जाति का ऊँचा नीचा होना उस जाति के कर्म के प्रति समाज की दृष्टि पर निर्भर करता था. जिस जाति का काम अलौकिक प्रभाव उत्पन्न करने वाले पूजा-पाठ, यज्ञ-याजन करना, भविष्य-दर्शन करना, शिक्षा-दीक्षा देना था, समाज उसे सहज ही उच्च मानता था. अस्त्र-शस्त्र पर अधिकारयुक्त लोगों का काम समाज में व्यवस्था कायम करना था, तो उस काम से जुड़े जाति को उच्च माना गया. शराब, मांसाहार जैसे कर्मों के प्रति सामाजिक असम्मान ने उस कर्म से जुड़े लोगों के जाति को निम्न माना. मरे हुए प्राणियों का निपटारा करना, या ऐसे ही अन्य अशौच से जुड़े लोगों को अंत्यज समझने के पीछे समाज का दृष्टिकोण सामुहिक था. शौच-अशौच को लेकर भारतीय समाज की सम्वेदनशीलता को हम नकारात्मक ढंग से नहीं ले सकते. जिस जलवायविक परिस्थिति में छुआ-छूत की बीमारी से निबटने का कोई अन्य कारगर उपाय नहीं था, वहाँ शौच-अशौच की अवधारणा ने लोगों को हमेशा उत्पन्न होने वाले महामारियों से बचाने का काम किया. शौच-अशौच की सामाजिक धारणा को मानने में ब्राहमणों की कठोरता का तात्पर्य यह नहीं, कि दूसरे लोग उससे जुड़ी सावधानी के महत्व को स्वीकार नहीं करते थे. सच तो यह है, कि ब्राह्मणों के अशौच निवारण के उपाय निम्न समझी जाने वाली जातियों में उनके प्रति श्रद्धा भाव को और अधिक बढाता था.
इन बातों को लेकर रुढिग्रस्तता की दिशा में समाज आगे बढा तो इसकी जिम्मेदारी ब्राह्मणों पर नहीं थोपी जा सकती. एक अंत्यज का गाँव में प्रवेश सिर्फ ब्राह्मण की शुचिता के लिये खतरा नहीं समझा जाता था. बल्कि, इस मायने में अन्य जातियों का व्यवहार भी अंत्यजों के प्रति यथेष्ट कठोर था. आज अगर दूसरी जातियों के लोग यह कह कर पल्ला झाड़ लें, कि ऐसा तो उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा संकलित धर्मशास्त्रों के पालन के लिये किया था, और कि इसकी जिम्मेदारी ब्राहमणों पर जाती है, तो यह महज अपनी जिम्मेदारी से भागना है. जिम्मेदारी से भागने वाले समाज की हालत क्या होती है, हम उसका एक उदाहरण हैं !
अपने युग के सामाजिक दृष्टिकोणों पुर्वग्रहों, धारणाओं को ब्राहमणों ने धर्मशास्त्रों में समाहित किया. समाहित करने का यह अर्थ कदापि नहीं लिया जा सकता, कि ब्राह्मणों ने उन प्रावधानों के पीछे समाज की सामुहिक सोच को उत्पन्न किया. ब्राह्मण भी समाज का हिस्सा था. समाज की सामुहिक चेतना, पुर्वग्रह, खामी, खूबी से ब्राह्मण भी वैसे ही जुड़ा था, जैसा किसी अन्य जाति के लोग. जातिप्रथा के बारे में एक अवैज्ञानिक दुस्प्रचार (राजनीति से प्रेरित) यह पाया जाता है, कि जाति की व्यवस्था धर्मशास्त्रों के कारण अस्तित्व में आया. सच इससे उलट है. जातिप्रथा का जन्म सामाजिक धारणाओं एवं पुर्वग्रहों से उपजा, जिसे धर्मशास्त्रों में संकलित और समाहित किया गया. हाँ, यह सही है, कि उस जमाने की धारणाओं पुर्वग्रहों को धर्मशास्त्र में प्रावधानों के रूप में शामिल करने वालों (ब्राह्मणों) ने अपने फायदे का विशेष खयाल रखा. ऐसा करने के लिये, अतीत के उदाहरणों, परम्पराओं के उद्धरणों को तोड़ मड़ोर कर प्रस्तुत किया.
लेकिन, ऐसा सिर्फ भारत में हुआ है, या प्राचीन काल तक ही सीमित रहा है, ऐसा सोचना इस देश के बौद्धिक पिछड़ेपन के कारण है. इस देश के लोगों ने दूसरे समाज, देश, परम्परा के अध्ययन की बात तो दूर, अपनी परम्परा को भी जानने में रुचि नहीं दिखाई है. आधुनिक काल में प्राचीन का लगभग सारा अध्ययन पश्चिमी अध्येताओं ने किया है. ऐसे में हम दुनिया के अन्य समाज की वास्तविकताओं को नही जान पाये हैं. सत्ता से जुड़े वर्गों ने हमेशा अपने लिये विशेषाधिकारों का प्रावधान रखा और उसका उपभोग किया.
