Friday, July 17, 2009

अहसास्

जो सोचता हूँ मैं

महसूसता हूँ जो

वह नहीं
इस कमरे जैसी छोटी

सिमटी, उदास रंगों की लिबास में
,

दिवारों पे उकेरी गयी

बेडौल हर्फों-लकीरों जैसी

या, इस मच्छरदानी जैसी

जिसका हुदूद

इक बदन के सिमटेपन से भी

शिकस्त है

इस बिछावन की
चौराई की तरह।


मैं जो चाहता हूँ सोचना

वह फैला है
तुम्हारी लम्बी जुल्फों की
बेहुदूद कैद सी
,

तुम्हारे ख्वाब की
उन मखमली सिलवटों की

अंतहीन कैफियत जैसी,

जिसमें डूबकर
हम भूल जाते हैं
हिकारत
इंसानी हैसीयत और
कायनाती आसमानियत को ।