Tuesday, June 11, 2019

स्त्री-क्षेत्र

कल ‘भैयाजी कहिन’ कार्यक्रम में छोटी छोटी बच्चियों के प्रति जघन्य अपराधों एवं उसे लेकर उठने वाले राजनीतिक छीछालेदर पर बहस के दौरान एक हिंदुत्ववादी प्रवक्ता ने बड़े रोष में आकर कुरान से वो आयत का उल्लेख किया जिसमें औरत को मर्द का ‘खेत’ बताया गया है, जिसे वह अपनी इच्छानुसार ‘जोतने’ के लिये स्वतंत्र है( कुरान 2:223). उन उत्तेजित महाशय के अनुसार कुरान की ऐसी ‘अस्वीकार्य दृष्टिकोण के धार्मिक मान्यता’ के कारण इसे मानने वाले बलात्कार जैसी घटना को अंजाम देने की प्रेरणा पाता है !
पहली बात, कि कुरान में ऐसा कहा गया है. लेकिन इसके बाद जानने वाली बात यह है, कि ऐसा सिर्फ कुरान में ही नहीं कहा गया है !
भारतीय पौराणिक साहित्यों (धर्मशास्त्र समेत) में स्त्री को संतानोत्पत्ति एवं वंशवृद्धि के संदर्भ में बार-बार ‘क्षेत्र’ गया है. और साथ ही पुरुष को वंशवृद्धि के लिये पूर्ण क्षेत्राधिकार दिया गया है. उदाहरण के लिये,
‘नियोगात् ब्रह्मणः पूर्वे मया स्वेन बलेन च, वैचित्रवीर्यके क्षेत्रे जातः स सुमहामतिः.’ (महाभारत, आश्रमवासिकपर्व 28:15)
अर्थात्, व्यास ने कहा, ‘ब्रह्मा के कहने पर मैंने अपने बल से विचित्रवीर्य के ‘क्षेत्र’ (भार्या) में सुमहामति विदुर को उत्पन्न किया.’
प्राचीन साहित्य ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जहाँ स्त्री को उसके पुरुष के लिये क्षेत्र (खेत) की संज्ञा दी गयी है.
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वास्तविकता यही है कि प्राचीन संस्कृतियों में संतानोत्पत्ति के लिये बलात्कार को भी स्वीकार किया गया था. वह उस समय की बात है. सभ्यता के विकास के साथ मानव समाज ने अपने पूर्व के पिछड़े हुए अमानवीय तौर-तरीकों को परिमार्जित किया, और विकसित हुआ. भारतीय सांस्कृतिक परम्परा की विशेषता यह रही है कि पूर्व के अमानवीय प्रावधानों को हर पीढी ने अपने समय के नैतिक मूल्यों के अनुसार ढाला. धर्मशास्त्रीय प्रावधान और उसकी व्याख्या हर युग में बदले गये.
इस्लाम जैसी परम्परा में यह काम मुश्किल इसलिये हो जाता है, क्योंकि अधिकांश मुसलमान कुरान को अपने ईश्वर की वाणी समझते हैं, जिसके प्रति श्रद्धा-भाव रखा जाना अनिवार्य होता है. लेकिन यह मानना कि इस कारण से छोटी छोटी बच्चियों के साथ कुकर्म को बढावा मिलता है, अनुचित है. सम्भव है, कि इस्लामी शिक्षा में छोटी छोटी बच्चियों से यौन सम्बंधों को लेकर आधुनिक मानदंडों के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश नहीं हो रही हो, परंतु इसे यौन कुकर्मों के पीछे का आधार मान लेने को स्वीकार नहीं किया जा सकता. कुछ कुकर्मों के पीछे सामुदायिक बदले की भावना होने की बात को स्वीकार किया जा सकता है, मगर इसे जरूरत से ज्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता. आधुनिक समय में नयी पीढी अगर मानसिक यौन-विकृति का शिकार हो रहा है तो इसके लिए आज के सामाजिक सांस्कृतिक कारण जिम्मेदार हैं, न कि प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में लिखे हुए कुछ वक्तव्य !
और सबसे बड़ी बात कि धर्मग्रंथों के प्रावधान संतानोत्पत्ति के संदर्भ में हैं, न कि यौन-शोषण के संदर्भ में ! इन दो अलग चीजों का हम घालमेल नहीं कर सकते.