भारत का बौद्धिक पिछड़ापन आज भी उतना ही गहरा है, जितना पहले कभी रहा था. जो लोग भारतीय समाज के पिछड़ेपन के लिये तथाकथित उच्च जातियों को दोष देते हैं, वो आज भी पिछड़ेपन से बाहर निकलने का सार्थक प्रयास नहीं कर रहे. पिछड़ेपन से निकलने के उपायों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाता है, कि ये उपाय अपने आप में पिछड़ेपन को और अधिक बढावा देने वाला है. तथाकथित उच्च जातियों में बौद्धिक और आर्थिक पिछड़ेपन का स्तर तथाकथित पिछड़ी जातियों से कम नहीं है. और ये दोनों प्रकार के पिछड़ेपन इस देश की उन्नति में सबसे बड़े बाधक है. वैश्विकृत दुनिया में पिछड़ेपन के माणदंड बिल्कुल अलग हैं. सामाजिक स्तर पर उस माणदंड को ध्यान में रखे बगैर देश के पिछड़ेपन से निबटना मुश्किल होगा.
इन बातों को लेकर रुढिग्रस्तता की दिशा में समाज आगे बढा तो इसकी जिम्मेदारी ब्राह्मणों पर नहीं थोपी जा सकती. एक अंत्यज का गाँव में प्रवेश सिर्फ ब्राह्मण की शुचिता के लिये खतरा नहीं समझा जाता था. बल्कि, इस मायने में अन्य जातियों का व्यवहार भी अंत्यजों के प्रति यथेष्ट कठोर था. आज अगर दूसरी जातियों के लोग यह कह कर पल्ला झाड़ लें, कि ऐसा तो उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा संकलित धर्मशास्त्रों के पालन के लिये किया था, और कि इसकी जिम्मेदारी ब्राहमणों पर जाती है, तो यह महज अपनी जिम्मेदारी से भागना है. जिम्मेदारी से भागने वाले समाज की हालत क्या होती है, हम उसका एक उदाहरण हैं !
अपने युग के सामाजिक दृष्टिकोणों पुर्वग्रहों, धारणाओं को ब्राहमणों ने धर्मशास्त्रों में समाहित किया. समाहित करने का यह अर्थ कदापि नहीं लिया जा सकता, कि ब्राह्मणों ने उन प्रावधानों के पीछे समाज की सामुहिक सोच को उत्पन्न किया. ब्राह्मण भी समाज का हिस्सा था. समाज की सामुहिक चेतना, पुर्वग्रह, खामी, खूबी से ब्राह्मण भी वैसे ही जुड़ा था, जैसा किसी अन्य जाति के लोग. जातिप्रथा के बारे में एक अवैज्ञानिक दुस्प्रचार (राजनीति से प्रेरित) यह पाया जाता है, कि जाति की व्यवस्था धर्मशास्त्रों के कारण अस्तित्व में आया. सच इससे उलट है. जातिप्रथा का जन्म सामाजिक धारणाओं एवं पुर्वग्रहों से उपजा, जिसे धर्मशास्त्रों में संकलित और समाहित किया गया. हाँ, यह सही है, कि उस जमाने की धारणाओं पुर्वग्रहों को धर्मशास्त्र में प्रावधानों के रूप में शामिल करने वालों (ब्राह्मणों) ने अपने फायदे का विशेष खयाल रखा. ऐसा करने के लिये, अतीत के उदाहरणों, परम्पराओं के उद्धरणों को तोड़ मड़ोर कर प्रस्तुत किया.
लेकिन, ऐसा सिर्फ भारत में हुआ है, या प्राचीन काल तक ही सीमित रहा है, ऐसा सोचना इस देश के बौद्धिक पिछड़ेपन के कारण है. इस देश के लोगों ने दूसरे समाज, देश, परम्परा के अध्ययन की बात तो दूर, अपनी परम्परा को भी जानने में रुचि नहीं दिखाई है. आधुनिक काल में प्राचीन का लगभग सारा अध्ययन पश्चिमी अध्येताओं ने किया है. ऐसे में हम दुनिया के अन्य समाज की वास्तविकताओं को नही जान पाये हैं. सत्ता से जुड़े वर्गों ने हमेशा अपने लिये विशेषाधिकारों का प्रावधान रखा और उसका उपभोग किया.
भारत का बौद्धिक पिछड़ापन आज भी उतना ही गहरा है, जितना पहले कभी रहा था. जो लोग भारतीय समाज के पिछड़ेपन के लिये तथाकथित उच्च जातियों को दोष देते हैं, वो आज भी पिछड़ेपन से बाहर निकलने का सार्थक प्रयास नहीं कर रहे. पिछड़ेपन से निकलने के उपायों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाता है, कि ये उपाय अपने आप में पिछड़ेपन को और अधिक बढावा देने वाला है. तथाकथित उच्च जातियों में बौद्धिक और आर्थिक पिछड़ेपन का स्तर तथाकथित पिछड़ी जातियों से कम नहीं है. और ये दोनों प्रकार के पिछड़ेपन इस देश की उन्नति में सबसे बड़े बाधक है. वैश्विकृत दुनिया में पिछड़ेपन के माणदंड बिल्कुल अलग हैं. सामाजिक स्तर पर उस माणदंड को ध्यान में रखे बगैर देश के पिछड़ेपन से निबटना मुश्किल होगा.
