Monday, March 1, 2021

दक्ष की अवधारणा

ऋग्वेद 10:121:,, में प्रजापति को सभी देवताओं को जानने वाला देवता मानकर उसकी पूजा करने की बात की गयी है. ऋग्वेद में ही देवताओं की उत्पत्ति दक्ष और अदिति से बताया गया है. और पौराणिक ग्रंथों में दक्ष को प्रजापतियों का राजा कहा गया है. अर्थात ऋग्वेद की अवधारणा के अनुसार दक्ष सभी देवताओं का पिता था. बाद के पौराणिक साहित्य में कई प्रजापति का उल्लेख है. सभी प्रजापतियों का राजा दक्ष का होना यह बताता है कि ऋग्वेद का दक्ष और प्रजापति, एक ही अवधारणा का दो अलग नाम हो सकता है. ऋग्वेद 10:72:02 ‘ब्रह्मनस्पति’ द्वारा देवताओं के बनाये जाने का उल्लेख है. क्या, प्रजापति, ब्रह्मणस्पति, और दक्ष एक ही अवधारणा का अलग रूप है? सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन करने वाला पुरुष-सूक्त यज्ञ को सृष्टि का कारण बताने वाली प्रतिकात्मक कहानी है. शतपथब्राह्मण 11:06:03:09 में यज्ञ को प्रजापति कहा गया है. पशु को यज्ञ कहा गया है.

शतपथब्राह्मण 01:07:04:01 में प्रजापति द्वारा अपनी पुत्री, दिव या उषा, से यौन सम्बंध स्थापित करने, और देवताओं द्वारा इसे पाप करार देने का उल्लेख है. देवताओं के कहने पर पशुपति रुद्र द्वारा प्रजापति (यज्ञ) को वाण से वींधने का उल्लेख है. यहाँ सभी देवता प्रजापति के पुत्र कहे गये हैं. भूमि पर गिरे वीर्य (रेत) को सार्थक करने, अर्थात् यज्ञ को सफल करने के क्रम में भग अंधा हुआ, पूषण का दांत दूट गया, आदि आदि. रुद्र के वाण के कारण पतित वीर्य को बृहस्पती के कहने पर सावित्री ने सफल किया. दक्ष-यज्ञ नष्ट किये जाने से जुड़ी कहानी का यह सम्भवतः सबसे प्राचीन रूप है. इस कहानी से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि पुराणों का प्रजापति दक्ष ही यज्ञ संस्कृति में ‘प्रजापति’ की अवधारणा है. प्रजापति यज्ञ है. विष्णु यज्ञ है.

ऐतरेयब्राह्मण 3:35 में प्रजापति और उसकी पुत्री उषा के यौन सम्बंध वाली कहानी दी गयी है. यहाँ प्रजापति ने हिरण के रूप में अपनी पुत्री से मैथुन किया. पशुपति के वाण से प्रताड़ित प्रजापति के भू-स्खलित वीर्य के ऊपर अग्नि और मरुत के प्रयास से आदित्य, भृगु, अंगिरा, बृहस्पति की उत्पत्ति का उल्लेख है. इसी कहानी को पुराणों में वरुण के यज्ञ में ब्रह्मा के वीर्य की हवि देने से भृगु आदि की उत्पत्ति वाली कहानी में बदल दिया गया. इससे स्पष्ट हो जाता है कि दक्ष, प्रजापति का ही दूसरा नाम या विशेषण है.

शतपथब्राह्मण 02:04:04:02 में कहा गया कि प्रजा, पशु और सम्पदा के लिये यज्ञ करने के लिये प्रजापति ने ‘दाक्षायण’ यज्ञ किया. इस यज्ञ से वह दक्ष हुआ, ‘प्रजापतिर्ह वा एतेनाग्रे यज्ञेनेजे । प्रजाकामो बहुः प्रजया पशुभिः स्यां श्रियं गच्छेयं यशः स्यामन्नादः स्यामिति - २.४.४.[१] स वै दक्षो नाम -----‘.