Tuesday, May 21, 2019

पृषध्र

वैवस्वत मनु के पुत्र, पृषध्र, ने अपने पुरोहित च्यवन के गाय को मारकर खा लिया. शापवश वह शूद्र हो गया,
‘----, पृषध्रो हिंसयित्वा तु गुरोर्गावमभक्षयत्.’ 01
शापात् शूद्रत्वम् आपन्नः च्यवनस्य महात्मनः, ----'. 02
- (वायुपुराण 86:01, 02)
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आखेट पर निकले सावर्णि मनु के पुत्र पृषध्र (पूषध्र) ने वन में मौलि नामक ‘किसी अग्निहोत्री ब्राह्मण’ के झाड़ी में आधा छिपे हुए होमधेनु को मार डाला.
 'स ददर्श तदा तत्र होमधेनुं मनोहराम्, -----'
‘गोपालः प्रेषितः पुत्रो वाभ्रव्यो नाम नामतः, ----‘
'गाय चराने के लिये भेजे गये--- . इस मौलि-पुत्र वाभ्रव्य के शाप से पृषध्र शूद्र हो गया.
- मार्कण्डेय पु. 112:--

यहाँ पृषध्र द्वारा इस ब्राह्मणपुत्र के अपमान का उल्लेख है, जिसके एवज में पृषध्र द्वारा वापस उस वाभ्रव्य को शाप देता हुआ उल्लेख किया गया है. इस कहानी से हमें वास्तविकता का अंदाजा लगा लेना चाहिये था. कबिलाई युग में योद्धा सर्वशक्तिमान था. उसके लिये किसी पुरोहित कर्म से जुड़े व्यक्ति का अपमान करना एक साधारण घटना थी. तपस्या से प्राप्त शक्ति के बल पर शाप देने की बात बहुत बाद की बौद्धिक उत्पत्ति है. ऐसे पृषध्र को बाद के पुराण-पण्डितों ने शूद्र घोषित करना अपरिहार्य समझा होगा.
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वैवस्वत मनु का पुत्र, पृषघ्र, को गुरु ने ‘गाय का पालन’ (गोपाल) करने वाला नियुक्त कर रखा था, (‘पृषध्रस्तु मनोः पुत्रो गोपालो गुरुणा कृतः, पालयामास गा यत्तो रात्र्यां वीरासनव्रतः’.) वर्षा की रात, गाय को व्याघ्र समझकर मार डाला. सुबह कुलपुरोहित ने उसे शुद्र हो जाने का शाप दिया.
- भागवतपुराण 09:02:03,,
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थोडा सा गौर करने पर इस एक घटना के तीन अलग अलग संस्करणों रचयिता के दृष्टिकोण का दर्शन होता है. तीन संस्करण, तीन अलग अलग समय और उसके सांस्कृतिक सामाजिक माणदण्डों को सामने रख कर रचा गया है. सबसे सीधा, और सबसे कम ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण वायुपुराण में वर्णित है. अर्थात्, तीनों संस्करणों में सबसे पुराणा वायुपुराण है, स्पष्ट हो जाता है.
इससे अधिक नयापन मार्कण्डेयपुराण की प्रस्तुति में है. क्योंकि इसमें पृषध्र को 'संदेह का फायदा' देते हुए, गोहत्या का दोषी माना गया है.
भागवतपुराण की कहाँई सबसे नई और सबसे अधिक दकियानूसी है. अर्थात्, भागवतपुराण में इस कहानी का समावेश सबसे नया है.
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तीनों संस्करणों में तथ्यों में भी बड़ा हेर फेर है. अनुवादों में तो और भी घपला है ! वायुपुराण में पृषध्र का पुरोहित च्यवन को बताया गया. मार्कण्डेयपुराण में गाय का मालिक 'कोई अग्निहोत्र ब्राह्मण' बन गया. और भागवतपुराण में तो पृषध्र को गुरु का गोपाल बना दिया गया. अनुवादक ने तो गुरु को बाजाब्ता वसिष्ठ नाम दे दिया है. क्योंकि प्राचीन तथ्यों को कुछ खास प्रकार से रूढ बनाने में उसे भी अपनी भूमिका निभानी थी. हाँ, एक चीज तीनों जगहों पर एक सा है कि 'गाय मारने पर पृषध्र शूद्र बन गया' !
शनैः शनैः समय के साथ पौराणिक प्रस्तुति अधिक ब्राह्मणवादी होती दिखाई देती है. मार्कण्डेयपुराण में ब्राह्मण का पुत्र 'गोपाल' है तो कोई परेशानी नहीं है. मगर भागवतपुराण लिखे जाने के समय तक इसमें परेशानी होने लगी. तो एक राजा के पुत्र को 'गोपाल' नियुक्त कर दिया गया ! ताकि स्थापित हो सके कि ब्राह्मण, राजा के ऊपर है !!       

