त्रयी कहते थे (हैं), तीन को मिलाकर जो बनता है. आज यह तीन प्रकार की प्राचीनतम
विद्या के लिये यह शब्द रूढ हो गया है. वो तीन विद्या थी, ऋक्, साम,
और यजुष्. इनमें से ऋक् सबसे प्राचीन
है. इस विद्या को सबसे पहली बार अलग पहचान मिली. स्वाभाविक है कि ध्वनियों से शब्द, और शब्दों से अर्थपूर्ण वाक्या को बनाने की क्षमता को पहचानना अपने समय में एक महान खोज थी, एक अलौकिक उपलब्धि थी. यह प्रशंसा, अनुरोध, वर्णन, आदि
से जुड़ी रचना की विद्या थी. आर्य कबीलों में जो लोग किसी भी विषय पर कविता रच सकते
थे, उन्हें ही ऋषि कहा गया. जब इस विद्या को मानव ने पहली बार पहचाना, उस
युग में यह एक दिव्य घटना थी. ऐसी रचनाओं से जीवन और उसके परिवेष पर उत्पन्न प्रभाव
को लेकर उस समय के लोगों में अद्भुत विश्वास रहा होगा, जो
इन गीतों में झलकता है.दूसरी विद्या ऋकों के गायन
का. अलग अलग प्रकार से उन गीतों को गाने वाले लोग जनसामान्य पर जो प्रभाव डालते थे, वह
भी दिव्य था. संगीत, जब आज भी दिव्य अहसास देता है, तो
फिर प्राचीन मानवों के लिये उसके महत्व को समझना आवश्यक है. वह महत्व उस युग के सापेक्ष
समझा जाना चाहिये. अतः, ऋकों के गायन से जिस विद्या का जन्म हुआ वह सामन-विद्या
थी.तीसरी विद्या आर्यों के जीवन
में अग्नि और उससे जुड़े वो कर्मकाण्ड थे जिनके माध्यम से अलौकिक शक्तियों को प्रसन्न
किया जाता था. उस धार्मिक कर्मकाण्ड को हम यज्ञ कहते हैं. तो यज्ञों के आयोजन, विधि-विधान, क्रियान्वयन
से जुड़ी विद्या यजुष् विद्या थी.
वेद और विद्या में कोई अंतर नहीं है. ये दोनों एक ही शब्द के अलग रूपांतर है.एक चौथी विद्या बहुत बाद में पूर्व की त्रयी के साथ जुड़ गयी. वह था मंत्रों के मायावी प्रभावों, जादू-टोना आदि से. आर्यों के ज्ञात अलौकिक शक्तियों से अलग अनेक अनार्य शक्तियों का नकारात्मक प्रभाव उन्हें परेशान किया करता था. सम्भव है कि कुछ अनार्य पुरोहितों ने इस विद्या को आर्यों को उपलब्ध कराया. इस विद्या को किसी अथर्वन् नामक पुरोहित के वंशजों ने सजोया था. यज्ञों के आयोजन को अनार्य मायावी शक्तियों से रक्षा करने के लिये अथर्व-विद्या के ज्ञाता पुरोहितों को दायित्व सौंपा जाता था. उन्हें ही ब्राह्मण कहते थे. क्योंकि उनका दावा था, कि वो ब्रह्म नामक परा अलौकिक शक्ति को अपने जादू-टोना से प्रभावित करने में सक्षम थे.
------------- वेद और विद्या में कोई अंतर नहीं है. ये दोनों एक ही शब्द के अलग रूपांतर है.एक चौथी विद्या बहुत बाद में पूर्व की त्रयी के साथ जुड़ गयी. वह था मंत्रों के मायावी प्रभावों, जादू-टोना आदि से. आर्यों के ज्ञात अलौकिक शक्तियों से अलग अनेक अनार्य शक्तियों का नकारात्मक प्रभाव उन्हें परेशान किया करता था. सम्भव है कि कुछ अनार्य पुरोहितों ने इस विद्या को आर्यों को उपलब्ध कराया. इस विद्या को किसी अथर्वन् नामक पुरोहित के वंशजों ने सजोया था. यज्ञों के आयोजन को अनार्य मायावी शक्तियों से रक्षा करने के लिये अथर्व-विद्या के ज्ञाता पुरोहितों को दायित्व सौंपा जाता था. उन्हें ही ब्राह्मण कहते थे. क्योंकि उनका दावा था, कि वो ब्रह्म नामक परा अलौकिक शक्ति को अपने जादू-टोना से प्रभावित करने में सक्षम थे.
