श.ब्रा. 13:04:03:03 में विवस्वान पुत्र राजा मनु को मनुष्य से जोड़ा गया है, जिसका वेद ऋक था. जाहिर है कि ऋक को क्षत्रियों से जोड़ा गया है. आदित्यपुत्र राजा वरुण को गंधर्वों से जोड़ा गया है, जिस समुदाय का वेद अथर्वन था. उसी प्रकार विष्णुपुत्र (वैष्णव) राजा सोम को अप्सरा समुदाय से जोड़ा गया, जिसका वेद अंगिरा था. धन्व पुत्र राजा असित को असुरों से जोड़ा गया, जिसका वेद जादू-टोना था. ये अलग अलग समुदाय और उनसे जुड़ा वेद आर्य समुदाय के अतीत की कहानी कहता है. क्षत्रिय वो विजेता थे जो अपनी उत्पत्ति मनु से मानते होंगे. इन्होंने ही ऋकों की रचना की. असुर, गंधर्व, अप्सरा, राक्षस, सर्प जैसे जन क्षत्रियों से पराजित होकर आर्य समुदाय का सहायक अंग बने थे. ऐतरेयब्राह्मण 7:20 में आदित्य को दैव क्षत्र कहा गया है. श.ब्रा. 02:04:03:06 इंद्र-अग्नि को ‘क्षत्र’, बाकी देवताओं को ‘विश’ कहा गया. इंद्र-अग्नि द्वारा जीते गये में विश (विश्वेदेवा) का भाग होता है. आर्य समुदाय में क्षत्र-विश वर्ग विभाजन का यह पहला चरण माना जा सकता है.
कौ.ब्रा.12:08 में इंद्राग्नि को ‘ब्रह्मक्षत्र’ कहा गया. वर्गीय विभाजन की दिशा में यह अगला चरण लगता है, जिसमें ब्राह्मणों ने अपने धार्मिक महत्व के आधार पर क्षत्र के साथ सामाजिक समानता की तलाश करना शुरु किया. तै.सं.1:03:07 में अग्नि को ऋषियों का पुत्र, ‘अधिराज’ कहा गया है. तै.सं1:04:13 में अग्नि वैश्वानर को ‘कवि, सम्राट, और अतिथि’ कहा गया है. तै.सं. में अग्नि को ‘अध्वरेषु राजन्’ (यज्ञों में राजा) कहा गया है. कौ.ब्रा.12:08 ‘अग्निर्ब्रह्म’ अग्नि ब्रह्म है. तै.सं.2:05:12 में अग्नि को प्राचीन राजा, ‘प्रत्न राजन्’, कहा गया है. ऋग्वे.01:61:02 में इंद्र को प्रत्न (प्राचीन राजा) कहा गया है. 4:03:03 में प्रत्न ऋषि का भी उल्लेख है. श.ब्रा.02:05:02:06 में वरुण को राजन्य और मरुतों को ‘विश’ कहा गया है. श.ब्रा.05:01:01:11 ‘-- क्षत्रं हीन्द्रं क्षत्रं राजन्यः—‘ इंद्र क्षत्र है. शांतिप.208:23, 24 में आदित्यों को क्षत्रिय, मरुतों को वैश्य, अश्विनीकुमारों को शूद्र कहा गया है. अंगिरा से उत्पन्न देवताओं को ब्राह्मण कहा गया है. श.ब्रा.10:04:01:05 में अग्नि को ब्रह्म और इंद्र को क्षत्र कहा गया है. विश्वेदेवा को विश कहा गया. श.ब्रा. 09:01:01:15,25 में रुद्र को क्षत्र बताया गया है. 3:03:09 रुद्र को समर्पित प्रार्थना में उसे क्षत्र का शिखर कहा गया है. तै.स.1:01:09 में वसुओं को गायत्री, और रुद्रों को त्रिष्टुभ, और आदित्यों को जगती छंद से जोड़ा गया है. तै.सं.1:03:11 में वरूण को राजा, 1:03:13, 2:03:14 में सोम को राजा कहा गया है. कौ.ब्रा.12:08 में सोम, इंद्र, वरुण को क्षत्र कहते हुए प्रजापति को ब्रह्म और क्षत्र दोनों गुणों को धारण किया हुआ बताया गया. यहाँ यजमान को ब्रह्म और क्षत्र शक्तियों से पूर्ण अन्न ग्रहण करने वाला बताया गया है. तै.सं.2:01:11 में आदित्यों को क्षत्रिय कहा गया है ‘त्यान्नु क्षत्रियां अव आदित्यान् याचिषामहे‘. तै.सं.2:03:14 बृहस्पति के लिये सम्राट शब्द का प्रयोग. श.ब्रा.14:04:02:23 ‘ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्। एकमेव तदेकं सन्न व्यभवत्तच्छ्रेयो रूपमत्यसृजत क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति—‘. यहाँ स्पष्ट तौर पर कहा गया कि क्षत्र से इंद्र, वरुण, सोम, पर्जन्य, यम, मृत्य, ईशान हुए. अनुशासनप.151:,, के कार्तवीर्य-वायु सम्वाद में पृथ्वी, जल, अग्नि, सूर्य, वायु, आकाश को क्षत्रिय सूचक बताते हुए, ब्राह्मण को इन सबसे श्रेष्ठ बताया गया है. कौ.ब्रा.7:10 में सोम, वरुण, को क्षत्र, और बृहस्पति को ब्रह्म कहा गया है.