Sunday, May 19, 2019

बौद्धिक अंतर्विरोध

सिर्फ बौद्धिकता से विज्ञान आगे नहीं बढ सकता. वकालत आगे बढती है. आँखें खुली हों, जो दिखता है, उसे समझने की ईमानदार कोशिश हो तो बुद्धि विज्ञान को जन्म देती है. वरना, दिये गये तथ्यों के आधार पर बंद आँखों से सोच-विचार हमें अवैज्ञानिक रास्तों पर ले जाता है. ऐसे में बौद्धिकता का उपयोग, मनमाने निश्कर्षों तक पहुँचने के लिये होता है. कुछ निशकषों की जाँच-परख करने पर उनमें अभिव्यक्त अंतर्विरोध प्रकट हो जाते हैं. हमें पता चल जाता है, कि हमारे देखने का तरीका क्या था.    
हमारे पूर्वजों ने बौद्धिकता के क्षेत्र में जिस प्रकार के कीर्तिमान स्थापित किये हैं, उससे इंकार नहीं किया जा सकता. फिर भी हम विज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से दुनिया के फिसड्डी प्राचीन समाज में परिणत हुए हैं.
शांतिपर्व 342वाँ अध्याय, श्लोक (हालाँकि यह गद्य जैसा है) 09 में सृष्टि के बारे में ऐसा बखान है,
तमाविष्ट (गहन अंधेरे में लिपटा अव्यक्त) ब्रह्म से पुरुषकी उत्पत्ति हुई. पुरुषसे ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई. पुरुषकी आँख से सोम और अग्नि की उत्पत्ति हुई.
सोम और अग्नि के बारे में कहा गया, कि
यः सोमः तत् ब्रह्म, यत् ब्रह्म ते ब्राह्मणा, यः अग्निः तत् क्षत्रं, क्षत्रात् ब्रह्म बलवत्तरम्.
अर्थात्, ‘जो सोम है वही ब्रह्म है, जो ब्रह्म है वही ब्राह्मण है. जो अग्नि है वही क्षत्र है. क्षत्र से ब्रह्म अधिक प्रबल है.
इसी अध्याय के 12वें श्लोक में स्थिति उलट जाती है,
अग्निर्हि यज्ञानां होता कर्ता स चाग्निब्रह्म’.
अर्थ, ‘अग्नि यज्ञों के होता और कर्ता हैं. वे अग्निदेव ब्रह्म हैं.
बौद्धिक मुश्किल यह है, कि आधुनिक अनुवादक जातिवादी पुर्वग्रहों से इतना ग्रसित रहा है कि 09 और 12 में प्रकट अंतर्विरोध को चुपचाप छुपा जाता है. यही नहीं, ब्रह्मको ब्राह्मणअनुवाद करने में उसे कोई असुविधा नहीं होती ! श्लोक 09 का तो दावा और भी अद्भुत् है; ‘ब्रह्मऔर ब्राह्मणके अंतर को ही मिटा दिया गया ! फिर तो जहाँ जहाँ ब्रह्मशब्द मिला, उसका अनुवाद ब्राह्मणकरने में कोई बाधा नहीं था.
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जातिवादी बौद्धिकता समाजशास्त्रीय वास्तविकताओं को नजरंदाज करते हुए अपने द्वारा प्रस्तुर निशकर्षों के अंतर्विरोध को भी नहीं सुलझा पाता. श्लोक 09 में अग्नि को क्षत्रिय बताने वाली बौद्धिकता श्लोक 12वीं में उसी को ब्राह्मण बताता है ! वह यह भी भूल जाता है कि यज्ञ में कर्ता राजा होता, पुरोहित नहीं !  
यही नहीं श्लोक 09 में सोम को ब्राह्मण बताते हुए, श्लोक 57 में सोम को राजा बताया गया है, ‘—दक्षशापात् सोमं राजानं यक्ष्मां विवेश—‘..(दक्ष के शाप से राजा सोम में यक्ष्मा का प्रवेष हुआ.)
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पौराणिक क्थाओं कें कही गयी बातों, दावों के विश्लेषण से ही हम प्राचीन समाज की विकास यात्रा के बारे में कोई खाका तैयार कर सकते हैं. जिसे एक जगह पर क्षत्रिय बताया, दूसरे स्थान पर वह ब्राह्मण हो जाता है, पुनः तीसरी जगह उसे क्षत्रिय के रूप में निरूपित किया जाता है.

