दक्ष नामक राजा ने अपनी पुत्री में संतानोत्पत्ति की. ‘--------, स्वस्या
सुतायां मूढात्मा पुत्रमुत्पादयिष्यसि.’ (कूर्मपुराण 14:63) (रुद्र
का शाप, कि ब्राह्मण से क्षत्रिय हो जाना, और अपनी पुत्री में संतानोत्पत्ति ! ब्रह्मा का पुत्र बताकर दक्ष को
ब्राह्मण बताया गया, और पुनः शाप केंद्रित कहानी के माध्यम
से जातिवादी ब्राह्मणवाद की कुंठा का निवारण करने का प्रयास किया गया है. प्राचीन
कहानी के पुनर्लेखन का यह एक उदाहरण है. पुरानी कहानी यह होगा कि प्रचेतों से
उत्पन्न दक्ष ने अपनी पुत्री में संतति विस्तार किया था. और यह आदिम मानवों के
लिये एक सहज घटना थी. उत्पत्ति की कहानी में ब्रह्मा के चरित्र का सृजन एक बौद्धिक
विकास की प्रक्रिया का परिणाम है. इस चरित्र की कल्पना के बाद दक्ष को ब्रह्मा के
अंगुठे से (या प्राण से) उत्पन्न बता दिया गया. मगर कहानियों में छुपे हुए तथ्यों
को पूरी तरह से मिटाया नहीं जा सका.)
‘दाक्षायणीपुत्रा सर्वे देवाः सवासवाः, --------‘ (दाक्षायणी
का अर्थ दक्ष की पुत्री है. यहाँ भी दक्ष द्वारा अपनी पुत्री से संतानोत्पत्ति
(सृष्टि) का उल्लेख है. रुद्र को दी गयी गौरी ('- गौरीनाम्नीं स्वयं देवीं भारतीं तां ददौ पिता') को पुनः ब्रह्मा द्वारा पुत्री रूप
में दक्ष को प्रदान किया गया; यही दाक्षायणी है. इससे जो
अर्थ निकलता है, वह तथाकथित नैतिक बंधन वाले को असहज कर देता है. इससे यह संकेत भी
मिलता है, कि रुद्र गौरी से संतान उत्पत्ति में अक्षम रहे थे,
और उसी गौरी से दक्ष ने अपनी संतति विस्तार किया. रुद्र और दक्ष के
बीच शत्रुता के पीछे असल कारण यह रहा होगा ! प्राचीन काल में एक ही स्त्री एकाधिक
पुरुषों द्वारा संतान प्राप्ति के अनेको उदाहरण पाये जाते हैं. और इस क्रम में
स्त्री के लिये प्रतिष्पर्द्धा और शत्रुता एक आम बात रही होगी. इस प्राचीन कहानी
को बाद में अलग प्रकार से नया रूप दिया गया. दक्ष-रुद्र ) (वाराहपुराण
21:10)
{ब्रह्मा का अपनी पुत्री (ब्रह्माणी) से या दक्ष का अपनी पुत्री (दाक्षायणी) से
संतानोत्पत्ति के नैतिक प्रश्न पर मत्स्यपुराण के चौथे अध्याय में विचार किया गया है, कि क्यों ब्रह्मा की संतानों को आपस में विवाह करने की अनुमति मिली? और कहा यह गया कि देवताओं की बात देवता ही समझें ! आगे शतरूपा को
स्वायम्भुव मनु (अधिपुरुष) की पत्नी बताया गया है. विष्णुपुराण 1:07:17 में शतरूपा
को स्वायम्भुव मनु की पत्नी बताया गया है. मत्स्यपुराण 04:33 में ‘अनंता’ को स्वायम्भुव मनु की पत्नी बताया गया है;
क्योंकि शतरूपा को तो ब्रह्मा के साथ जोड़ दिया गया था !! तमाम तरह
के उदाहरणों में यह एक है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि लोक कथाओं को अलग अलग लेखकों
ने अपनी सोच के अनुसार पुराणों के अपने अपने संकलनों में प्रस्तुत कर दिया. वैसे ‘शतम्’ को अनंत भी कहा गया है (आदिपर्व 216:07- शत और
शतसहस्त्र अनंत संख्या के वाचक हैं.) ब्रह्मा को एक व्यक्ति के रूप में कल्पित
किये जाने से पहले मनु ही सृष्टि का प्रथम पुरुष रहा होगा, और
अनंत रूपों वाली, अर्थात् शतरूपा को उसकी पत्नी बताया गया
होगा. ब्राह्मणवादी परम्परा के सशक्त होने के साथ ब्रह्मा की व्यक्तिरूप अवधारणा
को नई नई कहानियों के माध्यम से स्थापित किया गया.}
(प्राचीन कथाओं में प्रतीकों के माध्यम से बातों को कहने का चलन रहा
है. ब्रह्मा, रुद्र, दक्ष, गौरी जैसे
प्रतीकों के तौर पर ग्रहण कर हम चीजों को अलग प्रकार से समझ सकते हैं. ब्रह्म्, ऋचाओं में अभिव्यक्त प्रार्थानाओं, स्तुतियों,
आवाहनों, एवं मंत्रों को कहा गया है. उसपर
आधारित सृष्टि सम्बंधी अवधारणा में देवताओं को छंदों से उत्पन्न माना गया. उन
छंदों में आबद्ध ऋचाओं, अर्थात् ब्रह्म्, का मानवीकरण
करके ब्रह्मा
की अवधारणा सामने आयी. यही ब्रह्मा सृष्टि का प्रथम कारक के रूप में देखा गया. ऋचाओं, अर्थात् ब्रह्म् के
माध्यम से यज्ञ में देवताओं का आह्वान होता था. और यज्ञ को ही सृष्टि की उत्पत्ति
का कारक माना गया है.
