अर्थवान क्षण
शाम उतरी, झुकी
शीशम के नये पत्तों पर
झुकी-
गुलदाउदी के मुरझाये फूलों पर
अचेतन को छूकर
एक संगीत उभरा---
आम्र मंजरियाँ अलसा गयीं
और शाम
अवश उदास मिली टहनियों से
विदा लेती हुई
अन्धेरा व्यापने लगा
उस अकेली झोपड़ी के पास
अकेला खड़ा मैं
देखता हूँ -
अन्धकार की छाया में
उभरती-डूबती स्मृतियाँ
और सोचता हूँ
उतना नहीं जिया
जितनी उम्र है अपनी ।
रंगों की गन्धों की, आकाश की नीलिमा
ठंडी बयारों की,
कुनमुनायी धूप, और तपती दोपहरी,
चेतना सी उषा ,
और उदासी सी शाम
तुम्हारी गदरायी बाँहों के क्षण
जो गले पड़े
कितनी बार तुम्हारी आँखों को
सपना मैं बना
कितने आँसू मेरे मन में उतरे
तैरे, बहे
उन सबकी स्मृतियाँ, (अनुभूतियों के)
उनके क्षण-पल
उनकी अनुभूतियाँ
कितनी कम हैं ?
तब लगता है-
सभी क्षण बरसों के जिये नहीं गये
जीवित-क्षण थोड़े हैं-गहरे हैं,
भीतर कहीं ठहरे हैं ।
-अशोक "अशु"
