प्रसिद्ध इतिहासकार पर्सीवल स्पीयर ने आधुनिक इतिहास पर लिखी अपनी
किताब में पाकिस्तान आन्दोलन की चर्चा भारत में इस्लामी समाज की स्थापना काल से
शुरू की है. इसके उलट, भारतीय इतिहासकार विपिन्द चन्द्र ने(औरों ने भी) पाकिस्तान
के जन्म को लेकर आधुनिक काल में अंग्रेजी शासन की नीतियों के उद्भव के साथ शुरू
किया है. एक ओर जहाँ पर्सीवल स्पीयर का रुख पाकिस्तानी सरकार के दृष्टिकोणों से
अधिक मेल खाता दिखता है, वहीं विपिन चन्द्र जैसे विद्वानों का दृश्टिकोण भारतीय
राष्ट्रीय कॉंग्रेस की राष्ट्रवादी अवधारणा पर आधारित रही है. इसके तहत, अंग्रेजी
शासन शुरू होने से पहले तक भारत में साम्प्रदायिक सोच का भारतीय समाज में सर्वथा
अभाव माना गया. भारतीय समाज को शनैः-शनैः आधुनिकता की ओर कदम बढाते एक ऐसे समाज के
रूप में प्रदर्शित और व्याख्यायित किया गया है, जिसमें सामाजिक और सांस्कृतिक
विकास ‘गंगा-जमुनी’ अवधारणा पर बड़ी सहजता से हो रही थी. यह एक ऐसा काल के रूप में
जाना जा सकता है जब आक्रांता, आप्रवासित और धर्मांतरित मुसलमानों का स्थानीय
सामाजिक ताने बाने के साथ एक सहज साहचर्य स्थापित हो चुका था. तुर्की, अरबी, और
फारसी भाषा के आधार पर राजकाजीय क्षेत्र में एक ऐसी भाषा विकसित हो चुकी थी जिसे
हिन्दू और मुसलमान अपनी साझी विरासत कह सकते थे. वर्गीय-विभाजन का आधार धर्म की
जगह आर्थिक और सामाजिक हैसियत थी. पहनावा-ओढावा, रीति-रिवाज, पसन्द-नापसन्दगी,
लोकाचार, विश्वास-अन्धविश्वास, जैसी तमाम चीजें साझी हो चुकी थी. इस काल की ऐसी
सामाजिक सांस्कृतिक छवि का अंकण तमाम तरह के प्राथमिक स्रोतों से लिया गया है. ऐसे
चित्रांकण को किसी भी लिहाज से गलत कहना अनुचित होगा.
दूसरी ओर पर्सीवल स्पीयर और द्वारा पाकिस्तान की स्थापना का इतिहास
भारत में इस्लामी काल के आरम्भ से शुरू करने के पीछे एक सहज अवधारणा रही है, कि,
इस देश में हिन्दू और मुस्लिम सामाजिक-सांस्कृतिक धारा हमेशा एक दूसरे के समांतर
बनी रही. इस्लामी शासकों ने लगातार अपनी शक्ति और क्षमता को सशक्त बनाये रखने के
लिये शासन-प्रशासन में मुसलमानों को वरीयता दी. यहाँ तक, कि, इस बात पर विशेष रूप
से जोड़ दिया गया है कि सैनिक और प्रशासन के उच्च पदों पर बाहरी मुसलमानों को
प्रमुखता दी जाती थी. कुछ अपवादों को छोड़कर, हिन्दू-तत्वों पर बहुत ज्यादा विश्वास
और निर्भरता नहीं दिखाई देती. सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में आदान-प्रदान उच्च
वर्गीय लोगों के एक सीमित पॉकेट, दरबारों के आस-पास, तक सीमित रही. विभिन्न शासकों
के समय बार-बार देखा गया, कि, कट्टर-उलेमा अपनी धार्मिक-नीतियों को ऊपर रखने में
कामयाब होते थे. मुसलमान शासकों की स्थिति अर्ध-स्थायित्व से जूझता रहता था.
ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों और सामंतों के बीच तनाव और संघर्ष हमेशा कायम रहता
था. युग की सोच के अनुकूल ऐसे तनाव और संघर्ष का रंग हर बार धार्मिक पूर्वग्रह में
सना हुआ दिखता है. सामाजार्थिक और धार्मिक तनाव के बीच अंतर कर पाना इस युग में
सम्भव नहीं था. लगान की वसूली के लिये
अभियान का धार्मिक-अभियान में बदल जाना, अस्थिर सशस्त्र समुदायों के खिलाफ सैनिक
अभियानों का साम्प्रदायिक रंग में रंगा होना, युगोनुकूल ही था. कुल मिलाकर,
सामाजिक-सांस्कृतिक पटल की गुलाबी तस्वीर काफी धुँधली नजर आती है. इसी धुँधली
तस्वीर को लेकर जब अंग्रेजी शासन के परिप्रेक्ष्य में. जो कि, आधुनिक दृष्टि की
रोशनी में था, देखने पर उस वक्त की हिन्दू-मुस्लिम सामाजिक सम्बन्धों की तमाम
विषमताएँ और विडम्बनाएँ प्रकट हो जाती हैं. पर्सीवल स्पीयर ने इन्हीं विडम्बनाओं
के आधार पर होने पर साम्प्रदायिक राष्ट्रीय चेतना के विकास को विश्लेषित करने की
कोशिश की है.
