अलौकिक सर्वशक्तिमान के प्रति हमारे मानस में कौन सा भाव उत्पन्न होता
है? सबसे पहला, भय
का. और दूसरा प्रेम-सम्मान-श्रद्धा-स्नेह जैसे भावों का सम्मिलित प्रभाव, जिससे
भक्ति और
दासत्व भाव उपजता है. इन दो प्रकार के
भावों, नकारात्मक और सकारात्मक,
की उत्पत्ति हमारे परिवेष में पिता
को लेकर उपजता है. पिता से भय भी उतना लगता है, जितना हम उसपर निर्भर होते
हैं. और भय और निर्भरता के भावों के साथ प्रेम-सम्मान-श्रद्धा-स्नेह का सम्मिश्रित
रूप हमारे मन में छाया रहता है. पिता के पिता, उनके पिता, एवम्
प्रकार हम जैसे जैसे इस शृंखला में पीछे जाते हैं श्रद्धा और उससे उपजी गरिमापूर्ण
आभामंडल का विस्तार का भाव बढता जाता है.
इस भाव का ही विस्तारित रूप हमारे
भीतर अलौकिक भाव में लिपटी हुई चेतना को जन्म देता है. आज हम जिन अलौकिक चरित्रों को
हमारे अतीत में देवताओं के रूप में देखते हैं, वो हमारे पूर्वजों के अलावा
और कुछ नहीं हो सकते. अलौकिक के बारे में हमारी कल्पना में जो एक तत्व रहस्य का है, वह
प्राकृतिक घटनाओं से उत्पन्न है. उस रहस्य को अगर हम अपने पूर्वजों के आभामण्डित व्यक्तित्व
से जोड़ दें, तो वही हमारे ईश्वर का व्यक्तित्व कहलायेगा.
अतीत में इंद्र, वरुण, अग्नि, विष्णु, रुद्र
जैसे वैदिक देवताओं के बारे में हम सुनते हैं. इनमें से सबसे पुराने कौन होंगे, इसपर
विचार करना चाहिये. सांस्कृतिक विकासवाद में विश्वास करने वालों के लिये यह समझना आसान
है, कि आदिम मानव के लिए अग्नि, अंधकार, काले
मेघ, वज्रपात, आंधी,
बाढ जैसी प्राकृतिक घटनाएँ भय और रहस्य
दोनों के जनक रहे. इन घटनाओं से उपजे भय ने इनके पीछे के रहस्य को सबसे पुराने अलौकिक
शक्तियों के रूप में स्थापित किया होगा. लेकिन उन अलौकिक शक्तियों के व्यक्तित्व का
निर्माण करने में आदि मानवों के पूर्वजों के बारे में श्रद्धा विकास का महत्वपूर्ण
योगदान रहा होगा. अलौकिक शक्तियों को देवताओं के रूप में
समझने की बात तब शुरु हुई होगी जब अलौकिक शक्तियों के प्रति जनित श्रद्धा का सामंजस्य
पितृ के प्रति उपजी श्रद्धा के साथ हुआ होगा. पितृ के प्रति श्रद्धा की उत्पत्ति
को मानवीय चेतना के विकास क्रम में वह स्थान माना जा सकता है, जब
मनुष्य ने पहली बार अलौकिक शक्तियों को उस रूप में देखना शुरू किया, जिस
रूप में आगे चलकर उसकी आराधना पूजा वगैरह किया जाने लगा. हमारे सबसे पुराने धार्मिक
साहित्यिक दस्तावेज ऋग्वेद में जो देवता वर्णित हैं, उनके व्यक्तित्व के बारे में
हम जानते हैं. वह व्यक्तिव मानवीय रूप गुण स्वभाव में परिभाषित हैं. यहीं किसी भी अन्य
धार्मिक परम्परा विकास में पाया जाता है.
प्राचीन ग्रंथों में देवताओं
के व्यक्तित्व रूप गुण व्यवहार आदि से हम उनके प्राचीनता का अनुमान लगा सकते हैं. इससे
हमे यह पता चल जाता है, कि मानवीय सांस्कृतिक विकास क्रम में विभिन्न देवताओं
की उत्पत्ति क्रम क्या रहा है. देवताओं के रूप गुण व्यवहार से उन्हें पूजने वालों की
सांस्कृतिक स्थिति का आभास मिल जता है. मसलन,
इंद्र ऋग्वेदिक लोगों के सबसे आभामण्डित
विश्वसनीय देवता माने गये हैं. और इंद्र, युद्ध के विशेषज्ञ देवता हैं. इससे ऋग्वेदिक लोगों
की युद्धप्रियता का सीधा निष्कर्ष निकलता है. अन्य स्रोतों से भी इसी बात की पुष्टि
होती है. वज्र इंद्र का शस्त्र है,
तो वर्षा पर उसके नियंत्रण की बात
सामने आती है. बाद के पौराणिक आख्यानों में इंद्र की सवारी हाथी, बादलों
का प्रतीक है. पौराणिक आख्यानों में दिये गये इंद्र के मानवीय व्यक्तित्व पर गौर करें
तो हम पाते हैं, कि उसका शस्त्र, वज्र, मानवीय
कंकाल में सबसे मजबूत हड्डियों से मिलकर बना था. अर्थात्, बादलों
में चमकने वाला इंद्र का वज्र के बरअक्स हम उस पूर्वज योद्धा की कल्पना कर सकते हैं
जो मजबूत हड्डियों से बने हथियारों का प्रयोग करता था. सांस्कृतिक विकासवाद के रास्ते
हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि निश्चय ही इंद्र देवता के व्यक्तित्व में हमारे उस
पूर्वज का योगदान है जो अपने जमाने में हड्डियों से बने अस्त्र-शस्त्र से बड़े कारनामों
को अंजाम देता था. इससे हम पाते हैं कि इंद्र जैसे देवता के व्यक्तित्व में हमारे पूर्वज
की कहानी छुपी हुई है.
एक दूसरा उदाहरण हम रुद्र का
लेते हैं. ऋग्वेद में रुद्र एक गौण देवता के रूप में उपस्थित हैं. युद्धप्रिय समाज
में विनाश से जुड़े नकारात्मक प्रवृत्तियों से सम्बंधित रुद्र में लोगों की रुचि कम
रही होगी. ऋग्वेदिक युग के बाद जब हम रुद्र-पाशुपत मत की स्थापना और प्रचार काल में
पहुँचते हैं, तो विभिन्न पौराणिक आख्यानों में रुद्र और उसके व्यक्तित्व
से जुड़े अन्य चरित्रों के युद्ध में संलग्न होने से जुड़ी कहानियाँ पाते हैं. सबसे पुरानी
कहाँइयों में भी रुद्र धनुषधारी के रूप में वर्णित हैं. युद्ध के सांस्कृतिक विकास
क्रम में धनुष का आविष्कार वज्र से बहुत बाद का माना जायेगा. रुद्र का योद्धा रूप धनुष
के साथ प्रकट होना इस बात का परिचायक है,
कि पूर्वज के रूप में रुद्र,
इंद्र से काफी बाद की घटना हैं. और इस बात को सिद्ध करने के लिये और भी अनेकों साक्ष्य हमारे पास उपलब्ध हैं.
इस प्रकार हम देखते हैं, कि
हर देवता अतीत में कहीं न कही हमारा पूर्वज था. और उन पूर्वजों की प्राचीनता को हम
उसके बारे में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जान सकते हैं.