कल ‘भैयाजी कहिन’ कार्यक्रम में छोटी छोटी बच्चियों के प्रति जघन्य अपराधों एवं उसे लेकर उठने वाले राजनीतिक छीछालेदर पर बहस के दौरान एक हिंदुत्ववादी प्रवक्ता ने बड़े रोष में आकर कुरान से वो आयत का उल्लेख किया जिसमें औरत को मर्द का ‘खेत’ बताया गया है, जिसे वह अपनी इच्छानुसार ‘जोतने’ के लिये स्वतंत्र है( कुरान 2:223). उन उत्तेजित महाशय के अनुसार कुरान की ऐसी ‘अस्वीकार्य दृष्टिकोण के धार्मिक मान्यता’ के कारण इसे मानने वाले बलात्कार जैसी घटना को अंजाम देने की प्रेरणा पाता है !
पहली बात, कि कुरान में ऐसा कहा गया है. लेकिन इसके बाद जानने वाली बात यह है, कि ऐसा सिर्फ कुरान में ही नहीं कहा गया है !
भारतीय पौराणिक साहित्यों (धर्मशास्त्र समेत) में स्त्री को संतानोत्पत्ति एवं वंशवृद्धि के संदर्भ में बार-बार ‘क्षेत्र’ गया है. और साथ ही पुरुष को वंशवृद्धि के लिये पूर्ण क्षेत्राधिकार दिया गया है. उदाहरण के लिये,
‘नियोगात् ब्रह्मणः पूर्वे मया स्वेन बलेन च, वैचित्रवीर्यके क्षेत्रे जातः स सुमहामतिः.’ (महाभारत, आश्रमवासिकपर्व 28:15)
अर्थात्, व्यास ने कहा, ‘ब्रह्मा के कहने पर मैंने अपने बल से विचित्रवीर्य के ‘क्षेत्र’ (भार्या) में सुमहामति विदुर को उत्पन्न किया.’
प्राचीन साहित्य ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जहाँ स्त्री को उसके पुरुष के लिये क्षेत्र (खेत) की संज्ञा दी गयी है.
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वास्तविकता यही है कि प्राचीन संस्कृतियों में संतानोत्पत्ति के लिये बलात्कार को भी स्वीकार किया गया था. वह उस समय की बात है. सभ्यता के विकास के साथ मानव समाज ने अपने पूर्व के पिछड़े हुए अमानवीय तौर-तरीकों को परिमार्जित किया, और विकसित हुआ. भारतीय सांस्कृतिक परम्परा की विशेषता यह रही है कि पूर्व के अमानवीय प्रावधानों को हर पीढी ने अपने समय के नैतिक मूल्यों के अनुसार ढाला. धर्मशास्त्रीय प्रावधान और उसकी व्याख्या हर युग में बदले गये.
इस्लाम जैसी परम्परा में यह काम मुश्किल इसलिये हो जाता है, क्योंकि अधिकांश मुसलमान कुरान को अपने ईश्वर की वाणी समझते हैं, जिसके प्रति श्रद्धा-भाव रखा जाना अनिवार्य होता है. लेकिन यह मानना कि इस कारण से छोटी छोटी बच्चियों के साथ कुकर्म को बढावा मिलता है, अनुचित है. सम्भव है, कि इस्लामी शिक्षा में छोटी छोटी बच्चियों से यौन सम्बंधों को लेकर आधुनिक मानदंडों के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश नहीं हो रही हो, परंतु इसे यौन कुकर्मों के पीछे का आधार मान लेने को स्वीकार नहीं किया जा सकता. कुछ कुकर्मों के पीछे सामुदायिक बदले की भावना होने की बात को स्वीकार किया जा सकता है, मगर इसे जरूरत से ज्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता. आधुनिक समय में नयी पीढी अगर मानसिक यौन-विकृति का शिकार हो रहा है तो इसके लिए आज के सामाजिक सांस्कृतिक कारण जिम्मेदार हैं, न कि प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में लिखे हुए कुछ वक्तव्य !
और सबसे बड़ी बात कि धर्मग्रंथों के प्रावधान संतानोत्पत्ति के संदर्भ में हैं, न कि यौन-शोषण के संदर्भ में ! इन दो अलग चीजों का हम घालमेल नहीं कर सकते.
पहली बात, कि कुरान में ऐसा कहा गया है. लेकिन इसके बाद जानने वाली बात यह है, कि ऐसा सिर्फ कुरान में ही नहीं कहा गया है !
भारतीय पौराणिक साहित्यों (धर्मशास्त्र समेत) में स्त्री को संतानोत्पत्ति एवं वंशवृद्धि के संदर्भ में बार-बार ‘क्षेत्र’ गया है. और साथ ही पुरुष को वंशवृद्धि के लिये पूर्ण क्षेत्राधिकार दिया गया है. उदाहरण के लिये,
‘नियोगात् ब्रह्मणः पूर्वे मया स्वेन बलेन च, वैचित्रवीर्यके क्षेत्रे जातः स सुमहामतिः.’ (महाभारत, आश्रमवासिकपर्व 28:15)
अर्थात्, व्यास ने कहा, ‘ब्रह्मा के कहने पर मैंने अपने बल से विचित्रवीर्य के ‘क्षेत्र’ (भार्या) में सुमहामति विदुर को उत्पन्न किया.’
प्राचीन साहित्य ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जहाँ स्त्री को उसके पुरुष के लिये क्षेत्र (खेत) की संज्ञा दी गयी है.
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वास्तविकता यही है कि प्राचीन संस्कृतियों में संतानोत्पत्ति के लिये बलात्कार को भी स्वीकार किया गया था. वह उस समय की बात है. सभ्यता के विकास के साथ मानव समाज ने अपने पूर्व के पिछड़े हुए अमानवीय तौर-तरीकों को परिमार्जित किया, और विकसित हुआ. भारतीय सांस्कृतिक परम्परा की विशेषता यह रही है कि पूर्व के अमानवीय प्रावधानों को हर पीढी ने अपने समय के नैतिक मूल्यों के अनुसार ढाला. धर्मशास्त्रीय प्रावधान और उसकी व्याख्या हर युग में बदले गये.
इस्लाम जैसी परम्परा में यह काम मुश्किल इसलिये हो जाता है, क्योंकि अधिकांश मुसलमान कुरान को अपने ईश्वर की वाणी समझते हैं, जिसके प्रति श्रद्धा-भाव रखा जाना अनिवार्य होता है. लेकिन यह मानना कि इस कारण से छोटी छोटी बच्चियों के साथ कुकर्म को बढावा मिलता है, अनुचित है. सम्भव है, कि इस्लामी शिक्षा में छोटी छोटी बच्चियों से यौन सम्बंधों को लेकर आधुनिक मानदंडों के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश नहीं हो रही हो, परंतु इसे यौन कुकर्मों के पीछे का आधार मान लेने को स्वीकार नहीं किया जा सकता. कुछ कुकर्मों के पीछे सामुदायिक बदले की भावना होने की बात को स्वीकार किया जा सकता है, मगर इसे जरूरत से ज्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता. आधुनिक समय में नयी पीढी अगर मानसिक यौन-विकृति का शिकार हो रहा है तो इसके लिए आज के सामाजिक सांस्कृतिक कारण जिम्मेदार हैं, न कि प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में लिखे हुए कुछ वक्तव्य !
और सबसे बड़ी बात कि धर्मग्रंथों के प्रावधान संतानोत्पत्ति के संदर्भ में हैं, न कि यौन-शोषण के संदर्भ में ! इन दो अलग चीजों का हम घालमेल नहीं कर सकते.
