Saturday, July 17, 2010
एक प्रतिक्रिया
आज 17 जुलाइ 2010 की दोपहर में लोकसभा टीवी पर बीरभूम से एमपी सुश्री शताब्दि राय से ली जा रही इंटरव्यू देखते वक़्त मैंने कुछ बातों पर गौर किया. पहली बात कि प्रश्न अंग्रेजी में पूछे जाने के बावजूद सुश्री राय हिन्दी में ही जवाब दे रही थीं. अंग्रेजी में शुरू करने के बाद सहज ही हिन्दी में बोलने लगतीं. वो बांग्ला फिल्मों में काम करती रही, बांग्ला परिवेष में पली बढीं हैं, इसके बावजूद हिन्दी में इतनी सहजता देखकर सुखद आश्चर्य होता रहा. इसके विपरीत अगर हम बॉलीवूड के कलाकारों के भाषागत आदतो पर गौर करें तो पायेंगे कि वहाँ वाले हिन्दी में पूछे गये सवालों का जवाब भी अंग्रेजी में ही देते हैं. असल में हमें यह पता ही नहीं चलने देते कि वो हिन्दी जानते भी हैं या नहीं. यहाँ मैं सुश्री शताब्दी राय की भाषाई व्यवहार पर गौर कर रहा था. मुझे स्पष्ट तौर पर लगा कि एक बंगाली अपने स्वाभाविक परिवेष से बाहर जिस माहौल में अपने आपको सबसे सहज पाता है वह हिन्दी ही है. बंगाल में अभी तक पढे-लिखे माहौल में बांग्ला का ही बोलबाला है. अंतर्राज्यीय व्यवहार में रहने वाले बंगालियों के लिये बांग्ला के बाद हिन्दी ही सहज माध्यम होता है. यह बात बंगाल के अन्दर रहनेवाले के लिये भी लागू होता है. अंतर इतना सा है कि कम ही बंगाली इस तथ्य को स्वीकार कर पाते हैं.
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