Friday, March 15, 2019

त्रयी- तीन विद्या

त्रयी कहते थे (हैं), तीन को मिलाकर जो बनता है. आज यह तीन प्रकार की प्राचीनतम विद्या के लिये यह शब्द रूढ हो गया है. वो तीन विद्या थी, ऋक्, साम, और यजुष्. इनमें से ऋक् सबसे प्राचीन है. इस विद्या को सबसे पहली बार अलग पहचान मिली. स्वाभाविक है कि ध्वनियों से शब्द, और शब्दों से अर्थपूर्ण वाक्या को बनाने की क्षमता को पहचानना अपने समय में एक महान खोज थी, एक अलौकिक उपलब्धि थी. यह प्रशंसा, अनुरोध, वर्णन, आदि से जुड़ी रचना की विद्या थी. आर्य कबीलों में जो लोग किसी भी विषय पर कविता रच सकते थे, उन्हें ही ऋषि कहा गया. जब इस विद्या को मानव ने पहली बार पहचाना, उस युग में यह एक दिव्य घटना थी. ऐसी रचनाओं से जीवन और उसके परिवेष पर उत्पन्न प्रभाव को लेकर उस समय के लोगों में अद्भुत विश्वास रहा होगा, जो इन गीतों में झलकता है.दूसरी विद्या ऋकों के गायन का. अलग अलग प्रकार से उन गीतों को गाने वाले लोग जनसामान्य पर जो प्रभाव डालते थे, वह भी दिव्य था. संगीत, जब आज भी दिव्य अहसास देता है, तो फिर प्राचीन मानवों के लिये उसके महत्व को समझना आवश्यक है. वह महत्व उस युग के सापेक्ष समझा जाना चाहिये. अतः, ऋकों के गायन से जिस विद्या का जन्म हुआ वह सामन-विद्या थी.तीसरी विद्या आर्यों के जीवन में अग्नि और उससे जुड़े वो कर्मकाण्ड थे जिनके माध्यम से अलौकिक शक्तियों को प्रसन्न किया जाता था. उस धार्मिक कर्मकाण्ड को हम यज्ञ कहते हैं. तो यज्ञों के आयोजन, विधि-विधान, क्रियान्वयन से जुड़ी विद्या यजुष् विद्या थी.
वेद और विद्या में कोई अंतर नहीं है. ये दोनों एक ही शब्द के अलग रूपांतर है.एक चौथी विद्या बहुत बाद में पूर्व की त्रयी के साथ जुड़ गयी. वह था मंत्रों के मायावी प्रभावों, जादू-टोना आदि से. आर्यों के ज्ञात अलौकिक शक्तियों से अलग अनेक अनार्य शक्तियों का नकारात्मक प्रभाव उन्हें परेशान किया करता था. सम्भव है कि कुछ अनार्य पुरोहितों ने इस विद्या को आर्यों को उपलब्ध कराया. इस विद्या को किसी अथर्वन् नामक पुरोहित के वंशजों ने सजोया था. यज्ञों के आयोजन को अनार्य मायावी शक्तियों से रक्षा करने के लिये अथर्व-विद्या के ज्ञाता पुरोहितों को दायित्व सौंपा जाता था. उन्हें ही ब्राह्मण कहते थे. क्योंकि उनका दावा था, कि वो ब्रह्म नामक परा अलौकिक शक्ति को अपने जादू-टोना से प्रभावित करने में सक्षम थे.
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