पाकिस्तान की सरकारी इतिहास भी पाकिस्तान आन्दोलन को इस्लामी इतिहास
के एक पन्ने के तौर पर देखती है, न कि, भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास के तौर पर. यह
साम्प्रदायिक दृष्टि का एक बेहतरीन उदाहरण है. भारत में साम्प्रदायिक इतिहास में
यकीन करने वालों के लिये पर्सीवल स्पीयर ज्यादा आकर्षक लेखक होंगे. दूसरी तरफ
राजनीतिक दृष्टि से सेकुलर लोगों को विपिन चन्द्र का विश्लेषण ज्यादा अनुकूल
लगेगा. लेकिन, एक सही मायने में ऐतिहासिक दृष्टि-सम्पन्न व्यक्ति इतिहास को किसी
खास परिप्रेक्ष्य में देखने से पहले उसका वस्तुनिष्ठ अवलोकन करना चाहेगा. यह
वस्तुनिष्ठ अवलोकन किसी भी समाज के बौद्धिक मानक को दर्शाता है. पर्सीवल स्पीयर,
विपिन चन्द्र, या पाकिस्तानी राष्ट्रीय दृष्टिकोण को दर्शाता इतिहास लेखन निश्चय
ही अपनी-अपनी अवधारणाओं की पुष्टि के लिये उसी कालखंड से अपने उदाहरण और तथ्य
जुटाते हैं. तथ्यों के चुनाव से कोई परेशानी नहीं होती, बल्कि, एक तथ्य की जगह
दूसरे की अवहेलना से परेशानी होती है. इस लिहाज से हर विश्लेषक और लेखक अपनी
‘सुविधा’ को नहीं छोड़ पाता. और ‘सुविधा’ से तात्पर्य ऐतिहासिक तथ्यों के चुनाव में
दृष्टिकोणों की भूमिका से है. कोई यह दावा नहीं कर सकता, कि, उसका अध्ययन
उद्देश्यहीन है. उद्देश्य ही प्रेरणा है. और कई बार यही उद्देश्य विष्लेषक को एक
तथ्य की जगह दूसरे तथ्य को महत्वपूरण मानने के लिये प्रेरित करता है. इसीलिये,
किसी भी जगह के किसी कालखण्ड पर वस्तुनिष्ठ नजर डालने के लिये किसी एक लेखन
परम्परा से जुड़ना पर्याप्त नहीं है. पर्सीवल स्पीयर आधुनिक भारत में साम्प्रदायिक
राजनीति और उसके पृष्ठभूमि में राष्ट्रवाद की खिचड़ी पकने की कहानी में अंग्रेजों
की भूमिका को निश्चित तौर पर काफी सकारात्मक मानकर चलते हैं. उनके लिये तत्कालीन
भारतीय समाज में अंतर्निहित साम्प्रदायिक, जातीय, वर्गीय खींचतान ही पर्याप्त
आकर्षण रखता है, जिसके परिप्रेक्ष्य में वो पाकिस्तान-आन्दोलन को रेखांकित करते
हैं. इसके विपरीत, कॉंग्रेस की राष्ट्रीय विचारधारा से मेल खाती विपिन चन्द्र जैसे
इतिहास विश्लेषक इस काल-खण्ड के इतिहास में अंग्रेजी शासन की भूमिका को बहुत
ज्यादा महत्व देकर चलते हैं. सामप्रदायिकता और इसके इर्द-गिर्द की राजनीति में
अंग्रेजी सरकार की नीतियों, उसके कार्यान्वयन जैसी बातों को शक्तिशाली अवयवय के
रूप में लेकर चलते हैं. एक अध्येता के लिये दोनों तरह की बातों को जानना जरूरी है.
भारतीय परिप्रेक्ष्य में इतिहास –विश्लेषण की सबसे सशक्त और विज्ञानिक
पद्धति मार्क्सवादी लेखकों के पास माना जा सकता है. इसमें भारतीय मार्क्सवादी
स्कूल ने काफी मूल्यवान योगदान किया है. दुर्भग्यवश, सोवियत संघ के पतन के साथ
मार्क्सवादी इतिहास-लेखन को नये बौद्धिक परिवेष में विकास-विरोधी समझने की एक भूल
की जा रही है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जहाँ एक ओर नये-पूँजीवादियों द्वारा नकारने
की कोशिश हो रही है, तो दूसरी ओर साम्प्रदायिक दृष्टिकोणों द्वारा भी इसे अग्राह्य
समझा जाने लगा है. भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में मार्क्सवादी दृष्टिकोण की एक
स्वशक्त परम्परा धीरे-धीरे कमजोर पडती दिख रही है. भारत्त और इस्लाम के बीच लम्बे
साहचर्य को समझने के लिये, भारतीय उप-महाद्वीप में बहुपंथीय समाज के विकास और उसकी
अन्योन्याश्रयी सम्बन्धों को समझने, और भविष्य में दिशा तलाशने के क्षेत्र में
मार्क्सवादी इतिहास-विश्लेषण और लेखन का महान योगदान को भुलाने की कोशिश की जा रही
है. साम्प्रदायिक राजनीतिक और नव-पूँजीवादी विकासवादियों के मजबूत होते गठबन्धन
द्वारा मार्क्सवादी इतिहास लेखन को दर-किनार करना स्वाभाविक है. जब हर प्रकार की
दकियानूसी अवधारणाओं को सम्मानजनक स्थान देने के दावे के बीच एक स्वस्थ
सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक समाज की अवधारणा को लोगों के मन-मस्तिष्क से दूर
किया जा रहा है, ऐसे में, उपमहाद्वीप के इतिहास को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने की
परम्परा को मजबूत होने देने की बात कोई क्यों करेगा ? .