अतः मानवीकृत ब्रह्म् या ब्रह्मा के मन में सृष्टि को लेकर उहापोह की
स्थिति होने से क्रोध और क्षोभ ('-- कोपात्संजज्ञे स च रुद्रः प्रतापवान्, --) उत्पन्न होता है. वही क्रोध रुद्र का मानवीकृत रूप में
अभिव्यक्त है. गौरी को ऋचाओं की अभिव्यक्ति की देवी का प्रतीक कहा जा सकता है . गौरी, भारती, सर्वशुक्ला आदि सरस्वती के पर्याय हैं. सरस्वती, मुख
से उच्चारित शुभ ध्वनियाँ हैं. उन ध्वनियों से ऋचाओं का जन्म हुआ है. ऋक् और यज्ञ के
युग में सरस्वती के माध्यम से तमाम दैवी शक्तियों को प्रभावित किया जा सकता था. ऋचाओं
में अभिव्यक्त मंत्रों के माध्यम से ही देवताओं को शौर्य, शक्ति,
ऐश्वर्य, आरोग्य, बल प्राप्त
होता था. ब्रह्मा के क्रोध से उत्पन्न
रुद्र, गौरी, अर्थात् ऋचाओं एवं
मंत्रों, के माध्यम से यज्ञ संस्कृति को विकसित नहीं कर सकता
था. क्योंकि रुद्र नकारात्मक प्रतीक है. जीवन का अंत है. उससे सृष्टि का आरम्भ नहीं
दर्शाया जा सकता. इसके विपरीत दक्ष (दक्षता), यज्ञ संस्कृति
के विकास और विस्तार के माध्यम से सृष्टि के सबसे महत्वपूर्ण प्रजापति का प्रतीक
है. यह यज्ञ संस्कृति की रचनात्मकता का मानवीयकरण है. दक्ष, कर्त्ता
है, गौरी माध्यम है, और यज्ञ आधारित
सांस्कृतिक जीवन आर्यों का संतति विस्तार है. यह उस इतिहास को उद्घाटित करता है, जिसमें यज्ञ
आधारित जीवन यापन करने वाले लोगों ने भारत में अपना वंश विस्तार किया.
रुद्र का पुनरुत्थान उस नयी संस्कृति का द्योतक है, जिसे हम रुद्र-पाशुपत
मत के फैलाव के रूप में पाते हैं. पुरोहितों
के एक वर्ग ने जब पशुबलि आधारित यज्ञ संस्कृति को अपने आर्थिक सामाजिक हितों के
विरुद्ध पाया, उन्होंने ऐसे यज्ञ का विरोध करना शुरु किया जिसमें
गौवंश की होती थी. इस मत ने गौरी अर्थात् सती को उस उज्ज्वल सत्य का प्रतीक माना, जो बदले हुए सामाजिक आर्थिक
और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में यज्ञ की दक्षता से अलग हटकर रुद्र-पशुपति केंद्रित
नयी धार्मिकता के प्रति समर्पित होने की घोषणा करता है. वाराहपुराण के इस कहानी में
दक्ष और रुद्र की शत्रुता वर्गीय हितों के टकराव या संघर्ष का प्रतीक है. बदली हुई
परिस्थितियों में रुद्र-पाशुपत मतावलम्बी पुरोहितों ने रुद्र द्वारा दक्ष को शाप दिये
जाने की कल्पना की. यह शाप पशु-बलि आधारित यज्ञ संस्कृति की निंदा का प्रतीक है. निंदा
की तीक्ष्णता को हम गौरी या सती, अर्थात् धार्मिक सत्य द्वारा
को रुद्र के पक्ष में स्वयम् को भस्म किये जाने के रूप में पाते हैं. धार्मिक
सत्य की दावेदारी का नया मानदण्ड रुद्र-पाशुपत मत की दावेदारी में प्रकट हुई. और उस
दावेदारी की घोषणा को हम ब्रह्माण्डपुराण 1:13:60 में पाते हैं, जहाँ सत्य का मानवीकृत
रूप सती स्वयम् को हमेशा रुद्र से जुड़े होने की बात करती है.
अतीत की सामाजिक सांस्कृतिक प्रतिष्पर्द्धा और संघर्ष
ऐसी कहानियों के माध्यम से ही पौराणिक ग्रंथों में अभिव्यक्त हुआ है. धीरे धीरे, बाद के समय में कम रचनात्मक क्षमता वाले
लोगों ने अपने सीमित वर्गीय हितों की रक्षा करने, उसे और अधिक
फैलाव देने के लिये प्रतीकात्मकताओं के निहित अर्थों को भुला दिया.
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