार्कण्डेय पु. 112:--
यहाँ पृषध्र द्वारा इस ब्राह्मणपुत्र के अपमान का उल्लेख है, जिसके एवज में पृषध्र द्वारा वापस उस वाभ्रव्य को शाप देता हुआ उल्लेख किया गया है. इस कहानी से हमें वास्तविकता का अंदाजा लगा लेना चाहिये था. कबिलाई युग में योद्धा सर्वशक्तिमान था. उसके लिये किसी पुरोहित कर्म से जुड़े व्यक्ति का अपमान करना एक साधारण घटना थी. तपस्या से प्राप्त शक्ति के बल पर शाप देने की बात बहुत बाद की बौद्धिक उत्पत्ति है. ऐसे पृषध्र को बाद के पुराण-पण्डितों ने शूद्र घोषित करना अपरिहार्य समझा होगा.
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वैवस्वत मनु का पुत्र, पृषघ्र, को गुरु ने ‘गाय का पालन’ (गोपाल) करने वाला नियुक्त कर रखा था, (‘पृषध्रस्तु मनोः पुत्रो गोपालो गुरुणा कृतः, पालयामास गा यत्तो रात्र्यां वीरासनव्रतः’.) वर्षा की रात, गाय को व्याघ्र समझकर मार डाला. सुबह कुलपुरोहित ने उसे शुद्र हो जाने का शाप दिया.
- भागवतपुराण 09:02:03,,
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थोडा सा गौर करने पर इस एक घटना के तीन अलग अलग संस्करणों रचयिता के दृष्टिकोण का दर्शन होता है. तीन संस्करण, तीन अलग अलग समय और उसके सांस्कृतिक सामाजिक माणदण्डों को सामने रख कर रचा गया है. सबसे सीधा, और सबसे कम ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण वायुपुराण में वर्णित है. अर्थात्, तीनों संस्करणों में सबसे पुराणा वायुपुराण है, स्पष्ट हो जाता है.
इससे अधिक नयापन मार्कण्डेयपुराण की प्रस्तुति में है. क्योंकि इसमें पृषध्र को 'संदेह का फायदा' देते हुए, गोहत्या का दोषी माना गया है.
भागवतपुराण की कहाँई सबसे नई और सबसे अधिक दकियानूसी है. अर्थात्, भागवतपुराण में इस कहानी का समावेश सबसे नया है.
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तीनों संस्करणों में तथ्यों में भी बड़ा हेर फेर है. अनुवादों में तो और भी घपला है ! वायुपुराण में पृषध्र का पुरोहित च्यवन को बताया गया. मार्कण्डेयपुराण में गाय का मालिक 'कोई अग्निहोत्र ब्राह्मण' बन गया. और भागवतपुराण में तो पृषध्र को गुरु का गोपाल बना दिया गया. अनुवादक ने तो गुरु को बाजाब्ता वसिष्ठ नाम दे दिया है. क्योंकि प्राचीन तथ्यों को कुछ खास प्रकार से रूढ बनाने में उसे भी अपनी भूमिका निभानी थी. हाँ, एक चीज तीनों जगहों पर एक सा है कि 'गाय मारने पर पृषध्र शूद्र बन गया' !
शनैः शनैः समय के साथ पौराणिक प्रस्तुति अधिक ब्राह्मणवादी होती दिखाई देती है. मार्कण्डेयपुराण में ब्राह्मण का पुत्र 'गोपाल' है तो कोई परेशानी नहीं है. मगर भागवतपुराण लिखे जाने के समय तक इसमें परेशानी होने लगी. तो एक राजा के पुत्र को 'गोपाल' नियुक्त कर दिया गया ! ताकि स्थापित हो सके कि ब्राह्मण, राजा के ऊपर है !!
