आज शहरों में रेडियो सुनने का मतलब एफएम तक सिमटकर रह गया है. मैं रेडियो का बड़ा शौकीन हूँ, मसलन रेडियो के पारम्परिक प्रषारण सुनने की जहमत उठाता रहता हूँ. आज की व्यस्त जिन्दगी में नियमित तौर पर रडियो सुनने का संयोग नहीं बन पाता. महीने-दो-महीने में जब रेडियो सुनने का शौक चर्राता है तब अपनी चाइना सेट ट्यूनर को लेकर बैठ जाता हू. एक बैंड से दूसरे, शोर्ट वेव से मीडियम, फिर एफएम, टेवी बैंड तक का चक्कर लगाता रहता हूँ. कहीं से कुछ सुनने को मिल जाये. खासकर रेडियो सुनने का वक़्त तो शाम को ही मिलता है जब शॉर्ट वेव पर बहुत सारे स्टेशन उपलब्ध होते हैं. अंग्रेजी के कार्यक्रम विशेषकर बीबीसी बड़ी सहजता से और स्पष्ट सुनाई देता है. जो सबसे स्पष्ट और पूरे बोल्ड आवाज में शॉर्ट वेव पर बजे, वो निश्चय ही चाइना रेडियो इंटरनेशनल होती है. पहले सोचा करता था कि शायद चाइनीज रेडियो ट्यूनर होने के कारण चीनी स्टेशंस इतने साफ सुनाई पड़ते है. लेकिन, यकीनन ये मेरा अवैज्ञानिक सोच के सिवा कुछ और नही था. मैं कभी नहीं समझ पाया कि आखिर रेडियो मास्को, बर्लिन, बीबीसी, सीआरआई, और न जाने कितने ही गुणवत्तापूर्ण प्रसारण वाले सेवाओं से हमारे स्टेशंस इतने बुरे हाल में क्यों हैं. वैसे सस्ते और कुल मिलाकर अच्छे रेडियो ट्यूनर भी तो हमें चीन से ही मिले हैं. शायद, हमारे यहाँ रेडियो प्रसारण का महत्व अब वो नहीं रहा जो पहले हुआ करता था. लेकिन मुझे तब का भी याद है. तब भी हमारे यहां राष्ट्रिय स्तर के प्रसारण ट्रांस्मीटर्स की हालत अच्छी नहीं थी.
एक बात बड़ी ध्यान देनेवाली होती है, जब आप सुबह-शाम शॉर्ट वेव पर चक्कर लगाते हैं. पूरा शॉर्ट वेव ऐसा लगता है ईसाई धर्मप्रचार करनेवाले प्रसारणों से पटा मिलता है. भारत की हर बोली भाषा मंक बाइबिल प्रचार की बाढ बड़ी अजीब लगती है. जिस देश में शैक्षनिक या सांस्कृतिक प्रसारणों के लिये ट्रांसमीटर्स की इतनी कमी हो वहा धर्म-प्रचार के लिये इतने गुणवत्ता से परिपूर्ण प्रसारण यही दर्शाता है कि भारत जैसे विकाशशील देश में धार्मिक प्रचार के लिये अथाह संसाधन उपलब्ध हैं. इसके अतिरिक्त, मैंने महसूस किया है कि बंगाल में रहते हुए आप अगर हिन्दी बुलेटिन के लिये स्टेशन तलाश रहे हैं तो आप गलती कर रहे हैं. बंगाल में बांग्ला के अतिरिक्त अन्य भाषा जाननेवालों की अच्छी खासी तादाद है, लेकिन उनके स्थानीय स्टेशनों से दूसरी भाषाओं में कार्यक्रम न के बराबर उपलब्ध है. वैसे इसकी जरूरत नहीं पड़ती अगर दिल्ली ,लखनऊ, या पटना से प्रसारित होनेवाले हिन्दी कार्यक्रमों को स्थानीय स्तर पर ट्रांसमीटर्स की सुविधा उपलब्ध होती. पता नहीं, इस तरह की सुविधा के रास्ते में क्या और कैसी बाधाएं हैं. देशभर में हर भाषा में धार्मिक प्रचार की सुविधा उपलब्ध हो सकती है, हिन्दी या अन्य भाषाओं के प्रषारण में ऐसा क्यों नहीं सम्भव है !
Sunday, May 9, 2010
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1 comment:
achhaa alekh hai
radio naam ki cheez to jaane kahi simat kar hi reh gyi hai
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